परमेश्‍वर की पूर्ण केंद्रीय बुद्धिमत्ता संस्था

अध्याय तीस


1 शमूएल 23:7-13

Ron Meyers

7तब शाऊल को यह समाचार मिला कि दाऊद कीला को गया है। और शाऊल ने कहा, “परमेश्‍वर ने उसे मेरे हाथ में कर दिया है; वह तो फाटक और बेंड़ेवाले नगर में घुसकर बन्द हो गया है।” 8तब शाऊल ने अपनी सारी सेना को लड़ाई के लिये बुलवाया, कि कीला को जाकर दाऊद और उसके जनों को घेर ले। 9तब दाऊद ने जान लिया कि शाऊल मेरी हानि की युक्‍ति कर रहा है; इसलिये उसने एब्यातार याजक से कहा, “एपोद को निकट ले आ।” 10तब दाऊद ने कहा, “हे इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा, तेरे दास ने निश्‍चय सुना है कि शाऊल मेरे कारण कीला नगर नष्‍ट करने को आना चाहता है। 11क्या कीला के लोग मुझे उसके वश में कर देंगे? क्या जैसे तेरे दास ने सुना है, वैसे ही शाऊल आएगा? हे इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा, अपने दास को यह बता।” यहोवा ने कहा, “हाँ, वह आएगा।” 12फिर दाऊद ने पूछा, “क्या कीला के लोग मुझे और मेरे जनों को शाऊल के वश में कर देंगे?” यहोवा ने कहा, “हाँ, वे कर देंगे।” 13तब दाऊद और उसके जन जो कोई छ: सौ थे, कीला से निकल गए, और इधर उधर जहाँ कहीं जा सके वहाँ गए। और जब शाऊल को यह बताया गया कि दाऊद कीला से निकल भागा है, तब उसने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया। 


शाऊल द्वारा धर्मी दाऊद का पीछा करने का नाटक, जो परमेश्‍वर के अभिषिक्त के साथ लड़ने के बजाय भागना पसन्द करेगा, जारी है और हम यहाँ इसके बारे में और अधिक सीखेंगे कि परमेश्‍वर कैसे आज्ञाकारी अगुवों के माध्यम से रक्षा करता है, उनकी देखभाल करता है और उनके काम करता है, जो ईमानदारी से उसकी सेवा करना चाहते हैं। परमेश्‍वर मनुष्यों के मनों को जानता है और जब हम उसे अपना मुख्य सलाहकार बनने देते हैं, तो हम सुरक्षित रहते हैं। प्रत्येक राष्ट्र के पास किसी न किसी प्रकार की केंद्रीय खुफिया एजेंसी अर्थात् संस्था होती है, जिसे कभी-कभी सेन्ट्रल इन्टेलीजेन्स एजेंसी के रूप में जाना जाता है - एक सरकारी संस्था, जो शत्रुओं से देश को बचाने में सहायता करने के लिए जानकारी एकत्र करती है।


1 पलिश्तियों पर जय प्राप्त करने के बाद, दाऊद ने अपने ही राजा से फिर से खतरे का अनुभव किया।

