सामूहिक हानि

अध्याय इक्कीस


1 शमूएल 20:24-33

Ron Meyers

24इसलिये दाऊद मैदान में जा छिपा; और जब नया चाँद हुआ, तब राजा भोजन करने को बैठा। 25राजा तो पहले के समान अपने उस आसन पर बैठा जो भीत के पास था; और योनातान खड़ा हुआ, और अब्नेर शाऊल के निकट बैठा, परन्तु दाऊद का स्थान खाली रहा। 26उस दिन तो शाऊल यह सोचकर चुप रहा, कि इसका कोई न कोई कारण होगा; वह अशुद्ध होगा, नि:सन्देह शुद्ध न होगा। 27फिर नये चाँद के दूसरे दिन को दाऊद का स्थान खाली रहा। अत: शाऊल ने अपने पुत्र योनातान से पूछा, “क्या कारण है कि यिशै का पुत्र न तो कल भोजन पर आया था, और न आज ही आया है?” 28योनातान ने शाऊल से कहा, “दाऊद ने बैतलहम जाने के लिये मुझ से विनती करके छुट्टी माँगी; 29और कहा, ‘मुझे जाने दे; क्योंकि उस नगर में हमारे कुल का यज्ञ है, और मेरे भाई ने मुझ को वहाँ उपस्थित होने की आज्ञा दी है। और अब यदि मुझ पर तेरे अनुग्रह की दृष्‍टि हो, तो मुझे जाने दे कि मैं अपने भाइयों से भेंट कर आऊँ।’ इसी कारण वह राजा की मेज पर नहीं आया।” 30तब शाऊल का कोप योनातान पर भड़क उठा, और उसने उससे कहा, “हे कुटिला राजद्रोही के पुत्र, क्या मैं नहीं जानता कि तेरा मन तो यिशै के पुत्र पर लगा है? इस से तेरी आशा का टूटना और तेरी माता का अनादर ही होगा। 31क्योंकि जब तक यिशै का पुत्र भूमि पर जीवित रहेगा, तब तक न तो तू और न तेरा राज्य स्थिर रहेगा। इसलिये अभी भेजकर उसे मेरे पास ला, क्योंकि निश्‍चय वह मार डाला जाएगा।” 32योनातान ने अपने पिता शाऊल को उत्तर देकर उससे कहा, “वह क्यों मारा जाए? उसने क्या किया है?” 33तब शाऊल ने उसको मारने के लिये उस पर भाला चलाया; इससे योनातान ने जान लिया कि मेरे पिता ने दाऊद को मार डालना ठान लिया है।


योनातान दाऊद से यह देखने के लिए एक जाँच करने के लिए सहमत हो गया था कि क्या शाऊल वास्तव में दाऊद को मारने का मंशा रखता था। योजना के अनुसार, योनातान ने दाऊद की अनुपस्थिति पर शाऊल की प्रतिक्रिया का निरीक्षण करने की मंशा रची। शाऊल ने योनातान के लिए योजना का पालन करना आसान बना दिया, क्योंकि उसकी बाहरी प्रतिक्रिया से स्पष्ट रूप से पता चला कि वह दाऊद की अनुपस्थिति और योनातान की एक पारिवारिक समारोह के लिए दाऊद को बैतलहम जाने देने की सहमति से बहुत ज्यादा क्रोधित था। दाऊद के परिवार की जेवनार के बारे में अपने पिता को योनातान की कहानी बताना शाऊल के इरादों का पता लगाने के लिए एक चाल थी। जासूसी के कार्यों में सामान्य रूप से छल शामिल होता है। हम इस पाठ में देखते हैं कि परमेश्‍वर ने योनातान को अपने पिता के इरादों को निर्धारित करने और दाऊद को चेतावनी देने के लिए तैयार रहने में सक्षम बनाया।


शाऊल की सच्ची भावनाओं का पता लगाने की धोखेबाजी से भरी योजना। वचन 24-29

अध्याय 19 में लिखित रामा में नबायोत की घटना के बाद और अध्याय 20 की इन घटनाओं से पहले, शाऊल और दाऊद के बीच किसी प्रकार का अस्थायी मेल-मिलाप हुआ होगा, अन्यथा दाऊद के लिए शाऊल के घर पर जेवनार में अपेक्षा स्वरूप होने का कोई मतलब नहीं है। हम मान सकते हैं कि अध्याय 19 और 20 के बीच दाऊद शाऊल के घरेलू सभाओं में भाग ले रहा था। शाऊल को दाऊद के वहाँ होने की आशा करना इसी का अर्थ रहा होगा। फिर भी दाऊद को अपने प्राण का डर था और वह अपनी सुरक्षा के लिए निश्‍चित रूप से शाऊल के इरादों को जानना चाहता था।


