न्याय का महत्व

अध्याय छियासठ


2 शमूएल 4:9-12

Ron Meyers

यदि हम अध्याय 4 के पहले आठ वचन ही पढ़ें, तो ऐसा लग सकता है कि वे दोनों हत्यारे अपने बुरे कामों के बाद भी बच निकले, परन्तु हमें आगे भी पढ़ना चाहिए। दाऊद उन्हें न्याय के कटघरे में लाता है। लोग जैसा बोएँगे, वैसा ही काटेंगे—ठीक वैसे ही, जैसा इन दोनों लोगों के साथ हुआ। दाऊद दो बातें दिखाता है: (1) शत्रुओं के लिए भी प्रेम—यहाँ तक कि ईशबोशेत की स्मरण के लिए भी, जिसे अभी-अभी मारा गया था; और (2) उन दो लोगों को न्याय देना, जिन्होंने उसे मारा था—ये दोनों काम एक ही समय पर और एक ही कार्यवाही के परिणाम में किए गए। हमें न्याय के कामों से अपनी व्यक्तिगत् भावनाओं को अलग रखना चाहिए। जब ​​हम न्याय करते हैं, तो हम सही काम करते हैं। जब हम शामिल लोगों को जानते हैं, तो भावनाओं को एक तरफ रखकर एक सही और धार्मिकता से भरा निर्णय लेना मुश्किल हो सकता है; परन्तु एक मसीही अगुवे को यह सीखना चाहिए कि यह काम प्रेम से कैसे किया जाए। आइए, हम दाऊद से सीखें कि उसने उन दो लोगों के साथ कैसा बर्ताव किया, जिन्होंने दाऊद के शत्रु को मारा था।


9दाऊद ने बेरोती रिम्मोन के पुत्र रेकाब और उसके भाई बाना को उत्तर देकर उनसे कहा, “यहोवा जो मेरे प्राण को सब विपत्तियों से छुड़ाता आया है, उसके जीवन की शपथ, 10जब किसी ने यह जानकर कि मैं शुभ समाचार देता हूँ, सिकलग में मुझ को शाऊल के मरने का समाचार दिया, तब मैं ने उसको पकड़कर घात कराया; अर्थात् उसको समाचार का यही बदला मिला। 11फिर जब दुष्‍ट मनुष्यों ने एक निर्दोष मनुष्य को उसी के घर में, वरन् उसकी चारपाई ही पर घात किया, तो मैं अब अवश्य ही उसके खून का बदला तुम से लूँगा, और तुम्हें धरती पर से नष्‍ट कर डालूँगा।” 12तब दाऊद ने जवानों को आज्ञा दी और उन्होंने उनको घात करके उनके हाथ पाँव काट दिए, और उनके शव को हेब्रोन के पोखरे के पास टाँग दिया। तब ईशबोशेत के सिर को उठाकर हेब्रोन में अब्नेर की कब्र में गाड़ दिया।


