झूठा विवरण देना

अध्याय तिरपन


2 शमूएल 1:1-10

Ron Meyers

1शाऊल के मरने के बाद, जब दाऊद अमालेकियों को मारकर लौटा, और दाऊद को सिकलग में रहते हुए दो दिन हो गए, 2तब तीसरे दिन ऐसा हुआ कि शाऊल की छावनी में से एक पुरुष कपड़े फाड़े सिर पर धूल डाले हुए आया। जब वह दाऊद के पास पहुँचा, तब भूमि पर गिरा और उसको दण्डवत् की। 3दाऊद ने उससे पूछा, “तू कहाँ से आया है?” उसने उससे कहा, “मैं इस्राएली छावनी में से बचकर आया हूँ।” 4दाऊद ने उससे पूछा, “वहाँ क्या बात हुई? मुझे बता।” उसने कहा, “यह, कि लोग रणभूमि छोड़कर भाग गए, और बहुत लोग मारे गए; और शाऊल और उसका पुत्र योनातान भी मारे गए हैं।” 5दाऊद ने उस समाचार देनेवाले जवान से पूछा, “तू कैसे जानता है कि शाऊल और उसका पुत्र योनातान मर गए?” 6समाचार देनेवाले जवान ने कहा, “संयोग से मैं गिलबो पहाड़ पर था; तो क्या देखा कि शाऊल अपने भाले की टेक लगाए हुए है; फिर मैं ने यह भी देखा कि उसका पीछा किए हुए रथ और सवार बड़े वेग से दौड़े आ रहे हैं। 7उसने पीछे फिरकर मुझे देखा, और मुझे पुकारा। मैं ने कहा, ‘क्या आज्ञा?’ 8उसने मुझ से पूछा, ‘तू कौन है?’ मैं ने उससे कहा, ‘मैं तो अमालेकी हूँ।’ 9उसने मुझ से कहा, ‘मेरे पास खड़ा होकर मुझे मार डाल; क्योंकि मेरा सिर तो घूमा जाता है, परन्तु प्राण नहीं निकलता।’ 10तब मैं ने यह निश्‍चय जान लिया, कि वह गिर जाने के पश्‍चात् नहीं बच सकता, उसके पास खड़े होकर उसे मार डाला; और मैं उसके सिर का मुकुट और उसके हाथ का कंगन लेकर यहाँ अपने प्रभु के पास आया हूँ।”


2 शमूएल में हमारे प्रवेश के साथ ही, इस कहानी में कार्यवाही युद्ध के मैदान से चली जाती है, जहाँ शाऊल ने स्वयं को दक्षिण में यहूदा और पलिश्ती के बीच की सीमा के पास सिकलग गाँव में मार डाला है, जहाँ दाऊद और उसके लोग अमालेकियों के हाथों से खोए हुई सारी सामग्री वापस पाने के बाद एक अत्याधिक सफल अभियान से अभी-अभी लौटे हैं। दाऊद को एक विवरण प्राप्त होगा, जिसे हम जानते हैं कि 1 शमूएल के अंत में इतिहासकार ने जो लिखा है, उसके कारण झूठा है। अमालेकी जैसे कुछ लोग, जो शाऊल की मृत्यु के बारे में संदेश देते हैं, अपने श्रोताओं को वही बताते हैं, जो उन्हें लगता है कि श्रोता सुनना चाहता है, आवश्यक नहीं कि सच हो। जब ऐसा होता है, तो यह हमें संदेशवाहक के चरित्र के बारे में बहुत कुछ बताता है; यह हमें बताता है कि वह क्या सोचता है कि श्रोता सुनना चाहता है।



