जवाबदेही

अध्याय सन्तानवे


2 शमूएल 14:1-11

Ron Meyers

अबशालोम, जो अब एक हत्यारा बन चुका है, वह गशूर भाग गया है। उसे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है और वह एक बिगड़ी हुई सन्तान है।


1सरूयाह का पुत्र योआब ताड़ गया कि राजा का मन अबशालोम की ओर लगा है। 2इसलिये योआब ने तकोआ नगर में दूत भेजकर वहाँ से एक बुद्धिमान स्त्री को बुलवाया, और उससे कहा, “शोक करनेवाली बन, अर्थात् शोक का पहिरावा पहिन, और तेल न लगा; परन्तु ऐसी स्त्री बन जो बहुत दिन से मृतक के लिये विलाप करती रही हो। 3तब राजा के पास जाकर ऐसी ऐसी बातें कहना।” और योआब ने उसको जो कुछ कहना था वह सिखा दिया। 4जब तकोआ की वह स्त्री राजा के पास गई, तब मुँह के बल भूमि पर गिर दण्डवत् करके कहने लगी, “राजा की दोहाई।” 5राजा ने उससे पूछा, “तुझे क्या चाहिये?” उसने कहा, “सचमुच मेरा पति मर गया, और मैं विधवा हो गई। 6और तेरी दासी के दो बेटे थे, और उन दोनों ने मैदान में मारापीट की; और उनको छुड़ानेवाला कोई न था, इसलिये एक ने दूसरे को ऐसा मारा कि वह मर गया। 7अब सुन, सारे कुल के लोग तेरी दासी के विरुद्ध उठकर यह कहते हैं, ‘जिसने अपने भाई को घात किया उसको हमें सौंप दे, कि उसके मारे हुए भाई के प्राण के बदले में उसको प्राण दण्ड दें;’ और इस तरह वे वारिस को भी नष्‍ट करेंगे। इस तरह वे मेरे अंगारे को जो बच गया है बुझाएँगे, और मेरे पति का नाम और सन्तान धरती पर से मिटा डालेंगे।”

8राजा ने स्त्री से कहा, “अपने घर जा, और मैं तेरे विषय आज्ञा दूँगा।” 9तब तकोआ की उस स्त्री ने राजा से कहा, “हे मेरे प्रभु, हे राजा, दोष मुझी को और मेरे पिता के घराने ही को लगे; और राजा अपनी गद्दी समेत निर्दोष ठहरे।” 10राजा ने कहा, “जो कोई तुझ से कुछ बोले उसको मेरे पास ला, तब वह फिर तुझे छूने न पाएगा।” 11उसने कहा, “राजा अपने परमेश्‍वर यहोवा को स्मरण करे, कि खून का पलटा लेनेवाला और नाश करने न पाए, और मेरे बेटे का नाश न होने पाए।” उसने कहा, “यहोवा के जीवन की शपथ, तेरे बेटे का एक बाल भी भूमि पर गिरने न पाएगा।” 12तब स्त्री बोली, “तेरी दासी अपने प्रभु राजा से एक बात कहने पाए।” 13उसने कहा, “कहे जा।” स्त्री कहने लगी, “फिर तू ने परमेश्‍वर की प्रजा की हानि के लिये ऐसी ही युक्‍ति क्यों की है? राजा ने जो यह वचन कहा है, इस से वह दोषी सा ठहरता है, क्योंकि राजा अपने निकाले हुए को लौटा नहीं लाता। 14हम को तो मरना ही है, और हम भूमि पर गिरे हुए जल के समान ठहरेंगे, जो फिर उठाया नहीं जाता; तौभी परमेश्‍वर प्राण नहीं लेता, वरन् ऐसी युक्‍ति करता है कि निकाला हुआ उसके पास से निकाला हुआ न रहे।


