प्रसिद्धि या ख्याति

चौदहवाँ अध्याय


1 शमूएल 18:20-30

Ron Meyers

20शाऊल की बेटी मीकल दाऊद से प्रीति रखने लगी; और जब इस बात का समाचार शाऊल को मिला, तब वह प्रसन्न हुआ। 21शाऊल तो सोचता था कि वह उसके लिये फन्दा हो, और पलिश्तियों का हाथ उस पर पड़े। और शाऊल ने दाऊद से कहा, “अब की बार तू अवश्य ही मेरा दामाद हो जाएगा।” 22फिर शाऊल ने अपने कर्मचारियों को आज्ञा दी, “दाऊद से छिपकर ऐसी बातें करो, कि ‘सुन, राजा तुझ से प्रसन्न है, और उसके सब कर्मचारी भी तुझ से प्रेम रखते हैं; इसलिये अब तू राजा का दामाद हो जा’।” 23तब शाऊल के कर्मचारियों ने दाऊद से ऐसी ही बातें कहीं। परन्तु दाऊद ने कहा “मैं तो निर्धन और तुच्छ मनुष्य हूँ, फिर क्या तुम्हारी दृष्‍टि में राजा का दामाद होना छोटी बात है?” 24जब शाऊल के कर्मचारियों ने उसे बताया कि दाऊद ने ऐसी ऐसी बातें कहीं। 25तब शाऊल ने कहा, “तुम दाऊद से यों कहो, ‘राजा कन्या का मोल तो कुछ नहीं चाहता, केवल पलिश्तियों की एक सौ खलड़ियाँ चाहता है, कि वह अपने शत्रुओं से बदला ले’।” शाऊल की योजना यह थी कि पलिश्तियों से दाऊद को मरवा डाले। 26जब उसके कर्मचारियों ने दाऊद को ये बातें बताईं, तब वह राजा का दामाद होने को प्रसन्न हुआ। जब विवाह के कुछ दिन रह गए, 27तब दाऊद अपने जनों को संग लेकर चला, और पलिश्तियों के दो सौ पुरुषों को मारा; तब दाऊद उनकी खलड़ियों को ले आया, और वे राजा को गिन गिन कर दी गईं, इसलिये कि वह राजा का दामाद हो जाए। अत: शाऊल ने अपनी बेटी मीकल का उससे विवाह कर दिया। 28जब शाऊल ने देखा, और निश्‍चय जाना कि यहोवा दाऊद के साथ है, और मेरी बेटी मीकल उस से प्रेम रखती है, 29तब शाऊल दाऊद से और भी डर गया। इसलिये शाऊल सदा के लिये दाऊद का बैरी बन गया। 30फिर पलिश्तयों के प्रधान निकल आए, और जब जब वे निकल आए तब तब दाऊद ने शाऊल के अन्य सब कर्मचारियों से अधिक बुद्धिमानी दिखाई; इससे उसका नाम बहुत बड़ा हो गया।


तीसरा प्राणघातक प्रयास 20-25

दाऊद के लिए शाऊल का दामाद बनने का एक और अवसर आया। मीकल के दाऊद से प्रेम करने का मतलब यह नहीं है कि मेरब उससे प्रेम नहीं करती थी और इसलिए उसे नहीं दिया गया था। इसका कारण नहीं बताया गया है - स्पष्ट है कि शाऊल की इस विषय में कार्यवाही मनमानी थी। शायद लड़ाइयों ने उसका ध्यान भटका दिया हो? "अब की बार तू अवश्य ही मेरा दामाद हो जाएगा" (वचन 21)। पहली बार दाऊद को मेरब दिए जाने की प्रतिज्ञा के आधार पर था—जो बाद में टूट गई थी—और दूसरी बार मीकल के साथ वास्तविक विवाह के द्वारा।


