एक भयानक संदेश
अध्याय चौवालीस
1 शमूएल 28:15-25

Ron Meyers
15शमूएल ने शाऊल से पूछा, “तू ने मुझे ऊपर बुलवाकर क्यों सताया है?” शाऊल ने कहा, “मैं बड़े संकट में पड़ा हूँ; क्योंकि पलिश्ती मेरे साथ लड़ रहे हैं और परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया, और अब मुझे न तो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उत्तर देता है, और न स्वप्नों के; इसलिये मैं ने तुझे बुलाया कि तू मुझे जता दे कि मैं क्या करूँ।” 16शमूएल ने कहा, “जब यहोवा तुझे छोड़कर तेरा शत्रु बन गया, तब तू मुझ से क्यों पूछता है? 17यहोवा ने तो जैसा मुझ से कहलवाया था वैसा ही उसने व्यवहार किया है; अर्थात् उसने तेरे हाथ से राज्य छीनकर तेरे पड़ोसी दाऊद को दे दिया है। 18तू ने जो यहोवा की बात न मानी, और न अमालेकियों को उसके भड़के हुए कोप के अनुसार दण्ड दिया था, इस कारण यहोवा ने तुझ से आज ऐसा बर्ताव किया। 19फिर यहोवा तुझ समेत इस्राएलियों को पलिश्तियों के हाथ में कर देगा। और तू अपने बेटों समेत कल मेरे साथ होगा; और इस्राएली सेना को भी यहोवा पलिश्तियों के हाथ में कर देगा।” 20तब शाऊल तुरन्त मुँह के बल भूमि पर गिर पड़ा, और शमूएल की बातों के कारण अत्यन्त डर गया; उसने पूरे दिन और रात भोजन न किया था, इससे उसमें बल कुछ भी न रहा। 21तब वह स्त्री शाऊल के पास गई, और उसको अति व्याकुल देखकर उसने कहा, “सुन, तेरी दासी ने तो तेरी बात मानी; और मैं ने अपने प्राण पर खेलकर तेरे वचनों को सुन लिया जो तू ने मुझ से कहा। 22तो अब तू भी अपनी दासी की बात मान; और मैं तेरे सामने एक टुकड़ा रोटी रखूँ; तू उसे खा, कि जब तू अपना मार्ग ले तब तुझे बल आ जाए।” 23उसने इन्कार करके कहा, “मैं न खाऊँगा।” परन्तु उसके सेवकों और स्त्री ने मिलकर यहाँ तक उसे दबाया कि वह उनकी बात मानकर, भूमि पर से उठकर खाट पर बैठ गया। 24स्त्री के घर में एक तैयार किया हुआ बछड़ा था, उसने फुर्ती करके उसे मारा, फिर आटा लेकर गूँधा, और अख़मीरी रोटी बनाकर 25शाऊल और उसके सेवकों के आगे लाई; और उन्होंने खाया। तब वे उठकर उसी रात चले गए।
शाऊल को शमूएल द्वारा फटकार लगाई जाती है, उसे भयानक संदेश सुनाया जाता है और वह अपनी सेना की हार और अपनी मृत्यु की ओर बढ़ता है। यह एक बहुत ही दु:खद अंत है, जो कि पूरी तरह से अलग हो सकता था।
1. नियतिवाद बनाम व्यक्तिगत चुनाव और जिम्मेदारी। नियतिवाद यह विचार है कि मानवीय निर्णयों और व्यवहारों सहित जगत की सभी घटनाएँ पूर्व स्थितियों और प्रकृति के नियमों द्वारा निर्धारित की जाती हैं। यदि यह दर्शन सत्य होता, तो मनुष्य की अपने चुनाव के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होती, क्योंकि हमारे निर्णयों सहित सब कुछ पहले से ही निर्धारित हो चुका है। परन्तु, जो लोग बाइबल को समझते हैं, वे जानते हैं कि हमें चुनाव की शक्ति के साथ बनाने के बाद, परमेश्वर इसका सही ढंग से उपयोग करने के प्रति हमारे अवसर और जिम्मेदारी को नहीं खोता है। परमेश्वर का न्याय मनुष्य की जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है। यदि हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमारे लिए पहले से ही निर्धारित