देर से मिला न्याय
अध्याय छियानवे
2 शमूएल 13:30–39

Ron Meyers
अबशालोम ने अपने सेवकों को अम्नोन को मारने का निर्देश दिया था, और उन्होंने वैसा ही किया। इस पाठ में हम अबशालोम के भयानक घमण्ड और व्यवहार की कहानी को आगे बढ़ाते हैं। आइए देखें कि अम्नोन के मारे जाने के ठीक बाद क्या होता है: दाऊद के दूसरे पुत्र अबशालोम से भाग जाते हैं, और अबशालोम न्याय से भाग जाता है। इन सबसे हम क्या सीख सकते हैं?
30वे मार्ग ही में थे, कि दाऊद को यह समाचार मिला, “अबशालोम ने सब राजकुमारों को मार डाला, और उनमें से एक भी नहीं बचा।” 31तब दाऊद ने उठकर अपने वस्त्र फाड़े, और भूमि पर गिर पड़ा, और उसके सब कर्मचारी वस्त्र फाड़े हुए उसके पास खड़े रहे। 32तब दाऊद के भाई शिमा के पुत्र योनादाब ने कहा, “मेरा प्रभु यह न समझे कि सब जवान, अर्थात् राजकुमार मार डाले गए हैं, केवल अम्नोन मारा गया है; क्योंकि जिस दिन उसने अबशालोम की बहिन तामार को भ्रष्ट किया, उसी दिन से अबशालोम की आज्ञा से ऐसी ही बात निश्चित थी। 33इसलिये अब मेरा प्रभु राजा अपने मन में यह समझकर कि सब राजकुमार मर गए उदास न हो; क्योंकि केवल अम्नोन ही मारा गया है।” 34इतने में अबशालोम भाग गया। और जो जवान पहरा देता था उसने आँखें उठाकर देखा, कि पीछे की ओर से पहाड़ के पास के मार्ग से बहुत लोग चले आ रहे हैं। 35तब योनादाब ने राजा से कहा, “देख, राजकुमार आ गए हैं; जैसा तेरे दास ने कहा था वैसा ही हुआ।” 36वह कह ही चुका था, कि राजकुमार पहुँच गए, और चिल्ला चिल्लाकर रोने लगे; और राजा भी अपने सब कर्मचारियों समेत बिलख बिलख कर रोने लगा। 37अबशालोम तो भागकर गशूर के राजा अम्मीहूर के पुत्र तल्मै के पास गया। और दाऊद अपने पुत्र के लिये दिन दिन विलाप करता रहा। 38अत: अबशालोम भागकर गशूर को गया, और वहाँ तीन वर्ष तक रहा। 39दाऊद के मन में अबशालोम के पास जाने की बड़ी लालसा रही; क्योंकि अम्नोन जो मर गया था, इस कारण उसने उसके विषय में शान्ति पाई।
1. झूठा समाचार सुधारा जाता है और दाऊद तक पहुँचता है। वचन 30-32
स्वाभाविक रूप से, जब दाऊद ने वह समाचार सुना तो वह बहुत ज्यादा परेशान हो गया—जब तक कि उसे यह पता नहीं चला कि वह समाचार झूठा था। वचन 30-31 कहते हैं, “जब वे (राजा के पुत्र) मार्ग ही में थे, कि दाऊद को यह समाचार (झूठी समाचार) मिला, “अबशालोम ने सब राजकुमारों को मार डाला, और उनमें से एक भी नहीं बचा।’ तब दाऊद ने उठकर अपने वस्त्र फाड़े, और भूमि पर गिर पड़ा, और उसके सब कर्मचारी वस्त्र फाड़े हुए उसके पास खड़े रहे।” दाऊद ने अपनी समझ के अनुसार प्रतिक्रिया दी; उसे ऐसा बताया गया था, इसलिए उसने सोचा कि उसके सभी पुत्र मारे जा चुके हैं। जबकि उसके सभी पुत्र नहीं मारे गए थे, परन्तु दाऊद ने ऐसी प्रतिक्रिया दी मानो वे मारे जा चुके हों—क्योंकि जहाँ तक उसे पता था, वे मारे जा चुके थे। दो बातों ने इस संकटपूर्ण स्थिति को शांत करने में सहायता की।
