असमान पिता और पुत्र

अध्याय पंद्रह


1 शमूएल 19:1-5

Ron Meyers

1शाऊल ने अपने पुत्र योनातान और अपने सब कर्मचारियों से दाऊद को मार डालने की चर्चा की। परन्तु शाऊल का पुत्र योनातान दाऊद से बहुत प्रसन्न था। 2योनातान ने दाऊद को बताया, “मेरा पिता तुझे मरवा डालना चाहता है; इसलिये तू सबेरे सावधान रहना, और किसी गुप्‍त स्थान में बैठा हुआ छिपा रहना; 3और मैं मैदान में जहाँ तू होगा वहाँ जाकर अपने पिता के पास खड़ा होकर उससे तेरी चर्चा करूँगा; और यदि मुझे कुछ मालूम हो तो तुझे बताऊँगा।” 4योनातान ने अपने पिता शाऊल से दाऊद की प्रशंसा करके उससे कहा, “हे राजा, अपने दास दाऊद का अपराधी न हो; क्योंकि उसने तेरे विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया, वरन् उसके सब काम तेरे बहुत हित के हैं; 5उसने अपने प्राण पर खेलकर उस पलिश्ती को मार डाला, और यहोवा ने समस्त इस्राएलियों की बड़ी जय कराई। इसे देखकर तू आनन्दित हुआ था; और तू दाऊद को अकारण मारकर निर्दोष के खून का पापी क्यों बने?” 


हम एक विकल्प चुन सकते हैं

दाऊद की कहानी पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए शाऊल और योनातान के बीच मिलने वाले बड़े अंतर बहुत ही ज्यादा स्पष्ट हैं, परन्तु हम इससे क्या सीख सकते हैं? हम दाऊद के जीवन और उससे जुड़े लोगों का अध्ययन कर रहे हैं, क्योंकि हम सीखना चाहते हैं कि सर्वोत्तम अगुवा कैसे बनें। हम शाऊल और योनातान के बीच के मतभेदों से क्या सीख सकते हैं, जो हमें परमेश्‍वर के परिवार के सर्वोत्तम अगुवा बनने में सहायता करेंगे? तथ्य यह है कि अंतर दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले दोनों हैं, इसलिए उनकी पूरी तरह से सराहना करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, परन्तु आइए कोशिश करें। हम घृणा, प्रेम, क्रोध, निराशा, आनन्द या संतुष्टि को माप नहीं सकते हैं, फिर भी हम सभी इन शब्दों के बीच बहुत महत्वपूर्ण अंतर जानते हैं। मैं निष्कर्ष निकालता हूँ कि कुछ सत्य हैं, जो बहुत वास्तविक और महत्वपूर्ण हैं, सत्य जो मेरे जीवन को प्रभावित करेंगे, भले ही उन्हें मापा नहीं जा सकता है। भले ही उनकी मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है, फिर भी वे वास्तविक हैं। अपने जीवन के इस चरण में शाऊल बुरा था और योनातान, दाऊद के प्रति अपने निरंतर प्रेमपूर्ण व्यवहार और दृष्टिकोण के प्रति सच्चा, भला, बहुत अच्छा था। मतभेद वास्तविक हैं और वे जो कुछ भी करते हैं, उसे प्रभावित करते हैं। यदि हम अच्छा होना सीख सकते हैं, तो हम अच्छा कर सकते हैं; यदि हम बुरे हैं, तो हम बुरे काम करेंगे। ताकि हम सोच सकें, बोल सकें और अच्छे काम करें, हम दाऊद के सबसे अच्छे मित्र, योनातान के अच्छे चरित्र से सीखने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि हम शाऊल के बुरे नेतृत्व, दृष्टिकोण, शब्दों और व्यवहार से बचना चाहते हैं, हम शाऊल का अध्ययन कर रहे हैं।