वचन 24 और 25 में कहा गया है। "...तब राजा भोजन करने को बैठा। 25राजा तो पहले के समान अपने उस आसन पर बैठा जो भीत के पास था; और योनातान खड़ा हुआ, और अब्नेर शाऊल के निकट बैठा...।" इसलिए यहाँ हम शाऊल को एक जेवनार में बैठे हुए देखते हैं - एक उत्सव में- और फिर भी वह दाऊद के विरुद्ध ईर्ष्या, द्वेष और घृणा से भरा हुआ था। यदि उसे नए नियम की शिक्षाओं का लाभ मिलता, तो वह दाऊद के साथ मेल-मिलाप करना जानता, और फिर अपना उपहार देना चाहता, परन्तु इसके बजाय वह दाऊद का लहू पीने का मंशा रखता था। वह नहीं जानता था कि ईर्ष्या और कड़वाहट और जिस क्रोध की ओर यह ले जाता है, वह उसे स्वयं को ही नष्ट कर देगा।


नीतिवचन 17:1 में जो कहा गया है, "चैन के साथ सूखा टुकड़ा, उस घर की अपेक्षा उत्तम है, जो मेलबलि–पशुओं से भरा हो, परन्तु उसमें झगड़े–रगड़े हों।" यहाँ राजा, उसका दरबार, उसके मित्र, परिवार एक जेवनार में थे! और फिर भी इस व्यक्ति के मन में दाऊद के प्रति उसकी ईर्ष्या के कारण घृणा की उथल-पुथल मची हुई थी।


वह बलिदान (शायद एक बलिदान था) कितना घृणित था, जिसे इस तरह के दुष्ट मन के साथ लाया गया था। "दुष्‍टों का बलिदान घृणित लगता है;

विशेष करके जब वह महापाप के निमित्त चढ़ाता है!" (नीतिवचन 21:27)।


वचन 25 और 26 में कहा गया है, "परन्तु दाऊद का स्थान खाली रहा। 26उस दिन तो शाऊल यह सोचकर चुप रहा, कि इसका कोई न कोई कारण होगा; वह अशुद्ध होगा, नि:सन्देह शुद्ध न होगा।" दाऊद की स्थान खाली था। पहले ऐसा नहीं था। राज्य और युद्ध के कर्तव्यों में भाग लेने में दाऊद से अधिक सुसंगत कोई नहीं था। न ही वह अब अनुपस्थित होता, यदि यह नहीं होता कि उसके मेजबान - शाऊल से उसके प्राण को खतरा था। आत्म-सुरक्षा के लिए दाऊद को राजा के घर में अनुपस्थित रहना पड़ा था। यीशु स्वयं नासरत में भीड़ के बीच से निकल गया और कई अन्य अवसरों पर खतरे से बच गया, क्योंकि अभी तक उसके मरने का समय नहीं आया था। हमें जानबूझकर या वैचारिक रूप से स्वयं को खतरे के मुँह में नहीं डालना चाहिए और दाऊद ने ऐसा नहीं किया।


शाऊल जानता था कि दाऊद व्यवस्था को महत्व देता था और कैसे वह उसका सम्मान करता था और उसका पालन करता था और कैसे वह बिना तैयारी या अशुद्ध होने के बजाय एक पवित्र जेवनार से दूर रहना पसन्द करेगा। हमारे लिए विरोधाभास यह है कि कोई भी अशुद्धता हमें प्रभु यहोवा के "पर्वों" में भाग लेने से नहीं रोकती है। पश्‍चाताप और विश्‍वास से हम किसी भी समय सभी अशुद्धता से शुद्धिकरण के सोते में धोए जा सकते हैं। भजन संहिता 26:6 कहता है, "मैं अपने हाथों को निर्दोषता के जल से धोऊँगा, तब हे यहोवा मैं तेरी वेदी की प्रदक्षिणा करूँगा।" दाऊद ने भजन 23 में लिखा था, "तू मेरे सतानेवालों के सामने मेरे लिये मेज़ बिछाता है" परन्तु कुछ अपवाद भी थे। दाऊद सदैव अपने शत्रुओं के साथ भोजन नहीं खा सकता था।