पहली बात, योनादाब—दाऊद का वह दुष्ट भतीजा, जिसने अम्नोन को बीमार होने का नाटक करने का विचार दिया था—ने दाऊद को बताया कि केवल अम्नोन ही मरा है। वचन 32-33 कहते हैं, “तब दाऊद के भाई शिमा के पुत्र योनादाब ने कहा, “मेरा प्रभु यह न समझे कि सब जवान, अर्थात् राजकुमार मार डाले गए हैं, केवल अम्नोन मारा गया है; क्योंकि जिस दिन उसने अबशालोम की बहिन तामार को भ्रष्ट किया, उसी दिन से अबशालोम की आज्ञा से ऐसी ही बात निश्चित थी। इसलिये अब मेरा प्रभु राजा अपने मन में यह समझकर कि सब राजकुमार मर गए उदास न हो; क्योंकि केवल अम्नोन ही मारा गया है।’” योनादाब को यह बात पता थी। योनादाब यह बता सकता था, और संभवतः उसने यह बात पहले भी बताई होगी। संभवतः उसे यह बात महीनों पहले से पता थी—बशर्ते वह झूठ न बोल रहा हो। हमें यह नहीं पता। यदि उसे यह बात पहले से पता थी, तो उसने अपने मित्र अम्नोन या अपने चाचा दाऊद को चेतावनी क्यों नहीं दी? वह कितना दुष्ट व्यक्ति था, यदि उसे पता था, परन्तु उसने दूसरों को चेतावनी नहीं दी। यदि हम बुराई से बचने या उसे रोकने के लिए अपनी पूरी कोशिश नहीं करते, तो हम स्वयं उसके साथी बन जाते हैं। नीतिवचन 24:11-12 कहता है, “जो मार डाले जाने के लिये घसीटे जाते हैं, उनको छुड़ा; और जो घात किए जाने को हैं, उन्हें मत पकड़ा। यदि तू कहे, कि देख मैं इसको जानता न था, तो क्या मन का जाँचनेवाला इसे नहीं समझता? क्या तेरे प्राणों का रक्षक इसे नहीं जानता, और क्या वह हर एक मनुष्य के काम का फल उसे न देगा?” बहुत संभव है कि वह “मित्र” (योनादाब) जिसने अम्नोन के पाप को रोकने के लिए वह सब नहीं किया, जिसे वह कर सकता था, उसने अम्नोन के नाश को रोकने के लिए भी वह सब नहीं किया होगा, जिसे वह कर सकता था।
दूसरा, राजा के बेटों की सुरक्षित वापसी ने योनादाब के विवरण की सच्चाई की पुष्टि कर दी। पहरेदार ने शुभ सन्देश सुनाया। वचन 34-35 कहते हैं, “इतने में अबशालोम भाग गया। और जो जवान पहरा देता था उसने आँखें उठाकर देखा, कि पीछे की ओर से पहाड़ के पास के मार्ग से बहुत लोग चले आ रहे हैं। तब योनादाब ने राजा से कहा, “देख, राजकुमार आ गए हैं; जैसा तेरे दास ने कहा था वैसा ही हुआ।” जब दाऊद के पुत्र पहुँचे, तो राजा और उसके पुत्र सब मिलकर रोए। शुभ सन्देश यह था कि वे सब मारे नहीं गए थे। बुरा समाचार यह थी कि अम्नोन सचमुच मारा गया था, और वह भी अपने ही भाई के हाथों। हम अम्नोन के मारे जाने पर गहरे दु:ख का प्रगटावा देखते हैं, परन्तु हमें इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता कि किसी ने भी परमेश्वर का धन्यवाद और स्तुति करने के बारे में सोचा हो कि वे सब मारे नहीं गए। राजा को बुरा समाचार मिला, परन्तु वह उतना बुरा नहीं था, जितना कि हो सकता था; उसे मुश्किल का सामना करना पड़ा, परन्तु वह उतनी ज्यादा नहीं थी, जितनी हो सकती थी। क्या उसे कृतज्ञ होना चाहिए था?
