पाप और उसे छिपाना
अध्याय पचासी
2 शमूएल 11:1-9

Ron Meyers
1 और 2 शमूएल तथा 1 राजाओं के इकतालीस और आधा अध्याय दाऊद के जीवन की कहानी को समर्पित हैं। यह दु:ख की बात है कि दाऊद के सफल राज्यकाल की कहानी बताने के लिए केवल आठ अध्यायों (2 शमूएल 3-10) की ही आवश्यकता पड़ती है। दाऊद के जीवन का यह सबसे छोटा हिस्सा अद्भुत विजयों में बीता और यह आगे भी चलता रह सकता था। 1 शमूएल 16 से आरम्भ होने वाले प्रशिक्षण और तैयारी की अवधि ने हमें बहुत कुछ सिखाया। अब इस पाठ के साथ, हम उसके जीवन के बाद के उन कठिन वर्षों में प्रवेश करते हैं, जब उसके अपने ही परिवार में तलवार चल पड़ी थी। हम दाऊद के पूरे जीवन से महत्वपूर्ण सबक सीखते हैं, परन्तु यह बात दु:ख से भरी बनी रहती है कि इस्राएल के सबसे प्रिय और सफल राजा ने केवल अपेक्षाकृत कम समय के लिए ही धार्मिकता और विजय के साथ शासन किया। उसके जीवन के बाद के वर्षों की विपत्तियाँ उस घटना के कारण उत्पन्न हुईं, जिस पर हम इस पाठ में विचार कर रहे हैं। यदि हम लंबे समय तक सफल रहना चाहते हैं, तो हमें कुछ कठिन सबक सीखने ही होंगे।
दाऊद ने अम्मोनियों और उनकी सहायता करने का प्रयास करने वाले अरामियों के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई जीती थी। अब ऐसा प्रतीत होता है कि वह विश्राम कर रहा है, जबकि उसे अपने अभियानों को चलाए रखना चाहिए था। इस बात का संकेत तब मिलता है, जब अध्याय के आरम्भ में यह बताया जाता है कि दाऊद स्वयं अपने महल में घर पर था, जबकि उसकी सेना बाहर युद्ध क्षेत्र में थी।
1फिर जिस समय राजा लोग युद्ध करने को निकला करते हैं, उस समय, अर्थात् वर्ष के आरम्भ में दाऊद ने योआब को, और उसके संग अपने सेवकों और समस्त इस्राएलियों को भेजा; और उन्होंने अम्मोनियों का नाश किया, और रब्बा नगर को घेर लिया। परन्तु दाऊद यरूशलेम में रह गया।
2साँझ के समय दाऊद पलंग पर से उठकर राजभवन की छत पर टहल रहा था, और छत पर से उसको एक स्त्री, जो अति सुन्दर थी, नहाती हुई देख पड़ी। 3जब दाऊद ने भेजकर उस स्त्री को पुछवाया, तब किसी ने कहा, “क्या यह एलीआम की बेटी, और हित्ती ऊरिय्याह की पत्नी बतशेबा नहीं है?” 4तब दाऊद ने दूत भेजकर उसे बुलवा लिया; और वह दाऊद के पास आई, और वह उसके साथ सोया। (वह तो ऋतु से शुद्ध हो गई थी)। तब वह अपने घर लौट गई। 5और वह स्त्री गर्भवती हुई, तब दाऊद के पास कहला भेजा कि मुझे गर्भ है। 6तब दाऊद ने योआब के पास कहला भेजा, “हित्ती ऊरिय्याह को मेरे पास भेज।” तब योआब ने ऊरिय्याह को दाऊद के पास भेज दिया। 7जब ऊरिय्याह उसके पास आया, तब दाऊद ने उससे योआब और सेना का कुशल क्षेम और युद्ध का हाल पूछा। 8तब दाऊद ने ऊरिय्याह से कहा, “अपने घर जाकर अपने पाँव धो।” और ऊरिय्याह राजभवन से निकला, और उसके पीछे राजा के पास से कुछ इनाम भेजा गया। 9परन्तु ऊरिय्याह अपने स्वामी के सबसेवकों के संग राजभवन के द्वार में लेट गया, और अपने घर न गया।
1. दाऊद और बतशेबा का प्रेम-प्रसंग। वचन 1-5
