बालपरासीम
अध्याय उनहत्तर
2 शमूएल 5:17-21

Ron Meyers
17जब पलिश्तियों ने यह सुना कि इस्राएल का राजा होने के लिये दाऊद का अभिषेक हुआ, तब सब पलिश्ती दाऊद की खोज में निकले; यह सुनकर दाऊद गढ़ में चला गया। 18तब पलिश्ती आकर रपाईम नामक तराई में फैल गए। 19तब दाऊद ने यहोवा से पूछा, “क्या मैं पलिश्तियों पर चढ़ाई करूँ? क्या तू उन्हें मेरे हाथ कर देगा?” यहोवा ने दाऊद से कहा, “चढ़ाई कर; क्योंकि मैं निश्चय पलिश्तियों को तेरे हाथ कर दूँगा।” 20तब दाऊद बालपरासीम को गया, और दाऊद ने उन्हें वहीं मारा; तब उसने कहा, “यहोवा मेरे सामने होकर मेरे शत्रुओं पर जल की धारा के समान टूट पड़ा है।” इस कारण उसने उस स्थान का नाम बालपरासीम रखा। 21वहाँ उन्होंने अपनी मूरतों को छोड़ दिया, और दाऊद और उसके जन उन्हें उठा ले गए।
1. पूछने का अवसर और उसकी आवश्यकता। वचन 17-19
जिस विशेष सेवा के लिए दाऊद को खड़ा किया गया था, वह इस्राएल को पलिश्तियों के अत्याचार से मुक्त कराना था। 2 शमूएल 3:18 कहता है, “अब वैसा ही करो; क्योंकि यहोवा ने दाऊद के विषय में यह कहा है, ‘अपने दास दाऊद के द्वारा मैं अपनी प्रजा इस्राएल को पलिश्तियों वरन् उनके सब शत्रुओं के हाथ से छुड़ाऊँगा।’” दाऊद और इस्राएल के लिए परमेश्वर की इस योजना ने पलिश्तियों पर दो बड़ी जीत प्राप्त करने का अवसर दिया। दाऊद ने न केवल साढ़े सात वर्ष पहले यिज्रेल की लड़ाई में इस्राएल की हार के अपमान की भरपाई की—जिसमें शाऊल और उसके पुत्र मारे गए थे—बल्कि अन्य लाभ भी प्राप्त किए। इन जीतों ने दाऊद के नेतृत्व, इस्राएल की प्रतिष्ठा और परमेश्वर की महिमा को और अधिक स्थापित किया। परन्तु आज आपके और मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये लड़ाइयाँ हमें प्रार्थना में परमेश्वर की सेवा करने का सबसे प्रभावी तरीका सीखने का अवसर प्रदान करती हैं; यह तरीका केवल माँगने, विनती करने या अपनी योजनाओं और महत्वाकांक्षाओं को परमेश्वर पर थोपने से नहीं, बल्कि परमेश्वर से यह पूछने से है कि वह क्या करना चाहता है, और फिर उसी के अनुसार प्रार्थना करने और कार्य करने से है। यह प्रार्थना करने का यह सबसे प्रभावी तरीका है। जब परमेश्वर का कोई पुरुष या स्त्री प्रार्थना में परमेश्वर से पूछताछ करना सीख जाता है, तो उसकी प्रार्थनाओं की प्रभावशीलता और उनके उत्तर मिलने की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है; क्योंकि परमेश्वर की योजना की पूर्ति के लिए की गई प्रार्थना ही, प्रभावी प्रार्थना के चक्र में परमेश्वर के साथ सहयोग करने का सबसे उत्तम मार्ग है।