शाऊल के जीवन की त्रासदी यह है कि वह सदैव बुरा नहीं था; वह अपने आरम्भ में अच्छा था। वह बदल गया था। लोग बदलाव ला सकते हैं और ऐसा कर सकते हैं। यहाँ हमारे लिए शाऊल के जीवन से सीखने के लिए एक महत्वपूर्ण बात है। जैसे वह अच्छे से बुरे में बदल गया, वैसे ही यदि हम सावधान नहीं हैं, तो हमारे साथ भी ऐसा हो सकता है। केवल इसलिए कि हम सही तरीके से आरम्भ करते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हम सही तरीके से खत्म करेंगे। आइए हम वही अच्छा व्यवहार रखें, जिसे शाऊल ने अपने शासनकाल के आरम्भ में रखा था, परन्तु हम उससे वैसा न बदलें, जैसा उसने किया था। परमेश्‍वर के प्रति सावधानीपूर्वक, लगातार आज्ञाकारिता हमें शाऊल के जीवन में हुए दु:खद परिवर्तनों से बचने में सहायता करेगी।


शाऊल और योनातान की कहानी से सीखने के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण सबक यह है कि चरित्र और व्यक्तिगत गुण पद-स्थिति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। शाऊल एक राजा था, जबकि योनातान केवल एक राजकुमार था, जो कभी राजा नहीं बना। कौन सा हमारे सबसे अच्छे विचारों को सामने लाता है? हम सामान्य रूप से पर किससे घृणा करते हैं? कौन अपने सर्वोत्तम चरित्र के लिए प्रसिद्ध है? हम किसके बारे में पढ़ने का आनन्द लेते हैं? कौन सा बुरे व्यवहार को लेकर प्रसिद्ध था? जब भी हम उसके और दाऊद के साथ उसके बुरे व्यवहार के बारे में पढ़ते हैं, तो हम किसके डर और पछतावे से काँप उठते हैं? इन दोनों में से किसके पास उच्च पद था? शाऊल। संसार भर में बाइबल-पढ़ने वाले हर विश्‍वासी को किससे प्रेम है? योनातान से। पदवी या पद-स्थिति के बारे में इतना चिन्तित न हों; अच्छे चरित्र और व्यक्तिगत गुणवत्ता के बारे में चिन्तित रहें।


शाऊल और योनातान के बीच के मतभेदों से हम एक और मूल्यवान सबक सीखते हैं कि हम अपने पिता (या अपने माता-पिता में से किसी एक) के रवैये या व्यवहार को दोहराने के लिए बाध्य नहीं हैं। हमें अपने माता-पिता का सम्मान करने का निर्देश दिया जाता है, परन्तु बाइबल में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि हम उनके रवैये या व्यवहार की नकल करें। यदि हमारे पिता में कुछ ऐसे गुण हैं, जिन्हें हम दोहराना नहीं चाहते हैं, तो हम उनसे बच सकते हैं। यदि उनमें प्रशंसनीय दृष्टिकोण या व्यवहार हैं, तो हम उन्हें चुन सकते हैं और उनकी नकल कर सकते हैं। हम चयनात्मक हो सकते हैं। यदि हमारे पिता में कोई सराहनीय गुण नहीं हैं, तो हम किसी अन्य व्यक्ति के उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं, जिसे हम जानते हैं। एक अच्छा व्यक्ति चुनें और उसके नमूने का पालन करें। हम अपने आदर्श को चुन सकते हैं। हम में से कोई भी बुरे चरित्र के लिए केवल इसलिए क्षमा नहीं किया जा सकता, क्योंकि हमारे पिता का चरित्र बुरा था। योनातान एक ऐसे व्यक्ति का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसने अपने पिता द्वारा गलत किए जाने के बावजूद भी सही किया। योनातान के पास दाऊद से ईर्ष्या करने का एक बहुत बड़ा कारण था; यदि दाऊद राजा बन जाता, तो योनातान अगला राजा नहीं होता। जब शाऊल की मृत्यु हो गई, तो वह अब उसके आस-पास नहीं रहेगा और इससे मृत शाऊल को कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जो राजा था। वह मर चुका होगा। इसलिए भले ही योनातान के पास दाऊद की सफलता से ईर्ष्या करने का कारण था, तौभी उसने ऐसा नहीं किया। उसने मित्रता की और दाऊद की सहायता की। मैं योनातान के उदाहरण का अनुसरण करना चाहता हूँ।