हमें "प्रेम में सच्‍चाई से चलते हुए सब बातों को करना चाहिए” "मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।" और जब कोई किसी गलती में पड़ जाए, तो पवित्रशास्त्र की शिक्षाओं का पालन करना चाहिए। यह जोर इस बात का संकेत देता है कि हमें एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और एक-दूसरे को आगे बढ़ने में सहायता करनी चाहिए। परन्तु, हाल के वर्षों में हमने लगभग पूरी तरह से विश्राम, दया, सहनशीलता, करुणा, सहानुभूति और समानुभूति पर ही जोर दिया है। इन कोमल गुणों को समझना अच्छी बात है—परन्तु हमने इनका उपयोग गलत तरीके से किया है। पवित्रशास्त्र के अनुसार, हमें लोगों का सामना करना चाहिए, उन्हें उनके कामों के लिए जवाबदेह ठहराना चाहिए, और एक-दूसरे को चरित्र निर्माण में सहायता करनी चाहिए। न्याय "परमेश्‍वर के घराने से ही आरम्भ होता है।" हमने ऐसे लापरवाह मसीहियों की एक पीढ़ी तैयार कर दी है, जिनकी जीवन-शैली और व्यवहार के मानक संसार से बहुत अलग नहीं हैं। हम अपने व्यक्तिगत चरित्र में उतना विकास नहीं कर पाए हैं, जितना हम कर सकते थे।


बाइबल की व्याख्या बाइबल ही करती है। हर पाठ की व्याख्या इस बात को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए कि बाइबल के शेष हिस्सों में क्या कहा गया है। इससे हमें अतिवाद से बचने में सहायता मिलती है। उपवास पर उस दृष्टिकोण से विचार करें, जो बाइबल जेवनारों के बारे में बताती है। दया की व्याख्या उस दृष्टिकोण से करें, जो बाइबल जवाबदेही, न्याय और एक-दूसरे को सुधारने के बारे में बताती है। यह पाठ और अगला पाठ जवाबदेही पर केंद्रित हैं—इसलिए नहीं कि दया बाइबल-सम्मत नहीं है, बल्कि इसलिए कि दया पर आवश्यकता से ज्यादा या केवल उसी पर जोर देने से जवाबदेही की वह लगाम कमजोर पड़ जाती है, जिसकी हमें अपने व्यक्तिगत चरित्र को वैसा बनाने के लिए आवश्यकता है, जैसा परमेश्‍वर हमसे चाहता है।


1. योआब और तकोआ की स्त्री की योजना। वचन 1-4

योआब ने एक योजना बनाई, जिसके अधीन अबशालोम को उसके निर्वासन से वापस बुलाया जा सके और उसके अपराध को क्षमा कर दिया जाए। ऐसा इसलिए था, क्योंकि योआब को यह आभास हो गया था कि राजा दाऊद भी यही चाहता था। दाऊद का ऐसा चाहना गलत था, और योआब का इस मनचाही वापसी को बिना किसी न्यायिक दण्ड के पूरा करवाने की साजिश रचना भी गलत था। वचन 1 कहता है, "सरूयाह का पुत्र योआब ताड़ गया कि राजा का मन अबशालोम की ओर लगा है।" इसलिए योआब एक विस्तृत और कारगर योजना बनाने में जुट गया। उसे लगा कि दाऊद और अबशालोम के बीच की कड़वाहट अब खत्म हो गई है, और यदि वह अबशालोम के पाप को बिना दण्ड दिए छोड़ देता है और दाऊद को उसका भटका हुआ पुत्र वापस मिल जाता है, तो वह उन दोनों को प्रसन्न करके स्वयं भी ज्यादा सम्मान पा सकेगा। योआब समझता था कि अबशालोम लोगों का चहेता है, वह एक उभरता हुआ सितारा है, और दाऊद अपने पुत्र को दण्ड देने के बजाय उस पर दया दिखाने के लिए ज्यादा तैयार रहता है।


