एक जाल

अध्याय बीस


निर्गमन 11:1-10

Ron Meyers

1फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “एक और विपत्ति मैं फ़िरौन और मिस्र देश पर डालता हूँ, उसके पश्‍चात् वह तुम लोगों को वहाँ से जाने देगा; और जब वह जाने देगा तब तुम सभों को निश्‍चय निकाल देगा। 2मेरी प्रजा को मेरी यह आज्ञा सुना कि एक एक पुरुष अपने अपने पड़ोसी, और एक एक स्त्री अपनी अपनी पड़ोसिन से सोने–चाँदी के गहने माँग ले।” 3तब यहोवा ने मिस्रियों को अपनी प्रजा पर दयालु किया। इसके अतिरिक्‍त वह पुरुष मूसा, मिस्र देश में फ़िरौन के कर्मचारियों और साधारण लोगों की दृष्‍टि में अति महान् था। 4फिर मूसा ने कहा, “यहोवा इस प्रकार कहता है : आधी रात के लगभग मैं मिस्र देश के बीच में होकर चलूँगा। 5तब मिस्र में सिंहासन पर विराजने वाले फ़िरौन से लेकर चक्‍की पीसनेवाली दासी तक के पहिलौठे; वरन् पशुओं तक के सब पहिलौठे मर जाएँगे। 6और सारे मिस्र देश में बड़ा हाहाकार मचेगा, यहाँ तक कि उसके समान न तो कभी हुआ और न होगा। 7पर इस्राएलियों के विरुद्ध, क्या मनुष्य क्या पशु, किसी पर कोई कुत्ता भी न भोंकेगा; जिससे तुम जान लो कि मिस्रियों और इस्राएलियों में मैं यहोवा अन्तर करता हूँ। 8तब तेरे ये सब कर्मचारी मेरे पास आ मुझे दण्डवत् करके यह कहेंगे, ‘अपने सब अनुचरों समेत निकल जा।’ और उसके पश्‍चात् मैं निकल जाऊँगा।” यह कह कर मूसा बड़े क्रोध में फ़िरौन के पास से निकल गया। 9यहोवा ने मूसा से कह दिया था, “फ़िरौन तुम्हारी न सुनेगा; क्योंकि मेरी इच्छा है कि मिस्र देश में बहुत से चमत्कार करूँ।” 10मूसा और हारून ने फ़िरौन के सामने ये सब चमत्कार किए; पर यहोवा ने फ़िरौन का मन और कठोर कर दिया, इसलिये उसने इस्राएलियों को अपने देश से जाने न दिया।


निर्गमन ग्यारह में परमेश्‍वर अब मिस्र से इस्राएल से छुटकारे की घटना में अन्तिम कार्य की स्थापना कर रहा था, अर्थात् फसह की विपत्ति को लाना। अध्याय 10 वचन 24 में कहा गया है कि फ़िरौन ने मूसा को बुलाया, इसलिए माना जाता है कि मूसा अभी भी फ़िरौन के साथ शायद इसी अध्याय के वचन 8 तक फ़िरौन के दरबार में है। फ़िरौन ने कहा था कि मूसा उसे फिर कभी ना देख सकेगा, क्योंकि पिछला अध्याय समाप्त हो गया था। परन्तु मूसा अभी भी वहीं है और बातचीत खत्म नहीं हुई है। फ़िरौन के पास ये अन्तिम शब्द नहीं है; जबकि परमेश्‍वर के पास है। वचन 1-2 में परमेश्‍वर मूसा को निर्देश दे रहा था। वचन 3 "दयालुता से प्राप्ति की गई" वस्तुओं के बारे में एक आरम्भिक प्रविष्टि मिलती है। वचन 4-8 में वर्णन किया गया है कि मूसा ने फ़िरौन से क्या कहा और यह मूसा के क्रोधित होकर चले जाने के साथ समाप्त होता है। परमेश्‍वर और मूसा ने बातचीत को अपने नियंत्रण में रखा था, अर्थात् फ़िरौन के नहीं को। यह अध्याय वचन 9 और 10 के साथ समाप्त होता है, जो संक्षेप में बताता है कि दस विपत्तियों की प्रक्रिया के दौरान क्या हुआ। यह स्मरण रखना महत्वपूर्ण है कि घटनाओं के ऊपर नियंत्रण किसका है। कभी-कभी ये संघर्ष दो क्रोधित और हठी मानवीय नायकों, मूसा और फ़िरौन के बीच प्रतीत होता दिखाई देता है, परन्तु यह वास्तव में सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता और शक्तिशाली, विश्‍वासयोग्य जन, परमेश्‍वर द्वारा नियंत्रित एक अधिक गहरी घटना है, जो अपनी महिमा दिखाने के लिए अपने स्वयं के उद्देश्यों के लिए मानवीय खिलाड़ियों का उपयोग करता है। यहाँ पर "फंदा" दिया गया है।


