अपराध का उजागर होना

अध्याय नवासी


2 शमूएल 12:1-9

Ron Meyers

1तब यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा, और वह उसके पास जाकर कहने लगा, “एक नगर में दो मनुष्य रहते थे, जिनमें से एक धनी और एक निर्धन था। 2धनी के पास तो बहुत सी भेड़–बकरियाँ और गाय बैल थे; 3परन्तु निर्धन के पास भेड़ की एक छोटी बच्‍ची को छोड़ और कुछ भी न था, और उसको उसने मोल लेकर जिलाया था। वह उसके यहाँ उसके बाल–बच्‍चों के साथ ही बढ़ी थी; वह उसके टुकड़े में से खाती, और उसके कटोरे में से पीती, और उसकी गोद में सोती थी, और वह उसकी बेटी के समान थी। 4फिर धनी के पास एक यात्री आया, और उसने उस यात्री के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाने को अपनी भेड़–बकरियों या गाय बैलों में से कुछ न लिया, परन्तु उस निर्धन मनुष्य की भेड़ की बच्‍ची लेकर उस जन के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाया।” 5तब दाऊद का कोप उस मनुष्य पर बहुत भड़का; और उसने नातान से कहा, “यहोवा के जीवन की शपथ, जिस मनुष्य ने ऐसा काम किया वह प्राण दण्ड के योग्य है; 6और उसको उस भेड़ की बच्‍ची का चौगुना भर देना होगा, क्योंकि उसने ऐसा काम किया, और कुछ दया नहीं की।” 7तब नातान ने दाऊद से कहा, “तू ही वह मनुष्य है। इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा यों कहता है, ‘मैं ने तेरा अभिषेक कर के तुझे इस्राएल का राजा ठहराया, और मैं ने तुझे शाऊल के हाथ से बचाया; 8फिर मैं ने तेरे स्वामी का भवन तुझे दिया, और तेरे स्वामी की पत्नियाँ तेरे भोग के लिये दीं; और मैं ने इस्राएल और यहूदा का घराना तुझे दिया था; और यदि यह थोड़ा था, तो मैं तुझे और भी बहुत कुछ देनेवाला था। 9तू ने यहोवा की आज्ञा तुच्छ जानकर क्यों वह काम किया जो उसकी दृष्‍टि में बुरा है? हित्ती ऊरिय्याह को तू ने तलवार से घात किया, और उसकी पत्नी को अपनी कर लिया है, और ऊरिय्याह को अम्मोनियों की तलवार से मरवा डाला है।


1. निर्धन व्यक्ति की भेड़ का भेड़ की एक छोटी बच्‍ची। वचन 1-4 (परमेश्‍वर हमारे पीछे आता है, क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है)

बहुत ज्यादा समय बीत गया, कम से कम नौ महीने, जिस दौरान दाऊद पश्‍चाताप कर सकता था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया; इसके बाद नातान परमेश्‍वर की ओर से दाऊद के लिए एक संदेश लेकर आया। तब तक बच्चा पैदा हो चुका था। "तौभी तू ने जो इस काम के द्वारा यहोवा के शत्रुओं को तिरस्कार करने का बड़ा अवसर दिया है, इस कारण तेरा जो बेटा उत्पन्न हुआ है, वह अवश्य ही मरेगा" (वचन 14)। दाऊद व्यभिचार और हत्या का दोषी था, फिर भी नौ महीने तक उसने कोई पश्‍चाताप नहीं किया। क्या उस दौरान उसके विवेक ने उसे कभी नहीं कचोटा? क्या उसे कभी कोई पछतावा नहीं हुआ? हम शायद यह मान सकते हैं कि उस दौरान पवित्र आत्मा की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है कि परमेश्‍वर उसके साथ है; परमेश्‍वर के वचन से कोई सांत्वना नहीं मिलती; उसे उसके उद्धार से कोई आनन्द नहीं मिलता; और यदि मिला भी, तो बहुत कम—उसने अपना सारंगी नहीं बजाई, प्रभु यहोवा के लिए गीत नहीं गाए, और जहाँ तक हम जानते हैं, कोई भजन भी नहीं लिखा।


