अद्भुत दयालुता

अध्याय तैंतीस


1 शमूएल 24:1-15

Ron Meyers

1जब शाऊल पलिश्तियों का पीछा करके लौटा, तब उसको यह समाचार मिला, कि दाऊद एनगदी के जंगल में है। 2तब शाऊल समस्त इस्राएलियों में से तीन हज़ार को छाँटकर दाऊद और उसके जनों को ‘बनैले बकरों की चट्टानों’ पर खोजने गया। 3जब वह मार्ग पर के भेड़शालों के पास पहुँचा जहाँ एक गुफ़ा थी, तब शाऊल दिशा फिरने को उसके भीतर गया। उसी गुफ़ा के कोनों में दाऊद और उसके जन बैठे हुए थे। 4तब दाऊद के जनों ने उससे कहा, “सुन, आज वही दिन है जिसके विषय यहोवा ने तुझ से कहा था, ‘मैं तेरे शत्रु को तेरे हाथ में सौंप दूँगा, कि तू उससे मनमाना बर्ताव कर ले’।” तब दाऊद ने उठकर शाऊल के बागे की छोर को छिपकर काट लिया। 5इसके बाद दाऊद शाऊल के बागे की छोर काटने से पछताया। 6वह अपने जनों से कहने लगा, “यहोवा न करे कि मैं अपने प्रभु से जो यहोवा का अभिषिक्‍त है, ऐसा काम करूँ कि उस पर हाथ उठाऊँ, क्योंकि वह यहोवा का अभिषिक्‍त है।” 7ऐसी बातें कहकर दाऊद ने अपने जनों को समझाया, और उन्हें शाऊल पर आक्रमण करने को उठने न दिया। फिर शाऊल उठकर गुफ़ा से निकला और अपना मार्ग लिया। 8उसके बाद दाऊद भी उठकर गुफ़ा से निकला, और शाऊल को पीछे से पुकार कर बोला, “हे मेरे प्रभु, हे राजा।” जब शाऊल ने पीछे मुड़कर देखा, तब दाऊद ने भूमि की ओर सिर झुकाकर दण्डवत् की। 9और दाऊद ने शाऊल से कहा, “जो मनुष्य कहते हैं कि दाऊद तेरी हानि चाहता है उनकी तू क्यों सुनता है? 10देख, आज तू ने अपनी आँखों से देखा है कि यहोवा ने आज गुफ़ा में तुझे मेरे हाथ सौंप दिया था; और किसी किसी ने तो मुझ से तुझे मार डालने को कहा था, परन्तु मुझे तुझ पर तरस आया; और मैं ने कहा, ‘मैं अपने प्रभु पर हाथ न उठाऊँगा; क्योंकि वह यहोवा का अभिषिक्‍त है।’ 11फिर, हे मेरे पिता, देख, अपने बागे की छोर मेरे हाथ में देख; मैं ने तेरे बागे की छोर तो काट ली, परन्तु तुझे घात न किया; इससे निश्‍चय करके जान ले, कि मेरे मन में कोई बुराई या अपराध का सोच नहीं है। मैं ने तेरे विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया, परन्तु तू मेरा प्राण लेने को मानो उसका अहेर करता रहता है। 12यहोवा मेरा और तेरा न्याय करे, और यहोवा तुझ से मेरा बदला ले; परन्तु मेरा हाथ तुझ पर न उठेगा। 13प्राचीनों के नीति वचन के अनुसार : ‘दुष्‍टता दुष्‍टों से होती है;’ परन्तु मेरा हाथ तुझ पर न उठेगा। 14इस्राएल का राजा किसका पीछा करने को निकला है? और किसके पीछे पड़ा है? एक मरे कुत्ते के पीछे! एक पिस्सू के पीछे! 15इसलिये यहोवा न्यायी होकर मेरा तेरा विचार करे, और विचार करके मेरा मुक़द्दमा लड़े, और न्याय करके मुझे तेरे हाथ से बचाए।”