हम आसानी से देख सकते हैं कि मूसा और इस्राएल पर परमेश्‍वर का कितना बड़ा अनुग्रह था। मूसा स्वर्ग का प्रिय जन था, क्योंकि परमेश्‍वर उससे वह काम नहीं छिपाएगा, जिसे वह करने पर है। परमेश्‍वर ने न केवल उसे रचा है, वरन् उसका दूत अपने कामों को पूरा करने के लिए, अपना उद्देश्य बताता है। मूसा परमेश्‍वर का सेवक था और उसका उसके साथ वार्तालाप का एक भीतरी तरीका था। परमेश्‍वर ने उससे कहा कि वह एक और विपत्ति लाएगा, अन्तिम विपत्ति, जिसके द्वारा वह इस्राएल के छुटकारे को पूरा करेगा। वचन 1 में मूसा के लिए परमेश्‍वर के वचन की आश्‍वस्त वायु पर ध्यान दें, "फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “एक और विपत्ति मैं फ़िरौन और मिस्र देश पर डालता हूँ, उसके पश्‍चात् वह तुम लोगों को वहाँ से जाने देगा; और जब वह जाने देगा तब तुम सभों को निश्‍चय निकाल देगा।" क्या आप मेरे साथ कल्पना कर सकते हैं कि मूसा इस भयानक कार्य का अंत देखना चाहेगा, ताकि मिस्र को और अधिक पीड़ित न देखा जाए और इस्राएल को और अधिक सताया हुआ न देखा जा सके? मूसा इसके खत्म होने के लिए तैयार था। खैर, परमेश्‍वर कहता है, अब अंत निकट है; अन्तिम सिरा जल्द ही पकड़ा लिया जाएगा और युद्ध जल्द ही समाप्त हो जाएगा। फ़िरौन को यह स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाएगा कि वह जीत गया है और अपने चढ़े हुए, घमण्डी, स्वार्थी और अभिमानी उद्देश्य को छोड़ देगा। मिस्र के देवताओं में से हर एक का उपहास करने वाली सभी नौ विपत्तियों के बाद, सच्चा परमेश्‍वर कहता है, "मैं एक और विपत्ति डालता हूँ।" इसी तरह हमें इसे भी इस संसार में पापियों पर लाए गए सभी दण्डों के बाद हम मानवीय जाति के इतिहास में देख सकते हैं, फिर भी दूसरे संसार में उन पर अंत में लाए जाने वाला एक दण्ड प्रतिज्ञा कर रहा है, जो उन सभी को पूरी तरह से विनम्र कर देगा, जिन्हें और कुछ भी विनम्र नहीं करेगा।


