सामर्थी

अध्याय दो


प्रेरितों के काम 7:17-29

Ron Meyers

17”परन्तु जब उस प्रतिज्ञा के पूरे होने का समय निकट आया जो परमेश्‍वर ने अब्राहम से की थी, तो मिस्र में वे लोग बढ़ गए और बहुत हो गए। 18तब मिस्र में दूसरा राजा हुआ जो यूसुफ को नहीं जानता था। 19उसने हमारी जाति से चालाकी करके हमारे बापदादों के साथ यहाँ तक बुरा व्यवहार किया, कि उन्हें अपने बालकों को फेंक देना पड़ा कि वे जीवित न रहें। 20उस समय मूसा उत्पन्न हुआ। वह परमेश्‍वर की दृष्‍टि में बहुत ही सुन्दर था। वह तीन महीने तक अपने पिता के घर में पाला गया। 21जब फेंक दिया गया तो फ़िरौन की बेटी ने उसे उठा लिया, और अपना पुत्र करके पाला। 22मूसा को मिस्रियों की सारी विद्या पढ़ाई गई, और वह वचन और कर्म दोनों में सामर्थी था। 23”जब वह चालीस वर्ष का हुआ, तो उसके मन में आया कि मैं अपने इस्राएली भाइयों से भेंट करूँ। 24उसने एक व्यक्‍ति पर अन्याय होते देखकर उसे बचाया, और मिस्री को मारकर सताए हुए का पलटा लिया। 25उसने सोचा कि उसके भाई समझेंगे कि परमेश्‍वर उसके हाथों से उनका उद्धार करेगा, परन्तु उन्होंने न समझा। 26दूसरे दिन जब वे आपस में लड़ रहे थे, तो वह वहाँ आ निकला; और यह कहके उन्हें मेल करने के लिये समझाया, ‘हे पुरुषो, तुम तो भाई–भाई हो, एक दूसरे पर क्यों अन्याय करते हो?’ 27परन्तु जो अपने पड़ोसी पर अन्याय कर रहा था, उसने उसे यह कहकर हटा दिया, ‘तुझे किसने हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया है? 28क्या जिस रीति से तू ने कल मिस्री को मार डाला मुझे भी मार डालना चाहता है?’ 29यह बात सुनकर मूसा भागा और मिद्यान देश में परदेशी होकर रहने लगा, और वहाँ उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए।