वचन 17 कहता है, “फिर अब्नेर ने इस्राएल के पुरनियों के संग इस प्रकार की बातचीत की, “पहले तो तुम लोग चाहते थे कि दाऊद हमारे ऊपर राजा हो।” इस चढ़ाई अर्थात् आक्रमण में—और इसके बाद वाले आक्रमण में भी—पलिश्ती ही आक्रामक थे; उन्होंने स्वयं को अपने ही विनाश की ओर सक्रिय कर लिया था, और अपने ही सिर पर विपत्ति मोल ले ली थी। वे जानते थे कि शाऊल के अधीन रहते हुए दाऊद ने लाखों लोगों को मार गिराया था, और वे इस बात से चिन्तित थे कि जब वह स्वयं राजा बन जाएगा, तब वह क्या करेगा! स्पष्ट है, उन्हें लगा कि यह दाऊद के शासन को उसके आरम्भ दौर में ही—इससे पहले कि वह पूरी तरह से स्थापित हो पाता—कुचल देने का एक सुनहरा अवसर है। साढ़े सात वर्ष पूर्व शाऊल के विरुद्ध मिली सफलता ने उन्हें दाऊद पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया था; परन्तु वे शाऊल और दाऊद के बीच के एक बहुत बड़े अंतर को समझने में असफल रहे। दाऊद के साथ परमेश्वर की उपस्थिति थी—जिसे शाऊल ने अपनी जान-बूझकर की गई अवज्ञा के कारण लापरवाही से गँवा दिया था। परमेश्वर का राज्य भी आक्रमण की चपेट में है, और हम में से प्रत्येक को अपने-अपने सेवा-क्षेत्रों में इस आक्रमण का डटकर सामना करना चाहिए। “जाति जाति के लोग क्यों हुल्लड़ मचाते हैं, और देश देश के लोग व्यर्थ बातें क्यों सोच रहे हैं? यहोवा और उसके अभिषिक्त के विरुद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं, “आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें, और उनकी रस्सियों को अपने ऊपर से उतार फेकें’” (भजन संहिता 2:1-3)। आप परमेश्वर के चुने हुए और अभिषिक्त सेवक हैं। अविश्वासी विधर्मी लोग आपके विरुद्ध चाहे कितना भी क्यों न भड़क उठें, और आपके समुदाय की सरकारों के शासक चाहे क्यों न आपके विरोध में खड़े हो जाएँ—किन्तु उनका यह विरोध पूर्णतः व्यर्थ सिद्ध होगा। विनाश उन्हीं के विरुद्ध होकर आपके पक्ष में बदल जाएगा—ठीक वैसे ही, जैसे ‘बालपरासीम’ के युद्धों में हुआ था। यशायाह 8:9-10 कहता है, “हे लोगों, हल्ला करो तो करो, परन्तु तुम्हारा सत्यानाश हो जाएगा। हे पृथ्वी के दूर दूर देश के सब लोगों, कान लगाकर सुनो, अपनी अपनी कमर कसो तो कसो, परन्तु तुम्हारे टुकड़े टुकड़े किए जाएँगे; अपनी कमर कसो तो कसो, परन्तु तुम्हारा सत्यानाश हो जाएगा। तुम युक्ति करो तो करो, परन्तु वह निष्फल हो जाएगी, तुम कुछ भी कहो, परन्तु तुम्हारा कहा हुआ ठहरेगा नहीं, क्योंकि परमेश्वर हमारे संग है।”
यह पलिश्ती सेना मुख्य रूप से उन पलिश्ती सेनापतियों और सैनिकों से बनी थी, जिन्होंने दाऊद को अपनी सेना से निकाल दिया था, जब उन्होंने शाऊल पर आक्रमण करके उसे हराया था। पवित्रशास्त्र कहता है, "...तब सब पलिश्ती दाऊद की खोज में निकले...।" आपको भी ऐसे ही शत्रु का सामना करना पड़ेगा। वे देखने में बहुत ही खूंखार और डील-डौल वाले लग सकते हैं। वे पलिश्तियों की तरह "रपाईम नामक तराई में फैल भी सकते हैं।" रपाईम यरूशलेम के पास ही स्थित था; यह एक ऐसा नगर था, जिसे वे दाऊद द्वारा उसकी किलेबंदी पूरी करने से पहले ही अपने कब्जे में लेना चाहते थे। यरूशलेम, अपनी आरम्भ से ही, एक विशेष तरह की शत्रुता का निशाना रहा है और उस पर लगातार आक्रमण होते रहे हैं। उनका इस तरह फैल जाना यह दिखाता है कि उनकी सँख्या बहुत ज्यादा थी और वे देखने में बहुत ही जबरदस्त और डरावने लग रहे थे। उनके इस तरह सामने आने के खतरे ने दाऊद को प्रभु यहोवा से सलाह लेने का एक ठोस कारण दे दिया। दाऊद यह जानना चाहता था कि क्या उसे शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए।