शाऊल ने अपने भीतर दाऊद के विनाश की साजिश रची और झूठा दावा किया कि परमेश्‍वर उसके पक्ष में है, जैसा कि वचन 7 और 8 में कहा गया है, "7तब शाऊल को यह समाचार मिला कि दाऊद कीला को गया है। और शाऊल ने कहा, "परमेश्‍वर ने उसे मेरे हाथ में कर दिया है; वह तो फाटक और बेंड़ेवाले नगर में घुसकर बन्द हो गया है।" 8तब शाऊल ने अपनी सारी सेना को लड़ाई के लिये बुलवाया, कि कीला को जाकर दाऊद और उसके जनों को घेर ले।" शाऊल ने सुना कि दाऊद कीला में आया है, और क्या उसने उसके विषय में नहीं सुना होगा, जो उसे यहाँ ले आया था? क्या उसे यह नहीं बताया गया था कि उसने हियाव से कीला को छुड़ा लिया था और उसे पलिश्तियों के हाथों से छुड़ा लिया था? क्या शाऊल को इसके लिए आभारी और राहत में नहीं होनी चाहिए, कि दाऊद ने अपने देश की सेवा की थी, कि अब उसे स्वयं कीला को बचाने के लिए स्वयं को परेशान करने होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि दाऊद पहले ही ऐसा कर चुका था? किसी को लगता होगा कि इससे शाऊल को इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित होना चाहिए था कि दाऊद को क्या सम्मान और गरिमा दी जानी चाहिए। परन्तु, इसके बजाय, वह इसे दाऊद को और अधिक शरारत करने के अवसर के रूप में समझ लेता है। वह एक कृतघ्न अभागा था, और सदैव के लिए उसके पास कोई सेवा करने या वह दया दिखाए जाने के योग्य नहीं था। शायद दाऊद अपने शत्रुओं से शिकायत करे कि उन्होंने उसे भलाई के बदले बुराई का बदला दिया, और उसके प्रेम के कारण वे उसके विरोधी थे, भजन 35:12 कहता है, "वे मुझ से भलाई के बदले बुराई करते हैं, यहाँ तक कि मेरा प्राण ऊब जाता है।" और भजन 109:4 कहता है, "मेरे प्रेम के बदले में वे मेरा विरोध करते हैं, परन्तु मैं तो प्रार्थना में लवलीन रहता हूँ।" मसीह का भी इस तरह दुरुपयोग किया गया था, "मैं ने तुम्हें अपने पिता की ओर से बहुत से भले काम दिखाए हैं; उन में से किस काम के लिये तुम मुझ पर पथराव करते हो?" (यूहन्ना 10:32)। दाऊद और दाऊद का पुत्र दोनों हमें अनुसरण करने के लिए अद्भुत उदाहरण देते हैं! हम जो हैं और किस तरह का चरित्र रखते हैं, हम उसके आधार पर व्यवहार करते हैं। हम भला करेंगे, क्योंकि भला करना सही है, इस बात की परवाह किए बिना कि दूसरे इस पर कितना ध्यान देते हैं, इसकी कितनी परवाह करते हैं या सराहना करते हैं। हम जानते हैं कि परमेश्‍वर देखता है।