1. आरम्भिक विवरण। वचन 1-4

“1शाऊल के मरने के बाद, जब दाऊद अमालेकियों को मारकर लौटा, और दाऊद को सिकलग में रहते हुए दो दिन हो गए, 2तब तीसरे दिन ऐसा हुआ कि शाऊल की छावनी में से एक पुरुष कपड़े फाड़े सिर पर धूल डाले हुए आया। जब वह दाऊद के पास पहुँचा, तब भूमि पर गिरा और उसको दण्डवत् की। 3दाऊद ने उससे पूछा, “तू कहाँ से आया है?” उसने उससे कहा, “मैं इस्राएली छावनी में से बचकर आया हूँ।” 4दाऊद ने उससे पूछा, “वहाँ क्या बात हुई? मुझे बता।” उसने कहा, “यह, कि लोग रणभूमि छोड़कर भाग गए, और बहुत लोग मारे गए; और शाऊल और उसका पुत्र योनातान भी मारे गए हैं।”


अमालेकियों के हाथों से अपने परिवार और मित्रों को बचाने के बाद दाऊद फिर से अपने ही नगर सिकलग में बस गया और वहाँ रहने लगा, शायद वह वहाँ के खंडहरों और फैली हुई अव्यवस्था में व्यवस्था लाने की कोशिश कर रहा था और अपने मित्रों को उपहार भी भेज रहा था, जैसा कि हमने पहले के पाठ में देखा था। 


1 इतिहास 12:1, 8, 20 और 22 के अनुसार, जो लोग सिकलग में दाऊद के पक्ष में आए थे, उन्हें दाऊद शीघ्र ही ग्रहण करने लगा, क्योंकि इस समय तक वे अपने पहले की तरह दुःख और कर्ज में नहीं थे, बल्कि अपने देश में गुणवान व्यक्ति थे  “... ये उन वीरों में से थे जो युद्ध में उसके सहायक थे..... ये धनुर्धारी थे..... जो दाहिने–बायें, दोनों हाथों से गोफन के पत्थर और धनुष के तीर चला सकते थे..... युद्ध विद्या सीखे हुए और ढाल और भाला काम में लानेवाले थे। और उनके मुँह सिंह के से और वे पहाड़ी मृग के समान वेग से दौड़नेवाले थे..... एक हजार लोगों का अगुवा.....वरन् प्रतिदिन लोग दाऊद की सहायता करने को उसके पास आते रहे, यहाँ तक कि परमेश्‍वर की सेना के समान एक बड़ी सेना बन गई।” इस तरह के लोग प्रतिदिन परमेश्‍वर के साथ उसके पास आते थे, स्पष्ट तौर पर ऐसा करना उनके मनों को उत्तेजित करता था, जब तक कि उनकी सेना बहुत बड़ी और उत्कृष्ट नहीं हो गई। क्रांतियों के गुप्त स्रोत मानवीय रूप से अकथनीय हैं, और उन्हें सरकारों तथा मनुष्यों के विषयों में परमेश्‍वर के सर्वोपरि हस्तक्षेप के माध्यम से ही समझा जाना चाहिए। परमेश्‍वर ही है, जो सभी के मनों को पानी की नदियों की तरह बदल देता है। परन्तु उस प्रक्रिया के आरम्भ होने से पहले, सिकलग में तीसरे दिन दाऊद ने शाऊल की मृत्यु के संदेश के साथ एक युवा अमालेकी मेहमान का स्वागत किया।