वचन 21 में शाऊल ने गुप्त कारण बताया कि शाऊल क्यों चाहता था कि दाऊद उसका दामाद बने। यह "शाऊल तो सोचता था कि वह उसके लिये फन्दा हो।" इस वाक्याँश से पता चलता है कि शाऊल को आशा थी कि मीकल, दाऊद से अपने विवाह के बाद भी, अपने पति के विरुद्ध अपने पिता के साथ अपने हिस्से के काम को पूरा करेगी और शाऊल को दाऊद को नुकसान पहुँचाने या घात करने का अवसर देगी। शायद शाऊल ने दाऊद के लिए मीकल के प्रेम की शक्ति का गलत आंकलन किया था। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कुछ संकेत मिलते हैं कि मीकल ने दाऊद का बचाव किया था। फिर भी, उसी कहानी में, अन्य संकेत मिलते हैं कि मीकल ने दाऊद के विरुद्ध अपने पिता शाऊल का पक्ष लिया था।


जहाँ तक दाऊद का प्रश्न है, उसके पास स्वयं को और अपनी पारिवारिक विरासत को महत्व देने के लिए उतने ही कारण थे, जितने किसी भी व्यक्ति के पास थे। वह यहूदा के एक प्राचीन और सम्मानित परिवार से था, वह एक सुंदर युवक, एक बड़ा राजनेता और सैनिक था; उसकी उपलब्धियाँ बड़ी थीं, क्योंकि उसने गोलियत का सिर काटा था, योनातान की मित्रता को जीता था और मीकल का मन जीत लिया था। वह स्वयं को जानता था कि इस्राएल के सिंहासन के लिए परमेश्‍वर की ईश्‍वरीय मनसा के कारण उसे ठहराया गया था, और फिर भी जब उसे राजा का दामाद बनने का अवसर दिया गया, तो वह पहली बार विनम्रता से उत्तर देता हैः "मैं क्या हूँ, और मेरा जीवन क्या है, और इस्राएल में मेरे पिता का कुल क्या है, कि मैं राजा का दामाद हो जाऊँ?" (वचन 18) और दूसरी बार भी "मैं तो निर्धन और तुच्छ मनुष्य हूँ, फिर क्या तुम्हारी दृष्‍टि में राजा का दामाद होना छोटी बात है?" (वचन 23)। दोनों बार उसने विनम्रता दिखाई।


शाऊल ने दाऊद को अपनी दूसरी पुत्री मीकल से विवाह करने का विचार आरम्भ किया, जैसा कि वचन 25 में वर्णित है, "तब शाऊल ने कहा, "तुम दाऊद से यों कहो, ‘राजा कन्या का मोल तो कुछ नहीं चाहता, केवल पलिश्तियों की एक सौ खलड़ियाँ (चमड़ी का वह हिस्सा जो अक्सर लिंग के अंत को ढक देता है) चाहता है, कि वह अपने शत्रुओं से बदला ले’, शाऊल की योजना यह थी कि पलिश्तियों से दाऊद को मरवा डाले।"" दाऊद ने दो भागों में उत्तर दिया। वह राजा की पुत्री से विवाह करने के इस तरह के कदम के बड़े महत्व की - अपने और सम्मान के बीच की दूरी का वर्णन करते हुए पुष्टि करता है। और उसने स्वयं को इतना निर्धन घोषित कर दिया कि वह एक राजा की पुत्री के लिए उपयुक्त दुल्हिन की मूल्य नहीं दे सकता है।


उसे उनकी खलड़ियाँ लानी होगी; यह पलिश्तियों के लिए एक उपयुक्त और धार्मिकता से भरा तिरस्कार और अपमान होगा, जो खतना से घृणा करते थे, क्योंकि यह इस्राएलियों के परमेश्‍वर का एक नियम था; और शायद शाऊल ने सोचा था कि ऐसा करने से दाऊद के विरुद्ध उनकी घृणा बढ़ेगी - वे उसके विरुद्ध बदला लेने की कोशिश करेंगे। शाऊल यही तो चाहता था। हो सकता है कि दाऊद को उन दो सौ लोगों की खलड़ियाँ पाने के लिए उन्हें घात करने की आवश्यकता पड़ी हो। "शाऊल की योजना यह थी कि पलिश्तियों से दाऊद को मरवा डाले" (वचन 25)।


