अविश्‍वासियों के साथ संबंध

अध्याय तिरासी


2 शमूएल 10:1-8

Ron Meyers

1इसके बाद अम्मोनियों का राजा मर गया, और उसका हानून नामक पुत्र उसके स्थान पर राजा हुआ। 2तब दाऊद ने यह सोचा, “जैसे हानून के पिता नाहाश ने मुझ को प्रीति दिखाई थी, वैसे ही मैं भी हानून को प्रीति दिखाऊँगा।” तब दाऊद ने अपने कई कर्मचारियों को उसके पास उसके पिता के विषय शान्ति देने के लिये भेज दिया। दाऊद के कर्मचारी अम्मोनियों के देश में आए। 3परन्तु अम्मोनियों के हाकिम अपने स्वामी हानून से कहने लगे, “दाऊद ने जो तेरे पास शान्ति देनेवाले भेजे हैं, वह क्या तेरी समझ में तेरे पिता का आदर करने के विचार से भेजे हैं? क्या दाऊद ने अपने कर्मचारियों को तेरे पास इसी विचार से नहीं भेजा कि इस नगर में ढूँढ़ ढाँढ़ करके और इसका भेद लेकर इसको उलट दे?” 4इसलिये हानून ने दाऊद के कर्मचारियों को पकड़ा, और उनकी आधी–आधी दाढ़ी मुड़वाकर, और आधे वस्त्र, अर्थात् नितम्ब तक कटवाकर, उनको जाने दिया। 5इसका समाचार पाकर दाऊद ने लोगों को उनसे मिलने के लिये भेजा, क्योंकि वे बहुत लजाते थे। और राजा ने यह कहा, “जब तक तुम्हारी दाढ़ियाँ बढ़ न जाएँ तब तक यरीहो में ठहरे रहो, तब लौट आना।” 6जब अम्मोनियों ने देखा कि हम से दाऊद अप्रसन्न है, तब अम्मोनियों ने बेत्रहोब और सोबा के बीस हज़ार अरामी प्यादों को, और हज़ार पुरुषों समेत माका के राजा को, और बारह हज़ार तोबी पुरुषों को, वेतन पर बुलवाया। 7यह सुनकर दाऊद ने योआब और शूरवीरों की समस्त सेना को भेजा। 8तब अम्मोनी निकले और फाटक ही के पास पाँती बाँधी; और सोबा और रहोब के अरामी और तोब और माका के पुरुष उनसे अलग मैदान में थे।


1 तीमुथियुस 3 में पौलुस ने मसीही अगुवों के लिए योग्यताएँ बताई हैं। वचन 7 में कहा गया है, “और बाहरवालों में भी उसका सुनाम हो, ऐसा न हो कि निन्दित होकर शैतान के फंदे में फँस जाए।” हम दाऊद को अम्मोनियों के साथ अच्छे संबंध बनाने के उसके प्रयासों के लिए दोष नहीं दे सकते। और न ही हम स्वयं को या अन्य मसीहियों को दोष दे सकते हैं, यदि हम या वे अविश्‍वासियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने का प्रयास करते हैं। हमें केवल तभी सीमा निर्धारित करनी चाहिए और स्वयं को अलग कर लेना चाहिए, यदि उनके साथ मित्रता करने से विश्‍वासियों के रूप में हमारी गवाही पर कोई आँच आती है। मुझे ऐसा नहीं लगता कि दाऊद ने अपने मित्र नाहाश के पुत्र हानून से मित्रता करने के प्रयास में उस सीमा को पार किया था।