स्तिफनुस ने महासभा के सामने अपना बचाव में तर्क देने में लाभ उठाने के लिए मूसा की कहानी का उपयोग किया। इन वचनों में वह मूसा को इस्राएल के उद्धारक के रूप में उठाने का उल्लेख करता है। स्तिफनुस पर अभी-अभी मूसा के विरुद्ध निन्दा से भरे हुए शब्द बोलने का आरोप लगाया गया था, जिसके उत्तर में वह यहाँ उसके बारे में बहुत ज्यादा सम्मानपूर्वक बात करता है। मूसा का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब इस्राएल पर सताव सबसे गंभीर था, विशेष रूप से नवजात इस्राएली दास बालकों की हत्या के उस सबसे क्रूर उदाहरण मेंः "उस समय मूसा उत्पन्न हुआ। वह परमेश्‍वर की दृष्‍टि में बहुत ही सुन्दर था। वह तीन महीने तक अपने पिता के घर में पाला गया।" मूसा स्वयं खतरे में था, जैसे ही वह संसार में आया (जैसा कि हमारा उद्धारकर्ता भी बैतलहम में था) कि वह फ़िरौन, जो यूसुफ को नहीं जानता था, की लहू वाली राजाज्ञा के लिए एक बलिदान बन गया। फिर भी परमेश्‍वर अपने लोगों के छुटकारे के लिए तैयारी कर रहा था, जब उनका मार्ग अंधेरा था, और उन पर संकट गहरा था। "मूसा परमेश्‍वर की दृष्‍टि में बहुत ही सुन्दर था।" शायद जन्म लेते ही उसका चेहरा चमकने लगा था, जो उस सम्मान के एक सुखद संकेत था, जिसे परमेश्‍वर ने उसे देने की मंशा की थी। शायद यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की तरह उसे गर्भ से ही एक ईश्‍वरीय उद्देश्य के लिए अलग किया गया था और इसने उसे परमेश्‍वर की दृष्टि में सुंदर बना दिया। संभवतः उसके माता-पिता ने भी अपने विश्‍वास की आँखों से देखा कि वह विशेष था। एक पुरानी कहावत है, "हर बूढ़ा कौवा सोचता है कि वही सबसे काला है" दूसरे शब्दों में अंधों में काना राजा अर्थात् सभी माता-पिता सोचते हैं कि उनका बच्चा विशेष है, परन्तु अम्राम और योकेबेद के पास वास्तव में ऐसा मानने का एक विशेष कारण था। परमेश्‍वर की दृष्टि में पवित्रता की सुंदरता बहुत ज्यादा मूल्यवान है और शायद उन्होंने इसे अपने तीसरे बालक मूसा में देखा था। वह अपने बचपन में, सबसे पहले, अपने माता-पिता की कोमल देखभाल में अद्भुत रूप से संरक्षित था, जिन्होंने उसे अपने घर में तीन महीने तक पालन-पोषित किया, जब तक कि वे हियाव रख सकते थे। फिर दूसरी बात, जैसा कि हमने देखा है, वह एक अनुकूल ईश्‍वरीय प्रावधान द्वारा संरक्षित था, जिसने उसे फ़िरौन की पुत्री की बाहों में जाल दिया, जिसने उसे उठाया, और उसे अपने पुत्र के रूप में पालन-पोषित किया। वचन 21 में कहा गया है, "जब फेंक दिया गया तो फ़िरौन की बेटी ने उसे उठा लिया, और अपना पुत्र करके पाला।" वह एक बड़े काम के लिए उसकी देखभाल में आगे की तैयार थी। जिन्हें परमेश्‍वर एक विशेष तरीके से उपयोग करने के लिए तैयार करता है, उनका वह विशेष ध्यान रखेगा। फ़िरौन के घराने में मूसा एक बड़ा विद्वान बन गया, जैसा कि वचन 22 हमें बताता है। "मूसा को मिस्रियों की सारी विद्या पढ़ाई गई, और वह वचन और कर्म दोनों में सामर्थी था।" मूसा ने मिस्रवासियों के ज्ञान और बुद्धि को सीखा, जो उस समय सभी प्रकार के परिष्कृत साहित्य, विशेष रूप से दर्शन, खगोल विज्ञान और चित्रलिपि के लिए प्रसिद्ध थे। मिस्र के दरबार में यह शिक्षा प्राप्त करने के बाद मूसा को सभी कलाओं और विज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों, शिक्षकों और वार्तालापों द्वारा स्वयं को सुधारने का अवसर मिला। इसके अतिरिक्त, स्पष्ट है कि उसके पास ज्ञान के उस विशाल खजाने की सराहना करने और समझने में सक्षम दिमाग था। हालाँकि, हमारे लिए यह सोचना संभव है कि वह अब तक उसने अपने पूर्वजों के परमेश्‍वर को भूल नहीं था कि वह मिस्र के जादूगरों के अनैतिक अध्ययन और प्रथाओं से स्वयं को परिचित करा सके, जो उसके विरुद्ध प्रभावी ढंग से बहस करने में सक्षम होने के लिए आवश्यक था। फ़िरौन की पुत्री के पुत्र के रूप में वह स्पष्ट रूप से मिस्र के शासन में प्रधान मंत्री बन जाए। ऐसा लगता है कि इसका अर्थ उसके "वचन और कर्म दोनों में सामर्थी" होने से है, जैसा कि स्तिफनुस ने कहा। मूसा स्वयं बाद में कहता कि उसके पास स्वयं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने की क्षमता नहीं थी। यह सच हो सकता है कि मूसा अपने बारे में ऐसा कहे, हालाँकि दूसरों का कहना था कि वह वचन और कर्मों में सामर्थी था। दोनों ही विषयों में, स्पष्ट है, भले ही वह हकलाता था, फिर भी उसने सराहनीय रूप से अच्छी समझ से बात की, और उसने जो कुछ भी कहा वह सहमति का आदेश देता था, और वह ऐसा अपने स्वयं के प्रमाण और तर्क की शक्ति के साथ करता था। हम कह सकते हैं कि सामान्य तौर पर, यदि कोई और हो तो उसके समय में बहुत कम लोग इतने साहस और सफलता के साथ बोलते थे। इस तरह वह प्राकृतिक और मानवीय सहायता से उन सेवाओं के लिए तैयार किया गया था, जो उसे करने के लिए परमेश्‍वर के पास हैं, जिसमें आखिरकार, उसे ईश्‍वरीय प्रकाश के बिना पूरी तरह से सुसज्जित नहीं किया जा सकता था। स्तिफनुस यह प्रकट करता है कि, महासभा में सताने वालों के दुर्भावनापूर्ण आरोपों के बावजूद, वह स्वयं मूसा के बारे में उतनी ही उच्च और सम्मानजनक राय रखता था, जितनी कि उनके पास थी। आइए अब स्तिफनुस के "वचन और कर्म दोनों में सामर्थी" के संदर्भ को समझने की कोशिश करें। हम संक्षेप में धर्मनिरपेक्ष साहित्य की ओर मुड़ते हैं।