मेरे साथ ध्यान दें कि कैसे शाऊल इस्राएल के परमेश्‍वर का दुरुपयोग करता या उसके साथ दुर्व्यवहार करता है, ऐसा लगता है कि वह उसे अपने बुरे इरादों में भागीदार बनाता है और स्वयं के सफल होने की प्रतिज्ञा करता है, क्योंकि परमेश्‍वर उसके पक्ष में थाः 'परमेश्‍वर ने उसे मेरे हाथ में कर दिया है,' मानो वह जिसे परमेश्‍वर ने अवज्ञा के लिए अस्वीकार कर दिया था, अचानक से उसके द्वारा अनुग्रह प्राप्त कर चुका था, और दाऊद, जिसने आज्ञा का पालन किया और विनम्रता से परमेश्‍वर की सेवा की, अचानक से अस्वीकार कर दिया गया था। शाऊल ने जीत से पहले व्यर्थ विजय प्राप्त की, यह भूलकर कि उसे दाऊद के विरुद्ध अब की तुलना में कितनी बार अधिक लाभ हुआ था और फिर भी वह अपने लक्ष्य से चूक गया था। उसने मूर्खतापूर्ण, पवित्रतापूर्ण और धूमधाम से परमेश्‍वर को अपने उद्देश्य से जोड़ा, क्योंकि उसने सोचा, या भले ही उसने ऐसा नहीं सोचा था, उसने कम से कम यह कहा, कि परमेश्‍वर उसके पक्ष में था और उसने इससे लाभ प्राप्त किया था – क्योंकि दाऊद कीला में फंस गया था। ओह! जब परमेश्‍वर वास्तव में हमारे पक्ष में होता है, तो यह बहुत अच्छा होता है और हम इसके लिए उसकी महिमा करते हैं, परन्तु जब वह हमारे पक्ष में नहीं होता है और हम गलत होते हैं, तो हमें मूर्खतापूर्ण, घमण्ड और अभिमान से यह दावा नहीं करना चाहिए कि परमेश्‍वर हमारे अधार्मिकता से भरा व्यवहार में हम पर कृपा करता है। सभी जो कहते हैं कि "प्रभु यहोवा की स्तुति करो, वह भला है” और "परमेश्‍वर मेरे साथ है” उन्हें वास्तव में ऐसा कहने का अधिकार नहीं है। भजन संहिता 140:8 कहता है, "हे यहोवा, दुष्‍ट की इच्छा को पूरी न होने दे, उसकी बुरी युक्‍ति को सफल न कर, नहीं तो वह घमण्ड करेगा।" हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि मुस्कुराना और परमेश्‍वर की कृपा का दावा करना या तो एक अधर्मी कार्य को उचित ठहराता है या इससे मिलने वाली सफलता को सुरक्षित करता है। शाऊल ने परमेश्‍वर के इस्राएल के साथ दुर्व्यवहार किया, अपने लोगों को दाऊद के विरुद्ध अपनी डाह के सेवक बनाकर। उसने सभी लोगों को एक साथ युद्ध करने के लिए बुलाया, और उन्हें दाऊद और उसके लोगों को घेरने के लिए कीला की ओर तेजी से प्रस्थान किया, हालाँकि शाऊल ने उस योजना को छुपाया। पवित्रशास्त्र के इस अध्याय के वचन 9 में कहा गया है, "शाऊल मेरी हानि की युक्‍ति कर रहा है" और उसके विश्‍वासयोग्य लोगों को इस्राएल के लिए परमेश्‍वर के चुने हुए भावी राजा के विरुद्ध पलटा लेने का हथियार बनाया गया था। हम मसीही अगुवे हैं, फिर भी कभी-कभी हमारे कार्य संकीर्ण, स्वार्थी या यहाँ तक कि दुष्टता भरे होते हैं और हम दोषी होते हैं, परन्तु उन बच्चों पर दया करते हैं, जिनके पास अपने कार्यों में कोई विकल्प नहीं होता है; वे आज्ञा का पालन करते हैं, परन्तु अपनी निर्दोषता में अधर्म के हथियार बन जाते हैं। कुछ लोग बुरा नेतृत्व के अधीन परिश्रम करते हैं और पीड़ित होते हैं; यह दु:खद है। परन्तु इससे भी बदतर, दूसरों को अधर्म का सेवक और साधन बनाया जाता है और यह और भी दु:खद है। शाऊल का व्यवहार और रवैया हमें अपनी नेतृत्व शैली की जाँच करने का अवसर प्रदान करता है। आप किस तरह के अगुवा हैं?


2 दाऊद ने अपने बचाव के विषय में परमेश्‍वर से परामर्श लिया।  उसके पास लाई गई जानकारी से वह जानता था कि शाऊल उसके विनाश की साजिश रच रहा था और इसलिए उसने अपने महान संरक्षक से निर्देशन पाने के लिए आग्रह की। जल्द ही एपोद उसके पास लाया जाता है, क्योंकि वह इसका अच्छा उपयोग करता हैः "एपोद को निकट ले आ।" आज हमारे पास एपोद नहीं है या हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। हमारे हाथों में पवित्रशास्त्र, परमेश्‍वर का जीवित वचन है; आइए हम इससे सलाह लें, जब हम नहीं जानते कि क्या करना है। "एपोद को निकट ले आओ" कहने के बजाय, "बाइबल ला आओ" कहें। न तो हमारे पास एब्यातार है और न ही हमें इसकी आवश्यकता है। हम में से प्रत्येक के पास पवित्रशास्त्र है और इसे पढ़ने और जानने की आज्ञा दी गई है। यदि बाइबल हमें लाभ पहुँचाने वाली है, तो हमें इसे जानना चाहिए। इसे जानने के लिए हमें इसे पढ़ना चाहिए।