हम नहीं जानते कि दाऊद ने अपने भदियों को गत और/या यिज्रेल में क्यों नहीं छोड़ा था, ताकि वह उसे सैन्य संघर्ष की विश्‍वनीय और शीघ्रता के साथ जानकारी दे सके। शायद यह एक संकेत था कि वह शाऊल के दु:खद दिन की प्रतीक्षा नहीं कर रहा था, न ही वह सिंहासन पर आने के लिए अधीर था, बल्कि तब तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार था, जब तक कि समाचार उसके पास स्वाभाविक रूप से नहीं पहुँचता। जो व्यक्ति परमेश्‍वर पर भरोसा करता है, वह फुर्ती में नहीं होता है, वह अच्छे समाचार के आने की प्रतीक्षा करता है और प्रतीक्षा करते समय अधीर या असहज नहीं होता है। जो भी हो, दूत तीसरे दिन मृत राजा के लिए शोक मनाने वाला और अगले राजा के अधीन होने का नाटक करते हुए आया, जिसे उसने स्पष्ट रूप से दाऊद माना था। वह अपने फटे हुए वस्त्रों, सिर पर धूल के साथ आया, और शायद स्वयं को अंदर से बधाई देते हुए दाऊद के सामने झुक गया कि उसे अपने प्रभुता सम्पन्न के रूप में दाऊद को आदर देने वाला पहला व्यक्ति होने का सम्मान मिला है। परन्तु यह प्रमाणित हुआ कि वह पहला व्यक्ति था, जिसे उसके न्यायी के रूप में मृत्यु का दण्ड मिला था।


उसने दाऊद को बताया कि वह इस्राएल के शिविर से आया था, और इस्राएल की बुरी स्थिति का वर्णन किया, जब उसने कहा कि वह इससे बाहर निकल गया था (वचन 3)। उसने दाऊद को युद्ध का एक सामान्य विवरण दिया। नि:सन्देह, दाऊद यह सुनने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक था कि एक राजा के प्रति विश्‍वासयोग्य रहने और अब दूसरा राजा बनने वाला होने के कारण विषय आगे कैसे बढ़ता है। दूत ने उसे बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि इस्राएल की सेना पराजित हो गई थी, कई लोग मारे गए थे, और उन के बीच, शाऊल और योनातान भी मारे गए थे। उसने शायद केवल शाऊल और योनातान का नाम लिया था, क्योंकि वह जानता था कि दाऊद यह जानने के लिए सबसे अधिक चिन्तित होगा कि उनके साथ क्या हुआ था। दाऊद शाऊल से सबसे ज्यादा डरता था और योनातान उससे सबसे ज्यादा प्रेम करता था। अमालेकी ने उसे योनातान की तुलना में शाऊल की मृत्यु का अधिक विशेष विवरण दिया। यह संभव है कि दाऊद ने पहले ही सुना था कि क्या हुआ था, परन्तु वह सामने से प्रत्यक्ष विवरण प्राप्त करने के लिए उत्सुक था। दाऊद को एक निश्‍चित विवरण की आवश्यकता थी। विश्‍वनीय जानकारी के बिना दाऊद अपने अगले कदमों पर आगे नहीं बढ़ सकता था।


2. दाऊद द्वारा पूछताछ करनी । वचन 4-10 

"4दाऊद ने उससे पूछा, “वहाँ क्या बात हुई? मुझे बता।” उसने कहा, “यह, कि लोग रणभूमि छोड़कर भाग गए, और बहुत लोग मारे गए; और शाऊल और उसका पुत्र योनातान भी मारे गए हैं।” 5दाऊद ने उस समाचार देनेवाले जवान से पूछा, “तू कैसे जानता है कि शाऊल और उसका पुत्र योनातान मर गए?” 6समाचार देनेवाले जवान ने कहा, “संयोग से मैं गिलबो पहाड़ पर था; तो क्या देखा कि शाऊल अपने भाले की टेक लगाए हुए है; फिर मैं ने यह भी देखा कि उसका पीछा किए हुए रथ और सवार बड़े वेग से दौड़े आ रहे हैं। 7उसने पीछे फिरकर मुझे देखा, और मुझे पुकारा। मैं ने कहा, ‘क्या आज्ञा?’ 8उसने मुझ से पूछा, ‘तू कौन है?’ मैं ने उससे कहा, ‘मैं तो अमालेकी हूँ।’ 9उसने मुझ से कहा, ‘मेरे पास खड़ा होकर मुझे मार डाल; क्योंकि मेरा सिर तो घूमा जाता है, परन्तु प्राण नहीं निकलता।’ 10तब मैं ने यह निश्‍चय जान लिया, कि वह गिर जाने के पश्‍चात् नहीं बच सकता, उसके पास खड़े होकर उसे मार डाला; और मैं उसके सिर का मुकुट और उसके हाथ का कंगन लेकर यहाँ अपने प्रभु के पास आया हूँ।" 


