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अध्याय बारह
1 शमूएल 18:10-16

Ron Meyers
10दूसरे दिन परमेश्वर की ओर से एक दुष्ट आत्मा शाऊल पर बल से उतरा, और वह अपने घर के भीतर नबूवत करने लगा; दाऊद प्रतिदिन के समान अपने हाथ से बजा रहा था, और शाऊल अपने हाथ में अपना भाला लिए हुए था; 11तब शाऊल ने यह सोचकर कि “मैं ऐसा मारूँगा कि भाला दाऊद को बेधकर भीत में धँस जाए,” भाले को चलाया, परन्तु दाऊद उसके सामने से दोनों बार हट गया। 12शाऊल दाऊद से डरा करता था, क्योंकि यहोवा दाऊद के साथ था और शाऊल के पास से अलग हो गया था। 13शाऊल ने उसको अपने पास से अलग करके सहस्रपति किया, और वह प्रजा के सामने आया जाया करता था। 14और दाऊद अपनी समस्त चाल में बुद्धिमानी दिखाता था; और यहोवा उसके साथ साथ था। 15जब शाऊल ने देखा कि वह बहुत बुद्धिमान है, तब वह उससे डर गया। 16परन्तु इस्राएल और यहूदा के समस्त लोग दाऊद से प्रेम रखते थे; क्योंकि वह उनके आगे आगे आया जाया करता था।
शाऊल—जो कभी एक जगमगाता हुआ प्रकाश था—का धीरे-धीरे अंधकार में डूबना, और उसके समानांतर ही दाऊद—जो एक नया उगता हुआ तारा है—की चमक का निरंतर और बिना रुकावट के आगे बढ़ना देखना, अत्यंत दुखद है। "अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।" यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला, जो चाहता था कि यीशु सफल हो जाए, द्वारा कहे जाने पर, ये शब्द उसके लिए इतने अच्छे होते, परन्तु ईर्ष्यालु शाऊल के कड़वे मुँह में वे कितने भयानक होते। वास्तविकता के आगे झुकने और दाऊद में परमेश्वर की पसन्द को स्वीकार करने के बजाय, शाऊल के परेशान आत्मा ने उसके विरुद्ध संघर्ष आरम्भ किया, जैसे तूफान की लहरें एक बाँध के विरुद्ध होती हैं। और, उन लहरों की तरह, शाऊल भी व्यर्थ प्रयास के उफान में कांप गया था। विरोध करना और परमेश्वर के विरुद्ध काम करना मुश्किल है।
1. दाऊद को घात करने के लिए आक्रमण 10-11
यह अविश्वनीय है, यदि हम इसे सही ढंग से पढ़ रहे हैं और समझ रहे हैं, तो अगले ही दिन दाऊद को गोलियत को मारते हुए देखने के बाद शाऊल को इतनी जल्दी ईर्ष्या और डाह अर्थात् जलन होती है कि वह दाऊद को मारने का प्रयास कर सकता है। कल ही दाऊद, अब्नेर और दाऊद शाऊल के तम्बू में बातें कर रहे थे। हम उनकी चर्चा की सामग्री नहीं जानते हैं, परन्तु निश्चित रूप से यह उत्सव और हर्ष के साथ चिह्नित किया गया था। एक भयानक शूरवीर दानव, जिसने चालीस दिनों तक इस्राएल की सेना को परेशान किया था, अब मर चुका था। पलिश्ती भाग गए थे। गोलियत को हटाए जाने के अतिरिक्त, कई पलिश्ती भी मारे गए, क्योंकि इस्राएली सेना ने गत और एक्रोन तक उनका पीछा किया था। लौटने पर, इस्राएली सेना ने पलिश्ती शिविर को लूट लिया था। यह एक वैभवशाली, प्रतापी, अद्भुत और संपूर्ण जीत थी। स्त्रियाँ हर्ष से गा रही थीं और गीतों को सुना रहीं थीं।
