चरित्र का विकास

अध्याय अट्ठानवे


2 शमूएल 14:12-20

Ron Meyers

पिछले वचनों में, तकोआ की एक स्त्री ने एक कहानी सुनाई थी—जो वास्तव में एक दृष्टांत या कहानी निकली। अब वह उस बात का सार बताती है, जिसे वह कहना चाहती है। यदि आप उस कहानी से परिचित नहीं हैं, तो मेरा सुझाव है कि इसे पढ़ने से पहले आप पाठ सँख्या 97, 'जवाबदेही' को पढ़ लें।


12तब स्त्री बोली, “तेरी दासी अपने प्रभु राजा से एक बात कहने पाए।” 13उसने कहा, “कहे जा।” स्त्री कहने लगी, “फिर तू ने परमेश्‍वर की प्रजा की हानि के लिये ऐसी ही युक्‍ति क्यों की है? राजा ने जो यह वचन कहा है, इस से वह दोषी सा ठहरता है, क्योंकि राजा अपने निकाले हुए को लौटा नहीं लाता। 14हम को तो मरना ही है, और हम भूमि पर गिरे हुए जल के समान ठहरेंगे, जो फिर उठाया नहीं जाता; तौभी परमेश्‍वर प्राण नहीं लेता, वरन् ऐसी युक्‍ति करता है कि निकाला हुआ उसके पास से निकाला हुआ न रहे। 15अब मैं जो अपने प्रभु राजा से यह बात कहने को आई हूँ, इसका कारण यह है, कि लोगों ने मुझे डरा दिया था; इसलिये तेरी दासी ने सोचा, ‘मैं राजा से बोलूँगी, कदाचित् राजा अपनी दासी की विनती को पूरी करे। 16नि:सन्देह राजा सुनकर अवश्य अपनी दासी को उस मनुष्य के हाथ से बचाएगा जो मुझे और मेरे बेटे दोनों को परमेश्‍वर के भाग में से नष्‍ट करना चाहता है।’ 17अत: तेरी दासी ने सोचा, ‘मेरे प्रभु राजा के वचन से शान्ति मिले;’ क्योंकि मेरा प्रभु राजा परमेश्‍वर के किसी दूत के समान भले–बुरे में भेद कर सकता है; इसलिये तेरा परमेश्‍वर यहोवा तेरे संग रहे।” 18राजा ने उत्तर देकर उस स्त्री से कहा, “जो बात मैं तुझ से पूछता हूँ उसे मुझ से न छिपा।” स्त्री ने कहा, “मेरा प्रभु राजा कहे जाए।” 19राजा ने पूछा, “इस बात में क्या योआब तेरा संगी है?” स्त्री ने उत्तर देकर कहा, “हे मेरे प्रभु, हे राजा, तेरे प्राण की शपथ, जो कुछ मेरे प्रभु राजा ने कहा है, उससे कोई न दाहिनी ओर मुड़ सकता है और न बाईं ओर। तेरे दास योआब ही ने मुझे आज्ञा दी, और ये सब बातें उसी ने तेरी दासी को सिखाई हैं। 20तेरे दास योआब ने यह काम इसलिये किया कि बात का रंग बदले। और मेरा प्रभु परमेश्‍वर के एक दूत के तुल्य बुद्धिमान् है, यहाँ तक कि धरती पर जो कुछ होता है उन सब को वह जानता है।”


1. कहानी का सार। वचन 12-17

स्त्री को और अधिक बोलने की अनुमति मिल गई। “तब स्त्री बोली, “तेरी दासी अपने प्रभु राजा से एक बात कहने पाए।” 13उसने कहा, “कहे जा।” इस प्रकार, स्त्री ने सत्य और उसके गलत प्रयोग के मिश्रण के साथ अपनी बात आगे बढ़ाई। वचन 13-14 कहते हैं, "उसने कहा, “कहे जा।” स्त्री कहने लगी, “फिर तू ने परमेश्‍वर की प्रजा की हानि के लिये ऐसी ही युक्‍ति क्यों की है? राजा ने जो यह वचन कहा है, इस से वह दोषी सा ठहरता है, क्योंकि राजा अपने निकाले हुए को लौटा नहीं लाता। हम को तो मरना ही है, और हम भूमि पर गिरे हुए जल के समान ठहरेंगे, जो फिर उठाया नहीं जाता; तौभी परमेश्‍वर प्राण नहीं लेता, वरन् ऐसी युक्‍ति करता है कि निकाला हुआ उसके पास से निकाला हुआ न रहे।" योआब जानता था कि स्थिति क्या है—यह कि दाऊद उस प्रतिभाशाली, परन्तु निकम्मे अबशालोम के बारे में सोच रहा है; इसलिए उसने एक ऐसी चतुर कहानी गढ़ी, जो वास्तविक स्थिति से बहुत ज्यादा मिलती-जुलती थी, और उसे एक ऐसी विधवा के मुँह से कहलवाया, जिस पर दाऊद को दया आ सकती थी। स्त्री ने दाऊद को एक जाल में फंसा लिया था—क्योंकि उसने न्याय को दरकिनार करने और उसके दोषी पुत्र को क्षमा करने का वचन दे दिया था।