तब दाऊद ने पूछा, "तू कैसे जानता है कि शाऊल और उसका पुत्र योनातान मर चुके हैं?" युवक ने बिना किसी हिचकिचाहट के एक विस्तृत विवरण दिया, क्योंकि वह न केवल उसकी मृत्यु का एक चश्मदीद गवाह था, बल्कि उसने कहा, वह ऐसा करने में एक साधन भी रहा था, और इसलिए दाऊद उसकी गवाही पर भरोसा कर सकता था। उसने अपनी कहानी में योनातान की मृत्यु के बारे में कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह जानता था कि यह दाऊद के लिए अच्छा समाचार नहीं होगा; उसने केवल शाऊल के बारे में—यह सोचते हुए बताया, मानो कि दाऊद भी अच्छी तरह समझ गया था, कि इस समाचार के लिए उसका स्वागत किया जाना चाहिए और उसे 'अच्छा समाचार लाने वाले' के लिए प्रतिफल दिया जाना चाहिए।


कहानी में विवरण तो मिलता है, परन्तु यह केवल एक मनगढ़ंत कहानी थी। इस अमालेकी ने एक रुचिपूर्ण, परन्तु असत्य कहानी सुनाई थी। हो सकता है कि इन विवरणों ने उसकी कहानी को और अधिक विश्‍वनीय बना दिया हो और निश्‍चित रूप से अमालेकी को प्रतिफल मिलने की आशा थी।


हालाँकि, मुझे युवक की रिपोर्ट में एक स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है और शायद इसमें एक कमी भी थी। उसने वचन 6 में शाऊल के बारे में कुछ कहा, "शाऊल अपने भाले की टेक लगाए हुए है; फिर मैं ने यह भी देखा कि उसका पीछा किए हुए रथ और सवार बड़े वेग से दौड़े आ रहे हैं।" उस युवक ने शायद शाऊल को उसके भाले पर झुकते हुए देखा होगा, परन्तु उसके विवरण में एक गंभीर वैचारिक समस्या दिखाई देती है। यदि शाऊल अपने भाले पर टेक लगाए हुए होता तो उसका पीछा करने की कोई आवश्यकता नहीं होती, शाऊल हिल नहीं रहा था, भाग नहीं रहा था, वह केवल वहाँ खड़ा और झुका हुआ था। हो सकता है कि वह दौड़ रहा हो और रथ पीछा कर रहे हों या हो सकता है कि वह खड़ा हो और रथ पास में ही हों, परन्तु यह संभव नहीं है कि शाऊल अपने भाले पर टेक लगाए हुए हो और रथ उसका पीछा कर रहे हों।

तो इस अजीब वाक्य से क्या सबक मिल सकता है? आइए, शाऊल के लड़ाई न करने वाले, निष्क्रिय रवैये और एक सक्रिय मसीही सैनिक के विश्‍वास से भरे, आक्रामक लड़ाई वाले रवैये के बीच तुलना करें। मैं (1) आत्मिक युद्ध जो हम लड़ते हैं और सांसारिक युद्ध जो माना जाता है कि शाऊल लड़ रहा था और (2) भाला पर टेक लगाए हुए होने की निष्क्रिय स्थिति और आत्मिक ढाल पहने हुए एक मसीही सैनिक के आक्रामक विश्‍वास से भरे रवैये के बीच एक बड़ा अंतर देखता हूँ। इफिसियों 6:12-18 कहता है, "12क्योंकि हमारा यह मल्‍लयुद्ध लहू और मांस से नहीं परन्तु प्रधानों से, और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से और उस दुष्‍टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं। 13इसलिये परमेश्‍वर के सारे हथियार बाँध लो कि तुम बुरे दिन में सामना कर सको, और सब कुछ पूरा करके स्थिर रह सको। 14इसलिये सत्य से अपनी कमर कसकर, और धार्मिकता की झिलम पहिन कर, 15और पाँवों में मेल के सुसमाचार की तैयारी के जूते पहिन कर; 16और इन सब के साथ विश्‍वास की ढाल लेकर स्थिर रहो जिससे तुम उस दुष्‍ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको। 17और उद्धार का टोप, और आत्मा की तलवार, जो परमेश्‍वर का वचन है, ले लो। 18हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और इसी लिये जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिये लगातार विनती किया करो।"