परमेश्‍वर ने नातान को इसलिए नहीं भेजा था कि वह इस घाव पर कोई राहत देने वाली पट्टी बाँध दे। इस स्थिति के लिए एक बड़ी शल्य-चिकित्सा अर्थात् सर्जरी की आवश्यकता थी, और नातान को ही यह काम करना था। परमेश्‍वर के भविष्यद्वक्ता अर्थात् नबी, पास्टर, प्रचारक या शिक्षक का यह काम नहीं है कि वह अपना संदेश स्वयं चुने। यदि हम परमेश्‍वर के जन अर्थात् परमेश्‍वर के पुरुष या स्त्री बनना चाहते हैं, तो हमें सचमुच परमेश्‍वर का जन बनना होगा और उसके संदेशों को लोगों तक पहुँचाना होगा। पिछली बार जब नातान परमेश्‍वर की ओर से दाऊद के लिए संदेश लाया था, तो वह एक अच्छा संदेश था—जिसे देना भी आसान था और स्वीकार करना भी: "प्रभु यहोवा तुम्हारा घराना बनाएगा, और वह नित्य तक बना रहेगा।" अब नातान को एक कठिन, परन्तु आवश्यक और सुधार लाने वाला संदेश देने के लिए बुलाया गया है। हम दाऊद की कहानी से सीख रहे हैं, परन्तु हम इस घटना में शामिल दूसरे किरदारों अर्थात् पात्रों से भी सीख सकते हैं। इस विषय में, हम नातान से यह सीखते हैं कि हम कठिन संदेशों को भी उतनी ही ईमानदारी और विश्‍वासयोग्यता के साथ लोगों तक पहुँचाएँ, जितनी ईमानदारी से हम सुखद संदेशों को पहुँचाते हैं। हालाँकि नातान ने जो जानकारी दी और दाऊद ने जो सुनी, वह बहुत ही ज्यादा गंभीर थी, परन्तु वही आवश्यक थी, और हम इसका अच्छा परिणाम भजन संहिता 51:12-15 में देख सकते हैं: “अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल। तब मैं अपराधियों को तेरा मार्ग सिखाऊँगा, और पापी तेरी ओर फिरेंगे। हे परमेश्‍वर, हे मेरे उद्धारकर्ता परमेश्‍वर, मुझे हत्या के अपराध से छुड़ा ले, तब मैं तेरे धर्म का जयजयकार करने पाऊँगा। हे प्रभु, मेरा मुँह खोल दे, तब मैं तेरा गुणानुवाद कर सकूँगा।” हम शायद यह चाहें कि नातान के आने से पहले ही दाऊद के मन ने उसे पश्‍चाताप करने को कहा होता, परन्तु चाहे यह सच हो या नहीं, हम जानते हैं कि उसने ऐसा नहीं किया। क्या बेटे के जन्म से यह स्पष्ट नहीं हो गया था कि दाऊद का ऊरिय्याह की पत्नी के साथ संबंध ऊरिय्याह की मृत्यु से बहुत पहले ही बन चुका था, और राजा ने अपने पड़ोसी की पत्नी से विवाह कर लिया था? फिर भी दाऊद ने पश्‍चाताप नहीं किया। दाऊद को ‘नींद-से-जगाने-वाली-एक बुलाहट’ अर्थात् जागने के लिए एक जोरदार झटका दिए जाने की आवश्यकता थी; परमेश्‍वर की ओर से छोड़े गए एक तोप के गोले जैसी चेतावनी, और नातान ने उसके साथ वही किया।


