सब एक ही सेना में

अध्याय चौरासी


2 शमूएल 10:9-19

Ron Meyers

9यह देखकर कि आगे पीछे दोनों ओर हमारे विरुद्ध पाँति बन्धी है, योआब ने सब बड़े बड़े इस्राएली वीरों में से बहुतों को छाँटकर अरामियों के सामने उनकी पाँति बन्धाई, 10और अन्य लोगों को अपने भाई अबीशै के हाथ सौंप दिया, और उसने अम्मोनियों के सामने उनकी पाँति बंधाई। 11फिर उसने कहा, “यदि अरामी मुझ पर प्रबल होने लगें, तो तू मेरी सहायता करना; और यदि अम्मोनी तुझ पर प्रबल होने लगेंगे, तो मैं आकर तेरी सहायता करूँगा। 12तू हियाव बाँध, और हम अपने लोगों और अपने परमेश्‍वर के नगरों के निमित्त पुरुषार्थ करें; और यहोवा जैसा उसको अच्छा लगे वैसा करे।” 13तब योआब और जो लोग उसके साथ थे अरामियों से युद्ध करने को निकट गए; और वे उसके सामने से भागे। 14यह देखकर कि अरामी भाग गए हैं अम्मोनी भी अबीशै के सामने से भागकर नगर के भीतर घुसे। तब योआब अम्मोनियों के पास से लौटकर यरूशलेम को आया। 15फिर यह देखकर कि हम इस्राएलियों से हार गए अरामी इकट्ठे हुए। 16और हददेजेर ने दूत भेजकर महानद के पार के अरामियों को बुलवाया; और वे हददेजेर के सेनापति शोबक को अपना प्रधान बनाकर हेलाम को आए। 17इसका समाचार पाकर दाऊद ने समस्त इस्राएलियों को इकट्ठा किया, और यरदन के पार होकर हेलाम में पहुँचा। तब अराम दाऊद के विरुद्ध पाँति बाँधकर उससे लड़ा। 18परन्तु अरामी इस्राएलियों के सामने से भागे, और दाऊद ने अरामियों में से सात सौ रथियों और चालीस हज़ार सवारों को मार डाला, और उनके सेनापति शोबक को ऐसा घायल किया कि वह वहीं मर गया। 19यह देखकर कि हम इस्राएल से हार गए हैं, जितने राजा हददेजेर के अधीन थे उन सभों ने इस्राएल के साथ संधि की, और उसके अधीन हो गए। इसलिये अरामी अम्मोनियों की और सहायता करने से डर गए।


अम्मोनी लोगों के नए राजा हानून और हानून के पिता के मित्र दाऊद के बीच हुई एक गलतफहमी के कारण यह युद्ध छिड़ गया; परन्तु परमेश्‍वर ने इसका उपयोग इस्राएल को उसके मूर्तिपूजक पड़ोसियों से और अधिक अलग करने और इस्राएल को ऐसे दौर में ले जाने के लिए किया, जो वैभव के कई वर्षों से भरा हो सकता था।


1. अम्मोनी और अरामी लोग परमेश्‍वर और इस्राएल के विरुद्ध। वचन 9-14

शत्रुओं की तैयारियों को देखकर, योआब—जो एक बुद्धिमान सेनापति था—ने उसी के अनुसार अपनी सेना को विभाजित कर दिया। अम्मोनी लोगों ने अपनी तैयारियाँ कर ली थीं, और अब योआब ने अपनी तैयारियाँ कीं। उसने हाल ही में (1 शमूएल 8) अरामी लोगों के साथ युद्ध किया था, इसलिए वह स्थिति से भली-भांति परिचित था। "यह देखकर कि आगे पीछे दोनों ओर हमारे विरुद्ध पाँति बन्धी है, योआब ने सब बड़े बड़े इस्राएली वीरों में से बहुतों को छाँटकर अरामियों के सामने उनकी पाँति बन्धाई, और अन्य लोगों को अपने भाई अबीशै के हाथ सौंप दिया, और उसने अम्मोनियों के सामने उनकी पाँति बंधाई" (वचन 9, 10)। उसने सबसे चुनिंदा सैनिकों को अपनी सीधी कमान में रखा, ताकि वह अरामी लोगों से युद्ध कर सके—जिन्हें वह संभवतः सर्वोत्तम सैनिक मानता था, और जो किराए के पेशेवर सैनिक होने के कारण, युद्ध-कला में अधिक निपुण थे। शेष सेना को उसने अपने भाई अबीशै की कमान में रखा, ताकि वे अम्मोनी लोगों से टकरा सके अर्थात् लोहा ले सकें।