वचन 19 कहता है, “तब दाऊद ने यहोवा से पूछा, “क्या मैं पलिश्तियों पर चढ़ाई करूँ? क्या तू उन्हें मेरे हाथ कर देगा?” यहोवा ने दाऊद से कहा, “चढ़ाई कर; क्योंकि मैं निश्चय पलिश्तियों को तेरे हाथ कर दूँगा।’” दाऊद कौन था? एक सैनिक; एक अच्छा सैनिक। सैनिकों का एक अगुवा; जी सैनिकों का एक बहुत ही अच्छा अगुवा। दाऊद शाऊल की सेना में सबसे सर्वोत्तम सेनापति रहा था और अब वह राजा था। जब पलिश्ती आक्रमण करने के लिए यरूशलेम के निकट आए, तो आप सोचेंगे कि दाऊद को पता होगा कि क्या करना है। “चलो, साथियों, पलिश्तियों का पीछा करते हैं।” क्या दाऊद ने यही किया? नहीं। उसने अपनी स्वयं की समझ पर भरोसा नहीं किया और प्रभु यहोवा से पूछा। जब जीत मिली, तो इस्राएली क्षेत्र सुरक्षित रहा, परमेश्वर के लोग सुरक्षित रहे, परमेश्वर की महिमा हुई और पलिश्ती वहाँ से भाग खड़े हुए। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि राजा ने प्रभु यहोवा से पूछा था। सैनिक-कार्य और युद्ध-कौशल दाऊद के मजबूत पक्ष थे। तौभी उस में इतनी विनम्रता थी कि वह उस क्षेत्र में भी परमेश्वर के सामने स्वयं को दीन कर लेता था, जो उसका सबसे मजबूत पक्ष था। क्या हम में वह विनम्रता है? हमारे जीवन या हमारी सेवकाई के उन क्षेत्रों के बारे में प्रभु यहोवा से पूछना शायद आसान हो, जो हमारी शक्ति में नहीं हैं। ऐसी स्थितियों में हम परमेश्वर पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। अपनी कमजोरी के उन क्षेत्रों में हम अपनी आवश्यकता को ज्यादा आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। परन्तु क्या हम में इतनी विनम्रता, बुद्धि और क्षमता है कि हम अपनी शक्ति के क्षेत्र में भी स्वयं को दीन कर सकें और यह स्वीकार कर सकें कि अपनी शक्ति होने पर भी हमें परमेश्वर की आवश्यकता है? अपनी शक्ति होने पर भी हम अभी भी उतने मजबूत नहीं हैं।
दाऊद के प्रश्न के दो हिस्से थे: पहला हिस्सा: “क्या मैं जाऊँ?” यह उसके कर्तव्य से जुड़ा था। “क्या मुझे स्वर्ग से आक्रमण करने का आदेश मिला है?” कोई भी सोचेगा कि दाऊद को इस बारे में शक करने की कोई आवश्यकता नहीं थी; उसे राजा किस लिए बनाया गया था—सिवाय इसके कि वह प्रभु यहोवा और इस्राएल के लिए युद्ध लड़े? परन्तु एक अच्छा व्यक्ति अपने हर कदम पर परमेश्वर को अपने आगे चलते हुए देखना पसन्द करता है। दाऊद यह जानना चाहता था कि कब। “क्या मैं अभी जाऊँ?” यह काम किया जाना है, परन्तु क्या इसे इसी समय किया जाना है? शायद वर्षों बाद सुलैमान को अपने पिता का इतिहास स्मरण आया होगा, जब उसने नीतिवचन 3:5-6 लिखा: “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।" स्थिति बहुत ही अधिक जटिल और उलझी हुई थी, जिसमें कई अलग-अलग बातें शामिल थीं। शायद दाऊद के लिए निर्णय लेना इतना आसान नहीं रहा होगा। आखिर, भले ही पलिश्ती लोग सामान्य शत्रु थे, फिर भी उनमें से कुछ उसके विशेष मित्र भी थे। शाऊल के समय में, जब दाऊद मुश्किल में था, तब आकीश ने उसके साथ दयालुता दिखाई थी और उसकी रक्षा की थी। "अब," दाऊद ने शायद सोचा होगा, "क्या मुझे आकीश की सहायता को स्मरण नहीं करना चाहिए, और उनके साथ युद्ध करने के बजाय शांति स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए?" "नहीं," परमेश्वर ने कहा, "वे इस्राएल के शत्रु हैं, और उनका विनाश निश्चित है; इसलिए व्यक्तिगत् बातों को एक तरफ रख और 'जा'।" इस तरह, जब दाऊद इस सेना के विरुद्ध युद्ध करने गया, तो उसे अपने मित्र आकीश के विरुद्ध खड़ा होना पड़ा, और अपने सबसे अच्छे मित्र—परमेश्वर—के प्रति अपनी विश्वासयोग्यता बनाए रखनी पड़ी।
पहला प्रश्न कर्तव्य से जुड़ा है, और दूसरा प्रश्न सफलता से। भाग दो: "क्या मैं पलिश्तियों पर चढ़ाई करूँ?" उसके अंतर्मन ने पहला प्रश्न पूछा: "क्या मैं जाऊँ?" उसकी समझदारी ने दूसरा प्रश्न पूछा: "क्या तू उन्हें मेरे हाथ कर देगा?" (वचन 19)। दाऊद ने जीत के लिए परमेश्वर पर अपनी निर्भरता को स्वीकार किया; उसने माना कि जब तक परमेश्वर उन्हें उसके हाथों में नहीं सौंप देता, तब तक वह उन्हें पराजित नहीं कर सकता है। इसलिए, उसने अपने विषय को परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ दिया। "क्या तू ऐसा करेगा?" और परमेश्वर ने उत्तर दिया, "हाँ, मैं ऐसा करूँगा।" यदि परमेश्वर हमें भेजता है, तो वह हमारा साथ देगा और हमारे साथ खड़ा रहेगा। परमेश्वर ने हमें हमारे आत्मिक शत्रुओं पर जीत का जो भरोसा दिलाया है—कि वह जल्द ही शैतान को हमारे पैरों तले कुचल देगा—वह भरोसा हमारे आत्मिक संघर्षों में हमारा ढाँढ़स बढ़ाना चाहिए। हम बिना किसी निश्चितता के लड़ाई नहीं लड़ते। दाऊद के पास अब एक विशाल सेना थी, और उसे अपने सैनिकों का पूरे मन से साहसी समर्थन भी प्राप्त था; फिर भी, उसने अपनी स्वयं की शक्ति के बजाय परमेश्वर के प्रतिज्ञाएँ पर ज्यादा भरोसा किया।
यही कारण है कि मार्गदर्शन या सलाह लेना इतना महत्वपूर्ण है। युद्ध में जीत या हार, परमेश्वर की भागीदारी पर ही निर्भर करती है। 1 शमूएल 17 में, हमें दाऊद द्वारा विशालकाय दानव गोलियत को मार गिराने की रोमांचक कहानी मिलती है। जब वह गोलियत के निकट पहुँचा, तो दाऊद ने एक वैभवशाली भाषण दिया; उस भाषण के अंत में उसने एक ऐसी सच्चाई की घोषणा की, जो आज के हमारे पाठ के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। “और यह समस्त मण्डली जान लेगी कि यहोवा तलवार या भाले के द्वारा जयवन्त नहीं करता, इसलिये कि संग्राम तो यहोवा का है, और वही तुम्हें हमारे हाथ में कर देगा” (वचन 