वचन 10 "दूसरे दिन" से आरम्भ होता है। निश्चित रूप से इस्राएली अपने उत्सव जारी रखे हुए थे। यह संभव नहीं है कि वचन 1-16 में जो कुछ भी वर्णित किया गया है, वह अगले दिन हुआ हो, परन्तु निश्चित रूप से "दूसरे दिन" के संदर्भ का मतलब कुछ महत्वपूर्ण से है। ये घटनाएँ दूसरे दिन से आरम्भ हुईं। शाऊल ने अपना भाला दो बार दाऊद पर फेंका, शाऊल ने दाऊद को 1,000 सैनिकों के साथ सैन्य अभियानों पर भेज दिया। दाऊद को सफलता मिली, शाऊल दाऊद से डरता था, सारा इस्राएल और यहूदा दाऊद से प्रेम करता था। यह सब यहाँ वर्णित है और भले ही यह सब "दूसरे दिन" नहीं हुआ, परन्तु यह दूसरे दिन होने लगा। बाद में इस पाठ के अंत में हम चर्चा करेंगे कि हम जो एक बार करते हैं, वह कैसे एक निरंतर आदत बन सकता है।
इन वचनों से पता चलता है कि शाऊल ने जिस मनोदशा से दाऊद की ओर देखा, वह आश्चर्यजनक रूप से शीघ्रता के साथ और जानलेवा कार्यवाही को देखना था। शाऊल इस बात का एक भयानक उदाहरण है कि कैसे सन्देह और ईर्ष्या, बिना आत्म-नियंत्रण के काम करना, हमें चरम सीमा तक ले जाता है। जब तक दाऊद उसके दरबार में इस्राएल के लोगों से छिपा हुआ था और देश की स्त्रियाँ उसकी प्रशंसा में नहीं गा रही थीं, तब तक शाऊल को दाऊद से कोई समस्या नहीं थी। दाऊद शाऊल के लिए कोई खतरा नहीं था, जब कोई भी शाऊल और दाऊद की तुलना दाऊद के अधिक अनुकूल चित्रण के साथ नहीं कर रहा था। शाऊल दाऊद को पसन्द करता था और उसने यिशै से दाऊद को रहने देने के लिए कहा। जब दाऊद ने शाऊल को पीछे छोड़ दिया, तभी दाऊद के लिए एक समस्या बन गया। स्पष्ट रूप से समस्या दाऊद में नहीं, बल्कि शाऊल में थी।
हमें इस सच्चाई से इतना हैरान नहीं होना चाहिए कि शाऊल ने अपने पापपूर्ण वासनाओं और कार्यों के बवंडर से स्वयं उस दुष्ट आत्मा के लिए काम करने के लिए स्थान तैयार किया था। शाऊल ने इसे अपने ऊपर लिया; परिणाम 'स्वाभाविक' थे। स्पष्ट तौर पर, शाऊल की घृणा जान-बूझकर थी—यह निर्दोष मन वाली स्वाभाविक नहीं, जैसी कि हम आशा कर सकते हैं। "यह सोचकर कि "मैं ऐसा मारूँगा कि भाला दाऊद को बेधकर भीत में धँस जाए, "भाले को चलाया" (वचन 11)। यह एक सहज विचार से भी बदतर था। कोई भी व्यक्ति जो अपने नीच स्वभाव को पूरे जोरों पर चलने देता है, वह शैतान को आमंत्रित करता है। वचन 10 में कहा गया है, "दूसरे दिन परमेश्वर की ओर से एक दुष्ट आत्मा शाऊल पर बल से उतरा।" यह कहानी इस भयानक सत्य को प्रमाणित करती है कि यदि हम उन्हें अपने जीवन में आने दें, तो दुष्ट आत्माओं की हम पर बहुत बड़ी शक्ति होती है। वचन 10 शाऊल के बारे में भी कहता है कि, "वह अपने घर के भीतर नबूवत करने लगा।" मुझे आश्चर्य है कि यह किस तरह की "भविष्यद्वाणी" रही होगी। बाइबल इसे नहीं बताती है।
शाऊल, पूरे आवेश में घिरा हुआ और अनियंत्रित आवेगों से बह गया, भद्दे संकेतों के साथ ‘भविष्यद्वाणी’ या ‘बड़बड़ा’ रहा था और उससे भी ज्यादा अजीब तरह की आवाजें निकाल रहा था—जबकि दाऊद इसके बिल्कुल विपरीत था; दाऊद युवा और शांत था, अपने वाद्य-यंत्र पर मधुर धुनें छेड़ रहा था और अपने होठों से ऐसे गीत गा रहा था, जिनका उद्देश्य शाऊल के क्रोध के आवेगों को शांत करना था।