युद्ध से पहले योआब का साहसी और रणनीतिक भाषण उसकी योजना को स्पष्ट करता है; इस योजना का उद्देश्य यह सुनिश्‍चित करना था कि शत्रु सेना के विभाजन का लाभ स्वयं उसे ही मिले, न कि यह विभाजन उसके लिए किसी प्रकार की हानि का कारण बन जाए। शत्रुओं में से जो भी पक्ष अधिक शक्तिशाली सिद्ध होता, इस्राएली सैनिक युद्ध के उस मोर्चे पर सहायता के लिए पहुँच जाते। वचन 11 कहता है, "फिर उसने कहा, “यदि अरामी मुझ पर प्रबल होने लगें, तो तू मेरी सहायता करना; और यदि अम्मोनी तुझ पर प्रबल होने लगेंगे, तो मैं आकर तेरी सहायता करूँगा।" यह एक सर्वोत्तम रणनीति थी, जो अंततः अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई।


आज मसीही अगुवों के रूप में, जब हम आत्मिक विषयों को समझने का प्रयास करते हैं—विशेषकर प्रभु परमेश्‍वर के कार्य में समूह-में मिलकर काम करने के महत्व को, और परमेश्‍वर की सेना के विभिन्न टुकड़ियों के बीच आपसी सहयोग की आवश्यकता को—तो क्या यह घटना हमारे लिए 'आपसी सहायता' को एक भाईचारे के कर्तव्य के रूप में निभाने का एक महत्वपूर्ण सबक नहीं हो सकती? क्या कलीसिया के काम, मिशन, मसीही शिक्षा, सुसमाचार प्रचार और कलीसियाई प्रशासन में ऐसे समय नहीं आते, जब मसीही सेना का एक हिस्सा जीत रहा होता है, और उसे सेना के उस हिस्से की सहायता के लिए आगे आना चाहिए, जो उस समय कमजोर या मुश्किल में फँसा हुआ लग सकता है? दृढ़ लोगों को कमजोरों को सहायता देनी चाहिए, उनकी मदद करनी चाहिए और उन्हें मजबूत करना चाहिए। जो लोग परमेश्‍वर की कृपा से किसी विशेष प्रलोभन पर जीत पा लेते हैं, उन्हें उन लोगों को सलाह देनी चाहिए, उन्हें सांत्वना देना चाहिए और उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए, जो उस प्रलोभन का सामना कर रहे हैं। यीशु ने पतरस से कहा, “उसने उससे कहा, “हे प्रभु, मैं तेरे साथ बन्दीगृह जाने, वरन् मरने को भी तैयार हूँ” (लूका 22:32) और 1 कुरिन्थियों 12:21 कहता है, “आँख हाथ से नहीं कह सकती, “मुझे तेरी आवश्यकता नहीं,” और न सिर पाँवों से कह सकता है, “मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं!”” हमारे वरदान, हमारी बुलाहट, हमारे वचन और हमारी पद-स्थिति अलग-अलग हो सकती हैं, परन्तु हम फिर भी एक ही सेना हैं।