1. बुरे काम का बदला लिया जाना। वचन 9-12

दाऊद ने तुरन्त, बिना किसी हिचकिचाहट के और पूरे विश्‍वास के साथ बाना और रेकाब को दण्ड सुनाया। उसे किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी—सिवाय इसके कि उनके अपने मुँह ने ही उनके विरुद्ध गवाही दी थी; उन्होंने इस बात से इनकार करने की तो सोची भी नहीं; बल्कि वे तो इस पर घमण्ड कर रहे थे। दाऊद ने उन्हें उनके अपराध की जघन्यता दिखाई, और बताया कि वह लहू उसके हाथों से लहू का बदला माँग रहा था, जो अब मुख्य न्यायी और लहू का बदला लेने वाला था। हो सकता है कि वह इस विषय को आगे बढ़ाने में इसलिए ज्यादा जोरदार रहा हो, क्योंकि वह हाल ही में योआब पर मुकदमा चलाने में असफल रहा था। उसे ऐसा करना चाहिए था, परन्तु उसने नहीं किया। "...फिर जब दुष्‍ट मनुष्यों ने एक निर्दोष मनुष्य को उसी के घर में, वरन् उसकी चारपाई ही पर घात किया, तो मैं अब अवश्य ही उसके खून का बदला तुम से लूँगा, और तुम्हें धरती पर से नष्‍ट कर डालूँगा?" (11)। बाना और रेकाब कोई विकल्प नहीं दे सकते थे, इसलिए परमेश्‍वर की व्यवस्था के अनुसार, दाऊद इसके बदले उनके प्राण ले लेगा। दाऊद ने अपराध को सही ढंग से परिभाषित किया। जहाँ तक हमें पता है, ईशबोशेत एक भला व्यक्ति था; उसने उनके साथ न तो कोई गलत काम किया था और न ही ऐसा करने की कोई योजना बनाई थी। दाऊद स्पष्ट तौर पर इस बात से संतुष्ट था कि ईशबोशेत ने उसका जो भी विरोध किया था, वह किसी व्यक्तिगत् द्वेष के कारण नहीं, बल्कि एक गलती थी; और वह गलती किसी दूसरे व्यक्ति—अब्नेर—के विचारों और प्रभाव के कारण हुई थी।


दया हमें सिखाती है कि हम न केवल अपने मित्रों के बारे में, बल्कि अपने शत्रुओं के बारे में भी सबसे अच्छी सोच रखें; और यह मानें कि भले ही उन्होंने हमारे साथ गलत किया हो, फिर भी वे भले हो सकते हैं। हमें किसी भी व्यक्ति को केवल इसलिए जन्म से ही बुरा नहीं मान लेना चाहिए, क्योंकि उसने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है। दाऊद स्पष्ट तौर पर ईशबोशेत को एक ईमानदार व्यक्ति मानता था, भले ही ईशबोशेत ने उसे बहुत ज्यादा परेशान किया था। इस अपराधी स्वभाव ने इसे और भी ज्यादा घिनौना बना दिया था...उसे उसके अपने ही घर में मार डालना—जो कि उसका अपनी सुरक्षा अर्थात् किला होना चाहिए था—और उसके अपने ही बिछौने पर, जब वह सो रहा था और अपना बचाव करने में असमर्थ था; दो लोगों का एक व्यक्ति के विरुद्ध हो जाना न्यायसंगत नहीं है। यह एक कायरतापूर्ण, विश्‍वासघाती और बर्बरता से भरा हुआ कृत्य था। दाऊद एक घटना का भी हवाला दे सकता था। दाऊद ने उस अमालेकी को मृत्यु दण्ड दिया था, जो उसके विचार से शाऊल की मृत्यु की 'अच्छे समाचार' लेकर दाऊद के पास आया था। यहाँ उस अमालेकी द्वारा शाऊल को आत्महत्या करने में सहायता करने के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है; बल्कि केवल उसके द्वारा शाऊल की मृत्यु की समाचार लाने का वर्णन है। दाऊद मानो यह कह रहा हो, "मैंने उसके साथ एक अपराधी जैसा बर्ताव किया, जो मेरे लिए शाऊल का मुकुट लेकर आया था; तो फिर उन दुष्टों के साथ मैं इससे कम दण्ड वाला बर्ताव कैसे कर सकता हूँ, जो मेरे लिए एक निर्दोष व्यक्ति का सिर लेकर आए हैं?"