हमने 2 शमूएल अध्याय 11 में सीखा था कि दाऊद ने प्रभु यहोवा को क्रोधित कर दिया था। हम शायद सोचें कि यदि ऐसा हुआ था, तो शत्रु आक्रमण कर देंगे, और इस्राएल पर आतंक और महामारियाँ टूट पड़ेंगी। परन्तु नहीं, परमेश्‍वर ने नातान को भेजा—जो दाऊद का मित्र और भरोसे योग्य व्यक्ति था—ताकि वह उसे निर्देश दे और सलाह दे। एक सच्चा मित्र वही होता है, जो आपको वह सच बताता है, जिसे सुनने की आपको आवश्यकता है, न कि वह जो उसे लगता है कि आप सुनना चाहते हैं। हर मसीही अगुवे के पास ऐसे कुछ मित्र होने चाहिए—चाहे वे आपके जीवनसाथी हों, आपके कर्मचारियों के समूह के सदस्य हों, या आपके सेवा-कार्य में आपके साथी हों। दाऊद की तरह, आपको भी किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है, जो आपसे डरता न हो और आपको सच बता सके। और जब वे ऐसा करें, तो उन्हें डाँटें नहीं; बल्कि उनका धन्यवाद करें।


यदि कभी ऐसा कोई समय था, जब दाऊद को नातान की सलाह की सबसे ज्यादा आवश्यकता थी, तो वह यही समय था। परन्तु दाऊद ने नातान को नहीं बुलाया; बल्कि परमेश्‍वर ने नातान को दाऊद के पास भेजा, क्योंकि परमेश्‍वर अपने लोगों से प्रेम करता है, और अपने सेवकों से भी प्रेम करता है। परमेश्‍वर शायद हमें पाप में गिरने दे, परन्तु वह हमें उस पाप में विश्राम से पड़े रहने नहीं देगा; वह हमारी इतनी परवाह करता है कि वह हमें हमारी गलती का एहसास कराता है, और हम इसके लिए उसके आभारी हो सकते हैं। हम नहीं जानते कि यदि उस दिन नातान दाऊद से मिलने न आया होता, तो दाऊद अपनी उस पश्‍चाताप-हीन अवस्था में और कितने समय तक बना रहता। परन्तु हम यह अवश्य जानते हैं कि यशायाह 57:17-18 क्या कहता है: “उसके लोभ के पाप के कारण मैं ने क्रोधित होकर उसको दु:ख दिया था, और क्रोध के मारे उससे मुँह छिपाया था; परन्तु वह अपने मनमाने मार्ग में दूर भटकता चला गया था। मैं उसकी चाल देखता आया हूँ, तौभी अब उसको चंगा करूँगा; मैं उसे ले चलूँगा और विशेष करके उसके शोक करनेवालों को शान्ति दूँगा।”


इससे पहले कि हम परमेश्‍वर को खोजें या यह जानें कि हमें उसे खोजने की आवश्यकता है, परमेश्‍वर स्वयं हमें खोजता है; अन्यथा हम निश्‍चित रूप से खो जाते। नातान वह भविष्यद्वक्ता था, जिसके द्वारा परमेश्‍वर ने पहले दाऊद को यह संदेश भेजा था, कि वह उसके लिए एक ऐसा घर बनाना चाहता है, जो सदैव तक बना रहे; और अब उसी नातान के द्वारा, परमेश्‍वर ने दाऊद को न्याय और क्रोध का यह संदेश भेजा। परमेश्‍वर के सेवकों के मुख से निकले उसके वचन को हमें स्वीकार करना चाहिए, चाहे वह डराने वाला हो या सांत्वना देने वाला। नातान आज्ञाकारी था और परमेश्‍वर का संदेश लेकर गया। उसने यह नहीं कहा, "दाऊद ने पाप किया है, इसलिए मुझे मत भेज।" नहीं। 2 थिस्सलुनीकियों 3:15 कहता है, "तौभी उसे बैरी मत समझो, पर भाई जानकर चिताओ।" न ही नातान ने यह कहा, "दाऊद हमारा राजा है, मैं उसे फटकार नहीं लगा सकता।" यशायाह 50:7 कहता है, "क्योंकि प्रभु यहोवा मेरी सहायता करता है, इस कारण मैं ने संकोच नहीं किया; वरन् अपना माथा चकमक के समान कड़ा किया, क्योंकि मुझे निश्‍चय था कि मुझे लज्जित होना न पड़ेगा।" प्रभु परमेश्‍वर का सेवक, प्रभु परमेश्‍वर का ही सेवक होता है; हम वही करते हैं, जो वह कहता है, और परमेश्‍वर हमारी देखभाल करता है।