मुझे शाऊल के इस रूपक से चुनौती मिलती है। मैं भाले पर टेक लगाए हुए नहीं रहना चाहता हूँ। भाला इसके लिए नहीं है। जीवन में पहले शाऊल ने अपने भाले का दुरुपयोग करके दाऊद और फिर योनातान को मारने की कोशिश की थी। अपने डेरे में राजदण्ड के बजाय हाथ में भाला लेकर बैठना भी उसके द्वारा भाले का दुरुपयोग था। और अब वह अपने भाले पर टेक लगा कर युद्ध की दु:खद स्थिति के प्रति निष्क्रियता या त्याग दिखाता है। शाऊल को यह नहीं पता था कि भाला कब और कैसे लगाना है या भाला कब और कैसे नहीं लगाना है।


हो सकता है कि शाऊल ने अनुरोध किया हो, परन्तु शाऊल को मारने वाले अमालेकी के बारे में अमालेकी की कहानी का हिस्सा निश्‍चित रूप से सच नहीं था। हमारे पास पहले के एक अध्याय में शाऊल के अपनी तलवार पर गिरने और स्वयं को मारने की सच्ची कहानी मिलती है। "तब शाऊल अपनी तलवार खड़ी करके उस पर गिर पड़ा" (1 शमूएल 31:4)।


अमालेकी के अनुसार, शाऊल ने कहा, "मेरे पास खड़ा होकर मुझे मार डाल; क्योंकि मेरा सिर तो घूमा जाता है, परन्तु प्राण नहीं निकलता।" यह हिस्सा सच हो सकता है; शाऊल ने ऐसा कहा होगा। किसी भी विषय में, यह हमें भविष्य की एक और स्थिति की स्मरण दिलाने का काम कर सकता है। प्रकाशितवाक्य 9:6 कहता है, "उन दिनों में मनुष्य मृत्यु को ढूँढ़ेंगे और न पाएँगे; और मरने की लालसा करेंगे, और मृत्यु उन से भागेगी।" यदि हम मान लें कि अमालेकी की कहानी का यह हिस्सा सच है, तो शायद शाऊल के विवेक ने उस समय को स्मरण दिलाया था, जब उसने दाऊद पर अपना भाला फेंका था, उसका घमण्ड, द्वेष, जानबूझकर किए जाने वाला विश्‍वासघात, और विशेष रूप से याजकों की हत्या। यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं थी कि उस पर पीड़ा छा गई थ। उसके अक्षम्य अपराधबोध ने मृत्यु को वास्तव में आतंक का राजा बना दिया होगा। जिन लोगों ने अपने विश्‍वास को इनकार कर दिया है, उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा या सुनने से इनकार कर दिया जाएगा, या ये शायद उनके अन्तिम क्षणों में उन पर हावी हो जाएँ। मृत्यु विश्‍वासी के लिए मीठी या अविश्‍वासी के लिए भयानक हो सकती है।