युवा वीणा वादक ने बचने की कोशिश नहीं की होती, यदि शाऊल केवल अपना भाला हिला रहा होता। एक व्यक्ति, उग्र पागल और आवेग से भरे शत्रुता के साथ, केवल कोरी धमकियों के साथ किसी को घात करने की संभावना नहीं रखेगा। दाऊद के प्राण लेने का प्रयास वास्तविक था। यह एक गंभीर बात थी, और एक हाथ से फेंका गया भाला, उसकी पागलों की तरह की जाने वाली घृणा से कहीं अधिक मजबूत हो गया था, उस फुर्तीले वीणा वादक के बहुत निकट दीवार में घुस गया, जो फुर्ती से बच गया था। ईर्ष्या, जिसे जब अपने तरीके से चलने दिया जाता है, जानलेवा हो जाती है। आइए हम इसके आरम्भ को रोकें। एक बाघ के पिल्ले को मनुष्य की हाथों में रखा जा सकता है और उसके पंजे काटे जा सकते हैं, परन्तु एक पूर्ण विकसित बाघ के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता है।
दाऊद ने हाल ही में शाऊल से भी बड़े एक शूरवीर दानव को मार डाला था; उसे वहाँ से भागना नहीं पड़ा। परन्तु उसने शाऊल के पास से भाग जाने से पहले उसी अद्भुत चरित्र दिखाया, जैसा उसने गोलियत की ओर भागने में दिखाया था; वह परमेश्वर के शत्रु से नहीं डरता था, बल्कि परमेश्वर के अभिषिक्त शाऊल के साथ युद्ध नहीं करना चाहता था, बल्कि उसने उसे सम्मानित किया।
2. शाऊल ने दाऊद को सामने से निकाल दिया 12-16
वचन 12 और 15 दोनों में कहा गया है कि शाऊल दाऊद से "डरता" था। हालाँकि, वचन 15 में इसकी अभिव्यक्ति बहुत अधिक मजबूती से दिखाई देती है। शाऊल के पास डरने का कोई कारण नहीं था। उसकी मानसिक पीड़ा ने उसे दु:खी कर दिया था। यह एक शक्तिशाली व्यक्ति पर धीरे-धीरे से रेंगने वाले किसी अनाम आतंक की दयनीय दृश्य है। ठंडे भय की लगातार गाढ़ी होती परतें—किसी भीगी हुई धुंध की तरह—उस आत्मा को लपेट लेती हैं, जो कभी उज्ज्वल और ऊर्जावान थी। इसके लिए मुझे दो संभावित कारण दिखाई देते हैंः पहला, परमेश्वर ने उस ऊर्जा से भरी हुई, विद्रोही आत्मा को छोड़ दिया था, क्योंकि उसने उसे छोड़ दिया था या फिर, दूसरा कारण, उसने अपने एकान्त वाले अकेलेपन में,—जहाँ नम्रता या पश्चाताप का कोई नामो-निशान न था—कभी प्रबुद्ध रहे इस जन ने यह जान लिया था कि जिस सूर्य-के-प्रकाश को उसने ठुकरा दिया था, वह अब दाऊद के पर बरस रहा था।
शाऊल के सन्देह निश्चितता में कठोर हो गए थे। उसे निश्चय था कि जब स्त्रियाँ अपने गीतों को गा रही थीं, तो उसकी ईर्ष्या ने जिन बातों को फुसफुसाया था, वह अब गंभीर तथ्य थीं। वह असहाय होकर मनुष्यों और परमेश्वर के पक्ष में अपने उत्तराधिकारी की निरंतर होती प्रगति को देख सकता था। शाऊल में गहरे होते हुए अंधेरे और दाऊद में चढ़ते हुए प्रकाश की दो प्रक्रियाएँ दोनों लोगों में साथ-साथ चलती हैं, और प्रत्येक विपरीत रूप से दूसरे को और अधिक आकर्षक बनाती है। दो बार कहा गया है कि शाऊल दाऊद से डरता था। दो बार यह कहा गया है कि यहोवा दाऊद के साथ था और वह "बुद्धिमानी दिखाता था।" अन्तिम कथन में इब्रानी शब्द में विवेक और सफलता का विचार भी शामिल है। तो, एक ओर तो, सभी अच्छे, ईश्वरीय और सुखद गुणों और अनुभवों में एक स्थिर वृद्धि होती है; और वहीं दूसरी ओर, अंधेरे, उदासी, ईश्वर के बिना और निराशा की एक दु:खद वृद्धि होती है। निश्चय ही यह प्रकाशितवाक्य 22:11 में जो कहा गया है कि वह सारी पृथ्वी पर घटित होगा, उसका एक चित्र है। जिस दिशा की ओर कोई भी आगे बढ़ रहा है, उसके उस दिशा में जाने की संभावना है, जिसका वह अनुसरण करता रहता है। आइए हम अपने निर्देशों को ध्यान से चुनना सीखें, क्योंकि प्रकाशितवाक्य 22:11 में सच्चाई दी गई हैः "जो अन्याय करता है, वह अन्याय ही करता रहे; और जो मलिन है, वह मलिन बना रहे; और जो धर्मी है, वह धर्मी बना रहे; और जो पवित्र है; वह पवित्र बना रहे।"