वचन 27 - 29 कहते हैं, "27फिर नये चाँद के दूसरे दिन को दाऊद का स्थान खाली रहा। अत: शाऊल ने अपने पुत्र योनातान से पूछा, “क्या कारण है कि यिशै का पुत्र न तो कल भोजन पर आया था, और न आज ही आया है?” 28योनातान ने शाऊल से कहा, “दाऊद ने बैतलहम जाने के लिये मुझ से विनती करके छुट्टी माँगी; 29और कहा, ‘मुझे जाने दे; क्योंकि उस नगर में हमारे कुल का यज्ञ है, और मेरे भाई ने मुझ को वहाँ उपस्थित होने की आज्ञा दी है। और अब यदि मुझ पर तेरे अनुग्रह की दृष्‍टि हो, तो मुझे जाने दे कि मैं अपने भाइयों से भेंट कर आऊँ।’ इसी कारण वह राजा की मेज पर नहीं आया।" अब जाल बिछाया जा चुका था। योनातान अब दाऊद के बारे में शाऊल की मनोवृत्ति और सच्ची बिना परदे वाली मंशा को देखेगा। और शाऊल ने कैसा उत्तर दिया? क्या शाऊल शांत था और दाऊद के जाने के लिए तैयार था? क्या दाऊद का अपने परिवार के साथ जेवनार में जाना शाऊल के लिए ठीक था? नहीं! इसके बजाय, शाऊल में क्रोध में भर उठा। यह हमें इस शिक्षा के दूसरे भाग में लाता है।


शाऊल की सच्ची भावनाएँ पूर्ण रीति से स्पष्ट हो जाती हैं। वचन 30-33

वचन 30 और 31 हमें बताते हैं कि शाऊल ने क्या कहा। "30तब शाऊल का कोप योनातान पर भड़क उठा, और उसने उससे कहा, “हे कुटिला राजद्रोही के पुत्र, क्या मैं नहीं जानता कि तेरा मन तो यिशै के पुत्र पर लगा है? इस से तेरी आशा का टूटना और तेरी माता का अनादर ही होगा। 31क्योंकि जब तक यिशै का पुत्र भूमि पर जीवित रहेगा, तब तक न तो तू और न तेरा राज्य स्थिर रहेगा। इसलिये अभी भेजकर उसे मेरे पास ला, क्योंकि निश्‍चय वह मार डाला जाएगा।”


शाऊल एक बहुत ही ज्यादा उत्साह में भरते हुए क्रोधित हो उठा, और अपने शिकार पर निराश शेर की तरह भड़क उठा। दाऊद उसकी पहुँच से बाहर था, इसलिए शाऊल का क्रोध योनातान पर उतर गया।

शाऊल ने बहुत ही अभद्र और अश्लील भाषा का प्रयोग किया, जो एक सज्जन व्यक्ति या राजा के लिए उपयुक्त नहीं थी, वरन् किसी भी व्यक्ति के लिए नहीं, विशेष रूप से उसके अपने पुत्र और उसके मुकुट के उत्तराधिकारी के लिए के लिए तो बिल्कुल भी नहीं, एक ऐसा पुत्र जिसने उसकी सेवा की, जो उसके परिवार की सबसे बड़ी आशा और आभूषण था। इसके अतिरिक्त, वह एक बड़े समूह के सामने था, वह एक पवित्र जेवनार में था, जब सभी को अच्छे मनोभाव में होना चाहिए, जिस पर सभी क्रोध या द्वेष को नियंत्रित और कम किया जाना चाहिए। शाऊल निर्दयता से, असत्य और अशिष्टता से उसे तीन बातें कहता है। वह उसे एक कहता हैः


कुटिला - शाऊल के क्रूर क्रोध की मूर्खतापूर्ण गंदी भाषा के अनुसार, योनातान ने संसार को सन्देह करने का कारण दिया था कि वह शाऊल का वैध पुत्र नहीं था, क्योंकि वह दाऊद से प्रेम करता था, जिससे शाऊल घृणा करता था और उस व्यक्ति का समर्थन करता था, जिसे वह समझता था कि उसके परिवार का विनाश होगा - "हे कुटिला राजद्रोही के पुत्र" (वचन 30)।