1. दाऊद की गतिविधि (गुफ़ा में और जब वह वहाँ से चला गया)। वचन 1 – 7

जैसे ही शाऊल का पलिश्तियों के विरुद्ध अभियान समाप्त हुआ, वह फिर से दाऊद का पीछा करने लगा। वचन 1 और 2 हमें बताते हैं: “जब शाऊल पलिश्तियों का पीछा करके लौटा, तब उसको यह समाचार मिला, कि दाऊद एनगदी के जंगल में है। 2तब शाऊल समस्त इस्राएलियों में से तीन हज़ार को छाँटकर दाऊद और उसके जनों को ‘बनैले बकरों की चट्टानों’ पर खोजने गया।” शाऊल के लिए यह बात तर्कसंगत थी, क्योंकि वह पूरी तरह से अपनी सोच के अनुसार ही काम कर रहा था। वचन 2 में शाऊल ने जो किया, वह उसके लिए वचन 1 में सुनी गई बात के अनुरूप ही था। उसने सुना कि दाऊद कहाँ है और उसे खोजने के लिए निकल पड़ा। इस बुरे व्यक्ति के लिए बुरा काम करना स्वाभाविक था। और इसी कहानी में हम देखते हैं कि दाऊद—एक भले व्यक्ति—के लिए भला काम करना स्वाभाविक था।


हमने देखा है कि शाऊल दाऊद को घात करने का अवसर खोज रहा था, और, उसके लिए शर्मिंदगी की बात यह थी कि उसे ऐसा अवसर कभी नहीं मिला। हालाँकि, इस अध्याय में, शाऊल की सोच के बिल्कुल विपरीत, दाऊद के पास शाऊल को नष्ट करने का एक अच्छा और आसान अवसर था, परन्तु—उसके सम्मान की बात यह है कि—उसने ऐसा नहीं किया। उसने शाऊल के प्राण छोड़ दिए; और यह उसके भीतर परमेश्‍वर के अनुग्रह का उतना ही बड़ा प्रमाण था, जितना कि उसके अपने प्राणों का आश्‍चर्यजनक रूप से बच जाना परमेश्‍वर की सुरक्षा का एक उदाहरण था। ध्यान दें (1) कि शाऊल कितनी द्वेषपूर्ण भावना से दाऊद के प्राणों का प्यासा था।


वचन 3 कहता है: “जब वह मार्ग पर के भेड़शालों के पास पहुँचा जहाँ एक गुफ़ा थी, तब शाऊल दिशा फिरने को उसके भीतर गया। उसी गुफ़ा के कोनों में दाऊद और उसके जन बैठे हुए थे।” यहाँ कुछ हास्य भी छिपा है। केवल परमेश्‍वर ही ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकता था। शाऊल उस समय कितना असुरक्षित था! वह अपनी व्यक्तिगत् आवश्यकता में पूरी तरह से व्यस्त था, और यदि दाऊद उस पर आक्रमण कर देता, तो वह अपना बचाव करने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं होता।


वचन 4 में, लोगों ने कहा: “तब दाऊद के जनों ने उससे कहा, “सुन, आज वही दिन है जिसके विषय यहोवा ने तुझ से कहा था, ‘मैं तेरे शत्रु को तेरे हाथ में सौंप दूँगा, कि तू उससे मनमाना बर्ताव कर ले’। तब दाऊद ने उठकर शाऊल के बागे की छोर को छिपकर काट लिया।” जरा एक मिनट रुकिए। क्या परमेश्‍वर ने सचमुच ऐसा कहा था? यह बात कहाँ लिखी हुई है? परमेश्‍वर ने दाऊद को बदला लेना नहीं सिखाया था। ऐसा लगता है कि यहाँ दाऊद के लोगों ने परमेश्‍वर की बात को गलत तरीके से पेश किया है। लोग शायद कहें कि हमें बदला लेना चाहिए, परन्तु परमेश्‍वर ने ऐसा नहीं कहा था।