इसके अतिरिक्त, हम अम्नोन के मारे जाने पर गहरे दु:ख का प्रगटावा देखते हैं, परन्तु हमें इस बारे में कुछ भी पढ़ने को नहीं मिलता कि तामार के साथ बलात्कार होने पर किसी के मन में थोड़ी भी दु:ख या पीड़ा हुई हो। मारा जाना दु:खद है, परन्तु पीड़ित की पीड़ा लगभग तुरन्त ही खत्म हो जाती है—यह इस बात पर निर्भर करता है कि हत्या किस तरीके से की गई है—क्योंकि पीड़ित की मृत्यु हो चुकी होती है। बलात्कार होना एक कड़वा और शोकपूर्ण अनुभव है; पीड़िता जीवित रहती है और अपने शेष जीवन भर इस आघात के साथ पीड़ा सहती रहती है। क्या राजा के बेटों में से किसी को भी उस दण्ड से कोई सांत्वना मिली, जो दुष्ट अम्नोन को अभी-अभी मिली थी? क्या उनमें से किसी ने यह सोचा कि अम्नोन को वही मिला, जिसके लिए वह योग्य था? उन्होंने अम्नोन के लिए शोक मनाया, परन्तु क्या किसी ने तामार को सांत्वना देने के बारे में सोचा? इस जीवन में न्याय सदैव नहीं मिल पाता, परन्तु अगले जीवन में वह निश्चित रूप से मिलेगा।
2. एक समान दु:ख के प्रति दाऊद और अय्यूब की प्रतिक्रियाओं की तुलना।
अय्यूब के सभी पुत्र मारे गए थे; ऐसा परिवार में किसी पाप की कारण से नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ, क्योंकि परमेश्वर ने अय्यूब को संकट के समय भी स्वयं को धर्मी प्रमाणित करने का अवसर दिया। उस धर्मी पुरुष, अय्यूब ने क्या किया, जब उसने सुना कि उसके सभी पुत्र और पुत्रियाँ मारे जा चुके हैं? अय्यूब 1:20-22 में लिखा है, “तब अय्यूब उठा, और बागा फाड़, सिर मुँड़ाकर भूमि पर गिरा और दण्डवत् करके कहा, ”मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।” इन सब बातों में भी अय्यूब ने न तो पाप किया, और न परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाया।” और दाऊद ने क्या किया, जब उसने सुना कि उसके सभी पुत्र मारे जा चुके हैं? “तब दाऊद ने उठकर अपने वस्त्र फाड़े, और भूमि पर गिर पड़ा, और उसके सब कर्मचारी वस्त्र फाड़े हुए उसके पास खड़े रहे।” दाऊद की प्रतिक्रिया समझ में आती है, परन्तु वह कोई अनुकरणीय उदाहरण नहीं था। कभी-कभी, बहुत बुरा समाचार सुनने पर प्रतिक्रिया देने से पहले, उस समाचार की पुष्टि करना आवश्यक होता है। ऐसा हो सकता है कि इस तरह की समाचार पहली बार सुनने पर, वह वास्तविकता से कहीं ज्यादा भयानक लगे।
शायद हमें यह सीखने की आवश्यकता है कि जब हम सबसे बुरा समाचार सुनते हैं, तब भी हम सबसे अच्छे की आशा कर सकते हैं—कम-से-कम सर्वोत्तम की आशा तो कर ही सकते हैं। दाऊद उठा, अपने वस्त्र फाड़े, भूमि पर लेट गया, और उसके सेवकों ने भी अपने वस्त्र फाड़ लिए। क्या यह समझ में आता है? हाँ। क्या यह अनुकरणीय है? नहीं। इसमें विश्वास कहाँ था? परमेश्वर की शांति कहाँ थी? भरोसा कहाँ था? और हम दाऊद के दु:ख की तुलना अय्यूब के दु:ख से कैसे कर सकते हैं? अय्यूब के सभी बेटों की मृत्यु का समाचार सच थी; वे सब सचमुच मर चुके थे। दाऊद को भी यही लगा कि उसके सभी पुत्र मर चुके हैं; इसलिए इन दोनों लोगों की प्रतिक्रियाओं की तुलना करना सही है—क्योंकि दोनों को ही लगा था कि