शांतिदूत
अध्याय सैंतीस
1 शमूएल 25:23-35

Ron Meyers
23दाऊद को देख अबीगैल फुर्ती करके गदहे पर से उतर पड़ी, और दाऊद के सम्मुख मुँह के बल भूमि पर गिरकर दण्डवत् की। 24फिर वह उसके पाँव पर गिरके कहने लगी, “हे मेरे प्रभु, यह अपराध मेरे ही सिर पर हो; तेरी दासी तुझ से कुछ कहना चाहती है, और तू अपनी दासी की बातों को सुन ले। 25मेरा प्रभु उस दुष्ट नाबाल पर चित्त न लगाए; क्योंकि जैसा उसका नाम है वैसा ही वह आप है; उसका नाम तो नाबाल है, और सचमुच उस में मूढ़ता पाई जाती है; परन्तु मुझ तेरी दासी ने अपने प्रभु के जवानों को जिन्हें तू ने भेजा था न देखा था। 26और अब, हे मेरे प्रभु, यहोवा के जीवन की शपथ और तेरे जीवन की शपथ, कि यहोवा ने जो तुझे खून से और अपने हाथ के द्वारा अपना बदला लेने से रोक रखा है, इसलिये अब तेरे शत्रु और मेरे प्रभु की हानि के चाहनेवाले नाबाल ही के समान ठहरें। 27और अब यह भेंट जो तेरी दासी अपने प्रभु के पास लाई है, उन जवानों को दी जाए जो मेरे प्रभु के साथ चलते हैं। 28अपनी दासी का अपराध क्षमा कर; क्योंकि यहोवा निश्चय मेरे प्रभु का घर बसाएगा और स्थिर करेगा, इसलिये कि मेरा प्रभु यहोवा की ओर से लड़ता है; और जन्म भर तुझ में कोई बुराई नहीं पाई जाएगी। 29और यद्यपि एक मनुष्य तेरा पीछा करने और तेरे प्राण का ग्राहक होने को उठा है, तौभी मेरे प्रभु का प्राण तेरे परमेश्वर यहोवा की जीवनरूपी गठरी में बँधा रहेगा, और तेरे शत्रुओं के प्राणों को वह मानो गोफ़न में रखकर फेंक देगा। 30इसलिये जब यहोवा मेरे प्रभु के लिये यह समस्त भलाई करेगा जो उस ने तेरे विषय में कही है, और तुझे इस्राएल पर प्रधान करके ठहराएगा, 31तब तुझे इस कारण पछताना न होगा, या मेरे प्रभु का हृदय पीड़ित न होगा कि तू ने अकारण खून किया, और मेरे प्रभु ने अपना बदला आप लिया है। फिर जब यहोवा मेरे प्रभु से भलाई करे तब अपनी दासी को स्मरण करना।” 32दाऊद ने अबीगैल से कहा, “इस्राएल का परमेश्वर यहोवा धन्य है, जिसने आज के दिन मुझ से भेंट करने के लिये तुझे भेजा है! 33और तेरा विवेक धन्य है, और तू आप भी धन्य है, कि तू ने मुझे आज के दिन खून करने और अपना बदला आप लेने से रोक लिया है। 34क्योंकि सचमुच इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जिसने मुझे तेरी हानि करने से रोका है, उसके जीवन की शपथ, यदि तू फुर्ती करके मुझ से भेंट करने को न आती, तो नि:सन्देह सबेरे उजियाला होने तक नाबाल का कोई लड़का भी न बचता।” 35तब दाऊद ने उसे ग्रहण किया जो वह उसके लिये लाई थी; फिर उससे उसने कहा, “अपने घर कुशल से जा; सुन, मैं ने तेरी बात मानी है और तेरी विनती ग्रहण कर ली है।”
धन्य हैं, वे जो शांति स्थापित करते हैं। यहाँ एक आदर्श शांतिदूत का उदाहरण है—विनम्र, अपनी गलती मानने वाला, समझाने वाला, प्रशंसा करने वाला, उपहार देने वाला, दूसरे पक्ष को समझने वाला और प्रभु यहोवा का आशीषों का अनुभव करने वाला।