हमें नहीं पता कि योआब ने नातान के दृष्टांत के बारे में सुना था या नहीं, और यह भी नहीं पता कि उस दृष्टांत ने दाऊद को बतशेबा के साथ किए गए अपने पाप का एहसास मनाने में कितनी सहायता की थी। कुछ भी हो, उसने दाऊद के सामने एक भरोसेमंद व्यक्ति के द्वारा, एक भरोसेमंद कहानी प्रस्तुत करने की योजना बनाई। यह कहानी दाऊद के अबशालोम को यरूशलेम वापस न लाने के विषय से इतनी मिलती-जुलती थी कि राजा अपने ही शब्दों में फँस जाए। तकोआ की उस अनाम समझदार स्त्री ने अपनी कहानी इतनी अच्छी तरह से सुनाई कि राजा को लगा कि वह किसी वास्तविक घटना के बारे में सुन रही है, और उसने तुरन्त अपना दण्ड सुना दिया। इस दण्ड में उसने उस दोषी को—जो विधवा की कहानी में एक हत्यारा था—प्राथमिकता दी और उसे गलत तरीके से क्षमा कर दिया। योआब जानता था कि एक समझदार स्त्री द्वारा प्रभाव डालने वाले तरीके से सुनाई गई कोई दु:ख भरी कहानी दाऊद को भावनात्मक रूप से पिघला सकती है। इसलिए योआब और उस स्त्री ने एक चाल चलकर अबशालोम को यरूशलेम वापस लाने का बीड़ा उठाया। वचन 2-3 कहते हैं, “इसलिये योआब ने तकोआ नगर में दूत भेजकर वहाँ से एक बुद्धिमान स्त्री को बुलवाया, और उससे कहा, “शोक करनेवाली बन, अर्थात् शोक का पहिरावा पहिन, और तेल न लगा; परन्तु ऐसी स्त्री बन जो बहुत दिन से मृतक के लिये विलाप करती रही हो। तब राजा के पास जाकर ऐसी ऐसी बातें कहना।” और योआब ने उसको जो कुछ कहना था वह सिखा दिया।” उस स्त्री ने न केवल अच्छी तरह से बात की—जैसा कि हम जल्द ही देखेंगे—बल्कि उसने प्रभाव डालने वाले तरीके से अभिनय भी किया। वचन 4 कहता है, “जब तकोआ की वह स्त्री राजा के पास गई, तब मुँह के बल भूमि पर गिर दण्डवत् करके कहने लगी, “राजा की दोहाई।””


2. उस स्त्री द्वारा सुनाई गई कहानी। वचन 5-11

दाऊद जानता था कि परमेश्‍वर विधवाओं की आवश्यकताओं का ध्यान रखता है। भजन संहिता 68:5 कहता है, “परमेश्‍वर अपने पवित्र धाम में,

अनाथों का पिता और विधवाओं का न्यायी है।” हम कृतज्ञ हो सकते हैं कि किसी व्यक्ति न्यायी या राजा की तुलना में, परमेश्‍वर के कान और मन किसी विधवा की पुकार सुनने के लिए ज्यादा तत्पर रहते हैं। परन्तु फिर भी, दाऊद उसकी कहानी सुनकर पिघल गया। उस स्त्री की कहानी दया के लिए एक सीधा आग्रह थी, और उसके कहानी आरम्भ करने से पहले ही, राजा ने उसके लिए चीजें आसान बनाना आरम्भ कर दिया था; क्योंकि वचन 5 का आरम्भ इन शब्दों से होता है: "राजा ने उससे पूछा, "तुझे क्या चाहिये?""


उसने बताया कि उसका पति मर चुका है, और दुर्भाग्य से उसके दो बेटों में से एक ने दूसरे को मार डाला है; और अब वह अपने अन्तिम बचे हुए बेटे के प्राण बचाने की कोशिश कर रही है, जो कि हत्या का दोषी है। उसके कुछ दूसरे रिश्तेदार चाहते थे कि उसे भी मार दिया जाए। वर्षों पहले, रिबका को भी ऐसी ही एक समस्या का सामना करना पड़ा था। एसाव, याकूब को मार डालना चाहता था; इसलिए रिबका ने याकूब को वहाँ से भागने में सहायता की, जिससे याकूब के प्राण बच गए थे और एसाव हत्यारा बनने से भी बच गया। उसने याकूब से पूछा, "ऐसा क्यों हो कि एक ही दिन में मुझे तुम दोनों से रहित होना पड़े?" उस विधवा ने दाऊद को जो कहानी सुनाई, उस में और इस घटना में बहुत ज्यादा समानता थी—भले ही एसाव ने अभी तक याकूब को मारा नहीं था। उस विधवा का मानना ​​था कि उन्हें अपने अन्तिम बचे पुत्र की मृत्यु को हर हाल में रोकना होगा।