पहले वचन में एक वैभवशाली बात कही गई है, केवल एक—युद्ध के मैदान में योआब की सफलता; और एक बहुत ही अशोभनीय बात—दाऊद ने नेतृत्व के अपने कर्तव्य की उपेक्षा की। “फिर जिस समय राजा लोग युद्ध करने को निकला करते हैं, उस समय, अर्थात् वर्ष के आरम्भ में दाऊद ने योआब को, और उसके संग अपने सेवकों और समस्त इस्राएलियों को भेजा; और उन्होंने अम्मोनियों का नाश किया, और रब्बा नगर को घेर लिया। परन्तु दाऊद यरूशलेम में रह गया।” परमेश्वर की महिमा के लिए, योआब और सेना ने अम्मोनियों के विरुद्ध युद्ध चलाए रखा, जिसका वर्णन 2 शमूएल 10 में मिलता है, क्योंकि हम देखते हैं कि यह 2 शमूएल 11:1 में भी चलता रहा। दाऊद ने अम्मोनियों की सेना को हरा दिया था, और शीघ्र ही उसने अम्मोनियों को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए और अधिक सेना भेजी; ताकि अपने दूतों के साथ हुए अन्याय का और अधिक बदला ले सके। रब्बा एक बड़ा नगर था, और जब योआब और सेना उसे घेरे हुए थी, तब दाऊद यरूशलेम में ही रहा।
अम्मोनियों के विरुद्ध मिली विजय पर हमारा आनन्द और उत्सव अल्पकालिक सिद्ध होता है; यह इसलिए नष्ट हो जाता है, क्योंकि घर पर, यरूशलेम में, दाऊद एक दूसरे शत्रु से हार जाता है। युद्ध के मैदान में एक महान विजय प्राप्त करने के बाद—जिसने दाऊद के ज्ञान और वीरता को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया था—वापस यरूशलेम में, राजमहल के शयनकक्ष की एकान्त में, उसकी मूर्खता और कायरतापूर्ण व्यवहार उसके लिए और पूरे राज्य के लिए भारी लज्जा का कारण बन जाता है।
जब दाऊद ने गिलबो में शाऊल और योनातान की मृत्यु का समाचार सुना, तो वह शोक में डूब गया और कहा, “गत में यह न बताओ, और न अश्कलोन की सड़कों में प्रचार करना।” आज, जब हम दाऊद के व्यवहार के बारे में इस दु:खद वृत्तांत को पढ़ते हैं, तो हम भी शायद वही बात कह सकते हैं—और संभवतः दाऊद द्वारा अनुभव किए गए दु:ख और शोक से भी कहीं अधिक गहरे दु:ख और शोक के साथ। इस अध्याय में हम व्यभिचार और हत्या के बारे में पढ़ते हैं—दो ऐसे गुप्त पाप, जिन्हें अत्यंत लज्जाजनक ढंग से पूरा किया गया—और ये दोनों ही पाप उसी दाऊद द्वारा किए गए थे। हो सकता है कि हम चाहें तो इस कहानी को छिपा दें—कि इसे कभी न तो सुनाया जाए और न ही कोई इसके बारे में जाने। यह घटना उस भले और परमेश्वर-प्रेमी दाऊद के चरित्र से इतनी मेल नहीं खाती, जिसके बारे में हम अब तक पढ़ते आए हैं, जिस कारण हम यह सोचकर ही हम सिहर उठते हैं कि उसने सचमुच ऐसा किया होगा।
क्या हम इसे अनदेखा कर दें? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इसे छिपाया नहीं जाना चाहिए। हम बाइबल को इतना क्यों पसन्द करते हैं, इसका एक कारण यह है कि बाइबल सच है। यह चीजों को वैसे ही बताती है, जैसी वे थीं। पवित्रशास्त्र अपने बड़े नायकों की गलतियों को भी बताता है। बाइबल के लेखक सदैव हमें सच बताते हैं। रोमियों 15:4 कहता है, “जितनी बातें पहले से लिखी गईं, वे हमारी ही शिक्षा के लिये लिखी गईं हैं कि हम धीरज और पवित्रशास्त्र के प्रोत्साहन द्वारा आशा रखें।” और 1 कुरिन्थियों 10:11-12 कहता है, “परन्तु ये सब बातें, जो उन पर पड़ीं, दृष्टान्त की रीति पर थीं; और वे हमारी चेतावनी के लिये जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं। इसलिये जो समझता है, “मैं स्थिर हूँ,” वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े!”