है, तो जो निर्धारित किया गया था, उसे करने के लिए कोई उचित दण्ड नहीं हो सकता है। जो निर्धारित किया गया था, उसे करने के लिए न ही कोई उचित प्रतिफल हो सकता है। यदि हम परमेश्वर के उद्धार के कृपापूर्ण प्रस्ताव को अस्वीकार करने का विकल्प चुनते हैं और ऐसा करते हुए, स्वयं को नरक का दण्ड देते हैं, तो यह हमारा चुनाव है और हम परिणाम भुगतते हैं। यहाँ तक कि नरक में दण्ड का दिया जाने वाला स्तर भी सही है। अपने पाप की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करने के प्रति कितना विरोध करता है और स्वयं की ओर कितना आकर्षित होता है, कोई कितना जानता है और शायद अन्य कारकों के बारे में परमेश्वर जानता है, परमेश्वर पूरी निष्पक्षता के साथ गणना करता है कि हम किस दण्ड का अनुभव करेंगे, हम किस अपराध के लिए न्याय पाएँगे। नरक में दण्ड के अलग-अलग स्तर होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का निर्धारण एक धर्मी परमेश्वर द्वारा, हर चीज के अपने पूर्ण ज्ञान के आधार पर किया जाता है। वास्तव में, वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति को पता होगा कि उसे क्या करना चाहिए था और जिस हद तक लोग सर्वोत्तम जानते थे, वे स्वयं पर उचित मात्रा में आत्म-निन्दा को ले लेंगे। नरक में भी पूर्ण न्याय है। जिसको बहुत कुछ दिया गया है, उससे बहुत कुछ की अपेक्षा की जाती है—इसका तात्पर्य यह है कि जिनको बहुत कुछ नहीं दिया गया है, उनसे बहुत अधिक की अपेक्षा नहीं की जाती है। शाऊल की कहानी को समझने के लिए हमें यह समझना चाहिए कि शाऊल अपने व्यवहार की तुलना में स्वयं को अच्छी तरह से जानता था। एन्दोर की भूत सिद्धि करने वाली स्त्री के घर में शमूएल द्वारा उसे जो दण्ड दिया गया था, वह पूरी तरह से उचित था, क्योंकि शाऊल स्वयं इसे अपने ऊपर लाया था। वही स्वतंत्रता जो सफलता और प्रतिफल को संभव बनाती है, उस में विफलता और दण्ड की संभावना भी शामिल है। शाऊल अपने दण्ड के लिए स्वयं जिम्मेदार था। यह सामान्य रूप से शाऊल की कहानी और विशेष रूप से उसकी मृत्यु के आसपास की घटनाओं से सीखने के लिए गंभीर सबक हैं। आइए हम इसमें दिए गए सबक को सीखने के लिए अपने सर्वोत्तम प्रयास को करें।
2. परमेश्वर ने शमूएल से सलाह लेने की अनुमति दी और शमूएल ने शाऊल को सच बताया। वचन 15-19
यहाँ हम शाऊल और शमूएल के बीच की बातचीत देख रहे हैं। कुछ लोग मानते हैं कि यह शैतान या एक दुष्टात्मा थी, परन्तु, यदि यह सच होता तो बाइबल ने ऐसा अवश्य कहा होता। इसके विपरीत, बाइबल कहती है कि वह शमूएल था। हमें यहाँ एक आंशिक नुकसान का सामना करना पड़ता है, जिसके चलते प्रार्थना में—और इस संसार के अंधकार के शासकों से संघर्ष करते हुए—हमें अतिरिक्त परिश्रम करना पड़ता है; वह नुकसान यह है कि वे हमें भली-भांति जानते हैं, जबकि हम अक्सर उनकी चालों और युक्तियों से अनजान ही रह जाते हैं।