उनके सभी पुत्र मर चुके हैं—भले ही दाऊद का सोचना गलत था और उसके सभी पुत्र नहीं मरे थे। इसके अतिरिक्त, दाऊद के पुत्र धर्मी नहीं थे, जबकि हमारे पास यह मानने का कारण है कि अय्यूब के पुत्र धर्मी थे। ऐसा इसलिए था, क्योंकि अय्यूब नियमित रूप से उनकी ओर से बलिदान चढ़ाता था। जब वे सब मिलकर जन्मदिन की जेवनार मनाते थे, तो सभी बहुत प्रसन्न होते थे। उनमें से कोई भी मारा नहीं गया था! अय्यूब 1:4-5 कहता है, “4 उसके बेटे बारी–बारी से एक दूसरे के घर में खाने–पीने को जाया करते थे; और अपनी तीनों बहिनों को अपने संग खाने–पीने के लिये बुलवा भेजते थे। 5जब जब भोज के दिन पूरे हो जाते, तब तब अय्यूब उन्हें बुलवाकर पवित्र करता, और बड़े भोर को उठकर उनकी गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था; क्योंकि अय्यूब सोचता था, “कदाचित् मेरे लड़कों ने पाप करके परमेश्वर को छोड़ दिया हो।” इसी रीति अय्यूब सदैव किया करता था।” अय्यूब का व्यवहार, और सन्तान की पालन-पोषण का उसका तरीका और धार्मिक अभ्यास, दाऊद से कहीं ज्यादा सर्वोत्तम लगता है। फिर भी, जब अय्यूब ने सुना कि उसके सारे बच्चे मारे गए हैं, तो उसने परमेश्वर की आराधना की; जबकि दाऊद बहुत ज्यादा दु:खी हुआ और फिर उसी दुष्ट अम्नोन के लिए लंबे समय तक शोक मनाता रहा!
हमारे इस पाठ में जानकारी के ये दो हिस्से शामिल हैं: 1. “राजा भी अपने सब कर्मचारियों समेत बिलख-बिलख कर रोने लगा” (वचन 36)। और 2. “दाऊद अपने पुत्र के लिये दिन दिन विलाप करता रहा” (वचन 37)। एक आदर्श पिता होने का श्रेय दाऊद को नहीं, बल्कि अय्यूब को मिलता है। जब हम ऐसे गिरे हुए लोगों की बात कर रहे हैं, जो अपूर्ण हैं, तो हमें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वे जीवन के हर पहलू में आदर्श होंगे। दाऊद परमेश्वर की आराधना और प्रेम का एक अच्छा उदाहरण है, परन्तु एक जिम्मेदार माता-पिता के तौर पर वह अच्छा उदाहरण नहीं है। अय्यूब बिना किसी शिकायत के दु:ख सहने का, और एक धर्मी माता-पिता के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाने का एक अच्छा उदाहरण है। जब हम पवित्रशास्त्र पढ़ते हैं, तो आइए हम हर चरित्र के सबसे अच्छे पहलू को चुनें—उनके आदर्श व्यवहार और उनकी सोच को—और फिर उनके जीवन के उन आदर्श पहलुओं का पूरी लगन से अनुसरण करें। आइए हम उन बुरे उदाहरणों को भी पहचानें, और पूरी गंभीरता के साथ उनके जैसा व्यवहार करने से बचें।
3. बुरे या दु:खद अनुभवों की व्याख्या पर विचार।
इस भाग में, हम पिछले भागों की तुलना में कहीं ज्यादा सामान्य दृष्टिकोण से, इस बात पर चर्चा करने की स्वतंत्रता लेंगे कि किसी मुश्किल का सामना करते समय हम किस तरह से आशावादी प्रतिक्रिया दे सकते हैं—विशेषकर तब, जब वह मुश्किल उतनी बड़ी न हो जितनी कि वह हो सकती थी। सारे पुत्र नहीं, बल्कि केवल अम्नोन ही मारा गया था। क्या यह सोचना एक उचित व्यक्तिगत सांत्वना है कि कोई त्रासदी उतनी बुरी नहीं है, जितनी कि वह हो सकती थी? कितनी बार ऐसा होता है कि मसीही लोग दु:ख सहते हैं, परन्तु उतना ज्यादा नहीं जितना कि वे सह सकते