उस बुद्धिमान स्त्री की बात राजा के हृदय में गहराई तक उतर गई। उसने राजा की शपथ को उसी के विरुद्ध प्रयोग किया, और उससे यह अपेक्षा की कि वह अपने ही दोषी और पश्‍चाताप-हीन पुत्र को—अपने "निर्वासित" पुत्र को—वापस बुला ले। उसने यह संकेत दिया कि मानवीय शक्ति तब सबसे अधिक प्रबल होती है, जब दोषी को दण्ड न दिया जाए; तब सबसे अधिक उत्तम होती है, जब दण्डों को समाप्त कर दिया जाए; और तब सबसे अधिक प्रशंसनीय होती है, जब भटके हुए लोगों को पुनः स्वीकार कर लिया जाए। वह भी, हर पीढ़ी के उन अनगिनत लोगों की तरह, यह नहीं समझ पाई कि परमेश्‍वर में न्याय को बनाए रखते हुए भी दया दिखाने की पूर्ण सामर्थ्य है।


अब, एक क्षण के लिए, उस विधवा के "दो पुत्रों" वाले रूपक को और अबशालोम की बात को भी एक ओर रख दीजिए। आइए, एक पल के लिए हम इससे मिलने वाले ईश-वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर विचार करें। वे "निर्वासित" लोग कौन हैं? इस स्त्री ने उस बड़ी और भयानक सच्चाई को अपने मन में बिठा लिया कि पाप का परिणाम परमेश्‍वर से अलगाव होता है। ये लोग आवश्यक नहीं कि कोई बड़े अपराधी हों, बल्कि पूरी मानव-जाति इसमें शामिल है। जैसे कैन को देश निकाला दिया गया था और वह भाग गया था, वैसे ही अब अबशालोम भी भाग गया था और उसे भी देश निकाला दे दिया गया था। इसलिए हम सभी लोग, सामान्य तौर पर, और समय-समय पर हम में से हर कोई, उस पवित्र परमेश्‍वर की उपस्थिति से दूर भागते रहते हैं और हमें देश निकाला भी मिल जाता है; वह परमेश्‍वर जो भलाई से प्रेम करता है और बुराई से घृणा करता है। हम परमेश्‍वर के निकट, हर्ष और शांति से तब तक नहीं रह सकते, जब तक हम पाप से दूर न हों।


परमेश्‍वर का प्रेम हमें कभी नहीं छोड़ेगा, इसलिए वह सदैव हमारे लिए उपस्थित रहता है, परन्तु हमारा पाप इसमें रुकावट डालता है। धातु की दो चिकनी और सपाट प्लेटें आपस में चिपक सकती हैं, निकट आ सकती हैं, परन्तु यदि उनके बीच रेत आ जाए, तो वे एक-दूसरे के साथ मेल-मिलाप से नहीं रह पातीं; वे एक-दूसरे से रगड़ खाती हैं। इसी तरह, हमारा पाप हमें परमेश्‍वर से अलग कर देता है। वह हमारे पाप का विरोध करता है और हम उसकी पवित्रता से दूर भागते हैं। हम दोनों ही स्थितियों में होते हैं—हम भाग भी रहे होते हैं और हमें देश निकाला भी मिला होता है—और ये दोनों ही स्थितियाँ हमारे अपने द्वारा ही पैदा की हुई होती हैं; ये हमारी ही गलती होती है। अलगाव पैदा करने वाली इस समस्या को तब तक हल करना आवश्यक है, जब तक कि सही तरीके से मेल-मिलाप न हो जाए।