दाऊद ने बड़े मन से शाऊल के प्राण लेने से छोड़ दिए, जबकि उस समय वह शाऊल पर पूरी तरह हावी था और उसे आसानी से मार सकता था; परन्तु उसने शाऊल के बागे का बस एक छोर ही काटा। ऐसा उसने शाऊल के वस्त्रों को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं किया था, बल्कि इसलिए किया था, ताकि बाद में वह शाऊल को यह प्रमाणित कर सके कि उसने क्या किया था—या यूँ कहें कि उसने क्या नहीं किया था। या, कुछ लोगों का कहना है कि किसी राजा का राजसी वैभव उसके बोगे के निचले किनारे में ही छिपा होता था; और जब दाऊद ने शाऊल के बागे का कोना काटा, तो वास्तव में उसने शाऊल के बागे का वह हिस्सा काट दिया, जो उसके राजा होने के वैभव को दर्शाता था। यदि ऐसा है, तो दाऊद ने शाऊल के राजसी पद के प्रतीक को ही हटा दिया था। उसने शाऊल के प्राण तो नहीं लिए, परन्तु उसके राजसी पद के प्रतीक को अवश्य हटा दिया। यह समझना आसान है कि बाद में दाऊद को अपने इस काम पर पछतावा क्यों हुआ। वचन 5 के अनुसार, दाऊद का "शाऊल के बागे की छोर काटने से पछताया।" हालाँकि उसने शाऊल के प्राण नहीं लिए थे, परन्तु उसने एक महत्वपूर्ण प्रतीक को हटा दिया था। वह एक संवेदनशील मुद्दे—शाऊल के राजपद—को छू रहा था, जबकि शाऊल पहले से ही दाऊद की कारण से अपनी स्थिति को लेकर खतरे में महसूस कर रहा था।


2. दाऊद के शब्द (गुफ़ा के बाहर, शाऊल से उसका आग्रह)। वचन 8 – 15

उस सार्थक तरीके पर ध्यान दें, जिससे दाऊद ने शाऊल के नए व्यवहारों की अपनी व्याख्या को संबोधित किया, और उस सच्ची विचारशीलता पर, जिसके साथ दाऊद ने शाऊल को अपने प्रति सर्वोत्तम व्यवहार अपनाने के लिए मनाने की कोशिश में उससे तर्क-वितर्क किया। यहाँ शाऊल के लिए दाऊद का मन तोड़ने वाला, मार्मिक, स्नेहपूर्ण और भावुक भाषण मिलता है, जिसमें उसने शाऊल को यह समझाने का प्रयास किया कि इस तरह उसका सताव करके उसने दाऊद के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है, और उसने उससे मेल-मिलाप के लिए मनाने की कोशिश की।


जैसे ही शाऊल गुफ़ा से दूर जाने लगता है, दाऊद उसे पुकारता है, और जब शाऊल का ध्यान उसकी ओर हो जाता है, तो वह अपनी बात को बोलता है। दाऊद, शाऊल के अपने प्रति क्रोध का दोष उसके दुष्ट सलाहकारों पर डालता है: "और दाऊद ने शाऊल से कहा, "जो मनुष्य कहते हैं कि दाऊद तेरी हानि चाहता है, उनकी तू क्यों सुनता है?"" (वचन 9)। किसी भी देश के राजा के लिए—यदि वह कोई गलती करता है—तो उसका दोष अपने अधीनस्थों पर डालना सामान्य और सरल बात है; ये वे लोग होते हैं, जिन्होंने या तो उसे ऐसा करने की सलाह दी थी, या जिन्हें उसे ऐसा न करने की सलाह देनी चाहिए थी। इस घटना में, दाऊद के पास यह सोचने का पर्याप्त कारण था कि शाऊल वास्तव में केवल अपनी ईर्ष्या और द्वेष के कारण ही उसका सताव कर रहा था; फिर भी उसने विनम्रतापूर्वक, कूटनीति से और सावधानीपूर्वक यह सुझाव दिया कि शायद दूसरों ने उसे प्रभावित किया हो, और शाऊल को यह विश्‍वास दिलाया हो कि दाऊद उसका शत्रु है और यह कि वह उसकी बुराई चाहता था।