परमेश्‍वर जानता है कि दृष्टांतों अर्थात् कहानियों का उपयोग कैसे किया जाता है। यीशु और बाइबल में अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया। संदेश स्पष्ट होना चाहिए, और यदि कोई दृष्टांत संदेश पहुँचाने का सर्वोत्तम और अधिक प्रभावशाली माध्यम है, तो उसी का उपयोग करना चाहिए। दाऊद को पहले से चेतावनी देकर उसे बचाव की मुद्रा में आने का अवसर दिए बिना, सीधे उसके मन तक पहुँचने के लिए, नातान ने उसे एक कहानी सुनाई। और वह कहानी बहुत ज्यादा प्रभाव डालने वाली प्रमाणित हुई। यह एक ऐसा दृष्टांत था, जिसे सुनकर दाऊद को लगा कि यह उसकी प्रजा के दो लोगों के बीच की किसी समस्या से जुड़ा हुआ है—एक धनी व्यक्ति जिसके पास बहुत सारी भेड़ें थीं, और एक निर्धन व्यक्ति जिसके पास केवल एक ही भेड़ की एक छोटी बच्‍ची था, जिसे वह अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रेम करता था। दाऊद ने समझदारी दिखाते हुए नातान को अपने पास आने की अनुमति दी थी; और शायद यह एकमात्र अवसर नहीं था, जब नातान दाऊद से मिलने आया हो। पास्टरों, इस बात पर ध्यान दें। अपनी कलीसिया के लोगों के लिए सदैव उपलब्ध रहें।


नातान ने दाऊद के सामने एक दु:खद कहानी प्रस्तुत की, जिसमें बताया गया था कि एक धनी व्यक्ति ने अपने एक ईमानदार पड़ोसी को कितनी गहरी चोट पहुँचाई थी। "धनी के पास तो बहुत सी भेड़–बकरियाँ और गाय बैल थे; परन्तु निर्धन के पास भेड़ की एक छोटी बच्‍ची को छोड़ और कुछ भी न था, और उसको उसने मोल लेकर जिलाया था। वह उसके यहाँ उसके बाल–बच्‍चों के साथ ही बढ़ी थी; वह उसके टुकड़े में से खाती, और उसके कटोरे में से पीती, और उसकी गोद में सोती थी, और वह उसकी बेटी के समान थी" (वचन 2-3)। उस धनी व्यक्ति के पास भेड़ों और पशुओं के झुंड थे, परन्तु उस निर्धन व्यक्ति के पास केवल भेड़ की एक छोटी बच्‍ची थी—एक मादा भेड़ की एक छोटी बच्‍ची, भेड़ की एक छोटी बच्‍ची—क्योंकि उसके पास और भेड़ों को खरीदने या रखने के लिए बहुत ज्यादा धन नहीं था। यह भेड़ की एक छोटी सी बच्‍ची वह उसके यहाँ उसके बाल–बच्‍चों के साथ ही बढ़ी थी" (वचन 3)। उसे उससे बहुत ज्यादा प्रेम था, और यह सदैव उसके साथ घुल-मिलकर रहता था। उस धनी व्यक्ति को एक मित्र की आतिथ्य-सत्कार के लिए एक मेम्ने दूसरे शब्दों में भेड़ के एक बच्चे की आवश्यकता पड़ी; उसने अपने कई मेम्नों में से किसी एक का उपयोग करने के बजाय, उस निर्धन व्यक्ति के मेम्ने को ले लिया और उसे पकाकर खिला दिया। "परन्तु उस निर्धन मनुष्य की भेड़ की बच्‍ची लेकर उस जन के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाया" (वचन 4)।