2 तीमुथियुस 3:16 कहता है, “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है।” ये कहानियाँ हमारे लिए हैं। दूसरों के पापों के अनुभव हमारे लिए चेतावनी हो सकते हैं। कुछ लोग अपनी गलतियों से कभी नहीं सीखते और बार-बार वही गलतियाँ दोहराते रहते हैं। दूसरे लोग ज्यादा समझदार होते हैं; वे अपनी गलतियों से सीखते हैं और उन्हें दोहराते नहीं हैं। परन्तु सबसे समझदार लोग वे होते हैं, जो दूसरों की गलतियों से सीख लेते हैं; उन्हें स्वयं गलतियाँ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि कोई ऐसा उदाहरण है, जिस पर हम इस सिद्धान्त को सबसे अच्छे तरीके से लागू कर सकते हैं, तो वह यही कहानी है। दाऊद का जीवन नाश नहीं हुआ, उसने कई और वर्षों तक अपने लोगों की सेवा की, परन्तु अपने शेष जीवन में उसे जिस मन की पीड़ा और मुश्किलों का सामना करना पड़ा—जो स्पष्ट तौर पर बहुत ज्यादा हद तक इस एक गलती या इन गलतियों (यदि आप ऊरिय्याह की हत्या को भी शामिल करें) के कारण से थी—उसने उसके इतिहास को बदल दिया। हम 2 शमूएल के आठ अध्यायों पर दृष्टि डाल रहे थे, जिनमें दाऊद के जीवन के सबसे अच्छे वर्षों का वर्णन है। वे उसके विजय के वर्ष थे। उनसे पहले, जैसा कि 1 शमूएल में लिखा है, वह शाऊल की अधीनता में कठोर अनुशासन में प्रशिक्षण ले रहा था, जो उसका एक कठोर स्वामी था। 2 शमूएल के अध्याय 11 से लेकर उसके जीवन के अंत तक, हम एक के बाद एक त्रासदियों के बारे में पढ़ते हैं। दाऊद के सबसे अच्छे वर्षों का अंत बतशेबा वाली घटना के साथ बहुत ही दु:खद तरीके से घटित हुई।
बहुत ज्यादा हद तक यह संभव है कि कुछ लोगों को ऐसा लगा हो कि दाऊद के अनुभव ने उन्हें भी वैसा ही करने की छूट दे दी है; इस कहानी को सुनकर कुछ लोग दाऊद के बुरे उदाहरण का ही अनुसरण करने लगते हैं। परन्तु, इस पर सर्वोत्तम प्रतिक्रिया और उत्तर यह है कि हम इसे अपने लिए एक गंभीर चेतावनी मानें, स्वयं पर कड़ा पहरा लगाएँ, और इस पाप से लगातार सावधान रहें। दाऊद ने उरिय्याह की पत्नी बतशेबा के साथ व्यभिचार किया, और फिर, क्योंकि वह जानता था कि यह पाप बहुत भयानक है, उसने इसे छिपाने की कोशिश की। उसने यह दिखाने की कोशिश की कि वह बच्चा उरिय्याह का ही है। जब उसकी यह योजना विफल हो गई, तो उसने अम्मोनियों की तलवार से उरिय्याह की हत्या की साजिश रची, उसने उस दुष्ट योजना पर कार्यवाही की, और फिर उरिय्याह की विधवा से विवाह कर लिया।
यह दाऊद के लिए शर्म की बात है कि वह अपनी ही वासना के हाथों पराजित और बंदी बन गया। अय्यूब 31:9-11 कहता है, "यदि मेरा हृदय किसी स्त्री पर मोहित हो गया हो, और मैं अपने पड़ोसी के द्वार पर घात में बैठा हूँ; तो मेरी स्त्री दूसरे के लिये पीसे, और पराए पुरुष उसको भ्रष्ट करें। क्योंकि वह तो महापाप होता; और न्यायियों से दण्ड पाने के योग्य अधर्म का काम होता।" इस घटना से कुछ ही समय पहले, दाऊद अपनी सेना के साथ अम्मोनियों और फिर