राजद्रोही - "क्या मैं नहीं जानता कि तेरा मन तो यिशै के पुत्र पर लगा है" (वचन 30)।

मूर्ख - "क्योंकि जब तक यिशै का पुत्र भूमि पर जीवित रहेगा, तब तक न तो तू और न तेरा राज्य स्थिर रहेगा" (वचन 32)।


परन्तु वास्तव में, योनातान ने दाऊद के साथ सुरक्षा की गारंटी देने के लिए अपने और अपने परिवार के लिए बहुत ही ज्यादा बुद्धिमानी और अच्छी तरह से काम किया था, जिसे स्वर्ग ने सिंहासन के लिए नियत किया था। फिर भी इस ज्ञान के लिए उसे कुटिला, राजद्रोही और मूर्ख बना दिया जाता है।


शाऊल के विकृत मन में, दाऊद राजकीय सिंहासन को पाने के लिए एक विद्रोही प्रयास कर रहा है और योनातान, घनिष्ठ मित्रता में उससे बंधा हुआ है, इसलिए वह एक विद्रोही है। उसने इस विद्रोह को "बलवा" कहा, क्योंकि जब तक यिशै का पुत्र जीवित रहेगा, योनातान और उसका राज्य स्थापित नहीं होगा। शाऊल एक विद्रोही के रूप में दाऊद को मारने के लिए दृढ़ संकल्पित है। परमेश्‍वर और शाऊल ने इसे बिल्कुल अलग तरह से देखा। परमेश्‍वर और हम अक्सर चीजों को अलग तरह से देखता है और मैं इसे परमेश्‍वर के तरीके से देखना सीखना चाहता हूँ।


वचन 32 से पता चलता है कि योनातान ने अपने पिता शाऊल को क्या उत्तर दिया था। 32 "योनातान ने अपने पिता शाऊल को उत्तर देकर उससे कहा, “वह क्यों मारा जाए? उसने क्या किया है?”" योनातान ने अपने पिता से पूछा। अपने पिता की ओर से आए क्रोध के इस प्रकोप के बावजूद, योनातान ने दाऊद की निर्दोषता और उसे मारने के अन्याय को प्रदर्शित करने के लिए सौम्य और शांत शब्दों के साथ प्रयास किया। पहले शाऊल अपने क्रोध को कुछ सीमित और अस्थायी नियंत्रण में लाने में सक्षम था, परन्तु इस बार वह अत्याधिक नियंत्रण से परे वाले क्रोध में चला गया।

शाऊल ने योनातान के दाऊद के साथ संबंधों के बारे में बात की, और अप्रत्यक्ष घोषणा की, कि दाऊद, अपने राजा के विरुद्ध एक विद्रोही था, और इसलिए मृत्यु के योग्य था, वह शर्म और अपमान के लिए पर्याप्त था। योनातान ने सोचा कि यह एक अपमान था, उसके प्रश्न से स्पष्ट हैः "वह क्यों मारा जाए? उसने क्या किया है? " (वचन 32)। योनातान अपने पिता की बुरी भावनाओं से दु:खी था और यह और भी अधिक था, क्योंकि प्रेम करने वाले, भरोसेमंद पुत्र की अपने पिता से कहीं अधिक अच्छी इच्छाएँ और मंशाओं की आशाएँ थीं। हमें इस अध्याय के वचन 2 से पता चलता है, जब दाऊद ने कहा था कि शाऊल उसे मारने वाला था। योनातान ने कहा, "तू मारा न जाएगा। सुन, मेरा पिता मुझ को बिना बताए न तो कोई बड़ा काम करता है और न कोई छोटा; फिर वह ऐसी बात को मुझ से क्यों छिपाएगा? ऐसी कोई बात नहीं है!" योनातान एक विश्‍वासयोग्य, सम्मानजनक और जीवित पुत्र बनने की कोशिश कर रहा था, परन्तु शाऊल ने उसके लिए ऐसा करना मुश्किल बना दिया।