इस कहानी के द्वारा नातान ने उसे उस पाप की बुराई दिखाई, जिसका वह बतशेबा के साथ व्यभिचार करके दोषी बना था। दाऊद की कई पत्नियाँ और रखैलें थीं, जिन्हें वह स्पष्ट तौर पर स्वयं से दूर रखता था—ठीक वैसे ही, जैसे धनी लोग अपने भेड़ों के झुंडों को अपने खेतों में रखते हैं। यदि दाऊद की केवल एक ही पत्नी होती, और वह उसे उतनी ही प्रेमी होती, जितनी वह मादा भेड़ की एक छोटी बच्‍ची, जो उसके मालिक को प्रेमी थी, तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से उसके बहुत अधिक निकट होती। तब दाऊद के लिए नीतिवचन 5:19 में लिखे सिद्धान्त का पालन करना बहुत आसान होता: "प्रिय हरिणी या सुन्दर सांभरनी के समान उसके स्तन सर्वदा तुझे सन्तुष्‍ट रखें, और उसी का प्रेम नित्य तुझे आकर्षित करता रहे।" विवाह, व्यभिचार और परस्त्रीगमन के विरुद्ध एक मजबूत ढाल अर्थात् कवच का काम करता है; परन्तु कई पत्नियाँ रखने से विवाह की शपथें स्पष्ट तौर पर हल्की हो जाती हैं, और उनका पालन करना और भी मुश्किल हो जाता है। ऊरिय्याह उस निर्धन व्यक्ति जैसा था, जिसके पास प्रेम करने के लिए केवल एक भेड़ की छोटी बच्‍ची था। उसकी केवल एक ही पत्नी थी, जो उसे अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रेमी थी, और सदैव उसके बहुत निकट रहती थी—क्योंकि उसके पास कोई दूसरी पत्नी नहीं थी, और न ही वह किसी दूसरी पत्नी की चाहत रखता था। इसी बात से दाऊद का पाप और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है; उसने बतशेबा के साथ जबरदस्ती की और ऊरिय्याह के साथ घोर अन्याय किया।

दाऊद को लगा कि नातान की कहानी बिल्कुल सच है; उसने तुरन्त उस धनी व्यक्ति के विरुद्ध न्याय सुना दिया कि भेड़ की एक छोटी बच्‍ची छीनकर किए गए इस अन्याय के लिए उसे अपने प्राणों का मूल्य चुकाना होगा, और निर्गमन 22:1 में लिखी व्यवस्था के अनुसार उसे चार गुना भरपाई करनी होगी। “यदि कोई मनुष्य बैल, या भेड़, या बकरी चुराकर उसका घात करे या बेच डाले, तो वह बैल के बदले पाँच बैल, और भेड़–बकरी के बदले चार भेड़–बकरी भर दे।” नीतिवचन 6:32 कहता है, “परन्तु जो परस्त्रीगमन करता है, वह निरा निर्बुद्ध है; जो अपने प्राणों को नष्‍ट करना चाहता है, वही ऐसा करता है।” यदि कोई निर्धन व्यक्ति किसी धनी व्यक्ति से—अपनी भूख मिटाने के लिए चोरी करता है—तो भी उसे उसकी भरपाई करनी होगी, भले ही उसकी चोरी समझ में आने योग्य हो। फिर भी, दूसरी ओर, नीतिवचन 6:32 कहता है, “परन्तु जो परस्त्रीगमन करता है, वह निरा निर्बुद्ध है; जो अपने प्राणों को नष्‍ट करना चाहता है, वही ऐसा करता है।” धनी व्यक्ति के लिए दाऊद का दिया हुआ दण्ड कठोर प्रतीत होता है। दाऊद ने कहा कि उस धनी व्यक्ति को मरना ही होगा। “यहोवा के जीवन की शपथ, जिस मनुष्य ने ऐसा काम किया वह प्राण दण्ड के योग्य है; और उसको उस भेड़ की बच्‍ची का चौगुना भर देना होगा, क्योंकि उसने ऐसा काम किया, और कुछ दया नहीं की” (वचन 5ब-6)। उस समय दाऊद स्वयं भी अपराध-बोध से ग्रस्त था, और शायद अपने इसी अपराध-बोध के कारण उसने उस कल्पित धनी व्यक्ति पर अपना गुस्सा निकाला।