दाऊद ने एक शपथ खाई। "यहोवा जो मेरे प्राण को सब विपत्तियों से छुड़ाता आया है, उसके जीवन की शपथ।" उसने अपनी बात पूरी दृढ़ता से कही, ताकि उसके मंशा पर कोई शक न हो। वह उस प्रतिज्ञाएँ के अनुसार सिंहासन पर बैठने के लिए पूरी तरह से परमेश्‍वर पर निर्भर था, और वह किसी भी व्यक्ति की भलाई के लिए विवश नहीं होना चाहता था, जो किसी गलत तरीके से उसकी सहायता करे। परमेश्‍वर ने अब तक उसे हर मुश्किल से बचाया था, और कई कठिनाइयों और खतरों से बाहर निकाला था; इसलिए दाऊद अपने काम को पूरा करने और स्वयं को राजा बनाने के लिए भी उसी पर भरोसा करेगा। इस दु:ख भरी कहानी के बीच एक अनमोल बात छिपी है—परमेश्‍वर बचाता है। "यहोवा जो मेरे प्राण को सब विपत्तियों से छुड़ाता आया है" (वचन 9)। उसने हर मुश्किल से अपने बचाव की बात ऐसे कही जैसे कि वह हो चुकी हो, हालाँकि उसके सामने अभी भी कई तूफान आने शेष थे; क्योंकि वह जानता था कि जिसने उसे अब तक बचाया है, वह आगे भी बचाएगा। और आप और मैं भी यह जान सकते हैं।


दाऊद ने इन लोगों को मृत्यु की दण्ड देने के काले पृष्ठ पर हस्ताक्षर किए, जैसा कि 12वें वचन में लिखा है: "तब दाऊद ने जवानों को आज्ञा दी और उन्होंने उनको घात करके उनके हाथ पाँव काट दिए।" यह दण्ड कठोर लग सकता है, विशेषकर तब जब उन लोगों की मंशा दाऊद के साथ भलाई करने की थी; परन्तु दाऊद को उनके गलत तरीके बिल्कुल पसन्द नहीं थे। नाबाल की मृत्यु की घटना अलग थी। परमेश्‍वर ने स्वयं—जो पूरी पृथ्वी का सबसे बड़ा और निष्पक्ष न्यायी है—इस विषय में दखल दिया था। 1 शमूएल 25:39 में लिखा है: "नाबाल के मरने का हाल सुनकर दाऊद ने कहा, "धन्य है यहोवा जिसने नाबाल के साथ मेरी नामधराई का मुक़द्दमा लड़कर अपने दास को बुराई से रोक रखा; और यहोवा ने नाबाल की बुराई को उसी के सिर पर लाद दिया है।" तब दाऊद ने लोगों को अबीगैल के पास इसलिये भेजा कि वे उससे उसकी पत्नी होने की बातचीत करें।" परन्तु यदि कुछ दुष्ट लोग ईशबोशेत को मारते हैं, तो वे मृत्यु के दण्ड के योग्य हैं; क्योंकि उन्होंने परमेश्‍वर के काम को अपने हाथों में ले लिया। उन्होंने दाऊद को इससे ज्यादा दु:ख शायद ही कभी पहुँचाया हो—कि उन्होंने दाऊद को भी अपने जैसा ही समझ लिया; और अपने बुरे इरादों से, उसके ही बिछौने पर सो रहे एक व्यक्ति को मार डाला। कुछ लोगों को शायद इस बात की परवाह न हो कि सिंहासन पाने के लिए उन्हें कितना लहू बहाना पड़े; परन्तु दाऊद ऐसे लोगों में से नहीं था। या तो परमेश्‍वर स्वयं उसके लिए मार्ग बनाता, या फिर वह सिंहासन पर कभी न बैठता। क्या आप और मैं भी दाऊद जैसा ही दृष्टिकोण अपना सकते हैं? स्वयं को आगे बढ़ाने और चीजों को इस तरह से संभालने या उनमें हेरफेरी करने की कोशिश करने के बजाय कि हम तैयार हो जाएँ, क्या हमें यह विषय अकेले में, गुप्त प्रार्थना के द्वारा प्रभु के सामने नहीं रखना चाहिए? इसे परमेश्‍वर को करने दें।