अरामियों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए गया था। यदि वह अब भी अपनी सेना के साथ अम्मोनियों के विरुद्ध युद्ध जारी रखने गया होता, तो वह अपने महल की छत पर न घूम रहा होता। जब हम अपने कर्तव्य-कर्म में व्यस्त रहते हैं, तो हम उन प्रलोभनों से बच सकते हैं, जो अक्सर खाली बैठे लोगों को घेर लेते हैं। दाऊद की दृष्टि भटकने वाली थी। उसके अपने महल में ही पर्याप्त पत्नियाँ थीं, इसलिए उसे किसी पड़ोसी की पत्नी को नहाते हुए देखने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। यदि हम अय्यूब के साथ उसकी तुलना करें—या बल्कि, दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट करें—तो हम पाएँगे कि अय्यूब ने अपनी आँखों के साथ एक वाचा अर्थात् प्रतिज्ञा बाँधी थी। अय्यूब 31:1 कहता है, "मैं ने अपनी आँखों के साथ वाचा बाँधी है, फिर मैं किसी कुँवारी पर कैसे आँखें लगाऊँ?" दाऊद ने या तो अपनी आँखों के साथ ऐसी कोई वाचा नहीं बाँधी थी, या यदि बाँधी भी थी, तो अब वह उसे पूरी तरह भूल चुका था।
स्पष्ट है, दाऊद को उसे देखते ही तत्काल उसके प्रति वासना जाग उठी, और उसने उसके बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए किसी को भेजा। वचन 3 कहता है, "जब दाऊद ने भेजकर उस स्त्री को पुछवाया।" हो सकता है कि उसे यह न पता हो कि वह विवाहित है या नहीं। शायद उसे लगा हो कि वह उसे अपनी एक और वैध पत्नी के रूप में अपना सकता है। फिर, जब उसे यह पता चल गया कि वह कौन है और किसकी पत्नी है, तब भी उसने अगला कदम उठाया: "तब दाऊद ने दूत भेजकर उसे बुलवा लिया; और वह दाऊद के पास आई, और वह उसके साथ सोया" (वचन 4)। हो सकता है कि उसका मंशा उसे अपने बिछौने पर ले जाने का न रही हो; शायद वह बस कुछ देर के लिए उसकी संगति का आनन्द लेना चाहता था। पाप आरम्भ में सदैव पाप जैसा नहीं लगता, परन्तु जब हम ऐसे कदम उठाते हैं, जो हमें प्रलोभन की ओर ले जाते हैं, तो हम वास्तव में एक फिसलन भरे मार्ग पर चलना आरम्भ कर चुके होते हैं।
हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि उसने राजा के महल की दृष्टि के सामने स्नान क्यों किया, या उसने राजा से मिलने का निमंत्रण क्यों स्वीकार किया, या फिर उसने उसके साथ बिछौने साझा करने का दूसरा निमंत्रण क्यों मान लिया। ऐसा लगता है कि उसने बहुत आसानी से सहमति दे दी—शायद इसलिए, क्योंकि दाऊद एक बड़ा व्यक्ति था और अपनी भलाई के लिए प्रसिद्ध था। पाप का मार्ग ढलान वाला होता है, और एक बार इस पर चलना आरम्भ करने के बाद पीछे लौटना आसान नहीं होता। ऐसे किसी भी प्रलोभन की संभावना से भी बचकर रहना ही बुद्धिमानी है।