थे? हम कितनी बार इस बात का लेखा-जोखा लगाने के बारे में सोचते हैं कि जिस मुश्किल का सामना हम कर रहे हैं, उसे हमारे रक्षक परमेश्वर के अदृश्य और कृपालु हाथों ने वास्तव में कितना कम कर दिया होगा? क्या यह उचित है कि हम परमेश्वर का धन्यवाद करें कि हम जिस भी मुश्किल का सामना कर रहे हैं, वह उतनी बुरी नहीं है, जितनी हो सकती थी? क्या हम उसका धन्यवाद कर सकते हैं कि हमारे पास आधा गिलास पानी है, बजाय इसके कि हम शिकायत करें कि गिलास पूरा भरा हुआ नहीं है? जब हमारे प्रियजनों के जीवन के दिन कम हो जाते हैं, तो क्या यह सम्मानजनक और भली बात नहीं होगी कि हम परमेश्वर का धन्यवाद करें कि वे जितने समय तक भी हमारे साथ रहे, हमने उनका साथ पाया? क्या यह सर्वोत्तम नहीं है कि हमने प्रेम किया और फिर उन्हें खो दिया, बजाय इसके कि हमने कभी प्रेम किया ही न हो? उस व्यक्ति के साथ से हमारा जीवन किस तरह समृद्ध हुआ, जिसका साथ अब हमें नहीं मिल रहा है? सदैव सकारात्मक पहलू को देखें।
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए, कलीसिया के अगुवों के तौर पर, क्या पास्टरों और मसीही शिक्षकों के लिए यह समझदारी की बात नहीं होगी कि वे उन सच्चे और उत्सुक सुनने वालों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें, जिन्हें परमेश्वर हमारे पास तब भेजता है, जब हम प्रचार या शिक्षा देते हैं, बजाय इसके कि हम उन काल्पनिक लोगों के बारे में चिंता करें या उनकी आलोचना करें, जो शायद सभा में आ सकते थे, परन्तु नहीं आए? दु:ख की बात है कि मैंने प्रचारकों को उन लोगों को फटकार लगाते हुए सुना है, जो उपासना सभा में उपस्थित होते हैं, केवल इसलिए कि दूसरे लोग या और ज्यादा लोग वहाँ उपस्थित नहीं थे। इसका कोई अर्थ नहीं बनता। परमेश्वर की स्तुति हो कि आपके सामने ऐसे सुनने वाले ऐसे लोग बैठे हैं, जो परमेश्वर का वचन सुनने के लिए उत्सुक हैं। आइए, हम उन काल्पनिक लोगों के बारे में शिकायत करना बंद करें, जो वहाँ उपस्थित नहीं हैं। उनकी अनुपस्थिति के लिए उनकी आलोचना करने के बजाय, उनके लिए प्रेमपूर्वक प्रार्थना करना कहीं ज्यादा लाभप्रद है। आराधना सभा का आरम्भ यह कहकर करना कहीं ज्यादा सर्वोत्तम है, “मुझे बहुत ज्यादा आनन्द है कि आप यहाँ हैं। आपको देखकर मुझे हर्ष हुआ” बजाय इसके कि यह कहा जाए, “बाकी लोग कहाँ हैं? वे यहाँ क्यों नहीं हैं?” आइए हम सीखें कि दु:खद, बुरे या निराशाजनक अनुभवों को सकारात्मक दृष्टिकोण से कैसे देखें। आइए हम सच्ची दृढ़ता और विश्वास के साथ यह कहना सीखें, “यदि परमेश्वर इसमें शामिल न होता, तो हालात और भी बुरे हो सकते थे।”
4. अबशालोम अपने नाना के पास गशूर भाग गया। वचन 34अ और 37-39