राजा ने पहले कहा कि वह एक आदेश जारी करेगा, जो उदारता से भरा होगा; परन्तु जब उस स्त्री ने जोर देकर कहा कि लहू का बदला लेने वाला उसके बचे हुए बेटे को मार न पाए, तो भी राजा ने उसे व्यवस्था के अनुसार उत्तर नहीं दिया—जो कि उसकी अपनी मंशा से कहीं ज्यादा कठोरी होती—बल्कि उसने स्वयं आगे बढ़कर यह प्रतिज्ञा की कि उसके बेटे का एक बाल भी बाँका नहीं होगा। उसने एक ऐसी प्रतिज्ञा की, जिसने उसे एक हत्यारे के विषय में न्याय के व्यवस्था को तोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। वचन 8-11 में कहा गया है: "राजा ने स्त्री से कहा, "अपने घर जा, और मैं तेरे विषय आज्ञा दूँगा।" तब तकोआ की उस स्त्री ने राजा से कहा, "हे मेरे प्रभु, हे राजा, दोष मुझी को और मेरे पिता के घराने ही को लगे; और राजा अपनी गद्दी समेत निर्दोष ठहरे।" राजा ने कहा, "जो कोई तुझ से कुछ बोले उसको मेरे पास ला, तब वह फिर तुझे छूने न पाएगा।" उसने कहा, "राजा अपने परमेश्‍वर यहोवा को स्मरण करे, कि खून का पलटा लेनेवाला और नाश करने न पाए, और मेरे बेटे का नाश न होने पाए।" उसने कहा, "यहोवा के जीवन की शपथ, तेरे बेटे का एक बाल भी भूमि पर गिरने न पाएगा।"" अंत में, उस स्त्री को वही मिला, जिसे वह चाहती थी—न केवल लहू का बदला लेने वाले से सुरक्षा, बल्कि यह भी कि राजा इस उद्देश्य के लिए यहोवा को पुकारेगा। जब राजा ने ठीक वैसी ही शपथ ली, जैसी वह स्त्री चाहती थी, जिससे वह फँस गया। (उसे अपने उस हत्यारे पुत्र—अबशालोम—को क्षमा करना पड़ा, जिसने अपने किए पर कोई पछतावा नहीं दिखाया था।)

वचन 9 में, उस स्त्री ने एक ऐसा प्रतिज्ञा की थी, जिसे करने का अधिकार उसे नहीं था। उसने कहा था कि यदि तू मेरे पुत्र को क्षमा कर देगा, तो राजा दोष-मुक्त रहेगा: "हे मेरे प्रभु, हे राजा, दोष मुझी को और मेरे पिता के घराने ही को लगे; और राजा अपनी गद्दी समेत निर्दोष ठहरे।" जब उसने कहा, "राजा अपनी गद्दी समेत निर्दोष ठहरे” तो वास्तव में वह यह दावा कर रही थी कि "दोष मैं अपने ऊपर ले लूँगी।" परन्तु क्या होता यदि बाद में राजा को पता चलता कि उस स्त्री ने कहानी को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया था? क्या सचमुच उसके पास राजा को दोष-मुक्त करने का अधिकार था? यदि हम ऐसी दया दिखाने की प्रतिज्ञा करते हैं, जिसका प्रतिज्ञा हमारा दयालु परमेश्‍वर भी नहीं करता, तो हम एक खतरनाक मार्ग पर कदम बढ़ा रहे होते हैं।