शमूएल ने पूछा कि उसे क्यों भेजा गया हैः "तू ने मुझे ऊपर बुलवाकर क्यों सताया है" (वचन 15)। तब शाऊल ने शमूएल से शिकायत की, "मैं बड़े संकट में पड़ा हूँ; क्योंकि पलिश्ती मेरे साथ लड़ रहे हैं और परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया, और अब मुझे न तो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उत्तर देता है, और न स्वप्नों के; इसलिये मैं ने तुझे बुलाया कि तू मुझे जता दे कि मैं क्या करूँ" (वचन 15)। क्या शाऊल का यह संकेत था कि वह सोचता था—कि यदि परमेश्वर की उपस्थिति के प्रतीक मात्र मेरे साथ हों, तो मैं पलिश्तियों के विरुद्ध भली-भांति सफल हो जाऊँगा; परन्तु, हाय! "परमेश्वर ने मुझ छोड़ दिया है।" जब तक वह मुसीबत में न पड़ गया, तब तक उसने परमेश्वर से उसे छोड़ने की शिकायत नहीं की, जब तक कि पलिश्तियों ने उसके विरुद्ध युद्ध नहीं किया, और फिर वह परमेश्वर के पास जाने पर विलाप करने लगा। जिसने अपनी समृद्धि में परमेश्वर से पूछताछ नहीं की, अब अपनी विपत्ति में, उसने यह मुश्किल से सोचा कि परमेश्वर ने उसे उत्तर नहीं दिया, या उसके प्रश्नों पर कोई ध्यान नहीं दिया, न तो स्वप्नों या भविष्यद्वक्ताओं द्वारा, न तो उसे तुरन्त उत्तर दिए बिना और न ही उसने अपने किसी दूत को उसके पास भेजा। उसने इसमें परमेश्वर की धार्मिकता नहीं देखी; परन्तु, क्रोधित व्यक्ति की तरह, उसने परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत की, जैसे कि परमेश्वर अधार्मिकता से भरा था, न कि वह: "इसलिए मैंने तुझे बुलाया है" (वचन 15), मानो कि शमूएल, परमेश्वर का एक सेवक, उन पर अनुग्रह करेगा, जिन पर परमेश्वर क्रोधित हुआ था, या मानो कि एक मृत भविष्यद्वक्ता उसके लिए एक जीवित परमेश्वर से अधिक भला कर सकता है।
यह शमूएल की प्रतिक्रिया से शाऊल को मिली सांत्वना है, और स्पष्ट रूप से इसका उद्देश्य उसे निराशा की ओर धकेलना है, यदि नहीं तो आत्म-हत्या की ओर। हमें यह नहीं बताया गया है कि क्यों, जब शाऊल ने चाहा कि उसे बताया जाए कि उसे क्या करना चाहिए, तो शमूएल ने उसे पश्चाताप करने और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप करने के लिए नहीं कहा है, और दाऊद को उसके निकाल दिए जाने से वापस बुलाया होता, और फिर उससे कहा होता कि वह इस तरह से परमेश्वर से दया पाने के लिए आशा कर सकता है; परन्तु, इसके बजाय, शमूएल ने शाऊल के विषय को बेबस और निराशाजनक के रूप में प्रस्तु किया—ठीक वैसे ही, जैसे शैतान ने यहूदा के साथ किया था; जिसके लिए वह पहले एक प्रलोभन देने वाला बना और फिर एक सताने वाला—उसने पहले उसे अपने स्वामी को बेच देने के लिए उकसाया, और फिर स्वयं को फाँसी लगा लेने के लिए। शायद, इस पड़ाव पर पहुँच कर, शाऊल के विषय में बातें सचमुच ही बेबस हो चुकी थी। शायद इस समय शाऊल के विषय में बातें वास्तव में असहनीय थी। शमूएल ने अपने वर्तमान संकट के साथ शाऊल की आलोचना की, और उसे बताया, यह कि न केवल परमेश्वर उससे अलग हो गया था, बल्कि यह कि परमेश्वर उसका शत्रु बन गया था, और इसलिए उसे परमेश्वर या उसके भविष्यद्वक्ता से किसी भी सांत्वना पाने वाले उत्तर की आशा नहीं करनी चाहिए। मानो यह ऐसा कहना था, अब जब प्रभु यहोवा तुझसे अलग हो गया है और वह तेरा शत्रु बन गया है, तो तू मुझसे क्यों सलाह लेता है? जब परमेश्वर तेरा शत्रु है, तो मैं तेरा मित्र कैसे बन सकता हूँ, या जब वह तुझे छोड़ चुका है, तो मैं तेरा सलाहकार कैसे बन सकता हूँ?