उन दो हत्यारों के प्रति दाऊद की प्रतिक्रिया कितनी चौंकाने वाली रही होगी! कितनी भयानक निराशा! हत्यारों को दण्ड दिया गया; उनके हाथ-पैर काट दिए गए और उनके शवों को लटका दिया गया। जो कोई भी यह सोचता है कि वह अनैतिक कामों, युद्ध, सताव, धोखाधड़ी या भलाई का दिखावा करके 'दाऊद के पुत्र' अर्थात् मसीह के हितों की सेवा कर सकता है, उसे भी इसी तरह की विपत्ति, हार और असफलता का सामना करना पड़ेगा। आज जो कोई भी कुलीन लोगों की हत्या करता है, गंभीर प्रतिज्ञाओं को तोड़ता है, देशों को नष्ट करता है, कलीसियाओं को जलाता है या पास्टरों को मार डालता है, उसे मसीह के सामने उत्तर देना होगा। और किसी और दिन, मसीह उन्हें यह एहसास कराएगा कि मसीही विश्‍वास का उद्देश्य विनाश करना नहीं, बल्कि मानवता को आशीष देना था। जो लोग ऐसे कामों के द्वारा स्वर्ग पाने की आशा करते हैं, वे नरक की दण्ड से बच नहीं पाएँगे। आइए, हम अपना भले काम भले तरीके से ही करें!


2. तीसरी बार—एक सुखद संयोग

इन तीनों घटनाओं की समीक्षा और तुलना करके हम क्या सीख सकते हैं? हम यह सीख सकते हैं कि दाऊद इस बात से व्यक्तिगत रूप से दु:खी और अत्यंत व्यथित था कि उसके शत्रुओं में से किसी की हत्या कर दी गई। एक नैतिकवादी के तौर पर, दाऊद परमेश्‍वर के लोगों के बीच नैतिकता के क्षेत्र में होने वाले भावी विकास से कई पीढ़ियाँ आगे था। अपने शत्रुओं की मृत्यु के संबंध में मिले समाचारों पर प्रतिक्रिया देते समय, हम यह देख सकते हैं कि दाऊद का व्यवहार हर बार एक जैसा ही अर्थात सुसंगत रहा। उसे लोगों की बहुत ज्यादा परवाह थी, और उसने अपनी व्यक्तिगत् परिस्थितियों को अपनी प्रतिक्रिया पर प्रबल नहीं होने दिया। उसने सही, सच्ची और सहज प्रतिक्रिया दी। उसकी हर प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी; उसे यह सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि क्या करना सही होगा। अपने शत्रु की मृत्यु से वह प्रसन्न नहीं था; बल्कि तीनों ही विषयों में वह इस घटना से अत्यंत दु:खी और टूट-सा गया था।

पहली घटना: अमालेकी ने शाऊल की हत्या नहीं की थी, परन्तु उसने दावा किया था कि उसने ही शाऊल को मारा है; और संभवतः यदि उसे अवसर मिलता, तो वह सचमुच शाऊल को मार भी डालता। उसने तो बस संदेश पहुँचाया था। शाऊल एक दुष्ट व्यक्ति बन चुका था, जिसने परमेश्‍वर को निराश किया था और जो मृत्यु का ही पात्र था। उसने स्वयं अपने प्राण लिए थे। दाऊद ने न्यायसंगत और सही तरीके से उस अमालेकी को मृत्यु दण्ड सुनाया। स्वयं दाऊद ने भी शाऊल के लिए शोक दिलाया।


दूसरी घटना: योआब, दाऊद का भतीजा था। उसने ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा और अपने स्वार्थ के चलते भोले-भाले अब्नेर को धोखे से मार डाला। अब्नेर पहले दाऊद का शत्रु था, परन्तु सात वर्ष बाद उसने दाऊद से हाथ मिलाने का निर्णय लिया था। दाऊद ने योआब को मृत्यु की दण्ड नहीं दिया, जबकि उसे ऐसा करना चाहिए था। न्याय न करने की इस चूक के कारण लोगों को लगा कि वे भी बेझिझक योआब जैसा ही बर्ताव कर सकते हैं। दाऊद ने अधार्मिकता और गलत तरीके से योआब को मारने से इनकार कर दिया। बाद में, जब अबशालोम ने अम्नोन को मार डाला, तो योआब ने भी वही पाप दोहराया और अमासा को भी मार डाला। दाऊद ने स्वयं अब्नेर की मृत्यु पर गहरा शोक व्यक्त किया।