1. एक गलतफहमी। वचन 1-5

कुछ ही समय पहले, दाऊद ने पलिश्तियों, मोआब, एदोम, अरम्नहरैम और अरम्माका और सोबा —इन सभी पड़ोसी राष्ट्रों पर विजय प्राप्त की थी। उसने अम्मोन पर विजय प्राप्त नहीं की थी (जो कि एक पड़ोसी राष्ट्र ही था), संभवतः इसका कारण अम्मोन के राजा नाहाश के साथ उसकी मित्रता थी। दाऊद अपने पड़ोसी, अम्मोनियों के राजा का बहुत ज्यादा सम्मान करता था। ऐसा प्रतीत होता है कि नाहाश ने दाऊद के प्रति दयालुता दिखाई थी, और अब दाऊद उस दयालुता का बदला नाहाश के पुत्र, हानून के प्रति दिखाना चाहता था। हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि दाऊद को अपने पिता योनातान और दादा शाऊल के कारण मपीबोशेत के प्रति दयालुता दिखाने से जो संतोष मिला था, अब वह उसी कार्य को एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दोहराना चाहता था। कोई अच्छा कार्य करने से मिलने वाला संतोष हमें उसे दोबारा करने के लिए प्रेरित कर सकता है।


बहुत समय पहले, नाहाश ने इस्राएल के याबेश-गिलाद पर आक्रमण किया था। 1 शमूएल 11:2 में कहा गया है, “अम्मोनी नाहाश ने उनसे कहा, “मैं तुम से वाचा इस शर्त पर बाँधूँगा, कि मैं तुम सभों की दाहिनी आँखें फोड़कर इसे सारे इस्राएल की नामधराई का कारण कर दूँ।” हमें निश्‍चित रूप से यह ज्ञात नहीं है कि यदि नाहाश इस्राएल का शत्रु था, तो उसने दाऊद के प्रति दयालुता क्यों दिखाई; सिवाय इसके कि शायद वह इस बात से प्रेरित हुआ होगा कि दाऊद, शाऊल का विरोधी था—और शाऊल ही वह व्यक्ति था, जो नाहाश के आक्रमण के समय याबेश-गिलाद के लोगों की रक्षा के लिए आगे आया था। अतः, नाहाश ने संभवतः दाऊद को अपना मित्र इसलिए माना होगा, क्योंकि वह शाऊल का शत्रु था।


दाऊद ने इस जटिल रिश्ते को कोई मुद्दा नहीं बनाया। उसने नाहश की दयालुता को स्वीकार किया था और अब वह उसका बदला चुकाना चाहता था। जब तक कोई और ज्यादा आवश्यक सिद्धान्त न टूट रहा हो, भेंट अर्थात् उपहार देने वाले का उद्देश्य चाहे जो भी हो—भले ही वह घमण्ड हो या दूसरों पर नियंत्रण पाने की चाहत—फिर भी उपहार पाने वाले के लिए समझदारी इसी में है कि वह इसके लिए धन्यवादी रहे, और यदि उसे अवसर मिले, तो वह उस किए हुए उपकार का बदला चुका दे। परमेश्‍वर तो मन और इरादों को जानता है। इसलिए, दाऊद ने हानून को सांत्वना देने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजा, ताकि उसके पिता की मृत्यु के समय उसे सांत्वना दी जा सके।


जब कोई मित्र मर जाता है, तो हमें उस मरे हुए मित्र के बच्चों और मित्रों को सांत्वना देने का एक अनोखा अवसर मिलता है। यह दिखाकर कि जब वह मित्र जीवित था, तब हम उसका कितना आदर करते थे, हम उन लोगों का ढाँढसा बढ़ा सकते हैं, जो उसके जाने का शोक मना रहे होते हैं। यदि हम उस मरे हुए मित्र को नहीं जानते थे या उसका आदर नहीं करते थे, तो हमें यह अवसर नहीं मिलता। इससे बच्चों को तब बहुत अधिक सांत्वना मिलती है, जब उनके माता-पिता प्रभु में सो जाते हैं, और उन्हें पता चलता है कि उनके माता-पिता के मित्र उनके भी मित्र हैं। शोक मनाने वालों को तब बहुत अधिक सांत्वना मिलती है, जब उन्हें पता चलता है कि कोई और भी उनके साथ शोक मना रहा है, उनके दु:ख को समझ रहा है, और उस में उनके साथ शामिल है। क्या यही कारण है कि बाइबल कहती है कि जो लोग शोक मना रहे हैं, उनके साथ तुम भी शोक मनाओ? पौलुस अपने पढ़ने वालों से कहता है, "आनन्द करनेवालों के साथ आनन्द करो, और रोनेवालों के साथ रोओ" (रोमियों 12:15)। यदि आपको किसी को सांत्वना देने का अवसर मिले, तो उसका उपयोग अवश्य करें। यह किसी को मित्र बनाने का एक अच्छा समय हो सकता है, क्योंकि उस समय उनका मन आपके लिए किसी भी दूसरे समय की तुलना में ज्यादा खुला होता है। बाद में, तुम उस रिश्ते का उपयोग करके उन्हें परमेश्‍वर के राज्य से जुड़े किसी उद्देश्य के लिए प्रभावित कर सकते हैं।