शाऊल की योजना उल्टी पड़ गई। दाऊद को उसके पास से भेजकर, शाऊल ने अनजाने में दाऊद को फिर से राष्ट्र की सेवा करने का अवसर प्रदान किया। दाऊद को एक बार फिर राजा के दरबार में दिए गए "पद से नीचे उतार" दिया जाता है, परन्तु वह उसकी सेवा इतनी अच्छी तरह से करता है कि पद नहीं, बल्कि सेवा करने से उसे बढ़ावा मिलता है। इसका परिणाम यह हुआ "...परन्तु इस्राएल और यहूदा के समस्त लोग दाऊद से प्रेम रखते थे; क्योंकि वह उनके आगे आगे आया जाया करता था" (वचन 16)।
शाऊल के आंतरिक जीवन में पाप का इतिहास यह दर्शाता है कि एक बार जब पाप ने उसके हृदय में अपनी जड़ें जमा लीं और उस पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया, तो उसके बाद बुराई में निरंतर और तीव्र गति से वृद्धि हुई। जब कोई व्यक्ति एक बार बुरे व्यवहार के आगे झुक जाता है, तो वह अधिक से अधिक उसकी शक्ति में आ जाता है, और अंत में पूरी तरह से उसके द्वारा शासित होता है, और, और भी अधिक हिंसक रूप से पाप से पाप की ओर प्रेरित होता रहता है। जो पाप करता है, वह पाप का दास है।
दूसरी ओर, इसके ठीक विपरीत, जैसे-जैसे शाऊल और दाऊद की कहानी आगे बढ़ेगी, हम देखेंगे कि शाऊल की क्रूरताओं के कारण दाऊद ने जिन कष्टों का अनुभव किया, वे उसे आँतरिक और बाहरी विकास के व्यापक और उच्च अनुभव प्रदान करती हैं और परमेश्वर के राज्य के लिए उसे सौंपे गए बड़े कार्यों को प्रदान करती हैं। दाऊद की तरह हम जितनी अधिक स्वेच्छा से दुःख और संघर्ष के पाठशाला में प्रवेश करेंगे, उतनी ही अधिक हम विनम्रता, आज्ञाकारिता और परमेश्वर की इच्छा के प्रति सन्तान की तरह समर्पण में बढ़ेंगे और उतना ही अधिक हम इस सत्य को सीखेंगे कि परमेश्वर विनम्र लोगों पर कृपा करता है और सीधे लोगों के लिए मार्ग को सुगम बनाता है।
बुराई की ओर शाऊल के पीछे हटने और धार्मिकता में दाऊद की प्रगति दोनों में, बाइबल जीवन के नैतिक मुद्दों में कभी भी एक तटस्थ स्थिति का खुलासा नहीं करती है। यह सदैव पराक्रमी व्यक्ति को "या तो यह या वह" वाली स्थिति में रखती है। मनुष्य को यह तय करना है कि क्या वह आगे बढ़ेगा, या परमेश्वर की इच्छा के प्रति विनम्र आज्ञाकारिता में अपनी इच्छा का त्याग करेगा, या फिर उस अजेय पतन के साथ पीछे की ओर चलेगा, जो सदैव तब होता है, जब मनुष्य परमेश्वर के मार्गदर्शक वाले हाथ का विरोध करता है - जो स्वयं पर ही विपत्ति ले आता है।
फिर भी शाऊल ने कई वर्ष पहले ही अच्छा आरम्भ किया था! शाऊल शायद वही था, जो अभी दाऊद था - परमेश्वर की संगति से धन्य, समृद्ध और अपने लोगों का नायक। इस अध्याय के आरम्भ में दिए गए वचनों में दो जन एक ही मंच पर एक पल के लिए साथ-साथ खड़े हैं। यहाँ से उनके बीच में होने वाली घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं, जबकि दूसरा लगातार डूबता चला जाता है। दोनों दिशाओं में प्रगति की अंतहीन संभावनाएँ कितनी भयानक हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए खुली हुई हैं - जिनके बीच हम स्वयं चुनते हैं? आइए इस महत्वपूर्ण मुद्दे के बारे में कुछ और सोचें, जो दाऊद द्वारा गोलियत को मारने के ठीक बाद शाऊल द्वारा आरम्भ की गई कहानी से उठाई गईं हैं।