अब वापस दाऊद की दुविधा पर आते हैं। दाऊद अबशालोम का राजा था, इसलिए उसे व्यवस्था और न्याय का भी ध्यान रखना था; परन्तु दाऊद अबशालोम का पिता भी था, और उसका मन अपने पुत्र के लिए तड़प रहा था। देश निकाला पाया हुआ पुत्र भी आखिर पुत्र ही होता है, जिसके लिए एक प्रेम करने वाला पिता सदैव तड़पता रहता है। केवल वही लोग परमेश्‍वर के सच्चे "पुत्र" कहलाने के योग्य हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने पाप से मुक्ति दिलाई हो; क्योंकि एक व्यापक अर्थ में, हमारा स्वर्गीय पिता—ठीक दाऊद की तरह—अपने देश निकाला पाए हुए बेटों और बेटियों के साथ मेल-मिलाप करने के लिए तड़पता है। उसने एक ऐसा तरीका रचा है, जिससे वह अपने न्याय के सिद्धान्तों को भी पूरा कर सके और उन्हें वापस अपने पास बुलाकर, उन्हें अपने सच्चे पुत्र और पुत्रियाँ बना सके।


परमेश्‍वर का प्रेम उन सबसे बुरे, सबसे अयोग्य और सबसे ज्यादा बलवा करने वाले लोगों तक भी पहुँचता है, जो किसी दूर-दराज के स्थान पर भटक रहे होते हैं। वह देश निकाला पाए हुए पापी की मृत्यु नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि वह अपने पापों से मुँह मोड़ ले, पश्‍चाताप करे और एक नई जीवन की चाल चलें—केवल जीवन ही नहीं, बल्कि एक भरपूर और आनन्दित जीवन की। परमेश्‍वर उन्हें वापस अपनाना चाहता है, परन्तु वह यह काम सही तरीके से ही करना चाहता है।


उस स्त्री के दृष्टांत में, वह 14वें वचन में वह ऐसी कहती है कि "वरन् (परमेश्‍वर) ऐसी युक्‍ति करता है कि निकाला हुआ उसके पास से निकाला हुआ न रहे।" परमेश्‍वर देश निकाला पाए हुए लोगों को वापस लाने और उनके साथ अपने रिश्ते को फिर से जोड़ने के लिए लगातार काम करता रहता है। वह न केवल पुत्र को भौगोलिक रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले आता है, बल्कि मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और आपसी रिश्तों के कारण भी मनों को एक-दूसरे से दूर करने के बजाय, एक-दूसरे के निकट ले आता है। और वह उस समस्या से भी प्रभाव डालने वाले तरीके से निपटता है, जिसके कारण से वास्तव में यह निष्कासन हुआ था—अर्थात् पाप। यह एक बहुत बड़ा काम था, जिसके लिए परमेश्‍वर को "मार्ग निकालना" पड़ा। दाऊद ने निष्कासित व्यक्ति को वापस तो बुलाया, परन्तु सही रीति से नहीं। परमेश्‍वर ने यह काम किया और बिल्कुल सही रीति से किया—जिसके लिए यीशु को अपने प्राण देकर मूल्य चुकाया।


विधवा के विषय से स्पष्ट तौर पर वही प्राप्त हुआ, जिसे योआब और विधवा चाहते थे, और अब वह समय आ गया था, जब इसे अबशालोम पर लागू किया जाए। राजा आश्‍चर्यचकित तो दिखा, परन्तु ऐसा नहीं लगा कि वह इस बात से क्रोधित था कि लोगों की आवाज—अर्थात् कहानी सुनाने वाली वह स्त्री—वास्तव में उसके अपने प्रिय पुत्र के पक्ष में ही दलील दे रही थी। उसने गलती से यह मान लिया था कि अबशालोम की घटना भी बिल्कुल उसके पुत्र जैसा ही है। इसलिए, यदि राजा मेरे पुत्र की रक्षा करेगा, तो वह अपने पुत्र की भी रक्षा करेगा और उसे वापस बुला लेगा।