नातान के दृष्टांत अर्थात् कहानी ने दोषी दाऊद को उसके अपराध का बोध कराने का काम किया; दाऊद तब तक अपने अपराध को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। परन्तु योआब परमेश्‍वर का कोई भले जन नहीं था, जिसके पास परमेश्‍वर का कोई संदेश हो; उसकी कहानी का उद्देश्य उस स्त्री की कहानी में दोषी पुत्र को—और अबशालोम को भी—दोष-मुक्त करना था; न केवल उस विधवा का दोषी पुत्र—यदि सच में उसका कोई पुत्र था—बल्कि दाऊद का अपना दोषी पुत्र भी। अबशालोम, जो निश्‍चय दोषी था, उसने न तो कभी पश्‍चाताप किया और न ही कभी अम्नोन की हत्या के लिए पश्‍चाताप करेगा। एक कहानी—नातान की कहानी—ने वास्तविक दोषियों को उनके पाप का एहसास कराया, और दूसरी कहानी—योआब की कहानी—ने वास्तविक दोषियों को दोष-मुक्त कर दिया। इसमें जिम्मेदारी, न्याय और जवाबदेही कहाँ है? और परमेश्‍वर के सेवक के तौर पर अपने आत्म-विकास की हमारी अपनी कोशिशों के संदर्भ में, चरित्र का विकास या सुधार—या उसके होने की संभावना—कहाँ है, जब दोषियों को उनके पापों के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता?


इस बातचीत की एक दूसरी व्याख्या यह भी हो सकती है कि दाऊद ने उस विधवा के पुत्र और अपने स्वयं के पुत्र के साथ उदारता दिखाकर सही किया। वह स्त्री शायद इस सोच के साथ दया की गुहार लगा सकती थी, "हे महाराज, दयापूर्ण दण्ड सुनाने के इस अच्छे कारण पर ध्यान दे। स्मरण कर कि तेरा परमेश्‍वर प्रभु यहोवा कितना कृपालु और दयालु है। स्मरण कर कि प्रभु यहोवा ने तुझे ऊरिय्याह के लहू के पाप के लिए कैसे क्षमा किया था। जिस राजा पर दया की गई, अब वह भी दूसरों पर दया दिखाए।" हाँ, यह सोच अपनाई जा सकती थी, परन्तु तब हमें यह भी स्मरण रखना होगा कि दाऊद को इसलिए क्षमा किया गया, क्योंकि उसने पूरे मन से पश्‍चाताप किया था। अबशालोम ने ऐसा नहीं किया था, और न ही कभी करेगा।


फिर भी, चार बातें ऐसी हैं, जो यह इशारा करती हैं कि यह दया दिखाने का नहीं, बल्कि न्याय करने का समय था। पहली बात, पवित्रशास्त्र स्वयं कहता है, "न्याय का काम करना धर्मी को तो आनन्द, परन्तु अनर्थकारियों को विनाश ही का कारण जान पड़ता है" (नीतिवचन 21:15) और यशायाह 26:9-10 कहता है, "रात के समय मैं जी से तेरी लालसा करता हूँ, मेरा सम्पूर्ण मन यत्न के साथ तुझे ढूँढ़ता है। क्योंकि जब तेरे न्याय के काम पृथ्वी पर प्रगट होते हैं, तब जगत के रहनेवाले धर्म को सीखते हैं। दुष्‍ट पर चाहे दया भी की जाए तौभी वह धर्म को न सीखेगा; धर्मराज्य में भी वह कुटिलता करेगा, और यहोवा का माहात्म्य उसे सूझ न पड़ेगा।।" दूसरी बात, दाऊद कमजोर प्रमाणित हुआ, क्योंकि उसने अपने बेटों को सुधारा नहीं। उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी उसकी थी, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। दूसरे वचन दिखाते हैं कि दाऊद ने उनके साथ उदारता दिखाकर अपनी सन्तान का भला नहीं किया। उदाहरण के लिए, 1 राजा 1:6 में, अबशालोम के छोटे भाई अदोनिय्याह के बारे में कहा गया है, “(उसके पिता ने जन्म से लेकर उसे कभी यह कहकर उदास न किया था, “तू ने ऐसा क्यों किया।” वह बहुत रूपवान था, और अबशालोम के बाद उसका जन्म हुआ था)।” तीसरी बात, शरण-नगर उपलब्ध थे और उनमें अनजाने में हुई हत्याओं से निपटने के लिए परमेश्‍वर द्वारा तय की हुई एक व्यवस्था थी। विधवा की कहानी में जो जवान था, वह लड़ाई कर रहा था। यह कोई दुर्घटना में हुई मृत्यु नहीं थी। और न ही अबशालोम की हत्या अनजाने में हुई थी। चौथी बात, जैसे-जैसे अबशालोम की वापसी की कहानी आगे बढ़ती है, यह पता चलता है कि यदि दाऊद ने अबशालोम को इतनी “दया” दिखाने के बजाय कठोरता से सुधारा होता, तो दाऊद और पूरे इस्राएल को बहुत दु:ख—एक गृहयुद्ध—से बचाया जा सकता था। ऐसी “दया” वास्तव में दया नहीं है; यह कमजोरी है और इसके कारण केवल अबशालोम को ही दु:ख नहीं उठाना पड़ा।