"उसके पास खड़े होकर उसे मार डाला” संभवतः इतना कहने पर उसने देखा कि दाऊद उसे आनन्द के बजाय दु:ख या क्रोध के साथ देख रहा था, जिसे अमालेकी देखने की आशा कर रहा था, इसलिए उसने तुरन्त दाऊद को प्रसन्न करने के लिए अपनी कहानी का पहला हिस्सा जोड़ा, और स्वयं को क्षमा करने की कोशिश कीः "तब मैं ने यह निश्‍चय जान लिया, कि वह गिर जाने के पश्‍चात् नहीं बच सकता।" उसका जीवन अभी भी उस में था, परन्तु वह निश्‍चित रूप से पलिश्तियों के हाथों में पड़ गया होगा या स्वयं के बचाव के लिए एक और प्रयास किया होगा। हालाँकि अमालेकी वहाँ उपस्थित हो सकता था, फिर भी उसने वास्तव में शाऊल की मृत्यु में सहायता नहीं की। उसने केवल इस आशा में दाऊद से कहा कि वह उसे इसके लिए प्रतिफल देगा, क्योंकि उसने उसकी अच्छी सेवा की है। जो लोग शत्रु के मरने पर प्रसन्न होते हैं, वे दूसरों को स्वयं मापने देने में सक्षम होते हैं, और सोचते हैं कि वे भी ऐसा करेंगे। परन्तु, परमेश्‍वर के हृदय के अनुसार एक व्यक्ति को साधारण मनुष्यों के आधार पर न तो आँका जाना चाहिए और न ही उनसे उसकी तुलना की जानी चाहिए।। वह इससे भी अधिक धर्मी है। धर्मी व्यक्ति के लिए दुष्ट, विकृत और ओछी सोच को समझना मुश्किल है और इसी तरह, भ्रष्ट, अशुद्ध, गुमराह और विकृत व्यक्ति के लिए उन धर्मी लोगों की इच्छाओं को समझना मुश्किल है, जो केवल भला करना चाहते हैं।


हम नहीं जानते कि अमालेकी की कहानी कितनी सच है, पर हम जानते हैं कि इसके द्वारा उन्होंने स्वयं को दोषी ठहराया। यह दाऊद की पहली समझ हो सकती है और दाऊद ने सोचा कि कहानी सच है या नहीं। दोनों ही विषयों में, अमालेकी ने शाऊल की मृत्यु का प्रमाण उसके सिर पर लगे मुकुट और उसकी बाजू पर लगे कंगन में प्रस्तुत किया। क्या इसका अर्थ यह है कि शाऊल इन आभूषणों को इतनी मूर्खता से पसन्द करता था कि उन्हें युद्ध के मैदान में पहनता था, जिसने उसे तीर चलाने वालों के लिए एक अधिक स्पष्ट लक्ष्य बना दिया था? मैं महत्वपूर्ण पदों के लालच और उनके प्रतीकों और उन पदों से जुड़े घमण्ड के बीच एक घनिष्ठ और गंभीर संबंध देखता हूँ। वे हमें शैतान के आग जैसे तीरों का निशाना बनाते हैं। पद-स्थिति हमें सेवा करने के अवसर के रूप में दिए जाते हैं, न कि उनमें स्वयं को गौरवान्वित करने के लिए।