जब हम पिता और पुत्र के बीच के अंतर के बारे में बात करते हैं, तो विचार करने के लिए एक और बहुमूल्य बात दिखाई देती है। हमारे पिताओं ने हमें निराश या शर्मिंदा किया होगा, परन्तु हमारे पास एक और पिता है, जो परिपूर्ण है। हम सभी उन पर घमण्ड कर सकते हैं और उसके उदाहरण का अनुसरण करने का प्रयास कर सकते हैं। मैं अपने पिता की जैसी आँखों चाहता हूँ। अर्थात्, मैं चीजों को उसी तरह देखना चाहता हूँ, जैसे वह करते हैं। कोई नहीं जानता कि परमेश्‍वर की आँखों का रंग क्या है, क्या उसके पास मनुष्यों के जैसे रंग वाली भौतिक आँखें हैं। परन्तु मैं निश्‍चित रूप से उसकी आँखें रखना चाहता हूँ और लोगों में भलाई देखना चाहता हूँ। मैं वास्तव में उन चीजों को देखना और समझना चाहता हूँ, जो सुंदर हैं, ऐसी चीजें, जो परमेश्‍वर की रचनात्मक सामर्थ्य और सुंदरता को प्रकट करती हैं। मैं उन स्थितियों पर करुणा, सहानुभूति, दया और प्रेमपूर्ण विचार के साथ देखना चाहता हूँ और जो लोग चाहने योग्य नहीं होते हैं और परमेश्‍वर ने उनमें जो अच्छा रखा है, मैं उसे देखना चाहते हैं। मैं अपने स्वर्गीय पिता की तरह बनना चाहता हूँ। मैं कभी-कभी उसे अब्बा पिता कहता हूँ और उससे और भी अधिक प्रेम करता हूँ, क्योंकि वह चाहता है कि मैं उसके साथ घनिष्ठता और निकटता में रहूँ। चाहे हमारे सांसारिक या जैविक पिता हमें कितना भी निराश क्यों न करें, हमारा स्वर्गीय पिता कभी नहीं करेगा। आप और मैं दोनों उसके जैसे बनना चाहेंगे।


1 शमूएल 13 और 15 में शाऊल द्वारा परमेश्‍वर की अवज्ञा करने से आरम्भ होकर और फिर बाद में अध्याय 18 में दाऊद की बढ़ती हुई ईर्ष्या से प्रेरित होकर, गोलियत की हत्या के बाद दाऊद से जलन अर्थात् डाह होने के द्वारा, शाऊल का नैतिक पतन वृद्धि करता रहा। इसके साथ-साथ ही, ऐसा लगता है कि दाऊद ने अपने शत्रुतापूर्ण ससुर शाऊल के साथ जिन समस्याओं का अनुभव किया, उनके दबाव में आकर दाऊद का चरित्र भी बदल गया, पर उसके चरित्र में सर्वोत्तम की ओर वृद्धि करने वाला बदलाव आया। शाऊल और दाऊद दोनों अपनी चुनी हुई दिशाओं में चलते रहते हैं। दुर्भाग्य से शाऊल के लिए, यह प्रक्रिया लगभग बारह वर्षों तक चलती रही, जब तक कि अंततः शाऊल मर नहीं गया और दाऊद, जो परमेश्‍वर के प्रति विश्‍वास और प्रेम में बढ़ रहा है, राजा बन गया। अध्याय 18 से अध्याय 31 तक, 1 शमूएल इन दो विपरीत घटनाओं के नाटक का वर्णन करता है। कोई बीच का आधार नहीं मिलता है; हम या तो सुधार करते हैं या पीछे हटते हैं। समझदारी से चुनें। अपने और अपने आस-पास के लोगों के बीच के संबंधों पर ध्यान दें। आपके जीवन में दाऊद, शाऊल या योनातान हो सकते हैं और हम इस कहानी से सीख सकते हैं कि प्रतिक्रिया व्यक्त करना सबसे अच्छा कैसे है। आप शायद इसी तरह के विकास को पहचान सकते हैं, और यदि आप ऐसा करते हैं, तो दाऊद के अच्छे, विनम्र विकल्पों का पालन करें, जब तक कि इसमें बतशेबा घटना को शामिल न किया जाए!