3. जवाबदेही पर और अधिक विचार करना।

यहेजकेल 34:10 सीधे तौर पर आत्मिक अगुवों से बात करता है। यह कहता है, “परमेश्‍वर यहोवा यों कहता है : देखो, मैं चरवाहों के विरुद्ध हूँ; और मैं उनसे अपनी भेड़–बकरियों का लेखा लूँगा, और उनको फिर उन्हें चराने न दूँगा; वे फिर अपना अपना पेट भरने न पाएँगे। मैं अपनी भेड़–बकरियाँ उनके मुँह से छुड़ाऊँगा कि आगे को वे उनका आहार न हों।” चरवाहों के सामने जो विषय थे, वे उन विषयों से बहुत ज्यादा अलग थे, जो दाऊद के सामने थे। चरवाहे किसी न किसी तरह से भेड़ों का दुरुपयोग कर रहे थे, जबकि दाऊद उस पाप को हल्के में अनदेखा कर रहा था, जिसके लिए दण्ड मिलना चाहिए था। परन्तु यह तथ्य कि परमेश्‍वर अपने चरवाहों—आत्मिक अगुवों—को जवाबदेह ठहराता है, आज भी न्याय के पक्ष में तर्क के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जब पाप बिना दण्ड के रह जाता है। यदि जिम्मेदारी के ऐसे क्षेत्र उपस्थित है, जिनका चरवाहों ने उल्लंघन किया है, और परमेश्‍वर उनसे अप्रसन्न है और स्पष्ट रूप से उन्हें जवाबदेह ठहराने वाला है, तो आज के चरवाहे यहेजकेल से कौन से सबक सीख सकते हैं, जो हमें भेड़ों के स्वामी—परमेश्‍वर—को अधिक प्रसन्न करने में सहायता करेगा? हम निश्‍चित रूप से उसकी अप्रसन्नता से बचना चाहते हैं और अपनी पूरी क्षमता से उसे प्रसन्न करना चाहते हैं।

हम यहेजकेल के समय के चरवाहों को धार्मिकता से भरे रोष के साथ देखने से स्वयं को रोक नहीं पाते, और साथ ही, झुंड को उदारता से भरी करुणा के साथ देखते हैं। परमेश्‍वर, भविष्यद्वक्ता के द्वारा, यहाँ दोनों भावनाओं को उच्च कोटि में व्यक्त करता है; और यहेजकेल 34:7 और 9 में चरवाहों को प्रभु यहोवा का वचन सुनने के लिए—इस वचन को सुनने के लिए—बुलाया गया है। उन्हें सुनने दो कि वह उन लोगों को कितना कम महत्व देता है, जिन्होंने स्वयं को बहुत बड़ा समझा था, और वह उस झुंड को कितना अधिक महत्व देता है, जिसे उन्होंने कुछ भी नहीं समझा था; ये दोनों बातें उनके लिए विनम्रता लाने वाली होंगी। जो लोग प्रभु यहोवा का वचन सुनकर उससे मार्गदर्शन प्राप्त नहीं करेंगे, उन्हें अंततः प्रभु यहोवा का वह वचन सुनना ही पड़ेगा, जो उनके विनाश की घोषणा करेगा। यहाँ यहेजकेल 34 के वचन 6-10 दिए गए हैं, जो हमें वचन 10 के लिए एक संदर्भ प्रदान करते हैं, जिसे हमने ऊपर पढ़ा था। “6मेरी भेड़–बकरियाँ तितर–बितर हुई हैं; वे सारे पहाड़ों और ऊँचे ऊँचे टीलों पर भटकती थीं; मेरी भेड़–बकरियाँ सारी पृथ्वी के ऊपर तितर–बितर हुईं; और न तो कोई उनकी सुधि लेता था, न कोई उनको ढूँढ़ता था। 7”इस कारण, हे चरवाहो, यहोवा का वचन सुनो : 8परमेश्‍वर यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, मेरी भेड़–बकरियाँ जो लुट गईं, और मेरी भेड़–बकरियाँ जो चरवाहे के न होने के कारण सब वनपशुओं का आहार हो गईं; और इसलिये कि मेरे चरवाहों ने मेरी भेड़–बकरियों की सुधि नहीं ली, और मेरी भेड़–बकरियों का पेट नहीं, अपना ही अपना पेट भरा; 9इस कारण हे चरवाहो, यहोवा का वचन सुनो, 10परमेश्‍वर यहोवा यों कहता है : देखो, मैं चरवाहों के विरुद्ध हूँ; और मैं उनसे अपनी भेड़–बकरियों का लेखा लूँगा, और उनको फिर उन्हें चराने न दूँगा; वे फिर अपना अपना पेट भरने न पाएँगे। मैं अपनी भेड़–बकरियाँ उनके मुँह से छुड़ाऊँगा कि आगे को वे उनका आहार न हों।’”