जब योनातान ने शाऊल से पूछा कि दाऊद को क्यों मार दिया जाना चाहिए, तो शाऊल स्पष्ट रूप से और भी अधिक क्रोधित हो गया, क्योंकि वचन 33 में कहा गया है, "तब शाऊल ने उसको मारने के लिये उस पर भाला चलाया; इससे योनातान ने जान लिया कि मेरे पिता ने दाऊद को मार डालना ठान लिया है।" योनातान चुप रहा और जब तक शाऊल ने केवल योनातान की निंदा की, तब तक उसने उसे कोई उत्तर नहीं दिया। नम्रता और शांति के साथ उसने शाऊल के क्रोध और घात करने की लालसा को बुझाने की कोशिश की। परन्तु उदार आत्माएँ अपने मित्रों को दुर्व्यवहार करते हुए सुनने की तुलना में स्वयं के साथ दुर्व्यवहार को अधिक आसानी से सहन कर सकती हैं। योनातान ने अपने मित्र दाऊद के लिए फिर से बात की।


यह संभव है कि शाऊल जानता था कि दाऊद को उसी हाथ से राज्य के लिए अभिषिक्त किया गया था, जिसने पहले उसके सिर पर अभिषेक किया था। यदि ऐसा है, तो वह, योनातान नहीं, वरन् यह सोचने वाला मूर्ख जन था कि वह परमेश्‍वर की सलाह को पराजित कर सकता था। फिर भी उसके लिए कुछ भी काम नहीं आया सिवाय इसके कि दाऊद को मर जाना चाहिए और योनातान को उसे घात करने के लिए काम में लिया जाना चाहिए। क्रोध पागलपन है। क्रोध हमें अनुचित बनाता है। हमें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना चाहिए, अन्यथा वे हमें नियंत्रित करेंगी - और नाश - कर देंगी।


ऐसा लगता था कि शाऊल बहुत ज्यादा चिन्ता कर रहा था कि योनातान को उसके राज्य में स्थापित कर दिया जाना चाहिए, पर फिर भी अब वह स्वयं योनातान के जीवन पर ध्यान केंद्रित कर रहा था। क्या शाऊल चाहता है कि उसका पुत्र राजा बने? फिर अपने पुत्र को मारना इसे पूरा करने का कोई तरीका ही नहीं था। क्रोध मनुष्यों को ऐसे मूर्ख, ऐसे क्रूर पशु और उससे भी बदतर बना देता है। कैसे सोच को रोक देने वाला क्रोध मनुष्य को मूर्ख बनाता है - वह एक व्यक्ति को कैसे अपने आगोश में ले लेता है, जिससे वह यह भी नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है! वह मनुष्य को पशु के सरीखा कैसे कर देता है, जिससे कि वह अपना आपे को ही छोड़ देता है, और अन्धकार के वश में आ जाता है।


योनातान आखिरकार उस दु:खद समाचार के बारे में पूरी तरह से आश्‍वस्त हो जाता है, जिसे वह जानने के लिए उत्सुक नहीं था - कि उसके पिता शाऊल को घृणा थी और यदि वह उसके अधिकार में होता, तो वह अपने अच्छे मित्र दाऊद को मार देता। योनातान ने अपनी जान जोखिम में डालकर यह जानकारी प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक महँगा मूल्य चुकाया। योनातान अब पूरी तरह से संतुष्ट हो चुका था कि दाऊद के विरुद्ध बुराई ठहरा दी गई थी। वह उस जेवनार में और अधिक भोजन नहीं खा सकता था।


इस्राएलियों को शोक मनाते समय पवित्र वस्तुओं का सेवन नहीं करना था। हम सोच सकते हैं कि सभी मेहमान घबरा गए होंगे और डर गए होंगे और जेवनार की मौज - मस्ती, चुटकुले, संगीत और मनोरंजन पूरी तरह से बुरे हो गए थे। एक जेवनार के माहौल को एक सुखद घटना बनाने वाली उत्साहित और आनन्दित करने वाली गपबाजी बंद हो गई। संगीत बंद हो गया। उत्सव को उत्सव जैसा बनाने के लिए जो कुछ भी हो रहा था, अब उसे रोकना पड़ा। हमें नहीं पता कि केवल योनातान ने भोजन करना बंद कर दिया था या सभी ने भोजन बंद कर दिया। जब राजा ने अपने पुत्र को मारने के लिए उस पर भाला फेंका था, तो किसे जेवनार की भूख लगी होगी?