स्पष्ट है, राजा उसकी समझदारी और व्यवहार से प्रसन्न था। परन्तु, अबशालोम की घटना उसकी कहानी से बहुत अलग थी। अबशालोम एकलौता पुत्र नहीं था। उसने अपने भाई को मेहमानों के सामने, खाने की मेज पर, जान-बूझकर और लंबे समय से चली आ रही शत्रुता के चलते, दो वर्ष तक सोच-विचार करने के बाद मार डाला था। अबशालोम ने अपने भाई को किसी अचानक से आए क्रोध में नहीं मारा था, बल्कि पुरानी शत्रुता के चलते मारा था; उसने यह काम किसी खुले मैदान में नहीं किया था, जहाँ कोई गवाह न हो, बल्कि खाने की मेज पर, अपने सभी मेहमानों के सामने किया था। तकोआ की उस स्त्री के ये शब्द कि, "हम को तो मरना ही है," निश्‍चय एक अतिशयोक्ति वाला कथन था। हाँ, हम मरेंगे और अम्नोन भी कभी न कभी मर ही जाता, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं था कि अबशालोम द्वारा किया गया घात क्षमा योग्य हो जाएगा। अबशालोम को अपने स्वयं के निर्वासन में छोड़ देना अम्नोन को वापस जीवित नहीं ला सकता था। हाँ, परन्तु यह कोई अच्छा बचाव नहीं है। हत्या तो हत्या ही होती है और उसके लिए जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।

2. योआब की भूमिका का उजागर होना। वचन 18-20

राजा को शक था कि इस विषय में योआब का हाथ है, और उस स्त्री ने भी मान लिया कि ऐसा ही है। भला कोई स्त्री—तकोआ की एक सामान्य वासी, जो यहूदिया के ग्रामीण क्षेत्र में बैतलहम से ज्यादा दूर नहीं रहती थी—राज्य के राजनीतिक विषयों में क्यों शामिल होना चाहेगी? उस स्त्री ने तुरन्त और सार्वजनिक रूप से यह बात मान ली। वचन 19ब-20अ में कहा गया है, "हाँ, तेरे दास योआब ही ने मुझे आज्ञा दी, और ये सब बातें उसी ने तेरी दासी को सिखाई हैं। तेरे दास योआब ने यह काम इसलिये किया कि बात का रंग बदले।" शायद वह यह इशारा कर रही थी कि यदि दाऊद को यह विचार अच्छा लगा हो, तो इसका श्रेय योआब को ही दिया जाए; और यदि यह विचार बुरा लगा हो, तो भी इसकी जिम्मेदारी योआब पर ही डाली जाए। हालाँकि, इस बात की ज्यादा संभावना है कि वह योआब को उस काम का श्रेय दे रही थी, जो राजा को पसन्द आने वाला था। इसलिए, उसके लिए सच बोलना आसान था। योआब हालात बदलना चाहता था। बहुत बढ़िया! तो फिर, अबशालोम को पश्‍चाताप करने दे।


परन्तु, यहाँ एक समस्या थी—आजकल सामान्य लोगों की सोच का पूरा झुकाव एक ऐसे सतही और सस्ते सुसमाचार की ओर है, जो बोलता है—"अरे, बिल्कुल! परमेश्‍वर भी वैसे ही क्षमा कर देता है, जैसे दाऊद ने क्षमा किया था। क्या परमेश्‍वर प्रेम का ही रूप नहीं हैं? क्या परमेश्‍वर हमारा पिता नहीं है?" लोग यह भूल जाते हैं कि परमेश्‍वर से क्षमा पाने की मार्ग में कई बड़ी-बड़ी रुकावटें आती हैं। वह सुसमाचार, जो यह कहता है कि "परमेश्‍वर अवश्य क्षमा कर देगा!" यह सुनने में बहुत ही उदारता से भरा हुआ लगता है, परन्तु वास्तव में यह नि:सन्देह क्रूरता से भरा है। ऐसा सुसमाचार व्यक्तिगत जिम्मेदारी की भावना को कम कर देता है, जवाबदेही को खत्म कर देता है और लोगों को—ठीक वैसे ही जैसे उसने अबशालोम को किया था—लापरवाही से भरी महत्वाकांक्षा की ओर ले जाता है। व्यक्तिगत विकास की संभावना और क्षमता लगभग पूरी तरह से समाप्त हो जाती है। यह चुकाने के लिए बहुत बड़ा मूल्य है। जवाबदेही, चरित्र विकास और जिम्मेदारी की भावना के बिना समाज भ्रष्ट हो जाएगा। आज हमारी चुनौती—हे परमेश्‍वर के जन, हे परमेश्‍वर की पुत्री—यह है कि हम जवाबदेही, चरित्र विकास और व्यक्तिगत जिम्मेदारी कैसे सिखाएँ, जब हमारे आस-पास का पूरा समाज दया, सहनशीलता, स्वीकृति और व्यक्तिगत आत्म-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा है और उन पर जोर दे रहा है? पवित्रशास्त्र में जिन आदर्शों को स्थिर रखा गया है और सिखाया गया है, और हमारे आस-पास के गैर-मसीही समाज में जिन आदर्शों का उत्सव दिलाया जाता है और जिनकी प्रशंसा की जाती है, उनके बीच एक बहुत बड़ी खाई विद्यमान है।