शैतान, जो भाइयों पर दोष लगाने वाला सबसे बड़ा शत्रु है, उसके कार्यकर्ता हर स्थान पर विद्यमान हैं। उनका काम ही यह है कि वे परमेश्‍वर के लोगों को कैसर का शत्रु, राजाओं को नुकसान पहुँचाने वाले और अपने अतिरिक्त दूसरी मसीही सेवकाईयों को विनाशकारी के रूप में प्रस्तुत करें। दोषों की बौछार होती है, अफवाहें फैलती हैं, नकारात्मक समाचार जोर पकड़ते हैं और विनाशकारी झूठ कई गुना बढ़ जाते हैं। केवल धार्मिकता की झिलम और विश्‍वास की ढाल जैसे प्रभाव डालने वाले आत्मिक हथियारों से ही परमेश्‍वर के सैनिक आज इस लड़ाई को जीत सकते हैं और पलटे के बिना आक्रमण किए शांत रह सकते हैं। परमेश्‍वर आपको बुला रहा है, हे परमेश्‍वर के पुरुष और स्त्री, कि आप मजबूत बनें और दूसरों को, जो आपके उदाहरण पर चलते हैं, यह दिखाएँ कि ऐसे विरोधी संघर्षों में कैसे जीत प्राप्त की जाती है।


“यहोवा ने आज गुफ़ा में तुझे मेरे हाथ सौंप दिया था” (वचन 10)। इससे पहले शाऊल ने गलत दावा किया था, जिसका वर्णन 1 शमूएल 23:7 में मिलता है, कि परमेश्‍वर ने दाऊद को उसके हाथों में सौंप दिया था; परन्तु यहाँ हम एक बहुत ही ज्यादा स्पष्ट उदाहरण देखते हैं कि परमेश्‍वर ने वास्तव में शाऊल को दाऊद के हाथों में सौंप दिया। और दाऊद ने क्या किया? उसने उसे जाने दिया।


दाऊद ने पूरी गंभीरता से अपनी निर्दोषता का दावा किया, और कहा कि वह शाऊल को कोई भी वास्तविक नुकसान या आहत पहुँचाने से कोसों दूर है—सिवाय उस प्रतीकात्मक काम के, जिसमें उसने शाऊल के राजा होने के पद के प्रतीक को हटा दिया था। वचन 11 कहता है: “फिर, हे मेरे पिता, देख, अपने बागे की छोर मेरे हाथ में देख; मैं ने तेरे बागे की छोर तो काट ली, परन्तु तुझे घात न किया; इससे निश्‍चय करके जान ले, कि मेरे मन में कोई बुराई या अपराध का सोच नहीं है। मैं ने तेरे विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया, परन्तु तू मेरा प्राण लेने को मानो उसका अहेर करता रहता है।” मुझ पर किसी भी अपराध का दोष नहीं लगाया जा सकता, न ही मुझे किसी अपराध का एहसास है; तू बेझिझक मेरे मन में झाँककर मेरी ईमानदारी देख सकते हो। फिर उसने आगे कहा, “परन्तु तू मेरा प्राण लेने को मानो उसका अहेर करता रहता है” (वचन 11)।


उसने उसे ‘पिता’ कहकर पुकारा (वचन 1), क्योंकि वह न केवल एक राजा के तौर पर अपने देश का पिता था, बल्कि विशेष रूप से वह दाऊद का ससुर भी था। एक पिता से कोई भी करुणा और अच्छी राय की आशा कर सकता है। किसी राजा का अपनी अच्छी प्रजा में से किसी की नाश चाहना उतना ही अस्वाभाविक है, जितना किसी पिता का अपने ही सन्तान की नाश चाहना।  शाऊल परमेश्‍वर से बिल्कुल उलट है।