जोसीफुस का जन्म एक याजकीय परिवार में हुआ था और वह 37 ईस्वी से 100 ईस्वी के ठीक बाद तक जीवित रहा। अपने जीवन के पहले भाग में उसे जोसीफुस बेन मैटियास, एक यहूदी याजक, सेनापति और कैदी के रूप में जाना जाता था और अपने जीवन के दूसरे भाग में वह रोमी नागरिक और लेखक फ्लेवियस जोसीफुस था। हम देखेंगे कि उसका एक लेखन, "यहूदियों का पुरावशेष” सृष्टि से लेकर यहूदियों द्वारा रोमियों के विरुद्ध लड़े गए युद्धों तक यहूदी इतिहास के बारे में जानकारी देने का एक अतिरिक्त-बाइबल स्रोत प्रदान करता है। इस पाठ में हमारे उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए, जोसीफुस हमें यह समझने में सहायता करता है कि मूसा कैसा था, वह स्तिफनुस के शब्दों में उसके समय में, "वचन और कर्म दोनों में सामर्थी" था।


वाक्याँश, "वचन और कर्म दोनों में सामर्थी" प्रेरितों के काम 7:23 में मिलता है। स्पष्ट है, थर्मुथिस, (या बित्याह) फ़िरौन की निःसन्तान पुत्री ने मूसा को गोद लिया और उसकी परवरिश की। एक सन्तान के रूप में यह पता चलता है कि मूसा में सीखने की तीव्र योग्यता थी। जब बालक अभी छोटा ही था, तो उसने उसे अपने पिता की गोद में रख दिया और उसने उसे अपने गले लगा लिया। एक धर्मी शास्त्री ने भविष्यद्वाणी की कि यह बालक मिस्र के लिए नाश का कारण होगा और उसे मार दिया जाना चाहिए, परन्तु फ़िरौन अपने परिवार के उस एकमात्र सदस्य को, जो राजा बन सकता था, मौत के घाट उतरते हुए नहीं देखना चाहता था। इसलिए इसके बजाय मूसा को बहुत अधिकाई के साथ मिस्र की शिक्षा दी गई। उस समय के यहूदियों को आशा थी कि मूसा उनके लिए बड़े काम करेगा, परन्तु मिस्र के लोगों को उस पर सन्देह था।