"अब की बार तू अवश्य ही मेरा दामाद हो जाएगा" (वचन 21)। परन्तु शाऊल अपने मन में दाऊद से घृणा करता था। वे ईर्ष्यालु हृदय में घृणा को छिपाने वाले मधुर शब्द थे। शाऊल पहले से ही स्थापित विश्‍वासघाती विचारधारा में घिरा हुआ था, जब उसने दाऊद को मेरब को उसकी पत्नी होने के लिए अस्वीकार कर दिया था, भले ही उसने उससे इसकी प्रतिज्ञा की थी।


राजा के दामाद बनने पर दाऊद को दूसरी बार पेशकश की गई, उसने हर संभव विनम्रता और नम्रता के साथ उत्तर दिया। एक मुकुट पाए हुए राजा होने के नाते, वह पूरे सम्मान के साथ शाऊल और शाही परिवार के बारे में भी बात करता है। नया नियम हमें उन लोगों को सम्मान देना सिखाता है, जिन्हें सम्मान दिया जाना चाहिए। दाऊद ने ऐसा उस समय से पहले किया, जब पौलुस ने इसे सिखाया था।


नम्रता और हियाव के माध्यम से दाऊद की सफलता 26-30

इसके विपरीत जो होना चाहिए था, दाऊद ने अपनी सफलता और बुद्धिमान से भरे व्यवहार के कारण शाऊल की दुर्भावना प्राप्त की। फिर भी, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने एक बहुत बड़ा प्रतिफल भी प्राप्त किया, परमेश्‍वर का अनुग्रह। भजन संहिता 101:2 में दाऊद कहता है, "मैं बुद्धिमानी से खरे मार्ग में चलूँगा। तू मेरे पास कब आएगा? मैं अपने घर में मन की खराई के साथ चलूँगा।" अपने जीवन की इस अवधि के दौरान उसका व्यवहार अच्छी तरह से दर्शाता है कि दाऊद का यह कहने का क्या मतलब था कि वह निर्दोष होगा और उसका मन खरा होगा। परमेश्‍वर ने निश्‍चित रूप से उसकी प्रार्थना का उत्तर दिया था – घटना बार-बार बताती है कि परमेश्‍वर उसके साथ था।


भले ही परमेश्‍वर ने हमें धीरे-धीरे या तेजी से आगे बढ़ाया हो, आइए हम सदैव अपने बारे में कम सोचें। जो स्वयं को दीन करता है, वह ऊँचा किया जाएगा। यदि दाऊद ने राजा के लिए दामाद होने के सम्मान को बढ़ाया, तो हमें राजाओं के राजा के लिए अपने पुत्र या पुत्री होने के सम्मान को और कितना बढ़ाना चाहिए?


दाऊद ने पलिश्तियों की 100 खलड़ियाँ लेने के शाऊल के प्रस्ताव का सम्मानपूर्वक उत्तर दिया - उसने इसे दोगुना कर दिया। इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि दाऊद ने इस मात्रा को दोगुना क्यों किया, परन्तु हम अनुमान लगा सकते हैं कि यह उसकी सैन्य क्षमता या ऐसा कुछ करने पर जोर देने के लिए था। ऐसा लगता है कि दाऊद एक हियाव से भरा हुआ सैनिक और सच्चा प्रेमी था, परन्तु दूसरी ओर, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मीकल को उसके लिए क्या डर था - यदि दाऊद के लिए उसका प्रेम सच्चा होता?


शाऊल को जो भी आशा थी, दाऊद को पलिश्तियों के हाथों मरने का डर नहीं था, हालाँकि इस तरह के कार्य से उसे स्वयं को खतरे में डालना होगा।


मूसा की व्यवस्था में प्रावधान किया गया था कि लोगों को अपने विवाह के पहले वर्ष युद्ध में जाने की आवश्यकता नहीं थी। "जिस पुरुष का हाल ही में विवाह हुआ हो, वह सेना के साथ न जाए और न किसी काम का भार उस पर डाला जाए; वह वर्ष भर अपने घर में स्वतंत्रता से रहकर अपनी ब्याही हुई स्त्री को प्रसन्न करता रहे" (व्यवस्थाविवरण 24:5) परन्तु दाऊद अपने देश से प्रेम करता था और अपने सैन्य पेशे को इतनी गंभीरता से लेता था कि वह इस अधिकार का दावा नहीं करता था।