3. प्रायश्‍चित और चरित्र विकास पर विचार करना।

पतन के समय मानवीय आत्मा का विनाश भयानक और बहुत बड़ा था, परन्तु हम इसकी तुलना उन आश्‍चर्यकर्मों से कर सकते हैं, जिन्होंने मानवीय आत्मा के लिए प्रायश्‍चित और बहाली या पुनर्स्थापन का काम किया—जो कहीं ज्यादा बड़े थे। कुछ ही पलों में एक बम किसी भवन को नष्ट कर सकता है। परन्तु उस भवन को बहाल करने या फिर से बनाने में कई वर्षों की योजना, खर्च, निर्माण और पूर्णता का समय लगता है। पुनर्स्थापन अर्थात् बहाली में विनाश की तुलना में ज्यादा परिश्रम लगता है। विनाश आसान है; पुनर्स्थापन कठिन है। उस वाटिका में, सर्प के द्वारा हव्वा को अपने जाल में फँसाने, उसे धोखा देने और उसे वर्जित फल खाने के लिए लुभाने में बस कुछ ही पल लगे थे। परन्तु थोड़ा सा देखिए कि उस नुकसान की भरपाई करने के लिए क्या-क्या करना पड़ा: परमेश्‍वर का पुत्र एक व्यक्ति बना, वह उन्हीं मार्गों पर चला, जिन पर हम चलते हैं, हमारे इस गंदे और दूषित वातावरण में उसने एक पवित्र और परिपूर्ण जीवन जिया, क्रूस पर अपनी मृत्यु के समय उसने अकथनीय पीड़ा सही, और फिर वह मृतकों में से जी उठा। मनुष्य को फिर से वैसा ही बनाने के लिए—जैसा वह पहले था—परमेश्‍वर ने उसके उद्धार, छुटकारे, बचाव, प्रायश्‍चित, चंगाई, सुधार, पुनर्स्थापन और नवीनीकरण के लिए जो आश्‍चर्यकर्म किए, उनमें कहीं ज्यादा परिश्रम लगा। वास्तव में, यह शैतान के विनाशकारी काम की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ी उपलब्धि थी। चरित्र विकास इसी दूसरी श्रेणी में आता है—जो ज्यादा कठिन और ज्यादा मूल्यवान है। चरित्र विकास—जिसकी कमी अम्नोन, अबशालोम और अदोनिय्याह में थी—उसे ही परमेश्‍वर आप में भी विकसित करना चाहता है, ताकि आप उसके औजारों के बक्से में एक ज्यादा उपयोगी औजार, उसके शस्त्रागार में एक ज्यादा तेज हथियार, और उनकी सेना में एक सर्वोत्तम सैनिक बन सकें। मैं सेवा करने की हमारी क्षमता की बहाली की तुलना, प्रायश्‍चित के माध्यम से आत्मा की बहाली से करना चाहता हूँ। परमेश्‍वर पुनर्स्थापित करता है। परमेश्‍वर योद्धाओं का निर्माण करता है। परमेश्‍वर अच्छे लोगों और स्त्रियों को और भी सर्वोत्तम पुरुष और स्त्री बनाता है।