जोसीफुस यह कहना जारी रखता है कि बाद में मूसा ने अपनी नेतृत्व क्षमताओं को दिखाया, जब इथियोपियाई, दक्षिण के पड़ोसियों ने मिस्र पर आक्रमण किया और खजाने को लूट कर ले गए। युद्ध के मैदान में मिस्र के लोग इथियोपियाई लोगों के लिए कोई मुकाबला नहीं थे। अपनी सफलताओं से प्रोत्साहित होकर, इथियोपियाई लोगों ने अपना अभियान उत्तर में मेम्फिस और भूमध्य सागर तक जारी रखा, जिसमें एक भी नगर उनका विरोध करने में सक्षम नहीं था। इस पर मिस्रवासियों ने उनकी दैव्य वाणियों और भविष्यद्वाणियों की खोज की और फिर उनसे मूसा इब्री का उपयोग करने के लिए कहा। राजा ने अपनी पुत्री से उसे पैदा करने की माँग की और उसे मिस्र की सेना का सेनापति बनाया गया।


इससे पहले कि इथियोपियाई इस विकास के बारे में जानते, मूसा ने अपने सैनिकों का नेतृत्व दक्षिण की ओर किया, जैसा कि सामान्य रूप से पर नदी द्वारा नहीं, बल्कि भूमि द्वारा किया जाता था। वह उस क्षेत्र में रहने वाले कई सांपों पर काबू पाने के लिए एक विशेष रणनीति का उपयोग करके ऐसा करने में सक्षम हुआ। अन्य लोग उस मार्ग से गुजरने में विफल रहे थे, परन्तु मूसा ने दक्षिण की ओर कूच करने वाली सेना के उस मार्ग से गुजरने से पहले भूमि को साफ करने के लिए "बांज" पक्षियों का उपयोग किया, जो सांपों के शत्रु थे। इस तरह मूसा और उसकी सेना इथियोपियाई लोगों को उनके आक्रमण से आश्‍चर्यचकित करने में सक्षम हो गईं, उन्हें परास्त कर दिया, कई नगरों को उखाड़ फेंका और कईयों को मार डाला। इसलिए इथियोपियाई, मूसा के अधीन मिस्रियों द्वारा किए जा रहे विनाश से बचने की कोशिश में, जब वह भूमि को नष्ट कर रहा था, एक दूरदराज के क्षेत्र में स्थित शाही नगर सबा में पीछे हट गए। सबा अन्य नदियों के साथ-साथ नील नदी की प्राकृतिक सुरक्षा से घिरा हुआ था, जिससे यहाँ तक पहुँचना मुश्किल हो गया था। इस प्राकृतिक सुरक्षा को एक बड़ी दीवार द्वारा और अधिक बढ़ाया गया था, ताकि नदियों को पार करने पर भी दीवार शत्रु को बाहर और भीतर रहने वालों को सुरक्षित रखे।


जैसे ही मूसा स्वयं को बुद्धिमानी से इन कठिनाइयों को पार करते हुए दीवारों के पास ले जाने में व्यस्त कर रहा था, वह सफलतापूर्वक लड़ता हुआ दिखाई दिया, इथियोपियाई राजा की पुत्री थार्बिस ने मूसा की गतिविधियों को देखा। उसने सही ढंग से सोचा कि वह मिस्रवासियों की सफलताओं का लेखक था, और उसके उपक्रमों की सूक्ष्मता की प्रशंसा करते हुए, महसूस किया कि इथियोपियाई बहुत ज्यादा खतरे में थे। उसे उससे प्रेम हो गया और उस भावना से प्रेरित होकर उसने अपने सभी सेवकों में से सबसे विश्‍वासयोग्य को विवाह की संभावना पर विचार करने के लिए विश्‍वासयोग्य सरदार को मूसा के पास भेजा। उसने उसके प्रस्ताव को इस शर्त पर स्वीकार कर लिया कि वह गारंटी देगी कि नगर उसे स्वीकार कर लेगा, उसे आश्‍वासन दिया कि जब वह नगर पर कब्जा कर लेगा, तो वह उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करेगा। जोसीफुस लिखते हैं, "यह समझौता बहुत जल्द हो गया, और तुरन्त लागू हो गया; जब मूसा ने इथियोपियाई लोगों को परास्त कर दिया, तो उसने परमेश्‍वर को धन्यवाद दिया, और अपने विवाह को पूरा किया, और मिस्रियों को उनके अपने देश में वापस ले गया। (यहूदियों का पुरावशेष, अध्याय नौ) यह बाइबल के हम विश्‍वासियों के लिए पर्याप्त रूप से प्रदर्शित करता है कि मूसा, व्यवहार को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक कौशल के रूप में, वचन और कर्म में वास्तव में सामर्थी था। स्तिफनुस ने सही ही कहा था।