2. दोष की घोषणा। वचन 5-9

नातान ने न केवल एक जबरदस्त कहानी सुनाई और दाऊद को यह समझने में सहायता की कि किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अन्याय करना कितना गलत होता है, जिसके पास बहुत कुछ है, फिर भी वह किसी ऐसे व्यक्ति से छीन लेता है, जिसके पास बहुत कम है, बल्कि उसने दाऊद के बोलने की प्रतीक्षा भी की। फिर, जब दाऊद बोला और ऐसा करके उसने स्वयं को ही दोषी ठहराया, तो नातान ने बहुत ही वैभवशाली, जोरदार और कम शब्दों में अपनी बात का सार कहा; वह तोप के गोले की तरह सीधे निशाने पर जाकर लगा। "वह व्यक्ति तू ही है!" नातान ने उस दृष्टांत को दाऊद पर लागू किया।


यदि तुझे लगता है कि उस धनी व्यक्ति को मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए था, तो तुझे भी मिलना चाहिए। दाऊद, तू ही वह व्यक्ति है, जिसने यह गलत काम किया है, और कहानी के उस धनी व्यक्ति से भी कहीं ज्यादा बुरा काम किया है; तूने यह सब एक विश्‍वासयोग्य, ईमानदार और निष्ठावान पड़ोसी के साथ किया है, जो एक सैनिक के तौर पर तेरे लिए अपने प्राण देने को भी तैयार था। तू मृत्यु के ज्यादा दण्ड पाने के योग्य हो—उस धनी व्यक्ति से भी ज्यादा, जिसने केवल एक भेड़ की एक छोटी बच्‍ची को ही लिया था, जबकि तूने एक निर्धन व्यक्ति की पत्नी छीन ली। क्या वह धनी व्यक्ति मृत्यु के योग्य था, जिसने अपने पड़ोसी की भेड़ की एक छोटी बच्‍ची ली थी, और तू ही वह है, जिसने अपने पड़ोसी की पत्नी छीन ली? वह निर्धन व्यक्ति तो जिंदा बच गया, भले ही उसने अपनी भेड़ की एक छोटी बच्‍ची खो दी थी; परन्तु ऊरिय्याह, जिसने अपनी पत्नी खोई थी, उसने अपने प्राण भी गँवाने पड़े।


यदि किसी राजा को कभी कोई कड़ी फटकार मिली थी, तो वह दाऊद को ही मिली थी। नातान ने परमेश्‍वर के दूत और भविष्यद्वक्ता के तौर पर बात की। वचन 7-10 में कहा गया है, "तब नातान ने दाऊद से कहा, "तू ही वह मनुष्य है। इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा यों कहता है, ‘मैं ने तेरा अभिषेक कर के तुझे इस्राएल का राजा ठहराया, और मैं ने तुझे शाऊल के हाथ से बचाया; फिर मैं ने तेरे स्वामी का भवन तुझे दिया, और तेरे स्वामी की पत्नियाँ तेरे भोग के लिये दीं; और मैं ने इस्राएल और यहूदा का घराना तुझे दिया था; और यदि यह थोड़ा था, तो मैं तुझे और भी बहुत कुछ देनेवाला था। तू ने यहोवा की आज्ञा तुच्छ जानकर क्यों वह काम किया जो उसकी दृष्‍टि में बुरा है? हित्ती ऊरिय्याह को तू ने तलवार से घात किया, और उसकी पत्नी को अपनी कर लिया है, और ऊरिय्याह को अम्मोनियों की तलवार से मरवा डाला है। इसलिये अब तलवार तेरे घर से कभी दूर न होगी, क्योंकि तू ने मुझे तुच्छ जानकर हित्ती ऊरिय्याह की पत्नी को अपनी पत्नी कर लिया है।""