तकोआ की स्त्री ने, दाऊद से उसके पुत्र अबशालोम को वापस बुलाने की बात करते हुए, बड़ी होशियारी से अपनी बात रखी। राजा को अपनी कहानी या दूसरे शब्दों में दृष्टांत के जाल में फंसाने के बाद, उसने बहुत ही प्रभाव डालने वाले शब्दों में उससे विनती की। हमें उसके बात रखने के इस चतुर तरीके की सराहना करनी चाहिए, भले ही इसका परिणाम एक दोषी अपराधी को रिहा करने की आग्रह से ज्यादा कुछ नहीं था। उसने कुछ इस तरह विनती की: “यह सच है कि अबशालोम ने अपने भाई अम्नोन को मार डाला, परन्तु फिर भी उसके प्राण छोड़ दे, और उसे देश-निकाले से वापस लौटने की अनुमति दे। जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता; मृत्यु तो सभी के लिए लिखी है, और किसी न किसी तरह हम सभी को भूमि पर गिरे हुए पानी जैसा बन जाना है, जिसे फिर से इकट्ठा नहीं किया जा सकता। मरे हुए भाई की मृत्यु के बदले में, जीवित भाई को मारकर मरे हुए व्यक्ति को वापस जीवित नहीं किया जा सकता; इसलिए अबशालोम पर दया कर, और अपने वारिस को मृत्यु की दण्ड देकर, इस्राएल की आशा की चिंगारी को बुझा न दे। न्याय के अनुसार तुझे कोई अपवाद नहीं करना चाहिए, और न ही परमेश्‍वर ऐसा करता है; परन्तु फिर भी, अपनी असीम दया से, परमेश्‍वर ने एक ऐसा मार्ग बनाया है, जिससे कोई भी हत्यारा, जो शरणार्थी बन गया हो, 'शरण-नगर' में तब तक रहकर अपने घर वापस लौट सकता है, जब तक कि महायाजक की मृत्यु न हो जाए।” दाऊद को यह बात अच्छी तरह पता थी कि महायाजक की मृत्यु होने पर, वे हत्यारे, जिन्होंने अनजाने में किसी के प्राण लिए हो और जिन्हें शरण के लिए निर्धारित किए गए नगरों में रहने के लिए स्थान मिला हो, उन्हें वापस अपने घर जाने और अपनी भूमि पर पूरा अधिकार पाने की अनुमति मिल जाती थी। महायाजक की मृत्यु से, मारे गए लोगों के बदला लेने वाले रिश्तेदारों का अधिकार खत्म हो जाता था, जिससे कि हत्यारा अब दूसरे इस्राएलियों के साथ समाज में स्वतंत्रता के साथ घूम सके और परमेश्‍वर की सार्वजनिक आराधना में हिस्सा ले सके। वह आगे दावा करती है कि परमेश्‍वर ने ऐसे तरीके बनाए हैं, जिनसे उसके निर्वासित लोग सदैव के लिए उससे दूर न रहें; हे दाऊद, तुझे भी ऐसा ही करना चाहिए। हालाँकि अबशालोम कुछ समय के लिए भाग गया था और निर्वासन में रहा था, फिर भी अपने पुत्र पर दया कर और उसे वापस बुला ले। वह बिना किसी पश्‍चाताप की शर्त के, आसानी से क्षमा देने की गुहार लगा रही थी। उसके तर्क दोषपूर्ण थे और दो मुख्य तरीकों से अबशालोम के विषय पर लागू नहीं होते थे। 'शरण नगर' अनजाने में हुई हत्या के लिए एक प्रावधान था। परन्तु अबशालोम एक जान-बूझकर की गई हत्या करने वाला व्यक्ति था। और दूसरी बात, अबशालोम को अपने किए का कोई पश्‍चाताप नहीं था।


आइए, 'शरण नगरों' से जुड़े विचारों की सही व्याख्या और उनके सही अनुप्रयोग पर संक्षेप में दृष्टि डालें।