1. अबीगैल का दाऊद से कृपापूर्ण और बुद्धिमानी भरी आग्रह करना (वचन 22-31)
अबीगैल के कोमल उत्तर ने दाऊद के क्रोध को शांत कर दिया। अपने अत्यंत कृपापूर्ण व्यवहार और मधुर वाणी से, उसने नाबाल द्वारा कही गई अपमानजनक बातों का प्रायश्चित किया। वह दाऊद से तब मिली, जब वह क्रोधित होकर बदला लेने के लिए आगे बढ़ रहा था और नाबाल तथा उसके पूरे परिवार को नष्ट करने का विचार कर रहा था; परन्तु अबीगैल ने पूरी तरह से आज्ञाकारिता, आदर और सम्मान दिखाते हुए विनम्रतापूर्वक उससे कृपा की याचना की, और उससे उस अपराध को क्षमा करने का अनुरोध किया। उसने भूमि पर अपना मुँह झुकाकर उसे प्रणाम किया, जिससे उसकी अधीनता स्पष्ट हो जाती है। झुक जाने या समर्पण करने से बड़े-बड़े अपराध भी शांत हो जाते हैं। उसने स्वयं को एक पश्चात्तापी व्यक्ति और एक याजक के स्थान पर रखा; और जबकि यह उसके अपने परिवार की भलाई के लिए था, तब अपने ही सेवकों और दाऊद के सैनिकों के सामने ऐसा करने में उसे कोई शर्म महसूस नहीं हुई। उसने विनम्रतापूर्वक दाऊद से विनती की कि वह उसकी बात सुने: "मुझे तुझ से बात करने दें; तेरी दासी जो कहना चाहती है, उसे सुन” परन्तु शायद इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उसने जो कहा, वह दाऊद का ध्यान आकर्षित करने और उसे सुनने के लिए पर्याप्त था। तर्क का कोई भी विषय अछूता नहीं छोड़ा गया; हर बात को सही स्थान पर और सही ढंग से रखा गया, पूरी ईमानदारी से कहा गया, और सर्वोत्तम लाभ के लिए उपयोग किया गया—यह सब इतनी स्वाभाविक वाक्पटुता भर शैली के साथ किया गया, जिसकी बराबरी करना आसान नहीं है।
उसने आरम्भ से अंत तक दाऊद से उसी आदर और सम्मान के साथ बात की, जो इतने बड़े और अच्छे व्यक्ति के लिए उचित था; उसने बार-बार उसे "मेरा प्रभु" कहकर संबोधित किया, ताकि नाबाल द्वारा कहे गए उस अपराध को मिटाया जा सके, जिसमें उसने कहा था, "दाऊद कौन है?" उसने दाऊद की इस बात के लिए आलोचना नहीं की कि वह आक्रमण करने के लिए इतनी फुर्ती में क्यों आया था—हालाँकि इस बात के लिए उसे डाँट मिलनी चाहिए थी; न ही उसने उसे यह बताया कि उसके इस व्यवहार से उसके उत्तम चरित्र पर कितना बुरा प्रभाव पड़ रहा था; बल्कि उसने उसे शांत करके सर्वोत्तम मनोदशा में लाने का प्रयास किया, शायद इस आशा के साथ कि तब उसका अपना अंतःकरण ही उसके कार्य को पूरा कर देगा।
उसने दाऊद के दूतों के साथ हुए दुर्व्यवहार का दोष अपने ऊपर ले लिया: मानो वह यह कह रही हो, "यह दोष मुझ पर आए, मेरे प्रभु, मुझ पर ही आए।" "यदि तुझे गुस्सा आता है, तो मेरे बेचारे पति पर नहीं, बल्कि मुझ पर गुस्सा हो; और इसे मेरी गलती मान, उनकी नहीं।" बुरे लोग इस बात की परवाह नहीं करते कि उनकी गलतियों की कारण से दूसरों को कितना दु:ख उठाना पड़ता है, परन्तु भले मन वाले लोग दूसरों की गलतियों के लिए स्वयं दु:ख उठाने के लिए तैयार रहते हैं। यहाँ अबीगैल ने अपने पति के प्रति अपने प्रेम और कर्तव्य की सच्चाई और मजबूती, और अपने परिवार के लिए अपनी चिंता स्पष्ट की; नाबाल जैसा भी था, वह उसका पति था।