दाऊद ने ऐसे अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किए, जिनसे उस बेईमानी से भरे दोष का झूठा होना प्रमाणित हो गया—जिस पर शाऊल की उसके प्रति घृणा टिकी हुई थी। दाऊद पर अपमानजनक आरोप लगाया गया था कि वह शाऊल को नुकसान पहुँचाना चाहता है: “फिर, हे मेरे पिता, देख, अपने बागे की छोर मेरे हाथ में देख; मैं ने तेरे बागे की छोर तो काट ली, परन्तु तुझे घात न किया” (वचन 11)।

‘इससे निश्‍चय करके जान ले, कि मेरे मन में कोई बुराई या अपराध का सोच नहीं है। मैं ने तेरे विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया, परन्तु तू मेरा प्राण लेने को मानो उसका अहेर करता रहता है।’ “यहोवा ने आज (बहुत ही आश्‍चर्यजनक रूप से) गुफ़ा में तुझे मेरे हाथ सौंप दिया था।” इस प्रमाण की पुष्टि करने के लिए, उसने शाऊल को दिखाया कि परमेश्‍वर की कृपा ने उसे ऐसा करने का अवसर दिया था: और कई लोग यह निष्कर्ष निकालते कि यह परमेश्‍वर की इच्छा थी कि वह शाऊल को निर्णायक वार करे, जिसकी गर्दन उस समय वार के लिए पूरी तरह से खुली हुई थी—ठीक वैसे ही, जैसे गोलियत की गर्दन खुली हुई थी। जब शाऊल को दाऊद के मुकाबले बस थोड़ा सा ही लाभ मिला था, तो उसने चिल्लाकर कहा था, “यहोवा ने आज  गुफ़ा में तुझे मेरे हाथ सौंप दिया था” (1 शमूएल 23:7), और उसने उस लाभ का पूरा लाभ उठाने का निर्णय किया था; परन्तु दाऊद ने ऐसा नहीं किया।


दाऊद के सलाहकारों और उसके आस-पास के लोगों ने उसे ऐसा करने के लिए पूरी शक्ति से उकसाया था: “कुछ लोगों ने मुझे तुझे घात के लिए जोर दिया था।” उसने शाऊल को लोगों की बातों पर कान लगाने के लिए दोषी ठहराया था, और वह सही भी था; परन्तु अब वह दावा करता है कि शाऊल के विपरीत—जो बुरी सलाह सुनने को तैयार रहता था—उसने स्वयं ऐसी सलाह नहीं मानी। मानो वह यह कह रहा हो, ‘यदि मैंने ऐसा किया होता, तो तू अभी तक जीवित नहीं होता।’ दाऊद का ऐसा करने से इनकार करना एक अच्छा निर्णय था; ऐसा इसलिए नहीं था कि शाऊल के पहरुए उसके आस-पास विद्यमान थे, जो शायद शाऊल की मृत्यु का बदला ले सकते थे; नहीं, उसे ऐसा करने से रोकने वाला डर उन पहरुओं का नहीं, बल्कि परमेश्‍वर का डर था। “वह मेरा स्वामी है, और प्रभु यहोवा का अभिषिक्त है, जिसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है, और जिसके प्रति मैं निष्ठा और विश्‍वासयोग्यता का ऋणी हूँ; और इसलिए मैंने कहा, मैं उसके सिर के एक बाल को भी हाथ नहीं लगाऊँगा।” उसने स्वयं पर इतना पूर्ण और स्वस्थ नियंत्रण रखा था कि, सबसे बड़े उकसावे के बावजूद भी, उसने अपने स्वभाव को अपने सिद्धान्तों के विरुद्ध विद्रोह करने की अनुमति नहीं दी।