इस अवसर पर दाऊद की परमेश्‍वर से प्रार्थना बहुत गंभीर और श्रद्धापूर्ण थी। दो बार उसने परमेश्‍वर को इस्राएल का प्रभु यहोवा परमेश्‍वर कहा, और तीन बार स्वयं को उसका सेवक कहा। जो लोग परमेश्‍वर से बात करते हैं, उन्हें अपनी दूरी और वे किससे बात कर रहे हैं, यह पता होना चाहिए। वचन 10 और 11 कहते हैंः "तब दाऊद ने कहा, "हे इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा, तेरे दास ने निश्‍चय सुना है कि शाऊल मेरे कारण कीला नगर नष्‍ट करने को आना चाहता है। 11क्या कीला के लोग मुझे उसके वश में कर देंगे? क्या जैसे तेरे दास ने सुना है, वैसे ही शाऊल आएगा? हे इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा, अपने दास को यह बता।” यहोवा ने कहा, "हाँ, वह आएगा।""


उसकी प्रार्थना भी बहुत ज्यादा विशिष्ट और मन को उण्डेलने वाली थी। इस विषय में उसका मुद्दा यह हैः "हे इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा, तेरे दास ने निश्‍चय सुना है कि शाऊल मेरे कारण कीला नगर नष्‍ट करने को आना चाहता है। क्या कीला के लोग मुझे उसके वश में कर देंगे?" दाऊद हर व्यर्थ की अफवाह को एपोद के पास नहीं लाता है। वह यह नहीं कहता है, "मुझे नष्ट करने के लिए” परन्तु, "नगर को नष्ट करने के लिए” शायद उसे स्मरण है कि दोएग ने हाल ही में नोब नगर के साथ क्या किया था, "मेरे कारण"। वह उनकी सुरक्षा के लिए उतना ही चिन्तित है, जितना कि अपने लिए, और वह कहीं भी स्वयं को खतरे में डाल लेगा, बजाय इसके कि उसके उनके बीच होने मात्र से उन्हें कोई परेशानी उठानी पड़े हो। उदार आत्माएँ ऐसी ही होती हैं। उसकी विनती बहुत विशेष है। परमेश्‍वर हमें अपनी प्रार्थनाओं में यह विशेषाधिकार देता है: "प्रभु यहोवा, मुझे इस विषय में मार्गदर्शन दें, जिसके बारे में मैं अब परेशानी में हूँ।"

दाऊद ने शाऊल की "योजना" के बारे में "निश्‍चित रूप से" सुना। यह दो विलोम शब्द, दो लगभग विपरीत शब्दों का एक रुचिपूर्ण संयोजन है। संदेश निश्‍चित था, परन्तु योजना नहीं थी। दाऊद ने अवश्य सुना, परन्तु उसने निश्‍चित रूप से किस बारे में सुना? एक योजना के बारे। परिभाषा के अनुसार, एक योजना एक ऐसा विचार होता है, जिसे अभी तक कार्यान्वित नहीं किया गया है। यह मंशा है, परन्तु अभी तक घटित नहीं हुई है। शाऊल सफल नहीं हुआ, क्योंकि दाऊद दाऊद के पहरुए के निर्देशन में वहाँ से भाग निकला। जब आप बाइबल पढ़ते हैं या अपने जीवन पर दृष्टि डालते हैं, तो क्या आप उन चीजों को देख सकते हैं, जो एक धार्मिकता से भरा व्यक्ति के विरुद्ध या आपके विरुद्ध योजनाबद्ध थीं, जो पूरी नहीं हुईं। फ़िरौन की मंशा थी, कि इस्राएल के दासों को दासता में रखा जाए, परन्तु वह योजना पूरी नहीं हुई; मूसा ने इस्राएल की सन्तान को कनान देश में अपनी भूमि और घरों की स्वतंत्रता और स्वामित्व पाने के लिए प्रेरित किया। हामान ने यहूदियों को मारने की योजना बनाई, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। योजनाएँ पलट गईं और परमेश्‍वर के लोग न केवल बच गए, बल्कि फलते-फूलते रहे। शैतान ने यीशु को नष्ट करने की मंशा, योजना बनाई। परन्तु जो योजना बनाई गई थी, वह पूरी नहीं हुई। इसके विपरीत, उद्धारकर्ता यीशु ने लाखों विश्‍वासियों को बचाया है, जो शाश्‍वतता के लिए शैतान की निश्‍चित योजना को विफल करने का उत्सव मनाएँगे। आप एक योजना के बारे में निश्‍चित रूप से सुन सकते हैं, परन्तु आपका ज्ञान "अधूरा" है; योजना केवल एक योजना या मंशा होती है; पूरी नहीं हुई और पूरी नहीं होगी, यदि आप दाऊद के परमेश्‍वर से लगातार परामर्श करते हैं। परमेश्‍वर के पास भी योजनाएँ हैं और हम निश्‍चित रूप से जान सकते हैं कि उसकी योजनाएँ निश्‍चित हैं। दानिय्येल 7:14 कहता है, "तब उसको ऐसी प्रभुता, महिमा और राज्य दिया गया, कि देश–देश और जाति–जाति के लोग और भिन्न–भिन्न भाषा बोलनेवाले सब उसके अधीन हों; उसकी प्रभुता सदा तक अटल, और उसका राज्य अविनाशी ठहरा।" मत्ती 24:35 कहता है, "आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी।" 