जल्द ही इस श्रृँखला में हम मूसा को अपने बल पर एक इस्राएली दास की रक्षा करने के प्रयास के निर्गमन वृत्तांत की जाँच करेंगे, स्पष्ट रूप से, उन सभी को मुक्त करने की दिशा में एक दृष्टिकोण के साथ। हालाँकि, इस प्रयास को ठुकरा दिया गया, क्योंकि गुलाम मूसा पर भरोसा नहीं करना चाहता था। उस कहानी में इसे मूसा की ओर से धार्मिकता भरे आत्म-त्याग के कार्य के रूप में दर्शाया गया है। प्रेरितों के काम 7:23 में कहा गया है, "जब वह चालीस वर्ष का हुआ, तो उसके मन में आया कि मैं अपने इस्राएली भाइयों से भेंट करूँ।" मूसा ने, मिस्र के दरबार में अपनी प्राथमिकता के समय के प्रमुख समय में इस, "निर्णय" को लिया। बल्कि मुझे सन्देह है कि यह उसके मन में इसलिए आया, क्योंकि परमेश्‍वर ने इसे वहाँ उसके मन में रखा था। परन्तु मूसा गलत मार्ग पर चला गया, वह डर गया कि लोगों को इसका पता चल जाएगा और मिस्र से भाग गया और चालीस वर्ष तक वापस नहीं आया। फिर भी, आइए हम इस तथ्य के बारे में सोचें कि "उसके मन में आया कि मैं अपने इस्राएली भाइयों से भेंट करूँ।" इसका मतलब यह है कि वह यह देखना चाहता था कि वह किस तरह से उनकी कोई भी सेवा कर सकता है, ताकि वह स्वयं को एक सार्वजनिक व्यक्ति के रूप में, एक सार्वजनिक चरित्र के साथ - इस्राएल को छुटकारे देने वाले के रूप में दिखा सके। इस इच्छा को उसने एक सताए गए इस्राएली का बदला लेने के द्वारा प्रदर्शित किया, उसने उस मिस्रवासी को मार डाला, जिसने उसके साथ दुर्व्यवहार किया, जैसा कि प्रेरितों के काम 7:24 में वर्णित है। "उसने एक व्यक्‍ति पर अन्याय होते देखकर उसे बचाया, और मिस्री को मारकर सताए हुए का पलटा लिया।" वह पीड़ित के प्रति करुणा से प्रेरित था, और गलत करने वाले पर न्यायपूर्ण आक्रोश में था, जैसा कि सार्वजनिक स्थानों में पुरुषों को होना चाहिए, और "इसलिए वह उसके बचाव में गया और मिस्री को मारकर उसका पलटा लिया।" यदि वह केवल एक निजी व्यक्ति होता और सार्वजनिक मन वाला नहीं होता, तो उसने ऐसा करने की कोशिश भी नहीं की होती। उसने स्पष्ट तौर पर महसूस हुआ कि स्वर्ग से मिला उसका आदेश उसे सही प्रमाणित करेगा; और उसने सोचा कि उसके भाई—जिन्हें अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा के बारे में कुछ न कुछ जानकारी तो अवश्य रही होगी कि, जो भी जाति उन्हें सताएगी, परमेश्‍वर उसका न्याय करेगा—वह समझ जाएँगे कि परमेश्‍वर उसी के हाथों उन्हें छुटकारा दिलाएगा। यदि वह व्यक्तिगत रूप से आश्‍वस्त नहीं होता कि उसके पास ऐसा अधिकार और ईश्‍वरीय सामर्थ है, तो वह जो करता है, उसे करने के लिए उसके पास मन या शरीर की शक्ति नहीं हो सकती थी। किसी दृढ़ बात ने उसे प्रेरित किया होगा। यदि वे समय के संकेतों को समझते, तो वे इसे अपने छुटकारे के दिन की सुबह के रूप में ले लेते, परन्तु अभी समय नहीं आया था।