बाना और रेकाब, ईशबोशेत के कर्मचारी थे। उन दोनों ने मिलकर ईशबोशेत को उस समय मार डाला, जब वह अपने ही घर में, अपने ही बिछौने पर निहत्था और बिना किसी सुरक्षा के सो रहा था। ईशबोशेत, दाऊद का एक कमजोर शत्रु था। इस्राएल के राजा के तौर पर अब्नेर ने उसका साथ दिया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं था कि ईशबोशेत मृत्यु दण्ड के योग्य था। दाऊद ने न्यायसंगत और सही तरीके से बाना और रेकाब को मृत्यु का दण्ड दिया। दाऊद ने स्वयं ईशबोशेत की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया।


इन तीनों अलग-अलग घटनाओं में, दाऊद ने मरने वाले व्यक्ति की मृत्यु पर सच्चे मन से शोक व्यक्त किया। हालाँकि परिस्थितियाँ, हत्यारों की नैतिक स्थिति और पीड़ितों का चरित्र—ये सभी बहुत अलग-अलग थे, फिर भी दाऊद ने अपने शत्रुओं की मृत्यु पर लगातार शोक व्यक्त किया। उसने उन शत्रुओं की मृत्यु से मिलने वाले किसी भी व्यक्तिगत् लाभ के बारे में न तो सोचा, न उसे कोई महत्व दिया और न ही उस लाभ से चिपका रहा। वह इन तीनों शत्रुओं की मृत्यु पर प्रसन्न हो सकता था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया।


दाऊद ने एक ऐसी बात का उदाहरण पेश किया, जिसकी शिक्षा कई वर्ष बाद 'दाऊद के पुत्र' अर्थात् यीशु ने हम सभी विश्‍वासियों—जिनमें आप और मैं भी शामिल हैं—को दी। यह बात मत्ती 5:43-48 में इस प्रकार लिखी है: “तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।’ परन्तु मैं तुमसे यह कहता हूँ कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो,  जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भले और बुरे दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मी और अधर्मी दोनों पर मेंह बरसाता है। क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते?” 


संसार की दृष्टि में एक मजबूत अगवा वह होता है, जो पौरुष रखता हो, निर्णय लेने में निश्‍चित हो, कभी-कभी ऊँची आवाज में बोलने वाला हो, परन्तु सदैव आत्म-विश्‍वास से भरा हो और सामान्य रूप से पर दृढ़ता से भरा भाव रखता हो। दाऊद को उसकी अपनी पीढ़ी और उसके बाद आने वाली पीढ़ियों ने बहुत अधिक प्रेम दिया। वह परमेश्‍वर के मन के बहुत निकट था, उसमें हियाव था और वह बहादुर था, फिर भी वह लोगों की बहुत ज्यादा परवाह करता था और अपने शत्रुओं की मृत्यु पर भी दु:खी होता था, जिन्हें वह व्यक्तिगत् तौर पर जानता था। दाऊद ऐसा व्यक्ति था, जिसके पीछे दूसरे लोग चलना चाहेंगे। मैं यीशु जैसा बनना चाहता हूँ और दाऊद का उदाहरण मुझे यह समझने में सहायता करता है कि ऐसा दिखना कैसा होगा।


तीन बार दाऊद अपने किसी शत्रु की मृत्यु पर दु:खी हुआ। ये तीनों अवसर दिखाते हैं कि दाऊद अपने शत्रुओं से भी प्रेम करता था। दाऊद की प्रतिक्रियाएँ—किसी शत्रु की मृत्यु पर दु:खी होना—हर बार बहुत महत्वपूर्ण, अर्थपूर्ण और ध्यान देने योग्य थीं। तीन प्रतिक्रियाएँ—तीन खूबियाँ थीं।


3. न्याय क्यों आवश्यक है?