दाऊद को मारने की धोखेबाजी से भरी योजना की विफलता को स्वीकार करना 1अ

समय अक्सर बाइबल में वचनों या अध्यायों के बीच से गुजरता है। हम नहीं जानते कि पलिश्तियों की तलवारों से दाऊद को मारने की कोशिश करने की शाऊल की नीति के साथ कितने महीने या शायद वर्ष बीत गए। हम केवल यह इतना जानते हैं कि यह नीति विफल रही। दाऊद जीवित रहा। परिणाम को देखते हुए हम अच्छी तरह से अनुमान लगा सकते हैं कि दाऊद ने परमेश्‍वर की आशीषित उपस्थिति का अनुभव करना जारी रखा और शाऊल को समय-समय पर उस प्रभु यहोवा की दुष्ट आत्मा द्वारा सताया जाता रहा, जिसे शाऊल, स्वयं, अपनी अवज्ञा और परमेश्‍वर के विरोध द्वारा अपने ऊपर लाया था।

अपने जीवन के इस हिस्से में शाऊल जितना अनुचित रूप से क्रूर शत्रु कभी नहीं था। पलिश्तियों की तलवारों का उपयोग करके दाऊद को मारने की उसकी गुप्त और विश्‍वासघाती योजनाएँ विफल हो गई थीं और इसलिए वह इससे भी आगे बढ़ गया, क्योंकि उसने स्पष्ट रूप से दाऊद को एक अपराधी घोषित कर दिया था, और राजा के प्रति उसकी विश्‍वासयोग्यता के आधार पर, दाऊद को मारने के लिए उसके ऊपर सभी तरह के आरोप लगाए। यह पर्याप्त नहीं है कि शाऊल दाऊद को मरवाना चाहता है; उसे बलवे को खड़ा करना होगा और दूसरों को बुराई करने के लिए प्रेरित करना होगा, जो बुराई करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। कुछ लोगों के लिए दुष्ट होना ही बहुत ज्यादा नहीं होता है, उन्हें दूसरों को भी दुष्ट बनाना होगा। क्या यह हमारे समूह को सावधानीपूर्वक चुनने का एक अच्छा पर्याप्त कारण नहीं होगा। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और हमारी प्रवृत्तियाँ, दृष्टिकोण और व्यवहार हमारे आसपास के लोगों को प्रभावित करते हैं।


यह अजीब बात है कि शाऊल अपनी घृणा को इतने खुले तौर पर व्यक्त करने में भी शर्मिंदा नहीं था, जबकि वह इसका कोई कारण नहीं बता सका और वह जानता था कि उसके सभी सेवक दाऊद से प्रेम करते थे। उसने कहानी में पहले स्वयं ऐसा कहा था, जब वह दाऊद को अपनी पुत्री मीकल को पत्नी के रूप में पेश करके उसे मारने के लिए अपने दुष्ट जाल में फंसाने की कोशिश कर रहा था। उससे पहले, उसने अपने सेवकों से दाऊद को यह कहने के लिए कहा था, "और उसने अपने सेवकों से कहा, कि वे दाऊद से कहें" (18:22)। अब वह इस घात करने वाले आदेश से उन्हें सतर्क करने के लिए निडर था।


यह भी अजीब बात थी कि वह बहुत अच्छी तरह से जानता था कि योनातान दाऊद से कितना प्रेम करता था, फिर भी वह यह आशा करता है कि वह अपने मित्र को धोखा देगा और दाऊद को मार डालेगा। शायद उसने सोचा था कि योनातान को सिंहासन से उतनी ही चाह होगी, जितनी शाऊल को थी। जो घृणा करते हैं, वे प्रेम करने वालों को नहीं समझते हैं। दयालुता एक रहस्य प्रतीत होता है, जिसे वे समझ नहीं सकते।


योनातान स्वयं को एक सच्चा मित्र प्रमाणित करता है। 1ब-5

शाऊल के विपरीत, योनातान जैसा आश्‍चर्यजनक रूप से दयालु मित्र कभी कोई नहीं हुआ है। योनातान न केवल दाऊद में बहुत प्रसन्न रहता था, हालाँकि दाऊद के वैभव ने उसे ग्रहण कर लिया था, बल्कि उसने दाऊद के लिए दाऊद के मुद्दे को हियाव से शाऊल के सामने भी प्रस्तुत किया था, क्योंकि अब नदी दाऊद के विरुद्ध प्रबलता से बह रही थी।