योआब ने अपनी सेना को जो आदेश दिया, उस में साहस और समझदारी झलकती थी, “तू हियाव बाँध, और हम अपने लोगों और अपने परमेश्‍वर के नगरों के निमित्त पुरुषार्थ करें; और यहोवा जैसा उसको अच्छा लगे वैसा करे” (वचन 12)। यह चुनौती किसी वेतन, पदोन्नति, सम्मान या प्रसिद्धी पाने के लिए नहीं थी, बल्कि “अपने लोगों” और “अपने परमेश्‍वर के नगरों” के लिए—अर्थात् लोगों की सुरक्षा और भलाई के लिए थी। हमारे विषय में, हम प्रार्थना में संघर्ष करते हैं, विश्‍वास की अच्छी लड़ाई लड़ते हैं, और संसार भर में मसीह की पूरी देह की भलाई के लिए परमेश्‍वर के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं। हम सामान्य भलाई के लिए अच्छा काम करना चाहते हैं, न कि केवल अपने व्यक्तिगत् या स्वार्थी लाभ के लिए।


अंत में, लड़ाई आरम्भ होने से पहले, योआब ने परिणाम परमेश्‍वर पर छोड़ दिया। हम पूरी शक्ति से लड़ेंगे और परिणाम परमेश्‍वर पर छोड़ देंगे। हमारी ओर से कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। हमें जो भी सफलता मिले, वह परमेश्‍वर के काम के लिए हो; और तब हमारे विषय में परमेश्‍वर की इच्छा पूरी होगी। जब हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर चुके होंगे, तब हम पूरे संतोष के साथ, उस घटना के परिणाम परमेश्‍वर पर छोड़ सकते हैं। भले ही वह कभी-कभी दुष्ट, नैतिक रूप से एक दुष्ट और एक क्रूरता भरा हत्यारा था, फिर भी योआब के जीवन में कई ऐसे अवसर आए, जब उसने अपने चरित्र का एक दूसरा पहलू दिखाया—जैसे कि इस लड़ाई में, जब उसने अपने सैनिकों का ढाँढ़स बढ़ाया और परिणाम परमेश्‍वर के हाथों में सौंप दिए। "और यहोवा जैसा उसको अच्छा लगे वैसा करे" (वचन 12)।


दोनों ओर की तैयारियों का परिणाम यह हुआ कि परमेश्‍वर ने योआब और इस्राएली सेना को अराम और अम्मोन पर एक बड़ी जीत दिलाई। उन्होंने अराम और अम्मोन की मिली-जुली सेनाओं को हरा दिया। वचन 13-14 कहते हैं, “तब योआब और जो लोग उसके साथ थे अरामियों से युद्ध करने को निकट गए; और वे उसके सामने से भागे। यह देखकर कि अरामी भाग गए हैं अम्मोनी भी अबीशै के सामने से भागकर नगर के भीतर घुसे। तब योआब अम्मोनियों के पास से लौटकर यरूशलेम को आया।”


योआब ने सबसे बुरे हालात के लिए तैयारी की थी, यह सोचकर कि शायद अरामी और अम्मोनियों का सामना करना उसके लिए बहुत मुश्किल हो सकता है, परन्तु जब परमेश्‍वर इस्राएल के पक्ष में था, तो इस्राएल ही उन दोनों पर भारी पड़ गया। जीवन की लड़ाइयों में आने वाली मुश्किलों के लिए तैयार रहना हमारे लिए ठीक है। यह विश्‍वास की कमी के कारण नहीं, बल्कि हमारी मानवीय कमजोरियों पर बुद्धिमानी से विचार करने के कारण होता है। पहले अरामी लोगों को योआब ने पीछे धकेला, और फिर अम्मोनियों को अबीशै ने। नगर का उनके पीछे होने के कारण, अम्मोनियों के लिए पीछे हटना आसान था। जब हमारे पीछे कोई ऐसा नगर हो जहाँ हम शरण ले सकें, तो पीछे हटना आसान होता है। इससे क्या सीखा जा सकता है? एक बात तो यह है कि जब सैनिक लड़ सकते हैं या भाग सकते हैं, और दूसरी बात यह है कि जब उन्हें या तो लड़ना ही होता है या फिर मरना। मसीही सैनिक ढाल, तलवार, कवच, कमरबंद और जूते जैसे हथियारों से लैस होता है, परन्तु अपनी पीठ की रक्षा के लिए उसके पास कुछ नहीं होता। परमेश्‍वर की यह इच्छा नहीं है कि हम कभी पीछे हटें।