हम मान सकते हैं कि दाऊद ने उदार सिद्धान्तों और सम्मानजनक चरित्र से काम किया, परन्तु यह प्रश्न उठाता हैः क्या परमेश्‍वर ने हमारी भलाई के लिए जो प्रबंध किए हैं, उन्हें अस्वीकार करना सही है? परमेश्‍वर नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देना चाहता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्‍वर हमें हर सप्ताह विश्राम का एक दिन देता है। क्या हम परमेश्‍वर की इच्छा से अधिक काम करके अपने विशेषाधिकारों के नीचे रहते हैं?


शाऊल ने अपनी पुत्री को उसके लिए एक फन्दे के रूप में दिया, परन्तु यह दाऊद के लिए एक लाभ की बात ठहरी, क्योंकि शाऊल का दामाद होने के कारण उसे मुकुट प्राप्त करना अधिक स्वाभाविक लग रहा था। विवाह ने न केवल नए राजा के रूप में शाऊल के उत्तराधिकारी होने को अधिक स्वाभाविक बना दिया, बल्कि अनुभव के माध्यम से शासन के लिए व्यावहारिक तैयारी के लिए अधिक अनुभव भी प्रदान किया।


शाऊल ने सोचा कि पलिश्तियों के साथ एक खतरनाक लड़ाई में दाऊद को भेज कर वह उसे मार सकता है, परन्तु उसी सेवा ने दाऊद की लोकप्रियता को बढ़ाया और उसे स्वाभाविक रूप से अगला राजा बनने में सहायता की। परमेश्‍वर मनुष्यों के क्रोध से उसकी स्तुति करवाता है और उसके द्वारा उसकी दयालुता और उसके अपने लोगों की सेवा की जाती है। "...हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं" (रोमियों 8:28)।


कहानी से पता चलता है कि न केवल परमेश्‍वर दाऊद के साथ था, बल्कि शाऊल भी यह जानता था। पहले योनातान का प्रेम और अब दाऊद के लिए मीकल का प्रेम और शाऊल की घृणा (जो स्पष्ट रूप से एक स्थायी स्थिति में बढ़ गई थी) एकदम एक-दूसरे के विपरीत हैं।


दाऊद, जिसके पलिश्तियों के विरुद्ध वैभवशाली कारनामों और राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती हुई सैन्य प्रतिष्ठा ने शाऊल की ईर्ष्या और घृणा को और भी अधिक भड़का दिया, आगे बढ़ा दिया और स्वयं बुद्धिमानी से व्यवहार करता रहा और सफल होता चला गया।


दाऊद की समझदारी को अचानक समृद्धि (प्रसिद्धि का खतरा) के खतरों में तीन तरीकों से दिखाया गया हैः (1) चरवाहे-युवक को राजकुमार की मित्रता, भीड़ के जयकार और गायन, एक सैन्य कमान और राजसी परिवार में प्रवेश करने की संभावना से सम्मानित किया जाता है, परन्तु वह बुद्धिमानी से व्यवहार करता था और अधिक समृद्ध होता है! जो तेजी से चढ़ते हैं, उन्हें अच्छे दिमाग और अच्छे मन की विशेष आवश्यकता होती है।


(2) ईर्ष्यालु प्रतिद्वंद्वियों की साजिशों में - शाऊल और स्पष्ट तौर पर दरबार के अन्य सदस्य - दाऊद क्रोध के भाला और पाखंड की चाल से बचता है।


(3) मेरब के विषय विषय में (19) में तोड़ी गई प्रतिज्ञाओं और मीकल विषय में (25) नई शर्तों द्वारा क्रोध दिलाने वाली स्थितियों में भी प्रतिभाशाली युवा योद्धा और कवि एक बुद्धिमान राजनेता की तरह विवेकपूर्ण रहता है। यह सब कैसे संभव हुआ? वचन 12 को देखें "यहोवा उसके साथ था”  और वचन 14 "यहोवा उसके साथ-साथ था" और वचन 28 "यहोवा दाऊद के साथ था।