उसने अपने पति की गलती का बचाव करते हुए कहा कि यह उसकी स्वाभाविक कमजोरी और समझ की कमी की कारण से हुई है: "कृपा करके, मेरे प्रभु, उस दुष्ट व्यक्ति नाबाल पर ध्यान न दें।" मानो वह कह रही हो, "उसकी बदतमीजी और बुरे व्यवहार पर ध्यान न दें, क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा है; यह पहली बार नहीं है, जब उसने इतना बुरा बर्ताव किया है; हर किसी को उसके साथ धैर्य धरना पड़ता है, क्योंकि उस में समझ की कमी है: उसका नाम नाबाल है, जिसका अर्थ ही 'मूर्खता' है, और मूर्खता उसके साथ ही रहती है।" यह उसकी मूर्खता की कारण से था, उसकी किसी बुरी मंशा की कारण से नहीं। "वह सीधा-सादा है, परन्तु द्वेषपूर्ण नहीं। उसे क्षमा कर दें, क्योंकि उसे पता नहीं कि वह क्या कर रहा है।" उसने जो कहा वह बिल्कुल सच था, और उसने यह बात उसकी गलती का बचाव करने और उसे नाश से बचाने के लिए कही थी; वरना, उसकी मूर्खता के बारे में इतनी स्पष्ट बात करना उसके लिए सही नहीं होता। उसने उसे सम्मान देने की कोशिश की, न कि उसकी आलोचना करने की; उसने हालात को सर्वोत्तम बनाने की कोशिश की, न कि उसके बारे में बुरा बोलने की।
उसने इस विषय में अपनी अनभिज्ञता स्पष्ट की: "परन्तु मुझ तेरी दासी ने अपने प्रभु के जवानों को जिन्हें तू ने भेजा था न देखा था" यह इशारा करते हुए कि यदि वह वहाँ होती, तो उन्हें शायद सर्वोत्तम उत्तर मिलता। उसका पति मूर्ख था, और अपने विषयों को स्वयं संभालने के योग्य नहीं था, फिर भी वह यह इशारा करती है कि उस में इतनी समझ तो थी कि वह कभी-कभी उसकी सलाह मान लेता था।
वह यह मानकर चलती है कि उसने अपनी बात मनवा ली है—शायद दाऊद के चेहरे के हाव-भाव देखकर, जिससे उसे लगा कि दाऊद का मन बदलने लगा है: "कि यहोवा ने जो तुझे खून से और अपने हाथ के द्वारा अपना बदला लेने से रोक रखा है।" दाऊद को शांत करने के लिए उसने अपनी स्वयं की दलीलों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा पर भरोसा किया, और उसे थोड़ा भी शक नहीं था कि परमेश्वर की कृपा दाऊद पर जबरदस्त प्रभाव डालेगी। और फिर उसने कहा, "इसलिये अब तेरे शत्रु और मेरे प्रभु की हानि के चाहनेवाले नाबाल ही के समान ठहरें" (वचन 26)। दूसरे शब्दों में, "प्रभु यहोवा न केवल नाबाल से, बल्कि उन सभी लोगों से तेरा बदला ले जो तेरा विरोध करते हैं।" इसका अर्थ यह है कि "यदि तू स्वयं बदला नहीं लेगा, तो इसमें कोई शक नहीं कि परमेश्वर तेरी ओर से बदला लेगा, ठीक वैसे ही जैसे वह तेरे शेष सभी शत्रुओं से लेगा।" बदला लेना