इस लड़ाई से एक और बात सीखने को मिलती है, जो मसीही अगुवा और उसके पीछे चलने वालों के लिए लाभदायी होगी। योआब ने लड़ाई का आसान हिस्सा अपने लिए नहीं चुना; बल्कि उसने स्वयं सबसे मजबूत शत्रु का सामना किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि अगुवा को किसी भी परियोजना या काम का सबसे मुश्किल हिस्सा सदैव स्वयं ही करना चाहिए, बल्कि इसका अर्थ यह है कि ऐसे अवसर अवश्य आएँगे, जब उसे ऐसा करना चाहिए। हम अगुवों को सदैव मुश्किल कामों से बचना नहीं चाहिए (हालाँकि हमें अपने समय का भी ध्यान रखना चाहिए, ताकि हम पूरी स्थिति को ठीक से समझ सकें और अच्छी रीति से अगुवाई कर सकें), बल्कि जब भी पूरे समूह की भलाई के लिए आवश्यक हो, तो हमें ऐसे काम करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।


2. दाँव और ऊँचे हो गए: और भी अरामी लोग और दाऊद युद्ध में शामिल हुए। वचन 15-19

अपना सम्मान गँवाने के बाद, और दाऊद को लगातार मिल रही जीतों को रोकने की कोशिश में, अरामी लोगों ने एक नई चाल चली। उनकी सेना फिर से इकट्ठा हो गई, जैसा कि 15वें वचन में कहा गया है, “फिर यह देखकर कि हम इस्राएलियों से हार गए अरामी इकट्ठे हुए।” नए आक्रमणों से हमें आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। जो सेनाएँ दाऊद के पुत्र के विरुद्ध लड़ती हैं, वे भी ऐसा ही करती हैं; मत्ती 22:34-36 में उन बार-बार होने वाले आक्रमणों का वर्णन है, जो यीशु को उनके कई और अलग-अलग शत्रुओं से झेलने पड़े। इसमें कहा गया है, “जब फरीसियों ने सुना कि यीशु ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया, तो वे इकट्ठा हुए। उनमें से एक व्यवस्थापक ने उसे परखने के लिये उससे पूछा, ”हे गुरु, व्यवस्था में कौन सी आज्ञा बड़ी है?”” और प्रकाशितवाक्य 19:19 में कहा गया है, “फिर मैं ने उस पशु, और पृथ्वी के राजाओं और उनकी सेनाओं को उस घोड़े के सवार और उसकी सेना से लड़ने के लिये इकट्ठे देखा।” बार-बार आक्रमण होने के बावजूद, यीशु जीतता रहा।


अरामी लोगों ने अपनी सेना में और उत्तर से भी सहायता जोड़ी, परन्तु फिर भी वे असफल रहे। मीका 4:11-13 में कहा गया है, “अब बहुत सी जातियाँ तेरे विरुद्ध इकट्ठी होकर तेरे विषय में कहेंगी, “सिय्योन अपवित्र की जाए, और हम अपनी आँखों से उसको निहारें।” परन्तु वे यहोवा की कल्पनाएँ नहीं जानते, न उसकी युक्‍ति समझते हैं, कि वह उन्हें ऐसा बटोर लेगा जैसे खलिहान में पूले बटोरे जाते हैं। हे सिय्योन, उठ और दाँवनी कर, मैं तेरे सींगों को लोहे के, और तेरे खुरों को पीतल के बना दूँगा; और तू बहुत सी जातियों को चूर-चूर करेगी, और उनकी कमाई यहोवा को और उनकी धन–सम्पत्ति पृथ्वी के प्रभु के लिये अर्पण करेगी।” मीका ने कविता लिखी और 2 शमूएल एक इतिहास की पुस्तक है, फिर भी कविता में व्यक्त आत्म-विश्‍वास को गद्य की उपलब्धियों से जोड़ना आसान है।