यहेजकेल के दिनों में, परमेश्‍वर अपने चरवाहों से अप्रसन्न था। उनके अपराध बार-बार दोहराए गए। परमेश्‍वर का झुंड पहले उन धोखेबाजों का शिकार बना, जिन्होंने उन्हें मूर्तिपूजा की ओर खींचा, और फिर उन विनाश करने वालों का, जो उन्हें बंदी बनाकर ले गए; और इन चरवाहों ने न तो पहली बात को रोकने की कोई परवाह की और न ही दूसरी को; वे ऐसे थे, मानो वहाँ कोई चरवाहे थे ही नहीं; और इसलिए परमेश्‍वर ने वैसे ही बात की जैसा मैंने अभी-अभी पढ़े गए वचनों में पढ़ा है, और शपथ के साथ इस बात की पुष्टि की कि वह चरवाहों के विरुद्ध है। उन्हें परमेश्‍वर की ओर से झुंड को चराने का काम सौंपा गया था, और उन्होंने अपने कामों में इस नाम का उपयोग यह आशा करते हुए किया, कि परमेश्‍वर उनके साथ खड़ा रहेगा। “नहीं,” परमेश्‍वर कहता है, “ऐसा होने के बजाय, मैं उनके विरुद्ध हूँ।” केवल चरवाहों का नाम और अधिकार रखने से ही परमेश्‍वर हमारे पक्ष में खड़ा होने, हमारी रक्षा करने, हमारी सुरक्षा करने और हमें आशीष देने के लिए बाध्य नहीं हो जाता। यदि हम वह काम नहीं करते, जिसे परमेश्‍वर हमसे चाहता है, और उस भरोसे के प्रति विश्‍वासयोग्य नहीं रहते, जो परमेश्‍वर ने हम पर किया है, तो परमेश्‍वर हमारे विरुद्ध हो जाएगा। यहेजकेल ने कहा कि उन चरवाहों से इस बात का लेखा-जोखा लिया जाएगा, कि उन्होंने अपने भरोसे को किस तरह पूरा किया है। वचन 10 निश्‍चित रूप से जितना स्पष्ट है, उतना ही सशक्त भी है: “मैं चरवाहों के विरुद्ध हूँ; और मैं उनसे अपनी भेड़–बकरियों का लेखा लूँगा, और उनको फिर उन्हें चराने न दूँगा; वे फिर अपना अपना पेट भरने न पाएँगे। मैं अपनी भेड़–बकरियाँ उनके मुँह से छुड़ाऊँगा कि आगे को वे उनका आहार न हों।”