इस समय दाऊद की आयु लगभग पचास वर्ष रही होगी और वह अब कोई जवान व्यक्ति तो नहीं था। उसकी अपनी कई पत्नियाँ और रखैलें थीं। ऊरिय्याह, जिसने अम्मोनी लोगों के साथ युद्ध में पूरी विश्वासयोग्यता से सेवा की, अपने देश और अपने राजा के लिए अपने प्राण जोखिम में डाले थे—जिसके साथ दाऊद ने घोर अन्याय किया—वह उसके अपने तीस शूरवीरों में से एक था। बतशेबा, जिसके साथ उसने जबरदस्ती की, हम मान सकते हैं कि वह एक अच्छी सम्मानयोग्य स्त्री थी। फिर भी ये प्रश्न बने रहते हैं: उसने महल को दिखाते हुए उसके सामने क्यों नहाया? वह महल क्यों गई? और वह राजा के साथ बिछौने पर क्यों गई? बाद में जब उसे अपने पति की मृत्यु की समाचार मिला, तो वह दाऊद से क्रोधित क्यों नहीं हुई? वह कितनी निर्दोष थी? हम नहीं जानते, परन्तु हम यह अवश्य जानते हैं कि उसने स्पष्ट तौर पर सहमति दी थी और बाद में तब तक यह राज अपने पास रखा, जब तक कि नबी नातान ने पूरी बात सबके सामने ना ला दी। कुछ भी हो, दाऊद या तो उसके विरुद्ध या उसके साथ मिलकर सफल रहा।
व्यभिचारी अपनी ही आत्मा को नुकसान पहुँचाता है और उसे नाश कर देता है, और दूसरे की आत्मा को भी। दाऊद एक राजा था, जिस पर न्याय करने की जिम्मेदारी थी; उसे न्याय की तलवार सौंपी गई थी और अपराधियों—विशेषकर व्यभिचारियों—के विरुद्ध व्यवस्था लागू करने का अधिकार दिया गया था, जिन्हें मृत्यु की दण्ड दिया जाना था। यदि वह स्वयं ही दोषी है, तो वह दूसरों के विरुद्ध व्यवस्था कैसे लागू कर सकता है? वह एक न्यायी बनने के बजाय बुराई करने वालों के लिए एक दोषी घटना बन गया। यिर्मयाह 5:8 कहता है, “वे खिलाए–पिलाए बे–लगाम घोड़ों के समान हो गए, वे अपने अपने पड़ोसी की स्त्री पर हिनहिनाने लगे।” दाऊद शायद उतना बुरा न रहा हो, परन्तु जब एक बार उसे अपने हाल पर छोड़ दिया गया, तो उसने दिखा दिया कि वह अपनी ख्याति अर्थात् साख जितना अच्छा नहीं था। परमेश्वर ने हिजकिय्याह की भी परीक्षा ली और वह भी उस में असफल रहा। 2 इतिहास 32:31 कहता है, “तौभी जब बेबीलोन के हाकिमों ने उसके पास उसके देश में किए हुए अद्भुत कामों के विषय पूछने को दूत भेजे, तब परमेश्वर ने उसको इसलिये छोड़ दिया, कि उसको परखकर उसके मन का सारा भेद जान ले।” हिजकिय्याह घमण्डी हो गया और उसने यह प्रमाणित कर दिया कि वह यरूशलेम की भलाई के बजाय अपनी स्वयं की शांति और सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिन्तित था। यीशु ने हमें जो प्रार्थना करना सिखाई है, वह सीधी सी और समझदारी से भरी है: “और हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा।” वह प्रार्थना करने के बाद हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि हम स्वयं उस परीक्षा में न पड़ें।
2. सच छिपाने का आरम्भ करना। वचन 6-9
ऊरिय्याह कुछ सप्ताहों से घर से दूर था, क्योंकि वह अम्मोनियों के विरुद्ध युद्ध-अभियान में व्यस्त था। जब वह घर लौटा, यदि उसे सच पता होता कि क्या हुआ है, तो वह अपनी पत्नी का उजागर कर सकता था और माँग कर सकता था कि व्यभिचार के लिए उसे पत्थर मारकर मार डाला जाए। बतशेबा यह जानती थी और शायद उसे इस बात की कुछ चिंता भी थी, परन्तु फिर भी वह घर पर अपने पति का प्रतीक्षा करती रही कि वह उसके पास आए और उससे प्रेम करे, ताकि जो बच्चा पैदा हो, वह उसी का लगे। वह शायद उस सार्वभौमिक सच को भी जानती थी, जो अलग-अलग संस्कृतियों में मिलता है—एक ठगे हुए पति की सामान्य ईर्ष्या—जैसा कि नीतिवचन 6:34 में लिखा है: “क्योंकि जलन से पुरुष बहुत ही