इसलिए दाऊद ने उनके आक्रमण करने का प्रतीक्षा न करने का निर्णय किया, बल्कि अपनी सेना के आगे स्वयं बढ़कर, यरदन नदी पार की, युद्ध आरम्भ किया और पूरी अरामी सेना को पीछे धकेल दिया, “इसका समाचार पाकर दाऊद ने समस्त इस्राएलियों को इकट्ठा किया, और यरदन के पार होकर हेलाम में पहुँचा। तब अराम दाऊद के विरुद्ध पाँति बाँधकर उससे लड़ा” (वचन 17)। दाऊद आत्म-विश्‍वास से भरा हुआ आक्रामक योद्धा था। तो, एक जोरदार लड़ाई में उसने अरामी लोगों को बुरी तरह हराया, जैसा कि 18वे वचन में बताया गया है: “परन्तु अरामी इस्राएलियों के सामने से भागे, और दाऊद ने अरामियों में से सात सौ रथियों और चालीस हज़ार सवारों को मार डाला, और उनके सेनापति शोबक को ऐसा घायल किया कि वह वहीं मर गया।” 2 शमूएल 8 में हमने पढ़ा था कि एक पिछली लड़ाई में दाऊद ने अरामी लोगों से 1,000 रथ, 7,000 रथ-सवार और 20,000 पैदल सैनिक छीन लिए थे। इस बार दाऊद ने या तो और ज्यादा सैनिक और रथ प्राप्त किए, या फिर यह भी संभव है कि यह उसी लड़ाई का कोई दूसरा विवरण हो।


संयोग से, 1967 में, जब पाँच शत्रु देशों ने इस्राएल को चारों ओर से घेर लिया था, तब इस्राएली रक्षा बलों ने दाऊद के उदाहरण का पालन किया; वे शत्रुओं से थोड़ा भी नहीं घबराए, और उस लड़ाई में कूद पड़े जिसे आज “छह-दिवसीय युद्ध” के नाम से जाना जाता है—और जिसे इस्राएल ने ही जीता था।


अरामी सेनापति युद्ध में मारा गया और दाऊद को और भी अधिक अधीन रहने वाले राजा मिल गए। छोटे राजाओं ने समझदारी दिखाते हुए दाऊद से संधि कर ली और दाऊद विजय के साथ घर लौटा। वचन 19 कहता है, “यह देखकर कि हम इस्राएल से हार गए हैं, जितने राजा हददेजेर के अधीन थे, उन सभों ने इस्राएल के साथ संधि की, और उसके अधीन हो गए। इसलिये अरामी अम्मोनियों की और सहायता करने से डर गए।” यह प्रतिज्ञा अब्राहम से उत्पत्ति 15:18 में किया गया था: “इसी दिन यहोवा ने अब्राम के साथ यह वाचा बाँधी, “मिस्र के महानद से लेकर परात नामक बड़े नद तक जितना देश है”—और यहोशू से भी इसे दोहराया गया, जैसा कि यहोशू 1:4 में वर्णित है: “जंगल और उस लबानोन से लेकर परात महानद तक, और सूर्यास्त की ओर महासमुद्र तक हित्तियों का सारा देश तुम्हारा भाग ठहरेगा।” वह प्रतिज्ञा पूरी हुई, जब दाऊद ने अपनी सेना का नेतृत्व और भी अधिक पूर्णता के साथ किया, जैसा कि अराम के साथ पिछले युद्ध में हुआ था, जिसका वर्णन 2 शमूएल 8 में मिलता है।