कुछ चरवाहों को न्याय के दिन बहुत कुछ का उत्तर देना पड़ेगा, यदि वे आत्माओं की देखभाल की जिम्मेदारी तो ले लेते हैं, परन्तु वास्तव में उनकी कोई देखभाल नहीं करते। पास्टरों को ऐसे जागते रहना और काम करना चाहिए, जैसे उन्हें लेखा-जोखा देना है; जैसा कि इब्रानियों 13:17 में कहा गया है: “अपने अगुवों की आज्ञा मानो और उनके अधीन रहो, क्योंकि वे उनके समान तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते हैं जिन्हें लेखा देना पड़ेगा; वे यह काम आनन्द से करें, न कि ठंडी साँस ले लेकर, क्योंकि इस दशा में तुम्हें कुछ लाभ नहीं।” यहेजकेल के वचन के अनुसार, चरवाहों का काम और आमदनी छिन जाएगी। उन्हें झुंड को खिलाना बंद करना होगा—या शायद मुझे कहना चाहिए कि उन्हें झुंड को खिलाने का दिखावा करना बंद करना होगा। परमेश्‍वर के लिए यह उचित और न्यायसंगत है कि वह उन लोगों के हाथों से वह सारी शक्ति छीन ले, जिसका उन्होंने दुरुपयोग किया है, और वह सारा भरोसा तोड़ दे, जिसे उन्होंने धोखा दिया है। यदि यहेजकेल के समय के चरवाहों को बस यही दण्ड मिलता, तो शायद वे इसे किसी तरह सह लेते; परन्तु इसमें यह भी जोड़ा गया है: “मैं अपनी भेड़–बकरियाँ उनके मुँह से छुड़ाऊँगा कि आगे को वे उनका आहार न हों।” यदि हम परमेश्‍वर द्वारा हमारी देखभाल में सौंपे गए भेड़ों का उपयोग अपने लाभ के लिए करते हैं, बजाय उनकी देखभाल करने के, तो परमेश्‍वर अपनी भेड़ों के कारण स्वयं दखल देगा। परमेश्‍वर हर उस व्यक्ति के विरुद्ध है, जो जनसेवा के लाभों से स्वयं को समृद्ध कर रहा है और यह आशा करता है कि उसे सदैव ऐसा करने की अनुमति मिलती रहेगी। न ही परमेश्‍वर सदैव अपने लोगों को उन लोगों द्वारा रौंदे जाने की अनुमति देगा, जिन्हें उनका सहारा बनना चाहिए था; बल्कि वह एक ऐसा समय अवश्य लाएगा, जब वह उन्हें चरवाहों—जो उनके झूठे मित्र हैं—और साथ ही शेरों—जो उनके खुले शत्रु हैं—दोनों से बचाएगा। भेड़ों को शेरों से भागना तो आता है, परन्तु उन्हें उन चरवाहों से भागना नहीं आता, जो भेड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं, जबकि भेड़ें अपने भोलेपन में उन चरवाहों पर भरोसा करती हैं।


योआब और दाऊद स्पष्ट तौर पर इस बात को लेकर चिन्तित थे कि यदि अबशालोम इस्राएल लौट आया, तो लोग क्या सोचेंगे। तकोआ की स्त्री की कहानी के द्वारा दाऊद को मनाने की योआब की युक्ति इसी बात की ओर इशारा करती है। वास्तव समस्या यह है कि उन सभी को इस बात की ज्यादा चिंता होनी चाहिए थी कि परमेश्‍वर क्या सोचता है।


दाऊद को अपने बेटों को जवाबदेह ठहराने के लिए स्वयं भी जवाबदेह और जिम्मेदार बनना आवश्यक था। इस कहानी में हमें अम्नोन और अबशालोम से जुड़ा एक दु:खद प्रसंग देखने को मिलता है। इनमें से किसी का भी ऐसा हश्र होना आवश्यक नहीं था। इसे टाला जा सकता था। आपके बच्चों के बारे में क्या कहा जाए? उन्हें जवाबदेह ठहराने की आपकी अपनी जवाबदेही के बारे में क्या कहा जाए? और आपकी भेड़ों के बारे में क्या कहा जाए? क्या वे आपके पास सुरक्षित हैं? आप उसकी भेड़ों के साथ जो कुछ भी करते हैं, क्या उसके लिए आप 'अच्छे चरवाहे' के प्रति जवाबदेह हैं?