परमेश्‍वर के पुरुष हो या स्त्री, यदि परमेश्‍वर आपके साथ है, तो आप भी बार-बार सफल होंगे, तब भी जब आपको विश्‍वासघात और प्रसिद्धि पर विजय प्राप्त करने के लिए कठिन या असंभव पर नेतृत्व वाले कार्य दिए जाते हैं। स्वयं के लिए सम्मानपूर्वक और विनम्रता से आचरण करें, ताकि परमेश्‍वर आपके साथ हो। तब आप उसकी महिमा में सफल होंगे।


सफलता और प्रसिद्धि को विनम्रता से कैसे संभालें

हम सीख रहे हैं कि इस श्रृँखला में कैसे सफल होना है। यदि हम अच्छी तरह से सीखते हैं, तो हम सफल होंगे और यदि हम सफल होते हैं, तो हमें सफलता के अवसरों, चुनौतियों और प्रलोभनों को विनम्रता और शालीनता से संभालने में सक्षम होने की आवश्यकता है। हम इस पाठ को यह सोचकर समाप्त करते हैं कि हम ईश्‍वरीय/मानवीय साझेदारी में केवल मानवीय भागीदार हैं। जब हम देखते हैं कि हमारी सफलता वास्तव में वही है, जिसे परमेश्‍वर हमारे माध्यम से कर रहा है, जिसमें केवल ऐसा लगता है कि हम इसे कर रहे हैं, जो हमें यह महसूस करने में सहायता कर सकता है कि हमारी सफलता वास्तव में परमेश्‍वर की सफलता है।


"हमने जो कुछ किया है उसे तू ही ने हमारे लिये किया है" (यशायाह 26:12)। परमेश्‍वर के साथ साझेदारी अद्भुत है। वह हमारे व्यक्तित्वों, शब्दावली और स्वभाव के माध्यम से हमारे मानवीय तत्वों के साथ आलौकिकता के अद्भुत मिश्रण में काम करता है। कभी-कभी हमें यह सोचने के लिए लुभाया जाता है कि हम ही हैं, जो प्रभावी ढंग से उपदेश देते हैं, सिखाते हैं, चँगा करते हैं, सांत्वना देते हैं, सलाह देते हैं और सेवा करते हैं। परन्तु जो कुछ भी हम पूरा करते हुए दिखाई देते हैं, वह वास्तव में परमेश्‍वर करता है।


यहोशू से परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा में भी ऐसा ही विरोधाभास पाया जाता है। "उस वचन के अनुसार जो मैं ने मूसा से कहा, अर्थात् जिस जिस स्थान पर तुम पाँव धरोगे वह सब मैं तुम्हें दे देता हूँ" (यहोशू 1:3)। यहोशू और इस्राएल के लोग उस भूमि पर चले और उसके लिए लड़े, परन्तु यह परमेश्‍वर था, जिसने उन्हें यह दी थी। वे चलते थे और परमेश्‍वर ने एक साथ और उनकी साझेदारी में मानवीय और ईश्‍वरीय तत्वों के पूरी तरह से मिलन के साथ काम किया।


"उसके बाद अहोही दोदै का पुत्र एलीआज़र था। वह उस समय दाऊद के संग के तीनों वीरों में से था, जब कि उन्होंने युद्ध के लिये एकत्रित हुए पलिश्तियों को ललकारा, और इस्राएली पुरुष चले गए थे। वह कमर बाँधकर पलिश्तियों को तब तक मारता रहा जब तक उसका हाथ थक न गया, और तलवार हाथ से चिपट न गई; और उस दिन यहोवा ने बड़ी विजय कराई; और जो लोग उसके पीछे हो लिए वे केवल लूटने ही के लिये उसके पीछे हो लिए" (2 शमूएल 23:9-10)। प्रभु यहोवा ने एलीआज़र के माध्यम से इतना शक्तिशाली काम किया कि यह निर्धारित करना असंभव था कि मानवीय हाथ कहाँ रुका और तलवार कहाँ से आरम्भ हुई। परमेश्‍वर ने मनुष्य के माध्यम से काम किया और परमेश्‍वर ने तलवार के माध्यम से काम किया। तलवार और मनुष्य दोनों का उपयोग परमेश्‍वर ने किया था। एलीआज़र ने ऐसा किया और परमेश्‍वर ने ऐसा किया।