विश्वासियों के विश्वास और गरिमा के विरुद्ध है। नाबाल कमजोर है; वह तुझे न तो कोई नुकसान पहुँचा सकता है और न ही कोई भलाई कर सकता है। शायद उसने दाऊद के हाल ही में शाऊल को छोड़ देने की घटना का वर्णन किया हो, जब कुछ ही दिन पहले शाऊल पूरी तरह से दाऊद की दया पर था। "क्या तू उस शेर—शाऊल—से बदला लेने में हिचकिचाया नहीं, जो तुझे फाड़ खाने के लिए तैयार था? और अब तू इस कुत्ते—नाबाल—का लहू बहाना चाहता है, जो बस तुझ पर भौंक ही सकता है?" उसने इतनी कोमल और दयालुता भरी भावना दिखाई कि उसकी दलील का दाऊद पर गहरा प्रभाव हुआ; उसने दाऊद को बदल दिया, या यूँ कहें कि दाऊद को अपना मन बदलने में सहायता की।
उसने अपने लाए हुए उपहारों का वर्णन बस हल्के-फुल्के अंदाज में किया, परन्तु उसे दाऊद के स्वीकार करने योग्य नहीं बताया; इसलिए उसने चाहा कि वह उपहार उन लोगों को दे दिया जाए, जो दाऊद के पीछे चलते हैं—शायद विशेष रूप से उन दस लोगों को जो नाबाल के पास उसके दूत बनकर गए थे, और जिनके साथ नाबाल ने बहुत ही बुरा बर्ताव किया था।
उसने दाऊद की इस बात के लिए सराहना की कि उसने अपने देश के सामान्य शत्रुओं के विरुद्ध बहुत अच्छे काम किए हैं। उसे आशा थी कि इन बड़ी उपलब्धियों के प्रताप को दाऊद किसी भी व्यक्तिगत् बदले की भावना से दाग नहीं लगने देगा: "...इसलिये कि मेरा प्रभु यहोवा की ओर से लड़ता है; और जन्म भर तुझ में कोई बुराई नहीं पाई जाएगी" (वचन 28) ...अर्थात्, जब तक तू नाबाल और उसके परिवार को मार नहीं डालता। अपनी लड़ाइयाँ लड़ने का काम परमेश्वर पर छोड़ दे। तूने अपने देश के किसी भी नागरिक के साथ कोई गलत काम नहीं किया है—भले ही तुझे एक गद्दार की तरह सताया जा रहा हो—इसलिए अब ऐसा कोई काम आरम्भ न कर, और न ही ऐसा कुछ कर, जिसका उपयोग शाऊल तुझे पकड़ने और मारने की अपनी मंशा को सही ठहराने के लिए कर सके।
उसने 29वें वचन में उसकी विद्यमान मुश्किलों के वैभवशाली परिणामों की भविष्यद्वाणी की, जिसकी तीन हिस्सों में व्याख्या करना आवश्यक है। वह वचन कहता है: "और यद्यपि एक मनुष्य तेरा पीछा करने और तेरे प्राण का ग्राहक होने को उठा है और तेरे शत्रुओं के प्राणों को वह मानो गोफ़न में रखकर फेंक देगा।" 1) हाँ, कोई तेरा पीछा कर रहा है, परन्तु फिर भी, तुझे इन विषयों को हर उस व्यक्ति के प्रति इतनी तीखी और ईर्ष्यालु दृष्टि से देखने की आवश्यकता नहीं है, जो तेरा अपमान करता है; क्योंकि ये सभी तूफ़ान जो अभी तुझे परेशान कर रहे हैं, वे जल्द ही चले जाएँगे। 2) " तौभी मेरे प्रभु का प्राण तेरे परमेश्वर यहोवा की "जीवनरूपी गठरी" में बँधा रहेगा" यह एक यहूदी मुहावरा है, जो परमेश्वर की दृष्टि में हमारे जीवन के महत्व को दर्शाता है: "जो हम को जीवित रखता है; और हमारे पाँव को टलने नहीं देता" (भजन 66:9); दूसरे शब्दों में कहें तो, "प्राण का ग्राहक हमारे परमेश्वर प्रभु यहोवा के पास है, क्योंकि हमारी साँसें और हमारा समय उसी के हाथों में है।" 