अम्मोनी लोगों का नया राजा हानून, अपने भ्रम में पड़े हुए सलाहकारों के बहकावे में आकर, दाऊद को गलत समझ बैठा; और उसने दाऊद के भेजे हुए प्रतिनिधिमंडल का धन्यवाद करने के बजाय, उनका अनादर किया। उसने अपने हाकिमों अपने स्वामियों की बुरी सलाहों पर कान लगाया; उन सरदारों ने उसे यह निश्‍चय दिलाया था कि दाऊद के दूत तो बस सांत्वना देने का नाटक कर रहे हैं, जबकि वास्तव में उनकी मंशा कुछ और ही है—उन्हें तो जासूसी अर्थात् उसके राज्य का भेद लेने के लिए भेजा गया है। सभोपदेशक 3:4 में कहा गया है कि, "रोने का समय, और हँसने का भी समय; छाती पीटने का समय, और नाचने का भी समय है" और दाऊद जानता था कि यह शोक मनाने का ही समय है। दया से रहित और दुष्ट लोग दूसरों को भी अपने जैसा ही झूठा समझने के लिए सदैव तैयार रहते हैं। और जो लोग अपने पड़ोसियों के प्रति द्वेष रखते हैं, वे अक्सर यह सोच बैठते हैं कि उनके पड़ोसी कभी भी उनके प्रति सद्भावना नहीं रखेंगे। बिना किसी कारण के किए जाने वाला शक एक दुष्ट मन का प्रमाण प्रतीत होता है। चाहे वह बुरा विचार भीतर से आए या बाहर से, उस विचार को मन में स्थान देने या उसे अस्वीकार करने का चुनाव अंततः हम में से हर एक का ही होता है। केवल इसलिए कि यह बुरा विचार उसके सलाहकारों की ओर से आया था, हानून फिर भी दोषी है, क्योंकि उसी ने उस विचार पर कार्यवाही की। वह यह नहीं कह सकता था कि, "उन्होंने मुझसे ऐसा करवाया।" और हम यह सीखते हैं कि जब हम अविश्‍वासियों के साथ व्यवहार करते हैं या उनके साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने का प्रयास करते हैं, तो हम एक जोखिम उठाते हैं कि वे हमें शक की दृष्टि से देख सकते हैं। आखिरकार, वे विश्‍वासी नहीं हैं और उनके भीतर परमेश्‍वर का आत्मा उपस्थित नहीं है, जो उन्हें हमें समझने में सहायता कर सके।