योनातान को यह नहीं पता था कि हो सकता है कि कुछ सेवक या तो आँखे बंद करके घृणित शाऊल की आज्ञा का पालन करेंगे या स्वयं दाऊद से इतनी ईर्ष्या करेंगे कि वे वही करें, जिसका आदेश शाऊल ने दिया था। स्पष्ट तौर पर योनातान को डर था कि कुछ या सेवकों में से कोई एक वास्तव में दाऊद को घात कर डालेगा। इसलिए योनातान ने कार्यवाही की।


योनातान ने दाऊद को उसके जीवन पर शाऊल की मंशाओं के बारे में सूचित करके और उसे स्वयं को छिपाने की सलाह देकर दाऊद के प्रति अपनी मित्रता दिखाई। योनातान ने दाऊद के लिए एक दृढ़ प्रेम भी दिखाया, जब उसने शाऊल के साथ उसके लिए मध्यस्थता की और शाऊल के क्रोध को दूर करने की कोशिश की। इस बाद के कदम ने बहुत साहस लिया, क्योंकि शाऊल सामान्य तौर पर बुरे मनोभाव में था और दाऊद से घृणा करता था।


इसलिए योनातान ने अपने पिता को शांत करने के लिए समय और परेशानी उठाई और उसे दाऊद के साथ मेल-मिलाप करने की कोशिश की, क्योंकि वचन 4 स्पष्ट करता है, "योनातान ने अपने पिता शाऊल से दाऊद की प्रशंसा करके उससे कहा, "हे राजा, अपने दास दाऊद का अपराधी न हो; क्योंकि उसने तेरे विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया, वरन् उसके सब काम तेरे बहुत हित के हैं।"" अपने आग्रह में उसने समझदारी से दो सार्थक कारकों का उल्लेख कियाः (1.) अच्छी सेवाएँ दाऊद ने जनता के लिए और विशेष रूप से शाऊल के लिए की थी, "उसके सब काम तेरे बहुत हित के हैं" (वचन 4) और (2.) दाऊद की निर्दोषता। "उसने तेरे विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया" (वचन 4)। योनातान अपने परिवार को दोषी नहीं ठहराना चाहता था।


योनातान का उद्देश्य दाऊद को अपने पिता और लोगों के कल्याण के लिए दरबार में रखना था, क्योंकि उसने दाऊद में इस्राएल के कल्याण के लिए प्रभु यहोवा का एक विशेष रूप से चुना गया साधन देखा, जैसा कि उसने वचन 4 में व्यक्त किया था। एक अच्छा व्यक्ति छोटी प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठेगा और सभी की भलाई के लिए काम करेगा। योनातान दाऊद के प्रति विश्‍वासयोग्य था और उसने उसकी रक्षा की, क्योंकि वह जानता था कि दाऊद इस्राएल के लिए अच्छा था। 


अपने पिता को दिए गए योनातान के संबोधन के ज्ञान पर ध्यान दें। उसका पिता उसका पिता था; योनातान मूसा के व्यवस्था से जानता था कि वह अपने पिता का सम्मान करेगा। फिर भी उसका पिता गलत था और योनातान चाहता था कि वह इस्राएल के कारण दाऊद के साथ अपना व्यवहार बदले। योनातान ने शाऊल से जो कुछ कहा, उसमें सम्मान और फटकार के बीच एक संतुलन है। उसने खुले तौर पर और स्पष्ट रूप से अपने पिता को बताया कि यदि वह दाऊद को मार देता है, तो वह कितना बड़ा अपराध करेगा। योनातान का मन ईर्ष्या और डाह से मुक्त है, जबकि उसने अपने पिता को शाही घराने और पूरे राष्ट्र के लिए दाऊद की बड़ी सेवाओं के विषय में स्मरण दिलाया। उसके शब्दों और रवैये ने मुख्य रूप से दृढ़ता और निर्णय को दिखाया, इसके साथ ही निर्दोषता, श्रद्धा और आज्ञाकारिता के मेल में योनातान के होंठों से माता-पिता का आदर करने वाली आज्ञा के अनुरूप एक भी शब्द नहीं निकला। इन सब के अतिरिक्त, उसने अपने उदार आत्म-त्याग का प्रदर्शन किया, क्योंकि उसे नि:सन्देह सन्देह था कि उसका मित्र -वह नहीं - किसी दिन उसके पिता के बाद सिंहासन पर बैठेगा।