उसने इस पक्की मंशा को स्पष्ट किया कि वह कभी भी स्वयं अपना बदला नहीं लेगा: “यहोवा मेरा और तेरा न्याय करे, और यहोवा तुझ से मेरा बदला ले; परन्तु मेरा हाथ तुझ पर न उठेगा” (वचन 12)। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं स्वयं अपना बदला नहीं लूँगा। और फिर उसने आगे कहा, जैसा कि 13वें वचन में लिखा है, “प्राचीनों के नीति वचन के अनुसार : ‘दुष्‍टता दुष्‍टों से होती है;’ परन्तु मेरा हाथ तुझ पर न उठेगा।” पुरखाओं की समझदारी उनकी कहावतों के द्वारा आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचती है। हमें भी अपने पुरखाओं से परंपरा के रूप में ऐसी ही कई समझदारी की बातें मिलती हैं; और सामान्य लोगों की सलाहें भी बहुत ज्यादा हद तक इसी बात से तय होती हैं, “प्राचीनों के नीति वचन के अनुसार।” यहाँ एक ऐसी कहावत है, जो दाऊद के समय में उपयोग होती थी: “दुष्‍टता दुष्‍टों से होती है,” अर्थात्, व्यक्ति की अपनी बुराई ही आखिर में उसे नाश कर देगी—बहुत से लोग इस कहावत का यही अर्थ समझते हैं। भविष्य में, हताश और गुस्से से भरे लोग अपनी ही छुरियों से अपना ही गला काट लेंगे। उन्हें थोड़ी ढील दे दो, और वे स्वयं ही अपने गले में फंदा डाल लेंगे। इस भाव से, यह एक सही कारण बन जाता है कि दाऊद का हाथ शाऊल पर क्यों नहीं उठना चाहिए था। दाऊद शाऊल को स्वयं को नुकसान पहुँचाने देगा, परन्तु दाऊद उसे नुकसान नहीं पहुँचाएगा।


दुष्‍टता दुष्‍टों से होती है; एक व्यक्ति के सिद्धान्त और उसका स्वभाव जैसा होगा, उसके काम भी वैसे ही होंगे। लोग जैसा सोचते हैं, वैसा ही बोलते हैं: मन में जो भरा होता है, मुँह से वही निकलता है। लोग जैसा सोचते हैं, वैसा ही करते हैं: उनके कामों से ही आप उन्हें पहचानेंगे। यह बात भी दाऊद की उपयोग की हुई कहावत से पूरी तरह मेल खाती है। यदि दाऊद एक बुरा व्यक्ति होता—जैसा कि उसे दिखाया गया था—तो वह भी यह बुरा काम अवश्य करता; परन्तु उसने ऐसा करने की हियाव नहीं किया, क्योंकि उसे परमेश्‍वर का भय था। बुरे लोग हमें चाहे जितना भी नुकसान पहुँचाएँ, हमें बदले में उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए; बुरे लोग हमारे साथ जैसा बर्ताव करते हैं, हम वैसा ही बर्ताव उनके साथ नहीं करते। बुरे लोग बुरे काम ही करते हैं। वे उन काँटों की तरह हैं, जिनके बीच हम रहते हैं, और जो काँटों के बीच रहता है, उसे चुभने की आशा तो रखनी ही चाहिए। हालाँकि “दुष्‍टता दुष्‍टों से होती है,” फिर भी हमारी तरफ से वैसा ही बर्ताव नहीं होगा; हम उस तरह से बदला नहीं लेंगे। हम बदले की भावना से काम नहीं करते; हम वैसे ही पेश आते हैं, जैसे हम वास्तव में हैं। यदि हम सचमुच अच्छे हैं, तो हम अच्छे काम ही करेंगे। भले ही कुत्ता भेड़ों पर भौंकता है, परन्तु भेड़ें कुत्ते पर नहीं भौंकतीं। बुरे लोग बुरे काम करते हैं; अच्छे लोग अच्छे काम करते हैं। यशायाह की इस गहरी समझ यशायाह 32:6-8 में पर ध्यान दें: “क्योंकि मूढ़ तो मूढ़ता ही की बातें बोलता और मन में अनर्थ ही गढ़ता रहता है कि वह अधर्म के काम करे और यहोवा के विरुद्ध झूठ कहे, भूखे को भूखा ही रहने दे और प्यासे का जल रोक रखे। छली की चालें बुरी होती हैं, वह दुष्‍ट युक्‍तियाँ निकालता है कि दरिद्र को भी झूठी बातों में लूटे जब कि वे ठीक और नम्रता से भी बोलते हों। परन्तु उदार मनुष्य उदारता ही की युक्‍तियाँ निकालता है, वह उदारता में स्थिर भी रहेगा।।” हम एक विपरीत कहावत की सच्चाई के आधार पर भी जी सकते हैं: “अच्छे लोगों से ही अच्छी बातें ही निकलती हैं।”