दाऊद ने बाना और रेकाब के विषय में एक सही और निष्पक्ष निर्णय सुनाया। उसने उन दोनों को मरवा दिया और उनके शरीर को बिना किसी आदर के साथ—उनके दुष्ट हाथ-पैर कटवा दिए और उनके शरीरों को सबके सामने लटका दिया। नए राजा के लिए ऐसा करना इतना आवश्यक और सही क्यों था? भलाई और न्याय के बीच क्या रिश्ता है? न्याय भलाई पैदा करने में कैसे सहायता करती है? इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए, आइए हम परमेश्‍वर के न्याय के बारे में बात करें। क्योंकि परमेश्‍वर भला है और भलाई से प्रेम करता है, इसलिए वह लोगों में—जिन्हें उसने बनाया है और जिनसे वह प्रेम करता है—भला व्यवहार देखना चाहते हैं और बुरे व्यवहार से घृणा करता है। भले व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए, वह बुरे व्यवहार के लिए दण्ड देता है और भले व्यवहार के लिए प्रतिफल देता है। यही न्याय है। परमेश्‍वर न्यायी ईश्‍वर है। दण्ड देना वास्तव में परमेश्‍वर की ओर से भला व्यवहार पैदा करने का एक तरीका है। परमेश्‍वर का दण्ड एक दया है, क्योंकि यह सुधार करने वाला होता है; यह हमें सर्वोत्तम बनाता है। जब परमेश्‍वर न्याय करता है और दण्ड देता है, तो वह हमें सही या भले तरीके से व्यवहार करना सिखाता है। इससे हमारा ही लाभ होता है।

इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि परमेश्‍वर के न्याय और दण्ड दया के काम हैं, जिनका उद्देश्य भला व्यवहार पैदा करना होता है। न्याय और दण्ड एक दया है। यह इस बात से आसानी से प्रमाणित हो जाता है कि परमेश्‍वर ने माता-पिता को यह जिम्मेदारी दी है कि यदि वे अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, तो उन्हें दण्ड दें और सुधारें। न्याय की प्राथमिकता बचपन से ही समझ में आने लगती है और इसके बारे में सिखाना माता-पिता का दायित्व है। बाइबल कहती है कि यदि हम अपने बच्चों को दण्ड नहीं देते और उन्हें सुधारते नहीं हैं, तो हम उनसे प्रेम नहीं करते। परमेश्‍वर के विषय में भी यही बात सच है। वह हमारा न्याय करता है, हमें दण्ड देता है और हमें सुधारता है, क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है। न्याय के बिना (जिसमें दण्ड शामिल है) हम और भी ज्यादा अधर्मी बन सकते हैं। न्याय के साथ हम और भी ज्यादा धर्मी बन सकते हैं। जब दण्ड सही तरीके से दिया जाता है, तो न केवल दण्ड पाने वाला व्यक्ति, बल्कि दूसरे लोग भी गलत काम करने से डरते हैं। यहाँ तक कि जब यीशु पृथ्वी पर राज करेगा, तो वह लोहे के दण्ड से ऐसा करेगा। दया और न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वे एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं हैं; वे साथी हैं। न्याय दया का ही एक काम है, जो हमें सुधारकर हमारा भला करता है। दोषी व्यक्ति को मृत्यु दण्ड देने के विषय में, वह दण्ड उस व्यक्ति का कोई भला करने के लिए बहुत देर से मिलती है, परन्तु दूसरे लोग उस घटना से सीख ले सकते हैं।