योनातान एक ऐसा चरित्र है, जो पुराने नियम के जीवन के मंच पर एक विशिष्ट रूप से बड़ा, सामंजस्यपूर्ण, नैतिक और सहानुभूतिपूर्ण रूप में उभरता है, चाहे हम उसे वीर योद्धा और अगुवा के रूप में, या विश्‍वासयोग्य, आत्म-त्याग करने वाले मित्र के रूप में, या विनम्र, नम्रता से भरे हुए राजकुमार के रूप में मानते हैं। वह हमारे लिए अनुसरण करने की कोशिश करने के लिए एक अच्छा आदर्श है।


अपने पिता और अपने मित्र के बीच शांति लाने के प्रयास में, योनातान अस्थायी रूप से सफल रहा। परन्तु, जीवन के सामने आने वाले घटनाओं में सब कुछ अस्थायी है - सही करने के लिए एक दिन तय करना पर्याप्त नहीं है, हमें सही करना जारी रखने के लिए प्रतिदिन बने रहना चाहिए। योनातान कुछ समय के लिए सफल रहा था, परन्तु शाऊल एक सुसंगत व्यक्ति नहीं था।


आपके बारे में क्या कहा जा सकता है?


आप अपने जीवन में शाऊल जैसे लोगों से मिलेंगे। आप क्या करेंगे?


आपके पास पद होगा और आप अपने जीवन में दाऊद जैसे किसी व्यक्ति से मिलेंगे। आप क्या करेंगे?


आपके ऐसे मित्र होंगे, जिनकी आपके जीवन में आलोचना हो रही है या जिन पर सताव चल रहा है। आप क्या करेंगे?


हम में से प्रत्येक के माता-पिता होते हैं और हम में से कुछ के मित्र, भाई-बहिन, पति-पत्नी, नियोक्ता, कर्मचारी, समूह के सदस्य, मालिक या वे हमारी देखभाल और अधिकार के अधीन लोग होते हैं। आप क्या करेंगे?

आप प्रार्थना कैसे करेंगे?


आप लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेंगे?


आप किस आदर्श का अनुसरण करेंगे? 


परमेश्‍वर ने परमेश्‍वर के पुरुष या स्त्री के रूप में आपके विकास के लिए एक योजना तैयार की है। वह आपके जीवन में उन सभी लोगों को लाता है, जो उसके द्वारा आपके जीवन में होने के लिए अनुमति दिए गए हैं। वह इसे नियंत्रित करता है। प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक वार्तालाप आपके लिए अपने व्यक्तिगत गुणों को दिखाने का अवसर होता है। क्या आप शाऊल की तरह होंगे? क्या आप योनातान की तरह होंगे? क्या आप दाऊद की तरह होंगे? क्या आप मीकल की तरह होंगे, कभी-कभी उस व्यक्ति के पक्ष में और कभी-कभी उसके विरुद्ध, जिसके प्रति आपको विश्‍वासयोग्य रहना चाहिए? क्या आप बरनबास की तरह उत्साह देने वाले होंगे? क्या आप विश्‍वासघाती यहूदा इस्करियोती की तरह होंगे? क्या आप हर विषय में यीशु की तरह एक आदर्श उदाहरण होंगे?


क्या आपको स्मरण होगा कि आपके जीवन में हर मुलाकात एक संभावित सीखने का अनुभव है?


आपने अपनी पाठशाला के शिक्षकों से जीवन के बारे में क्या सीखा? पास्टर? पड़ोसी? भाई? बहिन? पिता? माँ?


आप किस तरह से अपने पिता की तरह बनना चाहते हैं? माँ? भाई? बहिन? पास्टर? पड़ोसी?

स्वयं के लिए प्रत्येक व्यक्तिगत आदर्श चुनने और यह जानने का अवसर है कि आप क्या बनना चाहते हैं और आप किससे बचना चाहते हैं। 

अच्छी तरह से चुनें। परमेश्‍वर चाहता है कि आप एक अच्छे मसीही अगुवे बनें और वह आपको ऐसा बनाने की कोशिश कर रहा है।