इस्राएली स्वर्ग के पसन्दीदा लोग थे; क्योंकि परमेश्‍वर स्वयं उनके पीड़ित होने के कारण के साथ निकटता से पहचान करता है, और उन्हें मिस्रियों की सेवा में उनके सभी दु:खों को सहते हुए देखने पर ध्यान रखता है। यह उनकी दासता का अन्तिम दिन था; वे जाने वाले थे। और उनके स्वामी, जिन्होंने उनके काम में उनके साथ दुर्व्यवहार किया था, अब एक प्रेरक शक्ति के द्वारा, जिसे वे स्वयं नहीं समझते थे, दासों को उनकी पिछली मजदूरी देने वाले हैं। परमेश्‍वर इस बात का ध्यान रखेगा कि मिस्र के लोग उन्हें उनकी मजदूरी देने में धोखा न दें, और उन्हें खाली हाथ न भेज दें। निर्धन इस्राएली स्वतंत्रता के लिए इतने अधिक उत्सुक थे कि वे बिना किसी वेतन के स्वतंत्रता से संतुष्ट हो जाते, और किसी भी परिस्थिति में अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए प्रसन्न होते, परन्तु अपने प्रस्थान पर अब भुगतान का अनुरोध करने के उसके निर्देशों में परमेश्‍वर की निष्पक्षता का प्रदर्शन दिखाया जाएगा। वचन 2 में परमेश्‍वर ने मूसा को इस तरह से निर्देश दिया था, "मेरी प्रजा को मेरी यह आज्ञा सुना कि एक एक पुरुष अपने अपने पड़ोसी, और एक एक स्त्री अपनी अपनी पड़ोसिन से सोने–चाँदी के गहने माँग ले।" परमेश्‍वर ने मिस्र के लोगों पर इन विपत्तियों को भेजकर इस्राएलियों को मजदूरी का भुगतान करने के लिए तैयार किया था। मिस्र के लोग विपत्तियों से पीड़ित रहने के बजाय आनन्द के साथ उन्हें उनकी घरेलू संपत्ति और खजाने से भुगतान करेंगे। परमेश्‍वर ने विपत्तियों को कई तरीकों से उपयोग किया। इस्राएलियों ने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की और परमेश्‍वर की महिमा देखी। मिस्रवासी न केवल उन्हें जाने देने के लिए तैयार थे, बल्कि उन्हें खजाने देने के लिए भी तैयार थे। बाद में परमेश्‍वर खजाने के कुछ हिस्से का उपयोग तम्बू और उसके पात्रों का निर्माण करने के लिए करेगा। और हम सभी जो इस कहानी को पढ़ रहे हैं, वे परमेश्‍वर को सर्वोत्तम जानते हैं, क्योंकि उन्होंने देखा कि वह कैसे काम करता है। हालाँकि धैर्यवान इस्राएली अपनी मजदूरी खोने से संतुष्ट थे, फिर भी परमेश्‍वर ने उन्हें बिना किसी वेतन के जाने नहीं दिया। किसी न किसी तरह से, परमेश्‍वर उन घायलों को उचित भुगतान अदा करेगा, जो एक विनम्र चुप्पी में अपना कारण उन्हें सौंप देते हैं, और यह देखते हैं कि अंत में कोई भी अपने रोगी की पीड़ा से हाराने वाला न हो।


मूसा और इस्राएल मिस्रवासियों के पक्ष में थे। मिस्र के नागरिकों में सामान्य रूप से फ़िरौन की तुलना में उनके प्रति निष्पक्षता, सही और गलत की अधिक सटीक भावना हो सकती है। यही कारण हो सकता है कि वचन तीन में कहा गया है, "(तब यहोवा ने मिस्रियों को अपनी प्रजा पर दयालु किया। इसके अतिरिक्‍त वह पुरुष मूसा, मिस्र देश में फ़िरौन के कर्मचारियों और साधारण लोगों की दृष्‍टि में अति महान् था।)" यहाँ तक कि इस्राएल के लोग, जिनसे अब घृणा और तिरस्कार की जाती थी, उनका भी सम्मान किया जाने लगा; उनके लिए परमेश्‍वर द्वारा किए गए आश्‍चर्यकर्मों ने उन्हें सम्मानित किया और अचानक उन्हें अति बड़ा बना दिया। जब हम परमेश्‍वर की सेवा करते हैं, तो वह हमें कितना अधिक बड़ा कर देता हैं, जिनके लिए परमेश्‍वर इस तरह लड़ता है! विपत्तियों के आश्‍चर्यकर्मों के माध्यम से प्रभु यहोवा ने इब्री दासों को मिस्रियों की दृष्टि में अनुग्रह यह प्रदर्शित करके दिखाया कि उसने उन पर कितना अधिक अनुग्रह किया था। उसने उनके लिए मिस्रवासियों के व्यवहार को बदल दिया, और उन्हें सताने वालों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बजाय उन्हें शर्मिंदा किया। भजन संहिता 106:46 हमें संक्षेप में यह बताता है, "और जो उन्हें बन्दी बना कर ले गए थे उन सबसे उन पर दया कराई।"