 वे मूसा के बुलाहट या मंशा को नहीं समझ पाए। न ही मूसा ने पूरी तरह से इसे समझ पाया था। उन्होंने इसे उस रूप में नहीं लिया, जैसा कि सोचा गया था, एक मानक की स्थापना के लिए, और तुरही की ध्वनि के साथ, मूसा को अपने उद्धारक और इस्राएल के न्यायी की घोषणा करने के लिए। उसने अगले ही दिन अपनी इच्छा का एक प्रदर्शन दिया, दो झगड़ालू इब्रियों के बीच एक बहस की मध्यस्थता करने की पेशकश में, जिसमें मूसा ने स्पष्ट रूप से एक सार्वजनिक चरित्र ग्रहण किया, जैसा कि प्रेरितों के काम 7:26 में दिखाया गया है, "दूसरे दिन जब वे आपस में लड़ रहे थे, तो वह वहाँ आ निकला; और यह कहके उन्हें मेल करने के लिये समझाया, ‘हे पुरुषो, तुम तो भाई–भाई हो, एक दूसरे पर क्यों अन्याय करते हो?'" जब वे लड़ रहे थे, तो उसने स्वयं को उनके सामने दिखाया, और शायद बहुत अधिक वैभव और अधिकार का प्रयोग किया। उसने समस्या को सुलझा लिया होता और मानो कि उनके राजकुमार ने उनके बीच के विवाद को यह कहते हुए निर्धारित किया होता, 'श्रीमान, तुम दोनों जन्म से आपस में भाई हो, और हमारे इब्री विश्‍वास के अनुसार; तुम एक-दूसरे के साथ अन्याय क्यों करते हो? क्योंकि उसने देखा होगा कि, अधिकांश संघर्षों की तरह, दोनों पक्षों में एक की गलती थी; और इसलिए, शांति और मित्रता बनाने के लिए, एक पारस्परिक छूट और सहानुभूति होनी चाहिए। जब मूसा ने अपने बल पर स्वयं को मिस्र से इस्राएल का मुक्तिदाता बनाया, तो उसने मिस्रवासी को मार डाला, और सोचा कि वह स्वयं मिस्र के हाथों से इस्राएल को बचा सकता है। पर वह असफल रहा।


परन्तु 40 वर्ष बाद जब वह अंततः इस्राएल के न्यायी और व्यवस्था देने वाला बनने वाला था, जब परमेश्‍वर ने उसे परिपक्व होने में सहायता की थी, तो उन्होंने ज्यादातर नरमी से (संयोग से, कुछ अपेक्षाओं के कारण, जिसे पाने के लिए वे योग्य थे) सोने के राजदंड के साथ शासन किया, न कि लोहे के दंड के साथ। जब वे बहस करते थे, तो उसने उन्हें घात नहीं किया और नहीं मारा, परन्तु उन्हें उत्कृष्ट व्यवस्था और विधियाँ दीं, और जब वे अपनी शिकायतें और आग्रह प्रस्तुत करते थे, तो धार्मिकता भरे निर्णय देता था, जैसा कि हम देखते हैं कि अंततः होता है, जैसा कि निर्गमन 18:16 में वर्णित है, "जब जब उनका कोई मुक़द्दमा होता है तब तब वे मेरे पास आते हैं, और मैं उनके बीच न्याय करता, और परमेश्‍वर की विधि और व्यवस्था उन्हें समझाता हूँ।" परन्तु अब यहाँ, मिस्र में उस झगड़ालू इस्राएली ने, जो संभवतः सबसे अधिक अन्याय में था, उसने उसे दूर धकेल दिया और ताड़ना को स्वीकार नहीं किया, हालाँकि वह एक न्यायी और कोमल व्यक्ति था, परन्तु उसके चेहरे को उघाड़ने के लिए तैयार था, "परन्तु जो अपने पड़ोसी पर अन्याय कर रहा था, उसने उसे यह कहकर हटा दिया, ‘तुझे किसने हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया है? क्या जिस रीति से तू ने कल मिस्री को मार डाला मुझे भी मार डालना चाहता है?’" (वचन27, 28)। समस्या का एक हिस्सा दास का घमण्ड था, दूसरा हिस्सा समय सही नहीं था और समस्या का एक तिहाई हिस्सा यह था कि मूसा तैयार नहीं था। परमेश्‍वर को उसे तैयार करना था। और परमेश्‍वर को हमें भी तैयार करना है। अभिमानी और आधिकारिक आत्माएँ सुधार और नियंत्रण के लिए प्रतिरोधी होती हैं।