3. परमेश्‍वर हमें स्वयं से भी सर्वोत्तम जानता है।

वचन 11 में, दाऊद एक साथ दो प्रश्न पूछता है। इसमें लिखा है, "क्या कीला के लोग मुझे उसके वश में कर देंगे? क्या जैसे तेरे दास ने सुना है, वैसे ही शाऊल आएगा?" हम नहीं जानते कि दाऊद ने वचन 11 के दो प्रश्नों के लिए एक अधिक स्वाभाविक अनुक्रम को क्यों उलट दिया। दाऊद का दूसरा प्रश्न पहले रखा जाना चाहिए था, और पहले उत्तर दिया गया था, "क्या जैसे तेरे दास ने सुना है, वैसे ही शाऊल आएगा?" मेरा अपना विचार है कि गलत क्रम इस तथ्य के कारण हो सकता है कि दाऊद ने सुना था कि शाऊल आक्रमण करेगा, यह सोचकर कि शाऊल आक्रमण करेगा, वास्तव में यह सुनकर कि वह आक्रमण करेगा, अब वह यह जानने में अधिक रुचि रखता था कि कीला के लोग उसे धोखा देंगे या नहीं। ऐसा लगता है कि एक सर्वज्ञानी और समझदार परमेश्‍वर दाऊद के प्रश्न का उत्तर इस क्रम में देकर इस विषय को सही करता है कि उसे तार्किक रूप से उससे पूछना चाहिए था। परमेश्‍वर अपने उत्तर में उत्तरों को सही क्रम में रखते हैं। "हाँ” परमेश्‍वर का उत्तर है, "वह आएगा"; उसने इसका हल कर लिया है, वह इसके लिए तैयारी कर रहा है, और वह ऐसा करेगा, जब तक कि वह यह न सुने कि तू नगर से चला गया है। और फिर, "ठीक है, यदि वह आता है, तो क्या कीला के लोग मेरे साथ खड़े होंगे और मेरी रक्षा करेंगे या वे उसके लिए दरवाजे खोलकर मुझे उसे दे देंगे? परमेश्‍वर ने "हाँ, वे दे देंगे" और "हाँ" कहा गया।