शमूएल ने उसे उसकी गलती दिखा दी और राज्य के लिए दाऊद के अभिषेक के संदेश से शाऊल को फटकार लगाई। वह उस तार को छू नहीं सकता था, जो शाऊल के कान में इससे अधिक अप्रिय लग रही थी। दाऊद के साथ उसका मेल-मिलाप कराने के विषय में कुछ भी नहीं कहा गया है, परन्तु सभी उसे दाऊद के विरुद्ध भड़काने और दरार को चौड़ा करने की प्रवृत्ति रखते हैं।
शमूएल ने अमालेकियों को नष्ट न करने में परमेश्वर की आज्ञा की अवज्ञा करने के लिए शाऊल को फटकारा। जब शमूएल शाऊल को पश्चाताप में लाने के लिए उसके साथ वार्तालाप कर रहा था, तब शैतान ने उसे उस पाप को अनदेखा करने और क्षमा करने में सहायता की थी, परन्तु अब शमूएल ने इसे बढ़ा दिया था, जिससे कि शाऊल को परमेश्वर की दया से निराश किया जा सके। देखें कि उन लोगों को क्या मिलता है, जो शैतान के प्रलोभनों को सुनते हैं और स्वीकार करते हैं। वह स्वयं उन पर आरोप लगाएगा और उनका अपमान करेगा। शमूएल ने भविष्यद्वाणी की थी कि शाऊल का विनाश निकट आ रहा है और उसकी सेना पलिश्तियों द्वारा पराजित की जाएगी। यह दो बार उल्लेख किया गया हैः "फिर यहोवा तुझ समेत इस्राएलियों को पलिश्तियों के हाथ में कर देगा" (वचन 19)। पलिश्तियों की उत्तम शक्ति और सँख्या, इस्राएल की सेना की कमजोरी, शाऊल के आतंक और विशेष रूप से उससे परमेश्वर के छोड़ कर चले जाने पर विचार करके वह इसका अनुमान लगा सकता है। "यहोवा तुझ समेत इस्राएलियों को पलिश्तियों के हाथ में कर देगा" (वचन 19)।
शमूएल ने कहा कि शाऊल और उसके पुत्र युद्ध में मारे जाएँगेः "कल” अर्थात् थोड़े ही समय में ही, और, यह मानते हुए कि यह समय अब आधी रात के बाद था, इसलिए इसे अगले दिन के लिए लिया जा सकता है, जो अब आरम्भ हो चुका था, "तू अपने बेटों समेत कल मेरे साथ होगा" (वचन 19), अर्थात्, मरे हुओं की स्थिति में, शरीर से अलग। शमूएल इस घटना की भविष्यद्वाणी नहीं कर सकता था, जब तक कि परमेश्वर ने उसे प्रकट नहीं किया था; और, परमेश्वर उसके द्वारा इसकी भविष्यद्वाणी कर सकता था; जैसा कि हम बाद में 1 राजा 22:20-23 में एक दुष्ट आत्मा के बारे में पढ़ते हैं, जिसने रामोत-गिलाद में अहाब के पतन की भविष्यद्वाणी की थी और इसमें सहायक था। आइए, शाऊल के प्रति अहाब की प्रतिक्रिया की तुलना करें। "20तब यहोवा ने पूछा, ‘अहाब को कौन ऐसा बहकाएगा कि वह गिलाद के रामोत पर चढ़ाई करके खेत आए?’ तब किसी ने कुछ, और किसी ने कुछ कहा। 21अन्त में एक आत्मा पास आकर यहोवा के सम्मुख खड़ी हुई, और कहने लगी, ‘मैं उसको बहकाऊँगी’ : यहोवा ने पूछा, ‘किस उपाय से?’ 22उसने कहा, ‘मैं जाकर उसके सब भविष्यद्वक्ताओं में पैठकर उनसे झूठ बुलवाऊँगी।’ यहोवा ने कहा, ‘तेरा उसको बहकाना सफल होगा, जाकर ऐसा ही कर।’ 23तो अब सुन यहोवा ने तेरे इन सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में एक झूठ बोलनेवाली आत्मा पैठाई है, और यहोवा ने तेरे विषय हानि की बात कही है।" प्रभु यहोवा ने तेरे लिए आपदा का आदेश दिया है। जब अहाब ने वह संदेश सुना, तो वह अपने सुने हुए संदेश के प्रति और अधिक हठी हो गया और अपनी अवज्ञा में दृढ़ रहा और शमूएल की इस बात ने शाऊल को डरा दिया। अहाब की उपेक्षा या शाऊल का डर, अपना चुनाव करें। दोनों संदेशों में केवल इतना ही कहा गया था कि वे नष्ट हो जाएँगे; वे लोग इतने दयनीय होते हैं, जो शैतान की शक्ति के अधीन होते हैं।