47)। दाऊद ने न केवल यह बात सबके सामने कही, बल्कि अपने मन की गहराइयों से इस पर विश्वास भी किया। यदि यह लड़ाई प्रभु यहोवा की है, तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हमें यह लड़ाई पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही लड़नी चाहिए या नहीं लड़नी चाहिए। दूसरे शब्दों में, यदि हम भी दाऊद की तरह लगातार लड़ाइयों में जीत प्राप्त करना चाहते हैं, तो एक सफल पास्टर, प्रचारक, मिशनरी या कलीसिया के अगुवा को यह सीखना होगा कि प्रभु से सलाह कैसे ली जाए। दाऊद जानता था कि लड़ाई कैसे लड़ी जाती है, क्योंकि उसे पता था कि प्रभु यहोवा से कब और कैसे सलाह लेनी है।
2. दाऊद की पहली सलाह का परिणाम। वचन 20-21
दो लड़ाइयों में से पहली लड़ाई में, जो रपाईम की घाटी में बालपरासीम में हुई थी, दाऊद ने तलवार के जोर पर पलिश्तियों की सेना को हरा दिया, और इसके लिए उसने परमेश्वर को महिमा दी; उसने कहा, “यहोवा मेरे सामने होकर मेरे शत्रुओं पर जल की धारा के समान टूट पड़ा है” (वचन 20)। मैं यह नहीं कर पाता, यदि उसने मेरे आगे यह न किया होता; उसने एक बांध में पानी के फूटने की तरह एक दरार खोल दी, जो खुलने के बाद और भी चौड़ी होती चली जाती है। इस काम का मुख्य हिस्सा परमेश्वर ने ही किया था, इसलिए सही प्रतिक्रिया यही है कि हम कहें—हमें नहीं, बल्कि तुझे, हे प्रभु—जैसा कि दाऊद ने भजन संहिता 115:1 में लिखा है, “हे यहोवा, हमारी नहीं, हमारी नहीं, वरन् अपने ही नाम की महिमा, अपनी करुणा और सच्चाई के निमित्त कर।” और फिर, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्मरण रखें कि परमेश्वर ने उस स्थान पर क्या किया था, उसने उस स्थान का नाम “बालपरासीम” रखा—जिसका अर्थ ‘दरारों का स्वामी’ या ‘तोड़कर आगे बढ़ने की स्थान का स्वामी’ है।
यहाँ एक रूचिपूर्ण बात देखने को मिलती है। पलिश्ती अपने देवताओं की मूर्तियों को अपने रक्षक के तौर पर युद्ध के मैदान में ले आए थे—शायद यह सोचकर कि इस्राएली भी अपने शिविर में ‘पवित्र वाचा का संदूक’ ले आए थे; परन्तु, जब उन्हें भागना पड़ा, तो उनके पास उन मूर्तियों को अपने साथ ले जाने का समय नहीं बचा। वे मूर्तियाँ—ठीक वैसे ही जैसे सभी झूठे देवताओं की मूर्तियाँ होती हैं, या आज हमारे मनों में बसी हुई मूर्तियाँ—एक बोझ होती हैं: यशायाह 46:1 कहता है, “बेल देवता झुक गया, नबो देवता नब गया है, उनकी प्रतिमाएँ पशुओं वरन् घरेलू पशुओं पर लदी हैं; जिन वस्तुओं को तुम उठाए फिरते थे, वे अब भारी बोझ हो गईं और थकित पशुओं पर लदी हैं।” परमेश्वर लोगों को उन चीजों से भी ऊब जाने पर मजबूर कर सकता है, जिन्हें वे सबसे ज्यादा पसन्द करते हैं; और उन्हें उन चीजों को छोड़ने के लिए विवश कर सकता है, जिन्हें वे अब तक संजोकर रखते थे और जिनकी सराहना करते थे।