अम्मोनी अपने पुराने सहयोगियों को हाथ से खो बैठे, क्योंकि अरामी समझ गए थे कि यह एक असफल प्रयास है। उन लोगों की सहायता करना खतरनाक होता है, जिनके विरुद्ध स्वयं परमेश्‍वर खड़ा हो; जब वे गिरते हैं, तो उनके सहायक भी उनके साथ ही गिरते हैं। परमेश्‍वर के लोगों के विरुद्ध बनाया गया कोई भी हथियार सफल नहीं होगा। अरामी लोगों ने यह सबक सीखा कि यदि अम्मोनी इस्राएल को हानि पहुँचाने का मंशा रखते हैं, तो उनकी सहायता नहीं करनी चाहिए। क्या हम अपनी ही पीढ़ी में, इस्राएल के रक्षात्मक युद्धों के दौरान—विशेषकर इस्राएल एक 1948 के स्वतंत्रता संग्राम युद्ध और 1967 के ‘छह-दिवसीय युद्ध’ के बाद के दशकों में—वैसा ही घटनाक्रम को नहीं देखते हैं? इन दोनों ही अवसरों पर, जब उसके शत्रु उसकी सीमाओं पर उसके विरुद्ध एकत्रित हुए थे, तब युद्ध के अंत में इस्राएल के पास पहले की तुलना में अधिक भूभाग था। और उसके वर्षों बाद भी, परमेश्‍वर ने हमास और हिज्बुल्लाह के विरुद्ध युद्धों में इस्राएल की सहायता की।


अतः इस अध्याय में, दाऊद ने अपनी प्रतिष्ठा को और भी अधिक ऊँचा उठाया; उसने उन लोगों के प्रति कृतज्ञता दिखाई, जिन्होंने उसके साथ भलाई की थी—अर्थात् अम्मोनी, और विशेष रूप से नाहाश—और उसने उनके प्रति भी भलाई का व्यवहार किया। और फिर, जब उसकी उस सद्भावना को ठुकरा दिया गया, तो उसने न्याय का प्रदर्शन करते हुए अरामियों से इस्राएल के लिए वह भूमि जीत ली, जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्‍वर ने अब्राहम से की थी। अम्मोनी, जिन्होंने भाड़े पर सैनिक लिए थे, और अरामी, जो भाड़े पर आए थे—दोनों ही एक साथ पराजित हुए। सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर में हमारा विश्‍वास निराधार नहीं है। हमारे पास उस पर विश्‍वास करने और भरोसा रखने के ठोस कारण हैं। आगे बढ़ें, हे मसीही सैनिकों! यीशु अपनी कलीसिया का निर्माण कर रहा है! 