3. शाऊल भोजन करने के लिए तैयार हो जाता है और अपनी मृत्यु की ओर चल पड़ता है। 20-25
शाऊल उपवास से कमजोर हो चुका था, परन्तु भूत सिद्धि करने वाली स्त्री उसे और उसके लोगों ने भोजन के लिए मना लिया। उसके बाद वह वहाँ से चला गया। अब हम जानते हैं कि शाऊल को शमूएल से यह भयानक संदेश कैसे मिला। वह चाहता था कि उसे बताया जाए कि उसे क्या करना चाहिए, परन्तु उसे केवल यह बताया गया कि उसने क्या नहीं किया है और उसके साथ क्या किया होने वाला था। जो लोग दुष्ट होते हैं, जो परमेश्वर से कुछ भी अच्छा पाने या सांत्वना की आशा रखते हैं, वे निराश होंगे।
वह बोझ के नीचे डूब गया। वह वास्तव में इसे सहन करने के लिए अयोग्य था, उसने पूरे दिन पहले या उस रात कुछ नहीं खाया था। वह अपने तम्बू से उपवास करके आया था, और उपवास करता रहा था; भोजन की कमी के कारण नहीं, बल्कि भूख न लगने के कारण। पलिश्तियों की शक्ति के डर से उसकी भूख मर गई थी, या शायद भूत सिद्धि करने वाली स्त्री से परामर्श करने के विचार के बाद अपने विवेक के साथ उसके संघर्ष ने उसे अपने लिए आवश्यक भोजन से भी घृणा करने पर मजबूर कर दिया था, चाहे वह स्वादिष्ट हो या निश्चित रूप से न हो। इसने उसे उस नए आतंक का आसान शिकार बना दिया, जो अब एक हथियार लिए हुए सैनिक की तरह उस पर टूट पड़ा था। इससे उसमें बल कुछ भी न रहा, (वचन 20)। मानो पलिश्तियों के तीरंदाजों ने उसे पहले ही मार दिया था, और उस में इस दु:खद और बुरे समाचार को सहने की शक्ति नहीं थी। उसके पास भूत सिद्धि करने वाली स्त्री से परामर्श करने के लिए बहुत कुछ था, और उसने उन्हें दयनीय रीति से सांत्वना देने वाले पाया। जब परमेश्वर अपने वचन में पापियों से भय की बात करता है, यदि वे पश्चाताप करते हैं, तो वह उनके लिए आशा का एक द्वार खोलता हैः परन्तु जो लोग सहायता के लिए नरक के द्वारों के आगे गिड़गिड़ाते हैं, उन्हें प्रकाश की किसी भी झलक के बिना अंधेरे की आशा करनी चाहिए।
उसे कठिनाई के साथ अंततः शिविर में अपने स्थान पर वापस ले जाने के लिए जितना आवश्यक था, उतना भोजन लेने के लिए मान लिया। भूत सिद्धि करने वाली स्त्री के साथ भोजन करना उसके लिए बहुत आवश्यक था, संभवतः इसलिए कि वह जल्दी से उसका घर छोड़ सकता है, इस डर से कि कहीं वह बीमार न पड़ जाए, विशेषकर यदि वह वहीं मर गया, तो उसे उसके इस कार्य के लिए गद्दार के रूप में दण्डित किया जाएगा, हालाँकि वह एक भूत सिद्धि करने वाली स्त्री के रूप में दण्ड पाने से तो बच गई थी। संभवतः, दया की किसी भी भावना के बजाय, इसने उसे उसकी सहायता करने के लिए उत्सुक बना दिया...यही उसे जाने में सहायता करता है। परन्तु वह स्वयं को कितनी दयनीय स्थिति में ले आया था, जब उसे इतने बुरे सांत्वना देने वाले की आवश्यकता थी! उसने विनती की कि उसने अपने जीवन को खतरे में डालने के लिए उसकी बात का पालन किया था, और इसलिए उसे अपने स्वयं के जीवन को राहत देने के लिए उसकी बात क्यों नहीं सुननी चाहिए? उसके हाथ में एक मोटा बछड़ा था, जिसे वह उसके स्वागत के लिए तैयार करती है।
शाऊल ने स्वयं के लिए बहुत ज्यादा असहमति दिखाई, "उसने इन्कार करके कहा, "मैं न खाऊँगा"" ( वचन 23), परन्तु स्त्री ने अपने सेवकों की सहायता से, उसके झुकाव और संकल्प के विरुद्ध, उसे कुछ विश्राम लेने के लिए मना ही लिया। मित्रता भरी सलाह से, उन्होंने उसे मजबूर किया।