फिर भी, इन दासों की मूर्खता को देखें। बल्कि इन इस्राएलियों को अपने शरीर पर अपने काम करने वालों द्वारा कठोरता से शासन करना चाहिए, बजाय इसके कि उन्हें मुक्त किया जाए, और उनके मन पर उनके छुटकारा देने वाले के द्वारा तर्क के साथ शासन किया जाए। गलती करने वाला उसे दी गई ताड़ना पर इतना अधिक क्रोधित था कि उसने मिस्र के नागरिक को मारने में मूसा द्वारा उसके राष्ट्र के लिए की गई सेवा की आलोचना की। यदि वे प्रसन्न होते, तो यह आगे और अधिक सेवा के लिए आरम्भ हो सकता थीः "क्या तू मुझे मारने के बारे में सोच रहा है, जैसे तूने कल मिस्र के व्यक्ति को मारा था?" मूसा पर उसके अपराध के रूप में आरोप लगाना और उसके लिए उस पर आरोप लगाने की धमकी देना बुद्धिमानी नहीं थी। मूसा की ओर से, यह कार्य मिस्रवासियों के लिए अवज्ञा के झंडे को लटकाने और इस्राएल के प्रति प्रेम और मुक्ति के झंडे को उठाने के बराबर था। फिर भी यहाँ, कई कारकों के कारण, प्रयास को निरस्त कर दिया गया और मूसा मिद्यान की भूमि की ओर भाग गया, और चालीस वर्ष बाद तक इस्राएल को बचाने का कोई और प्रयास नहीं किया। इस बीच, वह मिद्यान में एक परदेशी के रूप में बस गया, और यित्रो की पुत्री से विवाह किया, और उसके दो पुत्र हुए, जैसा कि वचन 29 बताता है, "यह बात सुनकर मूसा भागा और मिद्यान देश में परदेशी होकर रहने लगा, और वहाँ उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए।"


मूसा एक सामर्थी व्यक्ति था, परन्तु मानवीय शक्ति दासों को मुक्त नहीं करेगी। आपको और मुझे पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में सामर्थी होना सीखना चाहिए और लोगों को दूसरे प्रकार के युद्ध में दूसरे प्रकार के हथियार से मुक्त करना चाहिए। इफिसियों 6:12 कहता है, "क्योंकि हमारा यह मल्‍लयुद्ध लहू और मांस से नहीं परन्तु प्रधानों से, और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से और उस दुष्‍टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं।" 2 कुरिन्थियों 10:4 कहता है,"क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्‍वर के द्वारा सामर्थी हैं।" इसके विपरीत, उनमें गढ़ों को ढा देने की ईश्‍वरीय सामर्थ्य है।

चाहे आपके पास स्वभाविक तोड़े और शैक्षिक लाभ हों या न हों, आत्मिक रूप से परमेश्‍वर का एक सामर्थी पुरुष या स्त्री बनें। सामर्थी, उस सर्वसामर्थी परमेश्‍वर के कारण जो आपके द्वारा कार्य करता है। तब आप भी मूसा की तरह एक छुटकारा देने वाले बन सकते हैं।