अपने अविश्‍वासी सलाहकारों के असंवेदनशील और दुर्भावनापूर्ण सुझाव को मानते हुए, हानून ने दाऊद के दूतों का अपमान किया और उनके साथ बुरा व्यवहार किया। यदि उसे लगता था कि दाऊद के कर्मचारियों के मन में कोई बुरी मंशा है, तो वह उन्हें जितनी जल्दी हो सके, बस वापस भेज सकता था; परन्तु उसने उनके राजा और उनके देश के प्रति द्वेष के कारण, उन्हें अपमानित करके उनके साथ बहुत अधिक बुरा किया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्य स्वयं भी सम्मानित लोग थे, और उससे भी बढ़कर इसलिए कि वे उस राजा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिसने उन्हें भेजा था। परन्तु उनके वस्त्र काटकर और उनकी आधी दाढ़ी मुंडवाकर, उन्होंने पूरी तरह से अनावश्यक और शत्रुतापूर्ण कदम उठाया। वचन 4 कहता है, “इसलिये हानून ने दाऊद के कर्मचारियों को पकड़ा, और उनकी आधी–आधी दाढ़ी मुड़वाकर, और आधे वस्त्र, अर्थात् नितम्ब तक कटवाकर, उनको जाने दिया।” हानून ने उन्हें अपने सेवकों की अवमानना ​​और उपहास का पात्र बनाया, और उनका ठट्ठों उड़ाकर उन्हें और भी अधिक अपमानित किया। इस कार्य से उसने अपने सेवकों को उन पर फटकार लगाने की अनुमति दे दी—मानो वे आने वाले यहूदी किसी नीची जाति के लोग हों।


दाऊद ने मूल दूतों से मिलने के लिए दूसरे दूत भेजे, जिससे इस अपमान के प्रति उसकी गंभीरता स्पष्ट हुई, और संभवतः उसने यह भी स्पष्ट किया कि वह जल्द ही उनके साथ हुए दुर्व्यवहार का बदला लेगा। उसने उन्हें यह अहसास दिलाया कि वह स्वयं उनके इस झगड़े में कितना रुचि रखता है, वह कितनी जल्दी इसका बदला लेगा, और उन्हें निर्देश दिया कि वे तब तक यरीहो में ही रहें, जब तक उनकी दाढ़ी फिर से बढ़ न जाए। यहूदी अपनी दाढ़ी लंबी रखते थे और आज भी रखते हैं; वे इसे बुर्जुगी, गरिमा और गंभीरता को दिखने का एक सम्मानजनक तरीका मानते हैं। वस्त्रों की समस्या तो जल्दी ठीक हो सकती थी, परन्तु दाढ़ी बढ़ने में ज्यादा समय लगता। फिर भी, अपने मन में दाऊद यह जानता था—जैसा कि उसने भजन संहिता 37:6, 7 में लिखा है—कि “तेरा धर्म ऊँचे पर्वतों के समान है, तेरे नियम अथाह सागर ठहरे हैं; हे यहोवा, तू मनुष्य और पशु दोनों की रक्षा करता है। हे परमेश्‍वर, तेरी करुणा कैसी अनमोल है! मनुष्य तेरे पंखों के तले शरण लेते हैं।”


जैसा कि ऊपर संकेत दिया गया है, इस घटना की एक बिल्कुल अलग व्याख्या भी संभव है। दाऊद एक विधर्मी राष्ट्र के साथ मित्रता क्यों करना चाहता था? व्यवस्थाविवरण 23:3 कहता है, “कोई अम्मोनी या मोआबी यहोवा की सभा में न आने पाए; उनकी दसवीं पीढ़ी तक का कोई यहोवा की सभा में कभी न आने पाए।” नाहाश ने याबेश-गिलाद पर आक्रमण किया था, परन्तु केवल याबेश-गिलाद पर ही नहीं; क्योंकि आक्रमण की तैयारी का उद्देश्य पूरे इस्राएल का अपमान करना था, न कि केवल याबेश-गिलाद के लोगों का। जैसा कि 1 शमूएल 11:2 में कहा गया है, "अम्मोनी नाहाश ने उनसे कहा, "मैं तुम से वाचा इस शर्त पर बाँधूँगा, कि मैं तुम सभों की दाहिनी आँखें फोड़कर इसे सारे इस्राएल की नामधराई का कारण कर दूँ।" नाहाश ने इस्राएल का अपमान किया था। क्या दाऊद को इस बात को अनदेखा कर देना चाहिए था? हानून भी वही कर रहा था, जो उसके पिता नाहाश ने पहले किया था—इस्राएल का अपमान। दाऊद उस व्यक्ति के पुत्र से अच्छे व्यवहार की आशा क्यों करता, जिसने इस्राएल का अपमान और बुरा व्यवहार किया था—भले ही नाहाश ने दाऊद के साथ कोई व्यक्तिगत् भलाई की हो। शायद दाऊद के साथ की गई वह कथित "भलाई" वास्तव में शाऊल का अपमान करने और उसके साथ बुरा व्यवहार करने की एक परोक्ष कोशिश ही थी।