क्रोधित हो जाता है, और पलटा लेने के दिन वह कुछ कोमलता नहीं दिखाता।”
हमें नहीं पता कि दाऊद और बतशेबा के बीच किस तरह का समझौता हुआ था। हो सकता है कि उसने यह प्रतिज्ञा की हो कि वह चीजों को इस तरह संभालेगा कि ऊरिय्याह कोई बदले की कार्यवाही न करे। परन्तु, उनकी आपसी सहमति और फिर बतशेबा द्वारा दाऊद को यह बताने के तरीके को देखते हुए कि वह गर्भवती है, हम यह मान सकते हैं कि कोई योजना तो अवश्य वहाँ कार्य कर रही थी। तो, अब जो योजना बन चुकी थी, उसे लागू करने का समय आ गया था।
ऊरिय्याह सेना से घर लौटा, यह सोचकर कि वह युद्ध की प्रगति की रिपोर्ट ला रहा है; कि रब्बा की घेराबंदी कैसे चल रही है। “तब दाऊद ने योआब के पास कहला भेजा, “हित्ती ऊरिय्याह को मेरे पास भेज।” तब योआब ने ऊरिय्याह को दाऊद के पास भेज दिया”” (वचन 6) “जब ऊरिय्याह उसके पास आया, तब दाऊद ने उससे योआब और सेना का कुशल क्षेम और युद्ध का हाल पूछा” (7)। जब दाऊद की ऊरिय्याह के साथ बातचीत पूरी हो गई, तो उसने उसे घर भेज दिया और साथ में एक उपहार भी दिया—शायद कुछ खाना, जिसका आनन्द वह और बतशेबा साथ मिलकर ले सकें” और उसके पीछे राजा के पास से कुछ इनाम भेजा गया” (वचन 8)। परन्तु जैसा कि वचन 9 में स्पष्ट कहा गया है, ऊरिय्याह दाऊद की सोच से कहीं ज्यादा भला व्यक्ति था। वह अपने घर और अपनी पत्नी के पास नहीं गया। “परन्तु ऊरिय्याह अपने स्वामी के सब सेवकों के संग राजभवन के द्वार में लेट गया, और अपने घर न गया” (वचन 9)। जैसे-जैसे हम दाऊद की कहानी के इस दु:खद हिस्से में आगे बढ़ेंगे, हम भले ऊरिय्याह से बहुत कुछ सीखेंगे।
हम सुलैमान द्वारा विवाहेतर संबंधों से दूर रहने पर दिए गए जोर से भी सीख ले सकते हैं। उसे अपने पिता की समस्याओं और उनसे होने वाले दु:ख के बारे में पता रहा होगा। इसी बात ने शायद उसे नीतिवचन 7:6-27 में इस तरह लिखने के लिए प्रेरित किया होगा: “6मैं ने एक दिन अपने घर की खिड़की से, अर्थात् अपने झरोखे से झाँका, 7तब मैं ने भोले लोगों में से एक निर्बुद्धि जवान को देखा; 8वह उस स्त्री के घर के कोने के पास की सड़क पर चला जाता था, और उसने उसके घर का मार्ग लिया। 9उस समय दिन ढल गया, और संध्याकाल आ गया था, वरन् रात का घोर अन्धकार छा गया था। 10और देखो, उससे एक स्त्री मिली, जिस का भेष वेश्या का सा था, और वह बड़ी धूर्त थी। 11वह शान्ति रहित और चंचल थी, और अपने घर में न ठहरती थी; 12कभी वह सड़क में, कभी चौक में पाई जाती थी, और एक एक कोने पर वह बाट जोहती थी। 13तब उसने उस जवान को पकड़कर चूमा, और निर्लज्जता की चेष्टा करके उससे कहा, 14”मुझे मेलबलि चढ़ाने थे, और मैं ने अपनी मन्नतें आज ही पूरी की हैं। 