नातान के द्वारा परमेश्‍वर ने दाऊद को उन बड़े कामों की स्मरण दिलाई, जो उसने उसके लिए किए थे—उसे राजा बनाया, राज्य में उसकी रक्षा की, उसे शाऊल के घर और परिवार पर, और नाबाल पर अधिकार दिया, और फिर उसे यहूदा और उसके बाद इस्राएल का राज्य सौंपा। और, "और यदि यह थोड़ा था, तो मैं तुझे और भी बहुत कुछ देनेवाला था।" परमेश्‍वर दाऊद और हम पर बहुत उदार रहा है, परन्तु जब भरपूर आशीषें हमें आवश्यकता से ज्यादा या अनैतिक चीजों की चाहत में डाल देती हैं—या हमें 'वर्जित फल' की ओर खींचती हैं—तो हम गलती से परमेश्‍वर के प्रतिज्ञाएँ की सीमा को लांघ जाते हैं; जबकि परमेश्‍वर ने हमें जो कुछ भी देने का प्रतिज्ञा की है, वह हमारे लिए बहुत ज्यादा होना चाहिए।


इसके अतिरिक्त, नातान ने दाऊद पर 'ईश्‍वरीय अधिकार के अपमान' का आरोप भी लगाया, क्योंकि उसने वचन 9 में यह बात कही थी: "तू ने यहोवा की आज्ञा तुच्छ जानकर क्यों वह काम किया जो उसकी दृष्‍टि में बुरा है?" दाऊद ने परमेश्‍वर की व्यवस्था के प्रति अपने प्रेम को बहुत ही ऊँचे और भले शब्दों में व्यक्त किया था, और फिर भी यहाँ उसी पर व्यवस्था के उन नियमों के अपमान का आरोप लगाया जा रहा है। क्या यह संभव है कि कोई व्यवस्था से प्रेम तो करे, परन्तु उसका पालन न करे? क्या हम व्यवस्था का पालन करके ही उसके प्रति अपने प्रेम को स्पष्ट नहीं करते?

वचन 9 में ऊरिय्याह की हत्या का वर्णन दो बार किया गया है, और हाँ—इसके लिए 'हत्या' अर्थात् वचन में घात और मरवा डाला शब्दों का ही उपयोग किया गया है। जो लोग किसी बुराई की साजिश रचते हैं, वे भी उतने ही दोषी होते हैं, जितने कि उस बुराई को पूरा करने वाले लोग। दाऊद और बतशेबा के बीच हुए पाप का वर्णन भी दो बार आया है—एक बार वचन 9 में, और फिर दोबारा वचन 10 में। नातान ने दाऊद को परमेश्‍वर की उस योजना के बारे में बताया था, जिसके अधीन परमेश्‍वर उसके परिवार को बनाना, उसकी रक्षा करना और उसे सदैव के लिए बनाए रखना चाहता था। इसके बावजूद, दाऊद ने परमेश्‍वर की इस विशेष प्रतिज्ञाएँ का अपमान किया; उसने व्यभिचार और हत्या करके अपने ही घर को अपवित्र कर दिया। वासना और लहू बहाना—ये परमेश्‍वर के लिए 'मन्दिर' बनाने के कोई सही तरीके नहीं हैं। यौन-विजय अर्थात् किसी पर यौन-संबंधों के द्वारा अधिकार जमाना सदैव केवल वासना का ही विषय नहीं होता; इसमें अक्सर शक्ति, सत्ता, स्वामित्व और प्रभुता जैसे तत्व भी शामिल होते हैं। इसी तरह, हत्या भी सदैव केवल घृणा का ही परिणाम नहीं होती। दाऊद ऊरिय्याह से घृणा नहीं करता था; वह तो बस किसी भी मूल्य पर बतशेबा को अपने लिए प्राप्त करना चाहता था। हमें ठीक-ठीक नहीं पता कि इनमें से कौन-सा कारक दाऊद पर प्रबल था, परन्तु हम यह अवश्य जानते हैं कि वह व्यभिचार और हत्या—दोनों का ही दोषी था।