यशायाह 2:20 कहता है, “उस दिन लोग अपनी चाँदी–सोने की मूरतों को जिन्हें उन्होंने दण्डवत् करने के लिये बनाया था, छछून्दरों और चमगीदड़ों के आगे फेकेंगे।” यदि मेरे मन में कोई ऐसी मूर्ति है, जिसे मैंने पहचाना नहीं है, तो मैं चाहता हूँ कि प्रभु उसे मेरे सामने स्पष्ट करें, ताकि मैं उसे छोड़ सकूँ। दाऊद और उसके लोगों ने लूट का माल लिया और उन देवताओं को जला दिया। 2 शमूएल कहता है कि दाऊद की सेना उन्हें उठाकर ले गई, परन्तु 1 इतिहास इस कहानी को पूरा करता है और सही बात बताता है। उन्होंने उन्हें आग में जला दिया, जो कि व्यवस्थाविवरण 7:5 की आज्ञा का पालन होता। जैसा कि 2 शमूएल 5 में कहा गया है कि वे उन्हें उठाकर ले गए थे, उसके बाद 1 इतिहास 14:12 में कहा गया है, “वहाँ वे अपने देवताओं को छोड़ गए, और दाऊद की आज्ञा से वे आग लगाकर फूँक दिए गए।” इस तरह, हमें यह दृश्य मिलता है कि पहले वे उन्हें उठाकर ले गए और फिर उन्होंने उन्हें जला दिया।
आइए तुलना करें कि उन देवताओं के साथ क्या हुआ, जिन्हें पलिश्ती युद्ध में अपने साथ ले गए थे, और उस परमेश्वर के संदूक के साथ क्या हुआ था, जिसे इस्राएली वर्षों पहले युद्ध में अपने साथ ले गए थे। कितना बड़ा अन्तर है! 1 शमूएल 5:1-8 शमूएल के समय की यह रुचिपूर्ण कहानी बताता है, जो परमेश्वर की महान सामर्थ्य को दिखाती है। यह देखना रूचिपूर्ण है कि कैसे परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य पलिश्तियों को दिखाई, और इस कहानी के द्वारा, हमें भी दिखाई। “1पलिश्तियों ने परमेश्वर का सन्दूक एबनेज़ेर से उठाकर अशदोद में पहुँचा दिया; 2फिर पलिश्तियों ने परमेश्वर के सन्दूक को उठाकर दागोन के मन्दिर में पहुँचाकर दागोन के पास रख दिया। 3दूसरे दिन अशदोदियों ने तड़के उठकर क्या देखा कि दागोन यहोवा के सन्दूक के सामने औंधे मुँह भूमि पर गिरा पड़ा है। तब उन्होंने दागोन को उठाकर उसी के स्थान पर फिर खड़ा किया। 4फिर अगले दिन जब वे तड़के उठे, तब क्या देखा कि दागोन यहोवा के सन्दूक के सामने औंधे मुँह भूमि पर गिर पड़ा है; और दागोन का सिर और दोनों हथेलियाँ डेवढ़ी पर कटी हुई पड़ी हैं; इस प्रकार दागोन का केवल धड़ समूचा रह गया। 5इस कारण आज के दिन तक भी दागोन के पुजारी और जितने दागोन के मन्दिर में जाते हैं, वे अशदोद में दागोन की डेवढ़ी पर पाँव नहीं रखते। 6तब यहोवा का हाथ अशदोदियों के ऊपर भारी पड़ा, और वह उन्हें नष्ट करने लगा; और उसने अशदोद और उसके आस पास के लोगों के गिलटियाँ निकालीं। 7यह हाल देखकर अशदोद के लोगों ने कहा, “इस्राएल के देवता का सन्दूक हमारे मध्य रहने नहीं पाएगा; क्योंकि उसका हाथ हम पर और हमारे देवता दागोन पर कठोरता के साथ पड़ा है।” 