जब इन विचारों को हमारे जीवन पर सही ढंग से लागू किया जाता है, तो वे प्रायश्‍चित और उद्धार के बाद, 'नए सृष्टि' के माध्यम से लोगों और स्त्रियों के चरित्र में होने वाले सुधार और पुनर्स्थापन अर्थात् बहाली को दर्शाते हैं। परमेश्‍वर द्वारा अपने निर्वासित लोगों को वापस बुलाने के लिए अपनाए गए ये तरीके—यह आशीषित विचारशीलता और रचनात्मकता ही है—जो पहले उद्धार को, और फिर चरित्र-निर्माण को संभव बनाती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्‍वर द्वारा प्रदान किए गए इन तरीकों से, जो कुछ खो गया था, वह अब वापस मिल जाता है—या मैं कहूँ कि उसे वापस पाया जा सकता है—बशर्ते हम अपने इस विशेषाधिकार का उपयोग करें; इस तरह हम पहले बचाए जा सकते हैं और फिर सिद्ध बनाए जा सकते हैं। एक विद्रोही जाति के सदस्य होने के नाते, हम सभी के विरुद्ध परमेश्‍वर ने दोष-सिद्धि का एक बड़ा और सार्वभौमिक दण्ड सुनाया है। हम सभी ने उसकी व्यवस्था को तोड़ा है; हमने जान-बूझकर और दुष्टतापूर्ण ढंग से स्वर्ग के महिमामय शासन के विरुद्ध विद्रोह किया है। इसलिए, अपनी स्वाभाविक अवस्था में, हम निर्वासित लोग हैं—हम उसकी प्रेम और कृपा से वंचित हैं—और हम उस समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब उसके क्रोध का दण्ड पूरा होगा और "हे समस्त शापित लोगों, यहाँ से चले जाओ!"—ये शब्द बिजली की चमक की तरह हमारी आत्माओं को झकझोर देंगे। तथापि, सदा-के लिए-धन्य परमेश्‍वर ने ऐसे तरीके बनाए हैं, जिनके द्वारा हम निर्वासन की इस अवस्था से छुटकारा पा सकते हैं; और ये तरीके बहुत ज्यादा हद तक वैसे ही हैं, जिनका वर्णन 'तकोआ' की उस स्त्री ने किया था। उसने यीशु मसीह को हमारे लिए एक 'शरण नगर' और एक 'महायाजक' के रूप में नियुक्त किया है; और ठीक वही घटना हमारे साथ भी घटित होती है, जो अनजाने में हत्या करने वाले व्यक्ति के साथ घटित होती थी।


तो, उस हत्यारे के साथ आखिर क्या होता था? सबसे पहले, जैसे ही वह अनजाने में किसी व्यक्ति की हत्या कर बैठता था—और यह जानता था कि मृतक के निकट-संबंधी अर्थात् वारिस बदला लेने के लिए उसका पीछा कर सकते हैं—वह तुरन्त भागकर निकटतम 'शरण नगर' में पहुँच जाता था। और जब वह एक बार उस नगर के फाटकों तक पहुँच जाता था, तो वह पूरी तरह सुरक्षित हो जाता था। ठीक इसी प्रकार, प्रभु यीशु मसीह भी हमारे लिए वह एक शरण-नगर था, और हम उसकी ओर भाग सकते हैं। शायद आपको वह पल स्मरण हो, जब आप फाटक से गुजरे और उस उद्धार के भीतर सुरक्षित हो गए, जिसे परमेश्‍वर ने ठहराया था। लहू के बदला लेने वाले से सुरक्षित महसूस करना एक सुखद अनुभव था। यह जानना भी अत्यंत आनन्ददायक है कि पाप हमारा पीछा तो कर सकता है, परन्तु वह हमें मार नहीं सकता; यीशु का लहू हमारे और दण्ड के बीच एक दीवार बनकर खड़ा है। अब हम अपने 'प्रतिनिधि' के द्वारा परमेश्‍वर के क्रोध से सुरक्षित हैं।

हालाँकि सुरक्षित होते हुए भी, हत्यारे को 'शरण नगर' की सीमाओं के भीतर ही रहना पड़ता था। वह नगर की सीमाओं के भीतर एक तरह का 'पैरोल अर्थात् अस्थाई अवकाश पर रिहा कैदी' था; यदि वह किसी भी उद्देश्य से, या किसी भी बहाने से नगर की सीमाओं से बाहर जाता, तो वह ऐसा अपने जोखिम पर करता था, और जिस व्यक्ति की उसने हत्या की थी, उसके किसी भी रिश्तेदार द्वारा मारे जाने का खतरा उस पर बना रहता था। व्यवस्था उसकी रक्षा केवल तभी तक करती थी, जब तक वह उसके लिए निर्धारित सुरक्षित स्थान के भीतर रहता था। यह निर्वासन वर्षों तक चल सकता था, और हो सकता है कि वह हत्यारा अपने पैतृक गाँव और अपनी पारिवारिक भूमि से दूर ही मर जाए। परन्तु यदि ऐसा होता कि महायाजक की मृत्यु हो जाती, तो उसे और उन सभी अन्य लोगों को, जिन्होंने नगर की दीवारों के भीतर शरण ली थी, अब उस शरण की आवश्यकता नहीं रहती थी। वे अब किसी भी प्रकार के प्रतिशोध को लिए जाने से मुक्त हो जाते थे; वे मारे जाने के किसी भी जोखिम के बिना अपने घरों को लौट सकते थे, और उनकी स्वतंत्रता अब पूर्ण हो जाती थी। परन्तु उन्हें 'शरण नगर' में रहना पड़ता था, और हमें 'मसीह' में बने रहना चाहिए। हम न केवल यीशु के लहू के द्वारा सुरक्षित हैं, बल्कि उससे भी कहीं सर्वोत्तम बात यह है कि हम पाप से मुक्त हो गए हैं। अब हम उन लोगों की तरह नहीं हैं, जिन्हें दण्ड से बचाने के लिए कहीं बंद करके रखा गया हो, बल्कि हम उन निर्दोष ठहराए गए लोगों की तरह हैं, जिन पर अब कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता; हम अब पूरी स्वतंत्रता के साथ घूमते फिरते हैं। अब हमें किसी भी प्रकार के दण्ड या दोषारोपण का कोई भय नहीं है, क्योंकि हमारे 'महायाजक' की मृत्यु हो चुकी है। तो फिर, उस अनजाने में हत्या करने वाले व्यक्ति क्या करता है?