व्यभिचार और हत्या—ये दोनों ही बहुत बड़े पाप हैं। दाऊद और बतशेबा से जो गलती हुई थी, वह कोई छोटी-मोटी भूल नहीं थी। दाऊद के इस महापाप की गंभीरता और राजा के रूप में उसके ऊँचे पद—इन दोनों बातों को मिलाकर देखें, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि दाऊद के लिए अपनी गलती को स्वयं स्वीकार कर पाना कितना कठिन रहा होगा। थोड़ा ध्यान दीजिए कि परमेश्‍वर कितना कृपालु था कि उसने नातान को दाऊद के पास भेजा। नातान ने दाऊद को जो दृष्टांत अर्थात् कहानी सुनाई थी, उसका संदेश बहुत ही ज्यादा स्पष्ट था। दाऊद उस जाल में फँस गया, और उसने एक बहुत बड़ी बुराई के लिए कठोरतम दण्ड की घोषणा कर दी। इस तरह, दाऊद ने स्वयं को ही अपने जाल में फँसा लिया। इस पूरी घटना के दौरान, परमेश्‍वर की कृपा बनी रही। और हम भी परमेश्‍वर से प्रार्थना कर सकते हैं कि वह हम पर भी अपनी कृपा बनाए रखे, और हमें हमारे पापों का बोध कराए।


दाऊद को क्षमा मिलने से पहले, उसे उसके पाप का वास्तविक रूप दिखाया गया। नातान उसके पास जाकर यह नहीं बोला, "दाऊद, तूने जितना सोचा था, उससे कहीं ज्यादा बड़ी गलती की है। तूने अपने चरित्र को कलंकित किया है, और जिस परमेश्‍वर से तू प्रेम करता है, उसका भी अपमान किया है; फिर भी तुझे क्षमा कर दिया गया है।" नहीं, उसने एक दृष्टांत सुनाया, जिसने दाऊद के अपने चरित्र को उसके सामने पूरी तरह से उजागर कर दिया—कि उसका चरित्र कितना नीच और घिनौना था। उस यात्री का वर्णन, जो एक धनी व्यक्ति के पास आया था—और जिसके लिए जेवनार तैयार करने हेतु उस धनी व्यक्ति ने जाकर एक निर्धन व्यक्ति की एकलौती भेड़ छीन ली थी—बहुत ही सोच-समझकर किया गया था। यह एक ऐसा जाल था, जिसमें दाऊद बड़ी चालाकी से फँस गया, और उसे अपना ही वास्तव रूप को देखने पर विवश होना पड़ा—हालाँकि उस समय उसे थोड़ा भी अनुमान नहीं था कि वह वास्तव में स्वयं को ही देख रहा है।


परन्तु जब नातान ने उससे कहा, "वह व्यक्ति तू ही है” तो उसे यह एहसास हुआ कि वह कितना नीच और घिनौना व्यक्ति है, जो मृत्यु दण्ड ही योग्य है। उसका क्रोध स्वयं अपने ही विरुद्ध और अपने ही कर्मों के विरुद्ध भड़क उठा; और इस प्रकार, परमेश्‍वर ने यह सुनिश्‍चित किया कि दाऊद को तब तक क्षमा न मिले, जब तक कि उसे अपने पाप की गंभीरता का पूरी तरह से एहसास न हो जाए। यह भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा सबक प्रमाणित हुआ, जिसने उसे दोबारा कभी भी उस पाप में न फँसने में सहायता की। जब परमेश्‍वर हमें हमारे पापों के बारे में बताता है, तो वह हम पर एक बहुत बड़ा उपकार करता है। आइए, हम बिना किसी विरोध के, तुरन्त उसकी बातों को स्वीकार करना सीखें। 


यदि आप इस कहानी में 'नातान' की भूमिका में हैं, तो परमेश्‍वर का संदेश पूरी ईमानदारी से लोगों तक पहुँचाएँ। और यदि आप इस कहानी में 'दाऊद' की भूमिका में हैं, तो तुरन्त पश्‍चाताप करें।