8तब उन्होंने पलिश्तियों के सब सरदारों को बुलवा भेजा, और उनसे पूछा, “हम इस्राएल के देवता के सन्दूक से क्या करें?” वे बोले, “इस्राएल के देवता का सन्दूक घुमाकर गत नगर में पहुँचाया जाय।” अत: उन्होंने इस्राएल के परमेश्वर के सन्दूक को घुमाकर गत में पहुँचा दिया।” इसके बाद संदूक गाजा गया, जहाँ वैसी ही घटनाएँ घटीं, इसलिए उसे आगे एक्रोन भेज दिया गया। और एक्रोन में क्या हुआ? 1 शमूएल 5 के पद 11 और 12 कहते हैं, “11तब उन्होंने पलिश्तियों के सब सरदारों को इकट्ठा किया, और उनसे कहा, “इस्राएल के देवता के सन्दूक को निकाल दो, कि वह अपने स्थान पर लौट जाए, और हम को और हमारे लोगों को मार डालने न पाए।” उस समस्त नगर में तो मृत्यु के भय की हलचल मच रही थी, और परमेश्वर का हाथ वहाँ बहुत भारी पड़ा था। 12और जो मनुष्य न मरे वे भी गिलटियों के मारे पड़े रहे; और नगर की चिल्लाहट आकाश तक पहुँची।”
इस तरह, हम देखते हैं कि जब परमेश्वर का संदूक पलिश्तियों के हाथों में पड़ा, तो उसने उन्हें भस्म कर दिया, उन पर फोड़े निकल आए और उनकी मूर्तियाँ गिर पड़ीं; परन्तु, जब ये पलिश्ती मूर्तियाँ इस्राएल के हाथों में पड़ीं, तो वे देवता स्वयं को भी नहीं बचा पाए—किसी और की सहायता करना तो दूर की बात है—और वे स्वयं ही जला दिए गए। कई बार ऐसा होता है, जब यह स्पष्ट होता है कि हमें परमेश्वर से पूछना चाहिए कि हमें क्या करना है। ऐसे समय में हम बुद्धि पाने के लिए प्रभु की ओर मुड़ते हैं, और वह हमें वह बुद्धि और मार्गदर्शन देता है, जिसकी हमें अपनी सेवकाई के निर्णय लेने और काम को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यकता होती है। हम सबसे ज्यादा कमजोर तब होते हैं, जब हमें लगता है कि हमें पता है कि हमें क्या करना चाहिए। इस विषय में दाऊद एक सर्वोत्तम घटना है। वह एक बहुत ही सफल सैनिक था और जानता था कि विजयी लड़ाइयों में सैनिकों का नेतृत्व कैसे किया जाता है। परन्तु जब यरूशलेम के पास उसका सामना पलिश्तियों से हुआ, तो उसने प्रभु यहोवा से पूछा। यह पूछना कमजोरी, बेबसी, शक या डर की कारण से नहीं थी। यह परमेश्वर पर विनम्रतापूर्वक निर्भर रहने की भावना से प्रेरित था। क्या हम आज अपनी सेवकाई में दाऊद की घटना पर चल सकते हैं? क्या हम परमेश्वर पर अपनी निर्भरता दिखा सकते हैं? क्या हम अपने प्रभु के लिए अपनी आवश्यकता को स्पष्ट कर सकते हैं, और फिर जब वह हमारी सहायता के लिए आता है, तो क्या हम उसे महिमा दे सकते हैं? हमारे पवित्रशास्त्र का 20वाँ वचन कहता है, “तब दाऊद बालपरासीम को गया, और दाऊद ने उन्हें वहीं मारा; तब उसने कहा, “यहोवा मेरे सामने होकर मेरे शत्रुओं पर जल की धारा के समान टूट पड़ा है।” इस कारण उसने उस स्थान का नाम बालपरासीम रखा।’” दाऊद ने प्रभु यहोवा से पूछा, उसकी आज्ञा मानी, एक जबरदस्त जीत प्राप्त की, और फिर परमेश्वर को महिमा दी। क्या ही सर्वोत्तम तरीका है!
हम परमेश्वर के लोगों का नेतृत्व तब तक नहीं कर सकते, जब तक हम स्वयं परमेश्वर द्वारा निर्देशित होने के लिए तैयार न हों। परमेश्वर हमारा नेतृत्व करेगा, परन्तु हमारा यह दायित्व है कि हम उससे पूछें और तब तक प्रतीक्षा करें, जब तक हमें उसकी ओर से कोई उत्तर न मिल जाए। यह उन बड़े सबकों में से एक है, जो दाऊद आज के मसीही अगुवों को सिखाता है।