2. अम्मोनी, और माका तथा सोबा के अरामी सैनिक—परमेश्‍वर और इस्राएल के विरुद्ध। वचन 6-8

इसलिए अम्मोनी इस्राएल के साथ युद्ध की तैयारी में जुट गए। उन्हें स्पष्ट तौर पर यह एहसास हो गया था कि उन्होंने एक गंभीर गलती कर दी है; परन्तु जल्दी से क्षमा माँगने और अपने शांतिपूर्ण संबंधों को फिर से बहाल करने की कोशिश करने के बजाय, वे इस्राएल के प्रति अपने पुराने, और शायद ज्यादा गहरे व अपमानजनक रवैये पर लौट आए। यदि वे स्वयं को विनम्र बनाते और दाऊद से क्षमा माँगते, तो शायद एक सम्मानजनक समझौता हो सकता था। परन्तु जब उन्होंने हठपूर्वक अपने किए पर अड़े रहने का निर्णय किया, तो उन्होंने स्वयं को ही नष्ट करने के लिए न्योता दे दिया। स्मरण रखिए, हम यहाँ उन लोगों के व्यवहार को देख रहे हैं, जो परमेश्‍वर पर विश्‍वास नहीं करते। हम उनसे यह आशा नहीं कर सकते कि वे सही ढंग से सोचेंगे या व्यवहार करेंगे।

वे मेल-मिलाप नहीं चाहते थे; वे तो इस्राएल को पूरी तरह नष्ट कर देना चाहते थे—भले ही इसके लिए उन्हें वेतन पर रखे हुए सैनिक ही क्यों न बुलाना पड़ें। ठीक इसी तरह के एक कारण से, हमें भी शैतान के साथ मोल-भाव करने या समझौता करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वह हमारे साथ शांतिपूर्ण संबंध नहीं चाहता; वह तो हमें पूरी तरह नष्ट कर देना चाहता है। ऐसे हालात में, यीशु के नाम पर शत्रु को नष्ट कर देना कहीं ज्यादा सर्वोत्तम है, बजाय इसके कि हम स्वयं नष्ट हो जाएँ।

उन्होंने निश्‍चित रूप से अपनी सीमाओं को लाँघ दिया था। एक तो उनके पास पर्याप्त सैनिक नहीं थे, और इसलिए उन्हें किराए के सैनिकों के तीन अलग-अलग समूहों को बुलाना पड़ा। वचन 6 में कहा गया है कि, "तब अम्मोनियों ने बेत्रहोब और सोबा के बीस हज़ार अरामी प्यादों को, और हज़ार पुरुषों समेत माका के राजा को, और बारह हज़ार तोबी पुरुषों को, वेतन पर बुलवाया।" इस तरह कुल मिलाकर 33,000 सैनिक हो गए। रुचिपूर्ण बात यह है कि इनमें बीस हजार अरामी भी शामिल थे, जिन्हें अभी हाल ही में अराम सोबा में दाऊद के अत्यन्त सफल अभियान में हार का सामना करना पड़ा था। और सैनिकों की इतनी बड़ी संयुक्त सेना होने के बावजूद, उन्हें फिर भी हार ही मिली! अरामियों के विषय में हमें यह भी जोड़ना चाहिए: “एक बार फिर कहना!” क्या हमें यहाँ शैतान के झूठे दिखावे में कोई समानता दिखाई नहीं देती? वह “यहूदा के गोत्र के सिंह” का सामना बिल्कुल नहीं कर सकता, फिर भी वह एक गरजते हुए सिंह की तरह घूमता फिरता है, इस ताक में कि वह किसे फाड़ खाए। मसीहियों को उसके साथ शांति स्थापित करने की कोई आवश्यकता नहीं है; यीशु के नाम पर उसे निश्‍चित रूप से हार का सामना करना पड़ेगा।