दाऊद ने शाऊल को यह समझाने की कोशिश की कि, शाऊल का दाऊद जैसे एक छोटे और सीधे-सादे व्यक्ति का पीछा करना न केवल एक बुरा काम था, बल्कि एक नीच कार्यवाही भी थी। वह 14वें वचन में कहता है, “इस्राएल का राजा किसका पीछा करने को निकला है? और किसके पीछे पड़ा है? एक मरे कुत्ते के पीछे! एक पिस्सू के पीछे!” एक मरा हुआ कुत्ता; एक पिस्सू—जैसा कि इब्रानी भाषा में कहा गया है। एक इतने बड़े राजा के कारण, उसका अपना ही एक सेवक—जो पहले एक निर्धन चरवाहा था, अब देश निकाला झेल रहा है, और न तो विरोध करने में सक्षम है और न ही इच्छुक—जैसे एक कमजोर और अपने से बिल्कुल ही बेमेल व्यक्ति के साथ मुकाबला करना, उसके प्रताप के विरुद्ध है। उसे हराने से राजा का कोई सम्मान नहीं बढ़ेगा; बल्कि ऐसा करने की कोशिश से उसका नाम ही बुरा हो सकता है। यदि शाऊल अपने व्यक्तिगत् इतिहास और प्रतिष्ठा के बारे में सोचता, तो वह ऐसे कमजोर शत्रु से लड़ने के लिए इतना नीचे नहीं गिरता—भले ही वह सचमुच उसका शत्रु होता—और उसे यह एहसास होता कि उससे उसे कोई खतरा नहीं है। दाऊद शाऊल से लड़ने की इच्छा रखने से इतना दूर था कि, उसके अपने ही शब्दों में, वह राजा शाऊल के मुकाबले एक मरे हुए कुत्ते जैसा था।


वर्षों बाद, जब दाऊद राजा बन गया, तो शाऊल के पोते, मपीबोशेत ने स्वयं को एक मरे हुए कुत्ते जैसा बताया। “उसने दण्डवत् करके कहा, “तेरा दास क्या है, कि तू मुझ ऐसे मरे कुत्ते की ओर दृष्‍टि करे?” (2 शमूएल 9:8)। यदि शाऊल के मन में उदारता या कम से कम मानवता की कोई भी चिंगारी बची होती, तो उसकी ये विनम्र बातें अवश्य उस पर कुछ प्रभाव डालतीं। “शेर के लिए इतना ही बहुत ज्यादा है कि उसने अपने शिकार को भूमि पर गिरा दिया है।” एक मरे हुए कुत्ते को कुचलने में शाऊल को भला क्या बड़ाई मिलती? एक पिस्सू का शिकार करने में उसे क्या मजा आ सकता था—केवल एक पिस्सू को—जिसके बारे में यदि आप सोचें, उसे तो ढूँढ़ना आसान भी नहीं; और यदि मिल भी जाए, तो उसे पकड़ना आसान नहीं; और यदि पकड़ भी लिया जाए, तो वह कोई बहुत बड़ा प्रतिफल नहीं मिलता है—विशेषकर एक राजा के लिए। "चील कभी मक्खियों पर झपट्टा नहीं मारती।" दाऊद को लगा कि शाऊल के पास उससे डरने का कोई कारण नहीं था—ठीक वैसे ही, जैसे किसी पिस्सू के काटने से डरने का कोई कारण नहीं होता।