मूसा की प्रतिष्ठा भी उल्लेखनीय हो गई। यह कैसे नहीं हो सकता था, जब सभी ने देखा कि मूसा किस सामर्थ्य को धारण किए हुए था और उसके हाथ से कौन से आश्‍चर्यकर्म किए गए थे? उसी तरह प्रेरित, हालाँकि अन्यथा केवल सामान्य और तिरस्कृत लोग थे, परन्तु उनकी बड़ाई होने लगी, जैसा कि प्रेरितों के काम 5:13 हमें बताता है, "तौभी लोग उनकी बड़ाई करते थे।" जो परमेश्‍वर का सम्मान करते हैं, उसका वह सम्मान करेगा; और जो लोग स्वयं को उसके प्रति विश्‍वासयोग्य प्रमाणित करते हैं, चाहे वे इस संसार से कितनी भी विनम्रता से या किसी भी तरह की निम्न स्थिति में गुजरें, वह दिन आएगा, जब वे पूरे संसार की दृष्टि में श्रेष्ठ, अति श्रेष्ठ दिखेंगे। यहाँ तक कि जो लोग विश्‍वासियों की उपेक्षा करते हैं और उन्हें आश्‍चर्यचकित करने के लिए तिरस्कार के साथ व्यवहार करते हैं, वे उस दिन को देखेंगे, जब उन्हें पता चलेगा कि हम इन सभी वर्षों में क्या रहे थे, और यह कि हम किसके लिए जी रहे थे और उसके लिए क्यों जी रहे थे। वे हमें उसके द्वारा सम्मानित होते हुए देखेंगे, जिसे हम सम्मानित करने की इच्छा रखते हैं, एकमात्र वह जन अर्थात् परमेश्‍वर जिससे सबसे अच्छा सम्मान मिल सकता है।


हालाँकि फ़िरौन मूसा से घृणा करता था, स्पष्ट है कि फ़िरौन के कुछ सेवकों ने उसका सम्मान किया। जल्द ही हम देखेंगे कि जब इस्राएल मिस्र से बाहर निकलता है, तो कुछ मिस्रियों ने भी इब्रियों के साथ मिस्र को छोड़ दिया, परमेश्‍वर के लोगों के साथ अपने हिस्से को डाल दिया, जो अंततः सही प्रमाणित हुए। इसी तरह कैसर के घर में, यहाँ तक कि नीरो की शासन में भी, कुछ लोग ऐसे थे, जो पौलुस की स्थिति को समझते थे, जिसमें उसकी जंजीरें भी शामिल थीं और उसका सम्मान करते थे, जैसा कि फिलिप्पियों 1:13 कहता है, "यहाँ तक कि कैसर के राजभवन की सारी पलटन और शेष सब लोगों में यह प्रगट हो गया है कि मैं मसीह के लिये कैद हूँ।"