15इसी कारण मैं तुझ से भेंट करने को निकली, मैं तेरे दर्शन की खोजी थी, और अभी पाया है। 16मैं ने अपने पलंग के बिछौने पर मिस्र के बेलबूटेवाले कपड़े बिछाए हैं; 17मैं ने अपने बिछौने पर गन्धरस, अगर और दालचीनी छिड़की है। 18इसलिये अब चल हम प्रेम से भोर तक जी बहलाते रहें; हम परस्पर की प्रीति से आनन्दित रहें। 19क्योंकि मेरा पति घर में नहीं है; वह दूर देश को चला गया है; 20वह चाँदी की थैली ले गया है; और पूर्णमासी को लौट आएगा।” 21ऐसी बातें कह कहकर, उसने उसको अपनी प्रबल माया में फँसा लिया; और अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से उसको अपने वश में कर लिया। 22वह तुरन्त उसके पीछे हो लिया, जैसे बैल कसाई–खाने को, या जैसे बेड़ी पहिने हुए कोई मूढ़ ताड़ना पाने को जाता है। 23अन्त में उस जवान का कलेजा तीर से बेधा जाएगा; वह उस चिड़िया के समान है, जो फन्दे की ओर वेग से उड़े और न जानती हो कि उसमें मेरे प्राण जाएँगे। 24अब हे मेरे पुत्रो, मेरी सुनो, और मेरी बातों पर मन लगाओ। 25तेरा मन ऐसी स्त्री के मार्ग की ओर न फिरे, और उसकी डगरों में भूल कर न जाना; 26क्योंकि बहुत से लोग उस के द्वारा मारे पड़े हैं; उसके घात किए हुओं की एक बड़ी संख्या होगी। 27उसका घर अधोलोक का मार्ग है, वह मृत्यु के घर में पहुँचाता है।” हो सकता है कि दाऊद और बतशेबा की घटना ने सुलैमान को यह चेतावनी लिखने के लिए प्रेरित किया हो। और नीतिवचन 5:15-23: “15तू अपने ही कुण्ड से पानी, और अपने ही कूएँ के सोते का जल पिया करना। 16क्या तेरे सोतों का पानी सड़क में,
और तेरे जल की धारा चौकों में बह जाने पाए? 17यह केवल तेरे ही लिये रहे, और तेरे संग औरों के लिये न हो। 18तेरा सोता धन्य रहे; और अपनी जवानी की पत्नी के साथ आनन्दित रह, 19प्रिय हरिणी या सुन्दर सांभरनी के समान उसके स्तन सर्वदा तुझे सन्तुष्ट रखें, और उसी का प्रेम नित्य तुझे
आकर्षित करता रहे। 20हे मेरे पुत्र, तू अपरिचित स्त्री पर क्यों मोहित हो, और पराई को क्यों छाती से लगाए? 21क्योंकि मनुष्य के मार्ग यहोवा की दृष्टि से छिपे नहीं हैं, और वह उसके सब मार्गों पर ध्यान करता है। 22दुष्ट अपने ही अधर्म के कर्मों से फँसेगा, और अपने ही पाप के बन्धनों में
बँधा रहेगा। 23वह शिक्षा प्राप्त किए बिना मर जाएगा, और अपनी ही मूर्खता के कारण भटकता रहेगा।” यह भी शायद इसलिए लिखा गया होगा, ताकि दूसरों को उस पाप से बचने में सहायता मिल सके, जो सुलैमान के माता-पिता ने किया था। सुलैमान ने दूसरों को चेतावनी देकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या होगी?
हे प्रभु यहोवा, कृपया हमें स्वयं से और इस पाप से बचा। हमारे मन को पवित्र रखने में हमारी सहायता कर। और दूसरों की सहायता करने में भी हमारी सहायता कर! हम ऐसा भला अगुवा बनना चाहते हैं, जो दूसरों को धार्मिकता और फलदायी जीवन की ओर ले जाए।