क्या यह साहस, नियतिवाद या केवल हठी होना था? वह यह जानते हुए युद्ध में गया कि उसे मार दिया जाएगा। क्या वह साहसी था, हालाँकि उसे आश्वासन दिया गया था कि वह अपना जीवन और सम्मान दोनों खो देगा, फिर भी वह अपनी सेना को नहीं छोड़ेगा, परन्तु फिर भी वह दृढ़ता से अपने तम्बू में लौट आया, और एक गतिविधि में शामिल होने के लिए तैयार खड़ा था? क्या यह हियाव हो सकता है? वह बहादुर हो सकता था और हियाव दिखा सकता था, परन्तु बुद्धिमान और कोमल नहीं हो सकता था। क्योंकि जो हियाव प्रतीत होता है, उससे भी अधिक आश्चर्यजनक उसके हृदय की कठोरता है, यह कि उसने फिर से पश्चाताप और प्रार्थना द्वारा परमेश्वर से आग्रह - इस आशा में नहीं किया कि कम से कम कुछ अनुग्रह प्राप्त किया जाए, परन्तु वह स्वयं को और अपने बेटों और सेना के विनाश की ओर ले गया।
उसे उनकी सुरक्षा की परवाह नहीं थी। वह कितना स्वार्थी अगुवा है! "मुझे परवाह नहीं है कि जब मैं मर जाऊँगा, तो संसार में आग लगेगी या नहीं।" वह स्वार्थी हिजकिय्याह की तरह था, जिसने सोचा था कि यशायाह की यरूशलेम और उसके निवासियों के लिए विनाश की भविष्यद्वाणी अच्छी थी, क्योंकि यह उसके मरने के बाद पूरी होगी। यहूदा के भविष्य के विनाश के बारे में सुनकर, स्वार्थी हिजकिय्याह ने इस तरह से उत्तर दिया, "यहोवा का वचन जो तू ने कहा है अच्छा है” हिजकिय्याह ने उत्तर दिया। क्योंकि उसने सोचा, 'क्या मेरे जीवन में शांति और सुरक्षा नहीं होगी?' पहले शाऊल ने वैसे विनती नहीं की थी, जैसे दाऊद ने पाप करने के बाद की थी। "अपने पवित्र आत्मा को मुझसे दूर न कर।" और अब, शाऊल ने विनती नहीं की, जैसा कि दाऊद ने इस्राएल को नष्ट होते हुए देखा, "तेरा हाथ मेरे विरुद्ध हो, परन्तु तेरे लोगों के विरुद्ध न हो।"
शाऊल एक अच्छा अगुवा नहीं था। उसे उन लोगों की कोई परवाह नहीं थी, जिन पर परमेश्वर ने उसे एक रक्षक के रूप में रखा था। उसका उत्तराधिकारी उससे कितना अलग है। कैसे अच्छे और आदर्श चरवाहे के विपरीत, जिसने अपनी भेड़ों के लिए अपना जीवन दिया और कहा कि एक मित्र के लिए स्वयं को देने से बड़ा कोई प्रेम नहीं है।
हम इस भयानक कहानी से एक ऐसा निष्कर्ष कैसे निकाल सकते हैं, जो प्रेम करने वाले पास्टरों, प्रचारकों, मिशनरियों, मसीही शिक्षकों और कलीसिया के अगुवों के लिए लागू होता है, जिन्होंने अपना जीवन परमेश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया है? शाऊल का व्यवहार, मूल्य पद्धति और रवैया इतना भयानक है कि हम शायद ही विश्वास कर पाएँ, कि इस शिक्षा को लेने वाला कोई भी पाठक उसके उदाहरण का अनुसरण करने के लिए उसे पसन्द करेगा। क्या ऐसा हो सकता है कि कहानी का यह हिस्सा बाइबल में भी होने का कारण मसीही अगुवों को चेतावनी देना है कि एक बार परमेश्वर के आत्मा को उस व्यक्ति से हटा दिए जाने के बाद एक व्यक्ति कितना बुरा हो सकता है? यह सोचकर मुझे कंपकंपी होती है कि ऐसा हो सकता है - और जितनी जल्दी हो सके परमेश्वर के पास भाग कर पहुँचा जाए, न कि उससे दूर हो जाए।
शाऊल की कहानी एक अंधेरी पृष्ठभूमि को चित्रित करती है, जो दाऊद की उज्ज्वल प्रकाश के विपरीत है। दाऊद काले आकाश में एक चमकीले तारे की तरह है। आप भी इतने हल्के हो सकते हैं। हम शाऊल से सीखते हैं कि कैसे शाऊल की तरह नहीं होना चाहिए।