यह दिखाने के लिए कि परमेश्‍वर कैसे अन्तिम विपत्ति की स्थापना कर रहा था और कैसे परमेश्‍वर, फ़िरौन नहीं, बातचीत को अपने नियंत्रण में लिए हुए था, हम आगे मूसा को फ़िरौन को अन्तिम और विजयी होने वाली विपत्ति की चेतावनी देते हुए देखते हैं, जो उस आधी रात में स्पष्ट रूप से होने वाली थी। यह मिस्र में सभी पहिलौठों की मृत्यु थी, जिसके बारे में मूसा को पता था कि सिप्पोरा ने मिस्र के मार्ग पर उसके प्राण बचाए थे, जो निर्गमन 4 में वर्णित है। उस अध्याय की वचन 23 में परमेश्‍वर ने मूसा को सूचित किया कि वह फ़िरौन से क्या कहेगा, "और मैं जो तुझ से कह चुका हूँ कि मेरे पुत्र को जाने दे कि वह मेरी सेवा करे; और तू ने अब तक उसे जाने नहीं दिया, इस कारण मैं अब तेरे पुत्र वरन् तेरे जेठे को घात करूँगा।" छोटी-छोटी विपत्तियों के लिए, कम दण्डों का उपयोग किया गया था, परन्तु अब अन्तिम और सबसे बड़ी विपत्ति का समय आ गया था। यदि छोटी विपत्तियाँ फलदायी होतीं, तो यह विपत्ति आवश्यक नहीं होती। देखें कि परमेश्‍वर क्रोधित होने में कितना धीमा है, उसके दण्डों को ध्यान में रखते हुए, मनुष्य से मिलने और मनुष्य द्वारा मिले जाने के लिए वह कितना इच्छुक है? वह अपने क्रोध और विशेष रूप से मूल्यों को दूर करना पसन्द करता है, जो उसकी दृष्टि में मनुष्यों के जीवन के रूप में बहुमूल्य हैं। यदि उनके पशुओं की मृत्यु ने उन्हें विनम्र कर दिया और सुधार दिया होता, तो उनकी सन्तान को छोड़ा जा सकता था। परन्तु, यदि लोग ईश्‍वरीय दण्डों की जानबूझकर बढ़ती हुई प्रगति में निहित अवसरों को नहीं समझेंगे और उनका लाभ नहीं उठाएँगे, तो उन्हें स्वयं को धन्यवाद देना चाहिए, यदि वे अंत में पाते हैं कि सबसे बुरा तो आखिर के लिए ही बचाकर रखा गया था।


विशिष्ट महामारी के बारे में वचन 4-6 में कुछ विस्तार से भविष्यद्वाणी की गई है, "फिर मूसा ने कहा, "यहोवा इस प्रकार कहता है : आधी रात के लगभग मैं मिस्र देश के बीच में होकर चलूँगा। तब मिस्र में सिंहासन पर विराजने वाले फ़िरौन से लेकर चक्‍की पीसनेवाली दासी तक के पहिलौठे; वरन् पशुओं तक के सब पहिलौठे मर जाएँगे। और सारे मिस्र देश में बड़ा हाहाकार मचेगा, यहाँ तक कि उसके समान न तो कभी हुआ और न होगा।" समय ठहरा दिया गया था - लगभग आधी रात, स्पष्ट तौर पर अगली आधी रात, ठीक आधी रात में। क्या माता-पिता यह देखने के लिए जागते रहे कि क्या संदेश सच है या आधी रात को परिवारों को जगाने और उन्हें मरते हुए देखने के लिए उकसाने के लिए? जब वे सब सो जाएँगे, तो उनके सभी जेठे मृत्यु की नींद में सो जाएँगे। क्या यह चुपचाप होगा, ताकि सुबह तक इसका पता न चल सके। इसमें कौन शामिल होगा? वचन 5 के अनुसार, "तब मिस्र में सिंहासन पर विराजने वाले फ़िरौन से लेकर चक्‍की पीसनेवाली दासी तक के पहिलौठे; वरन् पशुओं तक के सब पहिलौठे मर जाएँगे।" घटना के अनुसार वहाँ जोरदार शोक होगा। इस विपत्ति की सीमा का वर्णन किया गया है। जिस राजकुमार को सिंहासन पर बैठना था, वह इतना ऊँचा नहीं था कि उस तक ना पहुँचा जा सके और न ही चक्की पीसने वाली दासी इतने नीचे थी कि उसे छुआ नहीं जा सकता था। मूसा और हारून को इस महामारी को बुलाने का आदेश नहीं दिया गया था। नहीं, प्रभु यहोवा ने कहा, "मैं पूरे मिस्र में से जाऊँगा।" जीवित परमेश्‍वर के हाथों में पड़ना एक भयानक बात है। उसकी चेतावनियों को अनदेखा करना खतरनाक है।