वह अपने घर लौट जाता है, और यदि उसकी अनुपस्थिति के दौरान किसी ने उसकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया था, तो वह अपनी उस संपत्ति को पुनः प्राप्त कर लेता है। यदि दाख की डालियाँ और अंजीर के वृक्ष बिना छंटाई किए रह गए थे, तो उसने उन्हें फिर से संवारा और छाँटा जाता था। यदि खेत ऊँट-कटारों से भर गए होते थे, तो उसने उन्हें फिर से जोतना आरम्भ कर दिया जाता था। जब पवित्र पर्वों का समय आता था, तो वह व्यक्ति—जो पहले एक निर्वासित जीवन जी रहा था—अब उन विशाल जनसमूह के साथ मिलकर पवित्र दिन मना सकता था, और उसे 'लहू का बदला लेने वाले' द्वारा आक्रमण किए जाने का कोई भय नहीं रहता था। अब उस पर किसी भी प्रकार के 'लहू-दोष' का कलंक नहीं रहता था; महायाजक की मृत्यु ने उसे विधिपूर्वक शुद्ध कर दिया था, और उसे उपासकों की भीड़ में शामिल होने का अधिकार दे दिया था। वह अब फिर से स्वयं को विकसित करने और आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र था।


हम इसे 'पवित्रीकरण' या 'चरित्र-निर्माण' कह सकते हैं। दोनों में से कोई भी शब्द हमें यह समझने में सहायता करेगा कि जब हम छुड़ाए जाते हैं और यीशु में एक नई सृष्टि बन जाते हैं, तो हम में यीशु का स्वरूप दिखाई देने लगता है; और धीरे-धीरे, जैसे-जैसे पवित्र आत्मा हमें निखारता चला जाता है, यीशु का स्वरूप और भी ज्यादा पूर्णता और स्पष्टता के साथ दिखाई देता है। हम दूसरों के लिए एक ज्यादा दयालु, समझदार, सहानुभूति रखने वाले और भले अगुवा बन जाते हैं। अबशालोम (और उन जैसे सभी लोग) पर तरस आता है, जिन्हें यह व्यक्तिगत विकास कभी अनुभव नहीं होगा, क्योंकि उसे (और उन्हें भी) अनुचित क्षमा मिली—बिना किसी आधार के दोष-मुक्ति, लोगों की दृष्टि में अच्छा नाम—परन्तु उसके दुष्ट हृदय की बुराई (और उनके दुष्ट हृदयों की बुराई) कभी दूर नहीं हुई और न कभी होगी। और यहीं पर विश्‍वासी—अर्थात्, विकासशील मसीही अगुवे—का आनन्द निहित है।


यदि हम अपना विकास करना चाहते हैं, तो हमें पश्‍चाताप करना सीखना होगा और परमेश्‍वर को हमें भीतर से बाहर तक निखारने देना होगा। यही वह चरित्र-निर्माण है, जो धर्मी और प्रभावशाली मसीही अगुवों को तैयार कर सकता है। इसका अर्थ है कि हम अपने पापों का सामना करें, जिम्मेदारी से काम करें, स्वयं को जवाबदेह ठहराएँ, पश्‍चाताप करें, सुधार करें और आगे बढ़ते रहें।