हम परमेश्‍वर और उसके उत्तरों पर भरोसा कर सकते हैं, परन्तु हम मनुष्यों और उनके उत्तरों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं; यहाँ तक कि पतरस जैसे सुविचारित पुरुष, जिसने शपथ खाई थी कि वह यीशु का इनकार नहीं करेगा, उसने भी ऐसा किया था। वास्तव में, न केवल हमें पूरी तरह से दोषपूर्ण और अविश्‍वनीय मनुष्यों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम भी मनुष्य हैं और पूर्ण अर्थों में भरोसेमंद नहीं हैं। यदि हम स्वयं पर निर्भर नहीं रहना सीखते हैं, बल्कि पूरी तरह से परमेश्‍वर पर निर्भर रहना सीखते हैं, तो हम स्वयं पर एक अनुग्रह दिखाते हैं। मुख्य कारण कि मुझे नीतिवचन 3:4, 5 इतना क्यों पसन्द है, क्योंकि इसमें किस पर भरोसा करना है, पर दोगुना जोर और स्पष्टीकरण शामिल है। यह हमें बताता है कि किस पर भरोसा करना है और किस पर नहीं। वचन इस प्रकार हैः "तो तू परमेश्‍वर और मनुष्य दोनों का अनुग्रह पाएगा, तू अति बुद्धिमान होगा। तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना।"

यदि दाऊद ने कीला के लोगों, न्यायियों या पुरनियों से पूछा होता कि वे उसके विषय में क्या करेंगे, तो वे अपने मन को जाने बिना उसे नहीं बता सकते थे। उन्हें नहीं पता था कि वे क्या करेंगे। उनमें से कुछ ने शायद कहा होगा, "तेरे साथ विश्‍वासघात? कभी नहीं! "परन्तु वे नहीं जानते थे और न ही उन्हें पता था कि वे नहीं जानते थे। न ही उन्हें क्या करना चाहिए। न ही न्याय के समय कि उनकी परिषद में अधिक सँख्या में वोट किस तरफ जाएँगे। उन्होंने शायद उसे बताया होगा कि वे उसकी रक्षा करेंगे, और फिर भी बाद में उसे धोखा देंगे; परन्तु परमेश्‍वर उसे पूरी तरह से और अचूकता के साथ कह सकता थाः "जब शाऊल उनके नगर को घेर लेगा, और उनसे माँग करेगा कि वे उसे उसके हाथों में सौंप दें, भले ही वे अब उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में कितना भी प्रेम क्यों न करते हों, वे शाऊल के क्रोध का सामना करने के बजाय तुझे सौंप देंगे।" ध्यान दें, [1] परमेश्‍वर सभी मनुष्यों को उनसे सर्वोत्तम जानता है, जितना कि वे स्वयं को जानते हैं, उनकी लंबाई, उनकी शक्ति, उनमें क्या है, और यदि वे ऐसी और किसी ओर परिस्थितियों में आएँगे, तो वे क्या करेंगे। [2] इसलिए वह न केवल जानता है कि क्या होगा, बल्कि क्या होगा, यदि इसे रोका नहीं गया; और इसलिए वह जानता है कि कैसे धार्मिकता से भरे लोगों को प्रलोभन से मुक्त किया जाए, और कैसे हर व्यक्ति को उसके कार्यों के अनुसार बदला दिया जाए। इसका सबसे अच्छा उदाहरण जो मेरे मन में आता है, वह यूहन्ना 6 में बताया गया है। लोगों को भोजन के लिए अद्भुत रोटी मिली थी और अब कुछ लोग यीशु को राजा बनाना चाहते थे। परन्तु यीशु मनुष्य के मनों को जानता था और राजा के पद पर समय से पहले बैठने से बचता था। वह राजा होगा, परन्तु सही समय पर। यूहन्ना 6:14, 15 में यूहन्ना ने यही तो लिखा है। "तब जो आश्‍चर्यकर्म उसने कर दिखाया उसे वे लोग देखकर कहने लगे, "वह भविष्यद्वक्‍ता जो जगत में आनेवाला था निश्‍चय यही है।" यीशु यह जानकर कि वे मुझे राजा बनाने के लिये पकड़ना चाहते हैं, फिर पहाड़ पर अकेला चला गया।"" 