इसे ध्यान में रखते हुए, हम दाऊद की समझदारी की सराहना कर सकते हैं, जिसने उस अमालेकी के साथ न्याय किया, जो शाऊल की मृत्यु की समाचार दाऊद के पास लाया था। उस व्यक्ति ने स्वयं यह दावा करके स्वयं को ही दोषी ठहराया कि उसने ही शाऊल को मारा था। दाऊद अपने राज्य में इस तरह की सोच या व्यवहार नहीं चाहता था, इसलिए उसने उस व्यक्ति को मृत्यु दण्ड दे दिया। जिस किसी ने भी उस घटना के बारे में सुना, उसे चेतावनी मिली होगी और उसने उस तरह की सोच या व्यवहार से बचने की कोशिश की होगी। वह न्याय था और वह एक दया भी थी, क्योंकि वह दूसरों के लिए एक चेतावनी के रूप में दिया गया था कि वे वैसा न करें, जैसा उस अमालेकी ने किया था। अब, उन दो लोगों की कहानी में, जिन्होंने ईशबोशेत को मारा था, वही बात दोहराई जाती है। उन लोगों को प्रतिफल नहीं मिला; उन्हें मृत्यु दण्ड वाला न्याय मिला। जिस किसी ने भी यह समाचार सुना, उसे चेतावनी मिली होगी और उसे उन दो मूर्ख लोगों के कामों को दोहराने से डर लगा होगा।


यहाँ तक कि स्वर्ग और नरक भी इसी सिद्धान्त को दर्शाते हैं। लोगों को भलाई से पेश आना चाहिए, ताकि वे स्वर्ग जा सकें। जब उन्हें पता चलता है कि वे अपनी स्वयं की शक्ति से पूरी तरह भलाई से पेश नहीं आ सकते, तो वे यीशु को स्वीकार कर सकते हैं, जिनकी भलाई किसी भी ऐसे व्यक्ति को मिल सकती है, जो उन पर भरोसा करता है। इन सब बातों में, परमेश्‍वर सही सोच को प्रतिफल दे रहा है। नरक एक बचाव का साधन है। कोई भी वहाँ नहीं जाना चाहता, इसलिए नरक का डर एक प्रेरक शक्ति बन सकता है, जो मनुष्य को सही सोच की ओर, पापों के पश्‍चाताप की ओर ले जाता है, ताकि नरक से बचा जा सके। नरक से बचने की इच्छा के अतिरिक्त भी पश्‍चाताप करने और परमेश्‍वर की भलाई को पाने के और भी कई अच्छे कारण हैं, परन्तु नरक से बचने की कोशिश करना भी एक प्रभाव डालने वाले प्रेरक शक्ति हो सकती है। स्वर्ग, नरक, भलाई और न्याय की इस पूरी चर्चा में, हम परमेश्‍वर की महान दया और प्रेम को देखते हैं, जो हमारे लिए सबसे अच्छा चाहता है। दाऊद द्वारा बाना और रेकाब को मरवा देना, हमें यह स्मरण दिला सकता है कि न्याय परमेश्‍वर की उस योजना का एक हिस्सा है, जिसके द्वारा वह हमें वहाँ पहुँचाना चाहता है, जहाँ वह हमें देखना चाहता है—अभी अपनी बाहों में और अंत में अपने स्वर्ग में। न्याय ही दया है। जब हम अपने परिवारों में, अपनी अगुवाई समूहों के साथ, या कलीसिया के कर्मचारियों के साथ न्याय करते हैं—जो सभी हमें देख रहे होते हैं और हमसे सीख रहे होते हैं—तो हम वास्तव में दया ही दिखा रहे होते हैं। न्याय दिखाकर हम दया ही दिखा रहे होते हैं, क्योंकि हम अपने बच्चों या अपने सहकर्मियों को चेतावनी देकर और उन्हें और भी ज्यादा उपयोगी और आशीषित व्यक्ति बनाकर उनका विकास कर रहे होते हैं।