भजन संहिता 44:3 कहता है, "क्योंकि वे न तो अपनी तलवार के बल से इस देश के अधिकारी हुए, और न अपने बाहुबल से; परन्तु तेरे दाहिने हाथ और तेरी भुजा और तेरे प्रसन्न मुख के कारण जयवन्त हुए; क्योंकि तू उनको चाहता था।" यहाँ एक हाथ और भुजा का संदर्भ दिया गया है। क्या यह आपको एलीआज़र के हाथ और तलवार की स्मरण दिलाता है? उन्होंने एक साथ इस तरह से काम किया कि इकाई वह पूरा कर सकी, जो इकाई का कोई भी आधा हिस्सा अकेले नहीं कर सकता था।


यीशु ने हमें सिखाया कि उसके बिना हम कुछ नहीं कर सकते। उसने कहा, "मैं दाखलता हूँ : तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते" (यूहन्ना 15:5) उस डाली के लिए कितना मूर्खतापूर्ण बात है कि वह इस बारे में घमण्ड करे कि उस दाखलता ने उसे क्या करने में सक्षम बनाया। दाखलता और डाली साझेदारी में एक साथ काम करते हैं।


बाद में, पौलुस ने इस अवधारणा को दोहराया है। बाइबल का आज का न्यू इंटरनेशनल अंग्रेजी संस्करण हमें अन्य अनुवादों की तुलना में इसे अधिक स्पष्ट रूप से समझने में सहायता करता हैः "मैं यह सब उसी के द्वारा कर सकता हूँ, जो मुझे बल देता है" (फिलिप्पियों 4:13)। कुछ अनुवाद इस वचन का अनुवाद करते हैं, "मैं सब कुछ कर सकता हूँ” स्पष्ट तौर पर यह दर्शाता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं। परन्तु निश्‍चित रूप से बाइबल सचमुच में ऐसा नहीं सिखाती है। हम उड़ नहीं सकते। न ही एक मसीही सेवक अकेले अपने पूरे जीवनकाल में संसार को बचा सकता है। यह विश्‍वास करना पूरी बाइबल की शिक्षा के साथ अधिक सुसंगत है कि हम जो करते हैं, हम उसकी सामर्थ्य से करते हैं। "हे यहोवा, तू हमारे लिये शान्ति ठहराएगा, हमने जो कुछ किया है उसे तू ही ने हमारे लिये किया है" (यशायाह 26:12)। हम ऐसा करते हैं, परन्तु केवल उसकी सक्षम सामर्थ्य के द्वारा। मनुष्य और परमेश्‍वर एक साथ काम करते हैं। परमेश्‍वर संसाधनों का उपयोग करता है। भविष्यद्वक्ता की आत्मा भविष्यद्वक्ता के अधीन होती है।

दाऊद ने पलिश्तियों से युद्ध किया, परन्तु इस तथ्य के सभी संदर्भों के साथ कि प्रभु यहोवा दाऊद के साथ था, क्या हम विश्‍वास कर सकते हैं कि जीत केवल इसलिए मिली थी, क्योंकि दाऊद एक युद्ध करने वाला योद्धा और सैनिकों का अगुवा था? यदि किसी को यह पता था, तो यह केवल दाऊद को पता था। वह जानता था कि उसने जो किया, वह प्रभु यहोवा की सहायता से किया था। और यदि आप और मैं वास्तव में इस विचार को समझ लें और सदैव स्मरण रखें कि यह परमेश्‍वर है, जो हमारे माध्यम से काम कर रहा है और हमें सफलता दे रहा है, तो हम भी सफल होंगे और परमेश्‍वर की महिमा होगी। हम जानेंगे कि प्रसिद्धि अर्थात् ख्याति को कैसे संभालना है। प्रसिद्धि हमें नियंत्रित नहीं करेगी; बल्कि हम अपने भीतर और अपने माध्यम से परमेश्‍वर की सफलता के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से ध्यान में रखेंगे।