3. हमारी आत्मिक लड़ाई, जिसमें आज हम हर ओर से अपने शत्रुओं का सामना कर रहे हैं।

पवित्रशास्त्र का उपयोग करके हम इस तरह प्रार्थना कर सकते हैं और अपने वास्तव शत्रुओं से लड़ सकते हैं। “परमेश्‍वर उठे और उसके शत्रु तितर-बितर हो जाएँ; उसके विरोधी उसके सामने से भाग जाएँ।” वह बलवान पुरुष बाँध दिया जाए और उसकी लूटी हुई चीजें छीन ली जाएँ। शांति का परमेश्‍वर जल्द ही शैतान का सिर हमारे पैरों के नीचे कुचल दे। हर वह बुरी सोच जो परमेश्‍वर के विरुद्ध स्वयं को ऊँचा उठाती है, नीचे गिरा दी जाए। हमें परीक्षा में न डाल, बल्कि उस दुष्ट से बचा। स्वर्ग में और पृथ्वी पर प्रेम, आनन्द, शांति, प्रार्थना, स्तुति और आराधना का बहाव हो। स्वर्ग में और पृथ्वी पर झूठ बोलना, चोरी करना, धोखा देना, कामुक पाप, दुष्ट आत्माओं से मेलजोल और विकृतियाँ बाँध दी जाएँ। जब शत्रु बाढ़ की तरह आए, तो उसके विरुद्ध एक झंडा खड़ा कर दिया जाए। नरक के फाटक कलीसिया पर प्रबल न हों, बल्कि इसके विपरीत, कलीसिया नरक के फाटकों पर प्रबल हो। इस वर्तमान संसार के शासक, अधिकारी, ऊँचे स्थानों में रहने वाली दुष्ट आत्माएँ और अंधकार की शक्तियाँ जड़ से उखाड़ दी जाएँ, गिरा दी जाएँ, नष्ट कर दी जाएँ और तोड़ दी जाएँ।” यह आत्मिक युद्ध अदृश्य है, परन्तु यह किसी भी दिखाई देने वाले युद्ध से कहीं ज्यादा वास्तविक और महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे हम इस युद्ध को जीतते चले जाते हैं, आत्माएँ शैतान के झूठ और बंधन से मुक्त होती चली जाती हैं। वे स्वंतत्र हो जाती हैं और अनंत काल स्वर्ग में बिताएँगी, क्योंकि हमने उन्हें मुक्त कराने के लिए आवश्यक आत्मिक लड़ाई लड़ी। बाइबल में वर्णित युद्ध वास्तव युद्ध थे, जिन्हें वास्तव लोगों ने वास्तव शत्रुओं के विरुद्ध लड़ा था। वे केवल रूपक नहीं हैं। वे वास्तविक थे। परन्तु उनका एक प्रतीकात्मक अर्थ भी है और वे हमारे लिए सबक लेने के लिए लिखे गए हैं। हम पृथ्वी पर देशों के बीच होने वाले युद्धों में उपयोग होने वाली सुरक्षा, हथियारों और युद्ध की योजनाओं से अलग तरह की चीजों के साथ लड़ते हैं, परन्तु यह आत्मिक युद्ध वास्तविक है और इसके मुद्दे जीवन और मृत्यु के विषय हैं; अर्थात् अनंत जीवन और अनंत मृत्यु का। हम इस तरह की आत्मिक प्रार्थना और युद्ध का उपयोग करके दोनों मोर्चों पर लड़ाइयाँ जीतें; वे सार्वजनिक लड़ाइयाँ, जिनके बारे में हर कोई जानता है, और वे व्यक्तिगत्, निजी और आँतरिक संघर्ष जिनका अनुभव आप—हे परमेश्‍वर के पुरुष, हे परमेश्‍वर की स्त्री—और मैं करते हैं, जिनके बारे में परमेश्‍वर और हमारे अतिरिक्त कोई नहीं जानता; वह आँतरिक युद्ध जिसमें हम उस राजा की सेवा में लगे हैं, जिसके राज्य के लिए हम लड़ते हैं। यीशु के नाम में हम जीत प्राप्त करेंगे, ठीक वैसे ही जैसा कि बाइबल में कई बार वर्णित है।


योआब और अबीशै ने एक ही सेना के दो हिस्सों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया और आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करने की इच्छा रखते हुए उन्हें जीत दिलाई। आइए, हम इससे सीख लें।


बड़े दु:ख की बात है कि 2 शमूएल 10 के आखिर में दिया गया यह सबक, दाऊद के सबसे अच्छे वर्षों के वृत्तांत को समाप्त करता है। यह दौर दाऊद के जीवन का सबसे छोटा हिस्सा था—उसकी तैयारी के वर्षों से भी छोटा, और बतशेबा और ऊरिय्याह की घटनाओं के बाद उसके मुश्किल भरे वर्षों से भी छोटा। ग्यारहवें अध्याय से आगे, दाऊद कई बार मुसीबतों में फँसेगा।