इस्राएल के तिबिरियुस नगर में, गलील झील के पश्चिमी किनारे पर रहते हुए, हमने अपने उन वर्षों के दौरान, समय-समय पर गशूर के प्राचीन स्थल का दौरा किया या वहाँ शिक्षाओं को दर्ज किया; यह स्थल झील के उत्तर-पूर्वी हिस्से के ऊपर एक पहाड़ी पर स्थित है। यह ऐसा था, मानो हम समय में पीछे जाकर दाऊद के वहाँ जाने के समय में पहुँच गए हों—जब उसने गशूर के राजा तल्मै की पुत्री से राजनीतिक विवाह किया था—और उस स्थान पर जहाँ अबशालोम तीन वर्ष तक अपने पिता से दूर एकान्त में रहा था। गशूर एक वास्तविक स्थान है, और अबशालोम का न्याय से बचने के लिए अपने नाना—गशूर के राजा—के पास भाग जाना एक वास्तविक घटना थी। “इस बीच, अबशालोम भाग गया था” (वचन 34)। अबशालोम किस स्थान पर भागा? इस नाटक का यह एक रुचिपूर्ण हिस्सा है। अबशालोम अब राजा के बेटों से उतना ही डरा हुआ था, जितना वे उससे डरे हुए थे; वे उसकी द्वेषपूर्ण भावना से भाग रहे थे, और वह उनके द्वारा की जाने वाली पलटा लेने वाली कार्यवाही और सुधार से भाग रहा था। इस्राएल में अबशालोम के लिए कोई स्थान नहीं बचा था; उसे गशूर ही भागना पड़ा। शरण देने वाले नगर में भी उसके लिए कोई सुरक्षा नहीं मिलती, क्योंकि जिस हत्या की साजिश उसने रची थी, वह जान-बूझकर की गई थी—पूरी तरह से जान-बूझकर। दाऊद ने अम्नोन के बलात्कार और व्यभिचार के लिए उसे दण्ड नहीं दिया था, परन्तु अबशालोम इस बात की गारंटी नहीं दे सकता था कि दाऊद उसके द्वारा अपने भाई की हत्या को अनदेखा कर देगा। इसलिए वह अपनी माँ के रिश्तेदारों के पास चला गया, जहाँ उसके नाना—गशूर के राजा तल्मै—ने उसका स्वागत किया। दाऊद ने उसे वापस बुलाने के लिए कोई संदेश नहीं भेजा, और तल्मै ने भी उसे यरूशलेम वापस नहीं भेजा। “अबशालोम तो भागकर गशूर के राजा अम्मीहूर के पुत्र तल्मै के पास गया। और दाऊद अपने पुत्र के लिये दिन दिन विलाप करता रहा। 38अत: अबशालोम भागकर गशूर को गया, और वहाँ तीन वर्ष तक रहा। दाऊद के मन में अबशालोम के पास जाने की बड़ी लालसा रही; क्योंकि अम्नोन जो मर गया था, इस कारण उसने उसके विषय में शान्ति पाई” (वचन 37-39)।
दाऊद ने अम्नोन के लिए बहुत ज्यादा समय तक शोक किया, परन्तु—जैसा कि दाऊद और बतशेबा के पहले पुत्र के विषय में हुआ था—दाऊद उसे मृत्यु के बाद वापस नहीं बुला सकता था, और धीरे-धीरे वह अपने इस दु:ख से उबर गया। परन्तु वह अपने सुंदर और मनमोहक पुत्र—अबशालोम—के साथ अपने रिश्ते के टूटने के दु:ख से कभी नहीं उबर पाया। पहले भी वह पाप के प्रति बहुत ज्यादा उदार रहा था, और अब भी—उसे एक घिनौने हत्यारे के तौर पर घृणा करने के बजाय—वह “दाऊद के मन में अबशालोम के पास जाने की बड़ी लालसा रही” (वचन 39)। पहले वह अपने मन में उसके लिए न्याय करने की हियाव नहीं जुटा पाया था, परन्तु अब वह उसके प्रति कृपा दिखाने की हियाव जुटा पा रहा था। दाऊद की वह कमजोरी—जिसके चलते वह अपने बेटों को नियंत्रित नहीं करता था, उन्हें सुधारता नहीं था, उन्हें शिक्षा नहीं देता था और न ही उन्हें सही राह दिखाता था—एक बार फिर सामने आ गई। आगे आने वाले अध्यायों में, हम दाऊद की इस अक्षमता या अनिच्छा के भयानक परिणामों को देखेंगे कि वह अपने बेटों को सुधारने के लिए तैयार नहीं था। यह दाऊद की एक अपूर्णता और कमी थी। हमारे प्रिय दाऊद के लिए यह कितनी शर्म की बात है कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह अपने बेटों से ज्यादा प्रेम करता था, जबकि वास्तव में एक आज्ञा न मानने वाले पुत्र के प्रति उदार होना सच्चा प्रेम नहीं होता।