दाऊद, अब परमेश्‍वर से अपने वास्तविक खतरे के बारे में जानते हुए, कीला से निकल गया, वचन 13 हमें चार तथ्य देता है। "तब दाऊद और उसके जन जो कोई छ: सौ थे, कीला से निकल गए, और इधर उधर जहाँ कहीं जा सके वहाँ गए। और जब शाऊल को यह बताया गया कि दाऊद कीला से निकल भागा है, तब उसने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया।" (1) दाऊद ने परमेश्‍वर द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर काम किया। हम भी ऐसा ही करें। (2) हम देखते हैं कि दाऊद के अनुयायियों की सँख्या अब बढ़कर 600 हो गई थी। अधिक से अधिक लोग शाऊल के नेतृत्व में देश की दिशा से असंतुष्ट थे और दाऊद अपने पास आने वालों को स्वीकार करने के लिए तैयार था। क्या हम दूसरों द्वारा अस्वीकार किए गए लोगों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? (3) अपने लोगों की बढ़ती हुई सँख्या के साथ दाऊद बाहर चला गया, यह न जानते हुए कि वह कहाँ जाएगा, परन्तु उसने परमेश्‍वर की सुरक्षा का पालन करने का संकल्प लिया और इसलिए स्वयं को उसके अधीन कर लिया। (4) इससे शाऊल की योजनाएँ टूट गईं। स्मरण रखें कि हमने योजनाओं के बारे में इस शिक्षण में पहले क्या सीखा था? शाऊल को उस योजना की आवश्यकता भी नहीं थी, क्योंकि शाऊल के उसे पूरा करने से पहले ही परमेश्‍वर ने दाऊद को बचा लिया था। 


इस पाठ के पहले हमने यह भी देखा कि शाऊल ने दावा किया था कि परमेश्‍वर ने दाऊद को उसके हाथ में सौंप दिया था, परन्तु कहानी ने वास्तव में प्रमाणित किया कि परमेश्‍वर ने उसे उसके हाथ से बचा लिया, जैसे कि पक्षी के जाल से एक पक्षी। "जब शाऊल को यह बताया गया कि दाऊद कीला से निकल भागा है, तब उसने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया।" जैसा कि उसने सोचा था। हम इसे पहले वचन 8 में पढ़ते हैं, "तब शाऊल ने अपनी सारी सेना को लड़ाई के लिये बुलवाया, कि कीला को जाकर दाऊद और उसके जनों को घेर ले।" परन्तु अब हम वचन 13 में पढ़ते हैं (वचन 8 के बाद केवल पाँच वचन बाद ही) "जब शाऊल को यह बताया गया कि दाऊद कीला से निकल भागा है, तब उसने वहाँ जाने का विचार छोड़ दिया।" कितना बढ़िया विचार है। यदि दाऊद वहाँ नहीं है, तो वहाँ क्यों जाना है? स्पष्ट रूप से शाऊल ने केवल अपने ही पहरुओं को ले जाने का निश्‍चय किया, और उसकी खोज में चला गया, क्योंकि हम बाद में देखेंगे कि शाऊल अभी भी दाऊद का पीछा कर रहा है। 


और इस कहानी से आप और मैं एक और उदाहरण देखते हैं कि परमेश्‍वर अपने लोगों के शत्रुओं के मंशाओं को चौंका देता है और उनकी सलाह को पलट देते हैं। परमेश्‍वर जानता है कि पासे को कैसे घुमाना है। यही कारण है कि यह आपके और मेरे और सभी मसीही अगुवों, पास्टरों, प्रचारकों और मिशनरियों के लिए अच्छा है कि वे परमेश्‍वर के मूल्य और मार्गदर्शन को प्राप्त करने के तरीके को सीखें। इसके बिना घर से बाहर न निकलें। प्रत्येक राष्ट्र के पास किसी न किसी प्रकार की केंद्रीय खुफिया एजेंसी होती है, जिसे कभी-कभी सेन्ट्रेल इन्टेलीजेन्स एजेंसी के रूप में जाना जाता है - एक सरकारी संस्था, जो शत्रुओं से स्वयं को बचाने में सहायता करने के लिए जानकारी एकत्र करती है। परमेश्‍वर के पास, नहीं, परमेश्‍वर स्वयं ही, एक केंद्रीय खुफिया एजेंसी है। उसके पास अपने सैनिकों के विरुद्ध नियोजित सभी गतिविधियों के बारे में सही बुद्धि/जानकारी है।