3. अपनी पसन्द की दिशा में प्रगति करें।
हम जो भी कार्यवाही चुनते हैं, हम पहचाने जाने योग्य चरणों की एक श्रृँखला के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। प्रत्येक चरण में दिशा बदलना अधिक कठिन हो जाता है। शाऊल कई वर्षों तक उस दिशा में चलता रहा, जिस दिशा में उसने उन वचनों में आरम्भ किया था, जिन्हें हम अब देख रहे हैं। आखिरकार वह अपने लक्ष्यों की खोज में इतना कठोर या दृढ़ हो गया कि भले ही दाऊद ने दो बार स्पष्ट रूप से और शाऊल के किसी भी दबाव के बिना शाऊल के प्राण बचाए थे, जबकि वह आसानी से शाऊल को घात कर सकता था। बाद में इस श्रृँखला में हम उन दो अवसरों की जाँच करेंगे, जब शाऊल को कुछ समय के लिए पश्चाताप हुआ, फिर भी उसने दाऊद का विरोध करना जारी रखा। ऐसा लगता है कि वह दिशा नहीं बदल सकता था। वह बहुत दूर चला गया था। अब, यहाँ, जब शाऊल दाऊद का विरोध करने की गलती करने लगा है, तो यह दिशा बदलने का समय होता।
हम पहले कुछ कल्पना करते हैं। शाऊल, जैसा कि वचन 11 में वर्णित है, "...तब शाऊल ने यह सोचकर कि मैं ऐसा मारूँगा कि भाला दाऊद को बेधकर भीत में धँस जाए।" उसने अभी तक ऐसा नहीं किया था, परन्तु इसके बारे में सोच रहा था। तब दिशा बदलना बहुत आसान होता। इसके बाद हम वही करते हैं, जिसकी हमने कल्पना की थी। शाऊल के विषय में अगले ही दिन वह वही करने लगा, जिसकी उसने कल्पना की थी। अब जिसकी उन्होंने पहले केवल कल्पना की थी, वह एक बार नहीं, बल्कि दो बार एक अनुभव बन गया है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कोई भी अनुभव एक मिसाल बन जाता है। वह काम हो चुका होता है। एक ढाँचा बन जाता है—भले ही वह पूरी तरह से तय न हुआ हो। जब कोई मिसाल स्थिर हो जाती है, और यदि उसे नकारा न जाए, बल्कि दोहराया जाए, तो वह एक पद्धति बन जाती है। और यदि उस पद्धति पर दोबारा विचार न किया जाए, उसका मूल्यांकन न किया जाए, और कोई अच्छा विकल्प न ढूँढ़ा जाए, तो वह एक आदत बन जाती है। (आदतें अच्छी या बुरी हो सकती हैं। मैं सत्रह अच्छी आदतों के बारे में बताता हूँ, और मसीही इसे मेरी पुस्तक, "अत्याधिक प्रभावीशाली मसीहियों की आदतें" में पढ़ सकते हैं और इसका आनन्द उठा सकते हैं। बुरी आदतों को छोड़ दिया जाना चाहिए और उनके स्थान पर अच्छी आदतें स्थापित की जानी चाहिए।) जब तक हम इन चरणों से गुजरते हैं, तब तक यह भविष्यद्वाणी की जा सकती है कि कोई क्या करेगा। जो पहले कल्पना की गई थी, वह केवल एक अनुभव बन गया और एक मिसाल स्थापित की गई, जिसने एक आदत के रूप में विचार और व्यवहार की एक पद्धति को और तय किया; अर्थात् एक जीवन शैली को। शाऊल इन चरणों से गुजरा और यह दाऊद द्वारा गोलियत को मारने के तुरन्त बाद इसका आरम्भ हुआ, जब शाऊल ने गाने वाली और नृत्य करने वाली इस्राएली स्त्रियों द्वारा दाऊद के लिए दी गई प्रशंसा पर बुरी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