जैसा कि वचन 12 और 15 दोनों हमें दिखाते हैं, दाऊद ने बार-बार परमेश्‍वर से एक न्यायी के रूप में गुहार लगाई। “यहोवा मेरा और तेरा न्याय करे, और यहोवा तुझ से मेरा बदला ले; परन्तु मेरा हाथ तुझ पर न उठेगा।” और “इसलिये यहोवा न्यायी होकर मेरा तेरा विचार करे, और विचार करके मेरा मुक़द्दमा लड़े, और न्याय करके मुझे तेरे हाथ से बचाए।” परमेश्‍वर का न्याय ही उन लोगों के लिए शरण और सांत्वना है, जो सताए हुए, पीड़ित और निर्दोष हैं। यदि मनुष्य हमारे साथ अन्याय करते हैं, तो परमेश्‍वर हमारे साथ न्याय करेगा—भले ही इसमें लंबा समय लगे, परन्तु अंततः न्याय के उस बड़े दिन में ऐसा अवश्य होगा। दाऊद ने अपना मुकद्दमा परमेश्‍वर के हाथों में सौंप दिया, और इस प्रकार वह संतुष्ट होकर विश्राम करने लगा, और उसके सामने उपस्थित होने के अपने समय की प्रतीक्षा करने लगा। 


शायद इसी समय दाऊद ने सातवाँ भजन लिखा था, जो कूशी बिन्यामीनी (संभवतः शाऊल) के विषय से जुड़ा था, जिसमें उसने परमेश्‍वर से इस तरह गुहार लगाई: “दाऊद का शिग्गायोन नामक भजन जो उसने बिन्यामीनी कूश की बातों के कारण यहोवा के सामने गाया।” “1हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, मेरा भरोसा तुझ पर है; सब पीछा करनेवालों से मुझे बचा और छुटकारा दे, 2ऐसा न हो कि वे मुझ को सिंह के समान फाड़कर टुकड़े टुकड़े कर डालें; और कोई मेरा छुड़ानेवाला न हो। 3हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, यदि मैं ने यह किया हो, यदि मेरे हाथों से कुटिल काम हुआ हो, 4यदि मैं ने अपने मेल रखनेवालों से भलाई के बदले बुराई की हो, या मैं ने उसको जो अकारण मेरा बैरी था लूटा है, 5तो शत्रु मेरे प्राण का पीछा करके मुझे आ पकड़े, और मेरे प्राण को भूमि पर रौंदे, और मेरी महिमा को मिट्टी में मिला दे. . . 8यहोवा जाति जाति का न्याय करता है; यहोवा मेरे धर्म और खराई के अनुसार मेरा न्याय चुका दे। 9भला हो कि दुष्‍टों की बुराई का अन्त हो जाए, परन्तु धर्म को तू स्थिर कर; क्योंकि धर्मी परमेश्‍वर मन और मर्म का ज्ञाता है। 10मेरी ढाल परमेश्‍वर के हाथ में है, वह सीधे मनवालों को बचाता है। 11परमेश्‍वर धर्मी और न्यायी है, वरन् ऐसा ईश्‍वर है जो प्रतिदिन क्रोध करता है. . . 17मैं यहोवा के धर्म के अनुसार उसका धन्यवाद करूँगा, और परमप्रधान यहोवा के नाम का भजन गाऊँगा।”


सर्वोत्तम होता कि हमारा कोई ऐसा शत्रु न होता, जिसे हम शत्रु मानते, परन्तु यदि दूसरे स्वयं को हमारा शत्रु बना लेते हैं, तो हमें वही करना चाहिए, जो दाऊद ने किया था। क्या हम उनके प्रति उतने ही दयालु हो सकते हैं, जितना दाऊद था? अद्भुत दयालुता! यह अच्छे मसीही अगुवों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।