दाऊद के प्रति योनातान का प्रेम एक तिहरे खुलासे, एक चेतावनी और एक यथार्थ की कसौटी द्वारा एक कठिन परीक्षा से होकर निकलता है। उसे (1) अपने मित्र वीर युवा के प्रति अपने राजा पिता द्वारा संजोए गए वास्तविक स्वभाव की झलक मिली। वह अपने पिता के बारे में सबसे अच्छा विश्‍वास करना चाहता था, परन्तु अब वह सबसे बुरी बात से इनकार नहीं कर सकता था कि उसके पिता ने सभी मेहमानों के सामने इतना भयानक भाषण दिया था और फिर उस पर अपना भाला फेंक दिया था। (2) वह उच्च नियति, जो परमेश्‍वर ने उसके प्रिय मित्र के लिए ठहराई थी। योनातान अपने क्रोधित पिता के बुरे व्यवहार से आसानी से समझ सकता था कि उसके पिता को भी पता था कि दाऊद अगला राजा होगा। (3) वह खतरा, जिसने दाऊद के साथ उसके संबंध के माध्यम से स्वयं को खतरे में डाल दिया। अपने पुत्र योनातान पर भाला फेंककर, शाऊल ने दाऊद पर अपना क्रोध पूर्ण रीति से स्पष्ट कर दिया। 

हालाँकि, योनातान की यह मानने की अनिच्छा के बारे में बहुत अधिक प्रेम भरी बात है कि उसका पिता इतना दुष्ट था। प्रेम अंधा होता है। दाऊद के लिए योनातान के प्रेम ने उसे यह कहने के लिए मजबूर किया, "जो कुछ तेरा जी चाहे वही मैं तेरे लिये करूँगा।" और अपने पिता के लिए उसके प्रेम और सम्मान ने उसे यह विश्‍वास करने से हिचकिचाया कि शाऊल वास्तव में दाऊद को मरवाना चाहता था। वह अपने पिता के बारे में सबसे अच्छा जानता था। दाऊद पहले से ही सोच रहा था कि शाऊल उसे मरवाना चाहता है और अब, जासूसी की चाल के माध्यम से, योनातान देख सकता था कि दाऊद को सन्देह था कि शाऊल उसे मारना चाहता था। एक बुरी रिपोर्ट पर विश्‍वास करने में संकोच करना अच्छा है, परन्तु जब सबूत स्पष्ट हैं, तो हमें उस बुरी समाचार पर विश्‍वास करने की आवश्यकता है, जिस पर हम भरोसा करना चाहते थे, कि वह भरोसेमंद नहीं है। यदि हम हर्ष से बुरा समाचार सुनते हैं, तो यह हमारे चरित्र में एक दोष का संकेत देगा। यदि हम बुरा समाचार सुनते हैं और दु:खी होते हैं, भले ही हम दु:खी हों, तो यह हमारे भीतर कुछ अच्छा होने का संकेत देता है। हम सबसे अच्छा चाहते थे, हम सबसे अच्छा मानते थे। 


शाऊल एक दुष्ट व्यक्ति बन चुका था। सदैव ऐसा नहीं था, परन्तु अब ऐसा ही है। शाऊल की बुराई, या किसी की भी बुराई का दु:ख इस बात में बढ़ जाता है कि उनकी बुराई दूसरों को प्रभावित करती है; जिसे सामूहिक हानि कहा जाता है; दूसरों को नुकसान, या अधिक नुकसान। मेरा मानना है कि आप एक मसीही अगुवे इसलिए बनना चाहते हैं, ताकि आप दूसरों के लिए एक आशीर्वाद बन सकें। आप चाहते हैं कि लोग सबसे अच्छे में रहें, अधिक जानें, सर्वोत्तम रीति से जीवन जिएँ, परमेश्‍वर से अधिक प्रेम करें और अपने जीवन में आपके नेतृत्व और प्रभाव के कारण अधिक ईमानदारी के साथ उसकी सेवा करें। यह एक भली इच्छा है। हम ऐसा करने की कोशिश करते रहें। और इस कठिन सबक को सीखें कि जिस तरह शाऊल के पाप, गलतियों और बुराईयों का असर स्वयं पर ही नहीं, बल्कि हम पर भी पड़ेगा। हमारी गलतियाँ, बुराईयाँ और पाप दूसरों को प्रभावित करते हैं। जो सही है, उसे करने का यह एक और कारण है! हम तटस्थ रहकर धार्मिकता से जीवन नहीं जीते; बल्कि हम दूसरों पर अच्छे के लिए प्रभाव डालते हैं। हम शून्य में पाप नहीं करते; हम अपने पाप से दूसरों को प्रभावित करते हैं।