क्या मैं आपकी सुरक्षा के लिए निम्नलिखित नियम सुझा सकता हूँ? 1. सावधान रहें कि आप क्या सोचते हैं। भले ही यह केवल आपके मन में है और जब तक आप ऐसा नहीं करते हैं, तब तक कोई पाप नहीं है, फिर भी हमें सावधान रहना चाहिए कि हम अपने मन को क्या कल्पना करने देते हैं। संसार में हर अच्छी या बुरी चीज भौतिक वास्तविकता बनने से पहले एक विचार है। सावधान रहें कि आप क्या सोचते हैं। 2. सावधान रहें कि आप क्या कर रहे हैं। भले ही आप इसे केवल एक बार करने का मंशा रखते हैं, एक बार अनुभव होने के बाद और ऐसा करने के बाद (यह एक वास्तविक घटना बन जाती है) और एक नई पद्धति भी स्थापित हो है। 3. सावधान रहें कि आप क्या दोहराते हैं। यदि आप अपने अनुभव को एक पद्धति नहीं बनने देने के अपने दृढ़ संकल्प में बहुत सावधान, समझदार और लचीला नहीं हैं, तो यह बन जाएगी।
यदि, संभावना है कि आप पहले से ही उन सभी चरणों से गुजर चुके हैं, जिन्हें हमने यहाँ देखा है और स्वयं को असहाय और निराशाजनक रूप से एक पद्धति में फंसते हुए पाते हैं, जिसे आप जानते हैं कि आपके लिए अच्छी नहीं है, तो बाइबल हमें एक और अवसर देती है। रोमियों की पुस्तक के अनुसार पवित्र आत्मा के लिए हमारे मन को नवीनीकृत करना संभव है। जबकि मैंने इस शिक्षा में मसीही अगुवों, वर्तमान और भविष्य की सहायता करने पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की है, न कि बुरी पद्धति स्थापित करने के लिए, मैं आपको विफल कर दूँगा, यदि मैं इसे एक समृद्ध जीवन में पवित्र आत्मा के अद्भुत और दयालु कार्य के साथ साझा नहीं करता, तो परिवर्तन संभव है। रोमियों 12:2 कहता है, "इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।" परमेश्वर हमारे मन को नया बना सकता है। वह हमारी सहायता करने के लिए तैयार है, ताकि हम एक सकारात्मक, प्रोत्साहित करने वाले मार्गदर्शक बन सकें, एक ऐसे अगुवे, जो लोगों का निर्माण करता है, न कि उन्हें नष्ट करता है। आप शाऊल की तरह होने से योनातान की तरह होने में बदल सकते हैं। फिलिप्पियों 2:3 कहता है, "विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।" परन्तु हम पवित्र आत्मा की सहायता के बिना ऐसा नहीं कर सकते हैं। यह शाऊल की सहायता करता, यदि वह जो पौलुस ने गलातियों 5:24 में सिखाया है, उसे प्राप्त करने और उसका अभ्यास कर पाता: "और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।" शाऊल ने ऐसा नहीं किया, परन्तु आप कर सकते हैं।
तो, आपकी पसन्द क्या है? क्या आप ईमानदारी से प्रार्थना करेंगे कि जब आप परमेश्वर की इच्छा के अनुसार मसीही अगुवे बनने की कोशिश करेंगे, तो आप दाऊद के जीवन का अध्ययन करेंगे और उन क्षेत्रों में उसके उदाहरण का अनुसरण करने की कोशिश करेंगे, जिनमें वह अनुकरणीय है? या क्या आप अपनी दृष्टि में बड़े बनने की कोशिश करने के लिए शाऊल के मानवीय और स्वाभाविक झुकाव में आसानी से फिसल जाएँगे और आपके जीवन में प्रवेश करने वाले हर "दाऊद" को आपकी सफलता के लिए खतरा समझेंगे? जैसे-जैसे हम पाठों की इस श्रृँखला के माध्यम से आगे बढ़ेंगे, इन दोनों विकल्पों के बीच का अंतर स्पष्ट और अधिक स्पष्ट होता चला जाएगा।