5. उन चीजों को कैसे पहचानें और उन पर विचार करें, जिन्हें हम सामान्य रूप से पर नहीं देख रहे होते।
यदि दाऊद सचमुच चौकस और जागरूक होता, तो वह अम्नोन, अबशालोम और अदोनिय्याह के दुर्व्यवहारों को पहचान लेता और उन पर गंभीरता से विचार करता। समस्या यह थी कि वह गलत व्यवहारों पर ध्यान नहीं दे रहा था, बल्कि स्पष्ट तौर पर उन चीजों से मुग्ध था, जिन्हें वह देखना चाहता था। यह बच्चा कितना प्रेमी है! कितना सुंदर है! मेरा पुत्र कितना होशियार है! मेरी पुत्री कितनी सुन्दर है! मैंने एक बार एक बहुत ही आज्ञा न मानने वाले सन्तान की माँ को यह कहते हुए सुना, "वह कितना प्रेमी था!" जब वह उस सन्तान के बचपन के आरम्भ वर्षों में, कई वर्ष पहले घर पर बनी फ़िल्में देख रही थी—वही बच्चा, जो अब बहुत आज्ञा न मानने वाला बन चुका था। इससे मुझे यह समझने में सहायता मिली कि वह बच्चा आज्ञा क्यों नहीं मानता था। बचपन में उसे प्रेम-दुलार तो बहुत मिला, परन्तु अनुशासन नहीं सिखाया गया।
व्यवहार विज्ञान संबंधी वैज्ञानिकों के अध्ययनों से पता चलता है कि यदि दो लोग किसी नगर के व्यावसायिक क्षेत्र में फुटपाथ पर खड़े हैं, और उस सड़क पर अन्य सभी प्रकार के व्यवसायों के बीच एक बैंक और एक रेस्तरां भी है, और एक व्यक्ति रेस्तरां की खोज में है और दूसरा व्यक्ति बैंक की खोज में है, तो बैंक की खोज करने वाले व्यक्ति को रेस्तरां दिखाई नहीं देगा और रेस्तरां की खोज करने वाले व्यक्ति को बैंक दिखाई नहीं देगा। हम अक्सर वही पाते हैं, जिसकी हम खोज कर रहे होते हैं। कई अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं। आइए इस अंतर्दृष्टि को दाऊद की कहानी पर लागू करें। स्पष्ट रूप से, दाऊद ने अपने बड़े बेटों के दुर्व्यवहार पर ध्यान नहीं दिया। शायद उन्होंने उनके साथ पर्याप्त समय नहीं बिताया। शायद वह हर पुत्र की सुंदरता या होशियारी को देखने में इतना मग्न था कि उसे उनका दुर्व्यवहार या उसे सुधारने की आवश्यकता दिखाई ही नहीं दी।
यह हमें यह समझने में सहायता कर सकता है कि दाऊद ने अपने बड़े बेटों को क्यों नहीं सुधारा, परन्तु फिर भी यह उनके इस कार्य का कोई बहाना नहीं हो सकता। बाइबल की कहानियों की व्याख्या करते समय और उनसे सीखते समय हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हमें अपने सन्तान की हर छोटी-बड़ी गलती, चूक या हल्के दुर्व्यवहार को ढूँढ़ने पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर देना चाहिए, परन्तु मैं निश्चित रूप से यह कह रहा हूँ कि जब हमें वे गलतियाँ दिखाई दें, तो हमें उन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए। वे महत्वपूर्ण हैं। उन्हें सुधारा जाना आवश्यक है, और भला हमारे सन्तान को सुधारने की जिम्मेदारी और किसकी हो सकती है? दाऊद के बड़े पुत्र—अम्नोन, अबशालोम और अदोनिय्याह—इनमें से हर एक को अंततः मृत्यु दण्ड ही मिला! क्या यह कहीं अधिक सर्वोत्तम न होता, यदि इन तीनों बेटों के माता-पिता ने उनके बचपन में ही—जब उन्हें सही आचरण की ओर निर्देशित किया जा सकता था—उनके लिए सुधारात्मक कदम उठाए होते?