3) कि परमेश्वर उसे उसके शत्रुओं पर जय देगा वह शत्रुओं के प्राणों को वह मानो गोफ़न में रखकर फेंक देगा—पत्थर गोफ़न में बंधा तो होता है, परन्तु उसे इसलिए बाँधा जाता है, ताकि उसे फिर से बाहर फेंका जा सके। इस तरह से धर्मियों की आत्माएँ खलिहान में रखे अनाज की तरह सुरक्षित रूप से बाँधकर रखी जाएँगी, परन्तु दुष्टों की आत्माएँ आग के लिए केवल जंगली घास की तरह होंगी। उसे विश्वास था कि परमेश्वर उसे धन और शक्ति देगा: “क्योंकि यहोवा निश्चय मेरे प्रभु का घर बसाएगा और स्थिर करेगा, इसलिये कि मेरा प्रभु यहोवा की ओर से लड़ता है; और जन्म भर तुझ में कोई बुराई नहीं पाई जाएगी,” अर्थात्, ‘दया दिखा, जैसा कि तू स्वयं दया पाने की आशा करता है। परमेश्वर तूझे ऊँचा उठाएगा, और ऊँचे लोगों की महिमा इसी में है कि वे अपराधों को अनदेखा कर दें।’
उसकी इच्छा थी कि वह इस बात पर विचार करे कि बाद में उसे यह स्मरण करके कितना अधिक आनन्द मिलेगा कि उसने इस अपमान को क्षमा कर दिया था, बजाय इसके कि उसने इसका बदला लिया होता। उसने इस तर्क को सबसे अंत के लिए बचाकर रखा था, क्योंकि ऐसे अच्छे व्यक्ति के लिए यह एक बहुत ही शक्तिशाली तर्क था। वचन 30 और 31 कहते हैं, “इसलिये जब यहोवा मेरे प्रभु के लिये यह समस्त भलाई करेगा जो उस ने तेरे विषय में कही है, और तुझे इस्राएल पर प्रधान करके ठहराएगा, तब तुझे इस कारण पछताना न होगा, या मेरे प्रभु का हृदय पीड़ित न होगा कि तू ने अकारण खून किया, और मेरे प्रभु ने अपना बदला आप लिया है। फिर जब यहोवा मेरे प्रभु से भलाई करे तब अपनी दासी को स्मरण करना।” वह यह सोचे बिना नहीं रह सकती थी कि यदि वह स्वयं बदला लेगा, तो बाद में उसे इसका दु:ख होगा। बहुत से लोगों ने आवेश में आकर ऐसे काम किए हैं, जिनके बारे में उन्होंने बाद में हजार बार चाहा है कि काश उन्होंने वे काम न किए होते। फुर्ती में और बिना सोचे-समझे लिए गए बदले की मिठास जल्द ही गहरी और स्थायी कड़वाहट में बदल जाती है। उसे विश्वास था कि यदि वह इस अपराध को क्षमा कर देता है, तो बाद में उसे इसका कोई दु:ख नहीं होगा; बल्कि, इसके विपरीत, उसे इस बात से अत्यन्त संतुष्टि मिलेगी कि उसकी बुद्धि और कृपा ने उसके आवेश पर विजय पा ली। जब हमें पाप करने का प्रलोभन होता है, तो हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि जब हम बाद में उस कार्य पर चिंतन करेंगे, तो वह हमें कैसा प्रतीत होगा। आइए, हम कभी भी ऐसा कोई काम न करें, जिसके लिए हमारा अपना विवेक बाद में हमें दोषी ठहराए, और जिसे हम बाद में पछतावे के साथ स्मरण करें: मेरा हृदय मुझे धिक्कारेगा नहीं।