जब दाऊद ने उनकी सैनिक तैयारियों के बारे में सुना, तो उसने तुरन्त योआब को एक विशाल सेना के साथ उन पर आक्रमण करने के लिए भेजा, जैसा कि वचन 7 में लिखा है, “यह सुनकर दाऊद ने योआब और शूरवीरों की समस्त सेना को भेजा।।” जैसा उस समय अम्मोनियों के साथ हुआ था, वैसा ही आज भी अधार्मिकता की उन शक्तियों के साथ होता है, जो दाऊद के पुत्र के विरुद्ध लड़ने के लिए इकट्ठा होती हैं। भजन संहिता 7:12 कहता है, “यदि मनुष्य (परमेश्‍वर का शत्रु, जो सोचता है कि वह परमेश्‍वर की सन्तान पर आक्रमण कर सकता है) न फिरे (या पश्‍चाताप न करे) तो वह (परमेश्‍वर) अपनी तलवार पर सान चढ़ाएगा; वह अपना धनुष चढ़ाकर तीर सन्धान चुका है।”


परमेश्‍वर के पास ऐसी सेनाएँ हैं, जिन्हें वह किसी भी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध भेज सकता है, जो उसकी अवज्ञा करता है। वह किसी भी शत्रु से भयभीत नहीं होता। यशायाह 5:19 कहता है, “...जो कहते हैं, “वह फुर्ती करे और अपने काम को शीघ्र करे कि हम उसको देखें; और इस्राएल के पवित्र की युक्‍ति प्रगट हो, वह निकट आए कि हम उसको समझें!”” यदि हम परमेश्‍वर के ज्ञान और सामर्थ्य को समझ पाते, तो हम उसके आत्म-विश्‍वास को भी समझ पाते। वह अपने शत्रुओं पर हँसता है—उन पर, जो उसका विरोध करने का दुस्साहस करते हैं। उनके प्रयास कितने व्यर्थ हैं! भजन संहिता 2:1-4 कहता है, “जाति जाति के लोग क्यों हुल्‍लड़ मचाते हैं, और देश देश के लोग व्यर्थ बातें क्यों सोच रहे हैं? यहोवा और उसके अभिषिक्‍त के विरुद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं, “आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें, और उनकी रस्सियों को अपने ऊपर से उतार फेकें।” वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हँसेगा; प्रभु उनको ठट्ठों में उड़ाएगा।””


युद्ध की तैयारी के लिए, दो समूह बनाए गए; अम्मोनियों—उनकी अपनी सेना—नगर के फाटक के पास इकट्ठा हुई, और अरामी—किराए की सेना—खुले मैदान में इकट्ठी हुई। अरामी सैनिकों को इस्राएल की सेना पर दूसरी ओर या पिछले भाग से आक्रमण करना था, जबकि अम्मोनियों को उन पर सामने से आक्रमण करना था। वचन 8 कहता है, “तब अम्मोनी निकले और फाटक ही के पास पाँती बाँधी; और सोबा और रहोब के अरामी और तोब और माका के पुरुष उनसे अलग मैदान में थे।”