शाऊल का मुकुट और हाथ का कंगन इस अमालेकी के हाथों में पड़ गए थे। इस विडंबना पर ध्यान दें। 1 शमूएल 15 में शाऊल ने अवज्ञा से अमालेकियों की सबसे अच्छी लूट को छोड़ा, और अब उसका सबसे अच्छा एक अमालेकी के हाथ में था। जब शाऊल मर चुका था, तब वह उन्हें दाऊद के पास अर्थात् उसके सही स्वामी के पास ले आया, यह सोचकर कि इससे उसे कोई प्रतिफल या सम्मान मिल सकता है। यहूदियों की एक रुचिपूर्ण परंपरा यह है कि यह युवा अमालेकी दोएग का पुत्र था। दोएग, जिसे वे मानते हैं कि दोएग के स्वयं को मारे जाने से पहले वह शाऊल का हथियार उठाने वाला था, ने शाऊल का मुकुट और कंगन अपने पुत्र को दिया होगा, और उसे दाऊद के साथ अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उन्हें ले जाने के लिए कहा होगा। हालाँकि, इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि दोएग का पुत्र शाऊल को इतना अच्छी तरह से जानता होगा कि शाऊल को उससे पूछने की आवश्यकता नहीं रही होगी, जैसा कि उसने इस अमालेकी से किया था, तू कौन हो। परन्तु यह भी अमालेकी की कहानी का एक हिस्सा है, जिस पर हमें विश्‍वास करने की आवश्यकता नहीं है कि यह सब सच है। जो भी हो, दाऊद लंबे समय से मुकुट की प्रतीक्षा कर रहा था, और अब यह एक अमालेकी द्वारा उसके पास लाया गया था। देखें कि परमेश्‍वर अपने लोगों के प्रति विश्‍वासयोग्य वचन-पालन के अपने उद्देश्यों को कैसे पूरा कर सकता है, यहाँ तक कि उन लोगों द्वारा भी जिनका एकमात्र उद्देश्य उनकी अपनी उन्नति होती है। परन्तु अमालेकी लोगों के पास गलत आशाएँ थीं, क्योंकि कुलीन लोग शत्रु के बारे में बुरा समाचार सुनकर प्रसन्न नहीं होते थे।


3. मृत्यु के बारे में बहुत अलग दृष्टिकोण, धर्मियों की मृत्यु के बारे में परमेश्‍वर का दृष्टिकोण।

भजन संहिता 116:15 कहता है, "यहोवा के भक्‍तों की मृत्यु, उसकी दृष्‍टि में अनमोल है।" धर्मी लोगों की मृत्यु के बारे में एक और महत्वपूर्ण वचन यशायाह 57:1, 2 में है। "धर्मी जन नष्‍ट होता है, और कोई इस बात की चिन्ता नहीं करता; भक्‍त मनुष्य उठा लिए जाते हैं, परन्तु कोई नहीं सोचता। धर्मी जन इसलिये उठा लिया गया कि आनेवाली आपत्ति से बच जाए, वह शान्ति को पहुँचता है; जो सीधी चाल चलता है वह अपनी खाट पर विश्राम करता है।" मसीही के लिए, मृत्यु पदोन्नति है, जो स्वर्ग ले जाती है, यह उसके लिए उत्सव का दिन है। सभोपदेशक 7:1 कहता है, "अच्छा नाम अनमोल इत्र से और मृत्यु का दिन जन्म के दिन से उत्तम है।" दो बार मैंने अपने माता-पिता, अपने पिता और चॉर की माँ के साथ प्रार्थना की है, दोनों ने एक बड़ा और अच्छा जीवन जिया था और मरने वाले थे। उपस्थित सभी लोग जानते थे कि यह परमेश्‍वर का समय था कि हमारे माता-पिता परमेश्‍वर की बाहों में चले जाएँ। उन्हें परमेश्‍वर के प्रति समर्पित करने की प्रार्थना और यह कि परमेश्‍वर उन्हें अपने स्वर्ग में स्वागत करेगा, उन्हें परमेश्‍वर के हाथों में सौंप देने का हमारा तरीका था। हमने परमेश्‍वर को उन अच्छे नमूने से भरे जीवनों के लिए धन्यवाद दिया, जो उसने हमें दिए थे और बहुमूल्य सबक, जो उसने हमें सिखाए थे। अगले दिन जब हमने इस तरह से प्रार्थना की तो उनमें से प्रत्येक की मृत्यु हो गई। "यहोवा के भक्‍तों की मृत्यु, उसकी दृष्‍टि में अनमोल है।" आइए हम लोगों को सही तरीके से जीना सिखाएँ, ताकि उनकी मृत्यु बहुमूल्य हो सके, दु:खद नहीं। यह भी अगुवाई ही है।