उसने स्वयं को उसकी कृपा के लिए प्रस्तुत किया: “फिर जब यहोवा मेरे प्रभु से भलाई करे तब अपनी दासी को स्मरण करना।” उस स्त्री को स्मरण रखना, जिसने तुझे ऐसा काम करने से रोकने का प्रयास किया, जिससे तेरे सम्मान पर कलंक लगता, तेरे विवेक में अशांति पैदा होती, और तेरे इतिहास पर एक दाग लग जाता। हमारे पास उन लोगों को सम्मान और कृतज्ञता के साथ स्मरण करने का पूरा कारण है, जिन्होंने हमें पाप से दूर रखने में हमारी सहायता की है।
2. दाऊद ने आसानी से अपना मन बदल लिया।
वचन 32 - 35 हमें इस बातचीत का एक सुखद अंत को दिखाते हैं। “32दाऊद ने अबीगैल से कहा, “इस्राएल का परमेश्वर यहोवा धन्य है, जिसने आज के दिन मुझ से भेंट करने के लिये तुझे भेजा है! 33और तेरा विवेक धन्य है, और तू आप भी धन्य है, कि तू ने मुझे आज के दिन खून करने और अपना बदला आप लेने से रोक लिया है। 34क्योंकि सचमुच इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जिसने मुझे तेरी हानि करने से रोका है, उसके जीवन की शपथ, यदि तू फुर्ती करके मुझ से भेंट करने को न आती, तो नि:सन्देह सबेरे उजियाला होने तक नाबाल का कोई लड़का भी न बचता।” 35तब दाऊद ने उसे ग्रहण किया जो वह उसके लिये लाई थी; फिर उससे उसने कहा, “अपने घर कुशल से जा; सुन, मैं ने तेरी बात मानी है और तेरी विनती ग्रहण कर ली है।””
दाऊद ने तुरन्त अबीगैल की सलाह की समझदारी को पहचान लिया और उसे क्षमा कर दिया। "जैसे सोने का नथ और कुन्दन का जेवर अच्छा लगता है, वैसे ही माननेवाले के कान में बुद्धिमान की डाँट भी अच्छी लगती है" (नीतिवचन 25:12)। अबीगैल ने दाऊद के आवेश को रोकने के लिए बुद्धिमानी से उसे टोका, और दाऊद ने अपने ही सिद्धान्त के अनुसार, उस डाँट को आज्ञाकारी होकर सुना। उसने स्वयं लिखा था, "धर्मी मुझ को मारे तो यह कृपा मानी जाएगी, और वह मुझे ताड़ना दे, तो यह मेरे सिर पर का तेल ठहरेगा" (भजन संहिता 141:5)। यह सीख इससे सर्वोत्तम तरीके से न कभी दी गई और न ही कभी ली गई।
दाऊद ने परमेश्वर का धन्यवाद किया कि उसने उसे पाप के मार्ग पर जाने से रोकने के लिए यह सुखद बाधा भेजी। "इस्राएल का परमेश्वर यहोवा धन्य है, जिसने आज के दिन मुझ से भेंट करने के लिये तुझे भेजा है।" हमारे मित्र हमारे लिए, चाहे हमारे प्राण के लिए हो या शरीर के लिए, जो भी भलाईयाँ करते हैं, उन सभी में हमें परमेश्वर को ही देखना चाहिए। हमें परमेश्वर को ही उस भेजने वाले के रूप में देखना चाहिए, जो भी व्यक्ति हमसे सलाह, मार्गदर्शन, सांत्वना, चेतावनी, या यहाँ तक कि सही समय पर डाँट-फटकार लेकर मिलता है। हमें उन सुखद रुकावटों के लिए बहुत आभारी होना चाहिए, जो परमेश्वर द्वारा हमें पाप से बचाने के लिए अपनाए गए कृपापूर्ण साधन हैं।