3. जब हम एक ही समय में दो मोर्चों पर लड़ते हैं।

दाऊद की सेना को दो तरफ से आने वाली सेनाओं का सामना करना पड़ा। यह कहानी हमें स्मरण दिला सकती है कि हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। प्रभु परमेश्‍वर के कार्य में मैंने देखा है कि शैतान अक्सर एक ही समय में दो या अधिक दिशाओं से हम पर आक्रमण करता है। हमें लोगों से जुड़ी और सेवकाई से संबंधित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और साथ ही हम अपने व्यक्तिगत् संघर्षों से भी गुजरते हैं। प्रेरित पौलुस ने भी ठीक यही अनुभव किया था। 2 कुरिन्थियों 6:3-10 में वह अपने उन व्यक्तिगत् संघर्षों के बारे में लिखते हैं, जो सदैव उनके मन में रहते थे। “3हम किसी बात में ठोकर खाने का कोई भी अवसर नहीं देते ताकि हमारी सेवा पर कोई दोष न आए। 4परन्तु हर बात से परमेश्‍वर के सेवकों के समान अपने सद्गुणों को प्रगट करते हैं, बड़े धैर्य से, क्लेशों से, दरिद्रता से, संकटों से, 5कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्‍लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से, 6पवित्रता से, ज्ञान से, धीरज से, कृपालुता से, पवित्र आत्मा से, 7सच्‍चे प्रेम से, सत्य के वचन से, परमेश्‍वर की सामर्थ्य से, धार्मिकता के हथियारों से जो दाहिने–बाएँ हाथों में हैं, 8आदर और निरादर से, दुर्नाम और सुनाम से। यद्यपि भरमानेवालों जैसे मालूम होते हैं तौभी सच्‍चे हैं; 9अनजानों के सदृश हैं, तौभी प्रसिद्ध हैं; मरते हुओं के समान हैं और देखो जीवित हैं; मारखानेवालों के सदृश हैं परन्तु प्राण से मारे नहीं जाते; 10शोक करनेवालों के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं; कंगालों के समान हैं, परन्तु बहुतों को धनवान बना देते हैं; ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं तौभी सब कुछ रखते हैं।” और क्या पौलुस इन व्यक्तिगत् चिंताओं को अपनी शिक्षा या प्रचार के अवसरों में दिखाई देने देता था? नहीं। वह अपने संदेश पर ही टिके रहता था। 1 कुरिन्थियों 2:2 में यह वर्णित है कि पौलुस ने किस बात पर ध्यान केंद्रित करने का निश्‍चय किया था—अपने संदेश पर: “क्योंकि मैं ने यह ठान लिया था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूँ।”

आपके जीवन में भी ऐसे समय आएँगे, जब आपसे किसी विशेष समस्या पर चर्चा करने के लिए किसी सभा में शामिल होने की आशा की जाएगी, और उस समय आप अपनी व्यक्तिगत् समस्याओं के बारे में शिकायत करने की हियाव भी नहीं कर पाएँगे। आपसे किसी समूह को उपदेश देने या सिखाने की आशा की जाएगी, और उस समूह की अपनी आवश्यकताएँ होंगी; उन्हें इस बात की आवश्यकता नहीं होगी कि आप अपनी व्यक्तिगत् समस्याओं का बोझ उन पर डाल दें। दूसरे शब्दों में, आपको परमेश्‍वर की सलाह या परमेश्‍वर के वचन को लोगों तक पहुँचाने के लिए बाहरी और सार्वजनिक संघर्ष करना पड़ेगा, और ठीक उसी समय आपको अपने अंदर चल रहे हर तरह के व्यक्तिगत् संघर्षों, प्रश्नों, चुनौतियों, निराशाओं और दु:खों का भी सामना करना पड़ेगा। ऐसे में आप क्या करेंगे? परमेश्‍वर आपको एक ही समय में इन दोनों शत्रुओं का सामना करने की सामर्थ्य प्रदान करेगा। वह आपको परमेश्‍वर के वचन को अच्छी तरह से लोगों तक पहुँचाने में सहायता करेगा, और साथ ही आपको अपनी व्यक्तिगत् समस्याओं का सामना करने के लिए विश्‍वास और साहस भी देगा। नहेम्याह के समय में यरूशलेम की दीवारों को दोबारा बनाने वाले लोगों के एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में चिनाई के लिए करनी रखनी होती थी। उन्होंने अपना काम पूरा किया, और परमेश्‍वर आपको भी ऐसा करने की सामर्थ्य देगा। हम देखेंगे कि इस्राएली सेना उन चारों सेनाओं को हराने में सफल रही—अम्मोनी, अरामी, और माका तथा तोब के सैनिक—जो दो अलग-अलग दिशाओं से उनके विरुद्ध लड़ने आए थे।