उसने अबीगैल का धन्यवाद किया कि उसने सही समय पर हस्तक्षेप करके उसके उस गलत मंशा को रोक दिया, जिसे वह पूरा करने ही वाला था। "तेरा विवेक धन्य है, और तू आप भी धन्य है" (25:33)। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि यदि वे डाँट को धैर्य से सुन लें, तो इतना ही बहुत ज्यादा है; परन्तु हमें ऐसे बहुत कम लोग मिलते हैं, जो उसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करें और डाँटने वाले की सराहना भी करें। अबीगैल को अपने पति और परिवार को बचाने से उतना हर्ष नहीं हुआ, जितनी हर्ष दाऊद को इस बात से हुआ कि अबीगैल ने उसे और उसके लोगों को पाप करने से बचा लिया।
ऐसा लगता है कि दाऊद उस बड़े खतरे से पूरी तरह अवगत था, जिसमें वह फँसने वाला था; और इसी जागरूकता ने उसके बचाए जाने की कृपा को और भी अधिक बढ़ा दिया। वह लहू बहाने के लिए आ रहा था—एक ऐसा पाप, जिससे वह अपने होश-हवास में रहते हुए बहुत अधिक घृणा करता था; जैसा कि उसने प्रार्थना की थी: "मुझे आज के दिन खून करने और अपना बदला आप लेने से रोक लिया है।" वह अपने हाथों से बदला लेने के लिए आ रहा था, और ऐसा करके वह परमेश्वर के सिंहासन पर बैठने की कोशिश कर रहा होता—उस परमेश्वर के सिंहासन पर, जिसने कहा है: "बदला लेना मेरा काम है; मैं ही आप प्रतिफल दूँगा।" कोई पाप जितना अधिक बुरा होता है, उससे बचा जाना उतनी ही बड़ी कृपा होती है। हम पाप करने के जितने निकट होते हैं, सही समय पर मिलने वाली रोक की कृपा उतनी ही ज्यादा होती है: “मेरे डग तो उखड़ना चाहते थे, मेरे डग फिसलने ही पर थे” (भजन संहिता 73:2)।
उसने उसे शांति भरे उत्तर के साथ विदा किया: “अपने घर कुशल से जा; सुन, मैं ने तेरी बात मानी है और तेरी विनती ग्रहण कर ली है” (25:35)। बुद्धिमान और अच्छे लोग तर्क की बात सुनते हैं, और उसे स्वयं पर हावी होने देते हैं—भले ही वह बात उनकी तुलना में कमजोर लोगों की ओर से ही क्यों न आई हो, और भले ही उस समय उनके मन में गुस्सा और आवेश ही क्यों न भरा हो। शपथें हमें ऐसी किसी भी चीज से नहीं बाँधनी चाहिए, जो पापपूर्ण हो। दाऊद ने पूरी गंभीरता से नाबाल के प्राण लेने की शपथ खाई थी। ऐसी शपथ खाना स्वयं में एक बुरा काम था, परन्तु यदि वह उस शपथ को पूरा कर देता, तो वह इससे भी कहीं ज्यादा बुरा काम करता। यह भी ध्यान दें: “जो किसी मनुष्य को डाँटता है, वह अन्त में चापलूसी करनेवाले से अधिक प्यारा हो जाता है” (नीतिवचन 28:23)।
उस पत्नी, किसी अन्य रिश्तेदार, कर्मचारी, मित्र या सलाहकार के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें, जो आपको कोई गलत काम करने से रोकने के लिए सही सलाह देता है। यह प्रभु यहोवा की ओर से एक आशीर्वाद है। और यदि आपको किसी दूसरे व्यक्ति को पाप करने से रोकने का अवसर मिलता है, तो पूरी विनम्रता के साथ उस अवसर का उपयोग करें। ऐसा करने पर आप और वह दूसरा व्यक्ति—दोनों ही प्रसन्न होंगे।
इस कहानी को दोबारा पढ़ें और उन हिस्सों को पहचानें, जिनका उपयोग आप अगली बार किसी को सुधारने या सावधान करने का अवसर मिलने पर कर सकते हैं।