इसके विपरीत, उस विशेष सुरक्षा पर ध्यान दें, जिसके अधीन इस्राएल की सन्तान सुरक्षित रहेगी और उनके और मिस्र के लोगों के बीच कितना बड़ा अंतर होगा। जबकि मृत्यु के दूत ने मिस्रियों के विरुद्ध अपनी तलवार खींची, पर इस्राएलियों के विरुद्ध, क्या मनुष्य क्या पशु, किसी पर कोई कुत्ता भी न भोंका। पिछली कुछ विपत्तियों की तरह, परमेश्‍वर के लोगों और उसके शत्रुओं के बीच उस भयानक रात को विशिष्ट रूप से अग्रिम चेतावनी और अंतर की एक विस्तृत सूचना दी गई थी। वचन 7 यह स्पष्ट करता है, "पर इस्राएलियों के विरुद्ध, क्या मनुष्य क्या पशु, किसी पर कोई कुत्ता भी न भोंकेगा; जिससे तुम जान लो कि मिस्रियों और इस्राएलियों में मैं यहोवा अन्तर करता हूँ।" यदि मनुष्य यह जान लेते कि परमेश्‍वर की सेवा करने वालों और नहीं करने वालों के बीच परमेश्‍वर क्या अंतर लाता है, और अनंत काल में क्या होगा, तो परमेश्‍वर की खोज करना ऐसी उदासीन बात नहीं लगती, जैसा कि वे अब होने का नाटक करते हैं, और न ही वे इतनी लापरवाही के साथ कार्य करते हैं, जैसा कि वे अब करते हैं।


यहाँ तक कि जिस विनम्र अधीनता के साथ फ़िरौन के सेवक इस्राएल से मिस्र छोड़ने का अनुरोध करेंगे, वह मूसा ने वचन 8 में फ़िरौन से जो कहा था, उस में शामिल है, "तब तेरे ये सब कर्मचारी मेरे पास आ मुझे दण्डवत् करके यह कहेंगे, ‘अपने सब अनुचरों समेत निकल जा।’ और उसके पश्‍चात् मैं निकल जाऊँगा।” यह कह कर मूसा बड़े क्रोध में फ़िरौन के पास से निकल गया।" परमेश्‍वर और उसके इस्राएल के घमण्डी शत्रुओं को अंततः परमेश्‍वर के अधिकार के अधीन कर दिया जाएगा, शायद जैसा कि प्रकाशितवाक्य 3:9 में वर्णित किया गया है, "देख, मैं शैतान के उन सभावालों को तेरे वश में कर दूँगा जो यहूदी बन बैठे हैं, पर हैं नहीं वरन् झूठ बोलते हैं–देख, मैं ऐसा करूँगा कि वे आकर तेरे पैरों पर गिरेंगे, और यह जान लेंगे कि मैं ने तुझ से प्रेम रखा है।" जी हाँ, शैतान और मिस्र के जादूगर झूठे थे, जिन पर फ़िरौन ने अपने विनाश के लिए विश्‍वास किया। इसी तरह की बात जल्द ही फिर से होगी, जब इस्राएल प्रतिज्ञा किए गए देश में प्रवेश करता है, जैसा कि व्यवस्थाविवरण 33:29 में वर्णित है, "हे इस्राएल, तू क्या ही धन्य है! हे यहोवा से उद्धार पाई हुई प्रजा, तेरे तुल्य कौन है? वह तो तेरी सहायता के लिये ढाल, और तेरे प्रताप के लिये तलवार है; तेरे शत्रु तुझे सराहेंगे, और तू उनके ऊँचे स्थानों को रौंदेगा।"

जब मूसा ने अपना संदेश फ़िरौन को दिया, तो लिखा है कि वह बड़े क्रोध में उसके पास से चला गया। हालाँकि वह पृथ्वी के सभी लोगों में सबसे नम्र था! यदि मूसा को परमेश्‍वर द्वारा अग्रिम सूचना नहीं दी गई होती कि फ़िरौन लोगों को जाने नहीं देगा, तो उसने आशा की होती कि जेठों की मृत्यु की धमकी ने फ़िरौन को मान लेने के लिए प्रेरित किया होता। निश्‍चित रूप से फ़िरौन पहले ही देख चुका था कि मूसा की सभी भविष्यद्वाणियाँ कैसे पूरी हुईं! इन विपत्तियों का असर क्यों नहीं हुआ? सफलता क्यों नहीं मिली? फ़िरौन का घमण्डी हृदय अपने राज्य के सभी जेठों को बचाने के लिए हार नहीं मानेगा, नहीं। यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि मनुष्यों को अगले संसार में शाश्‍वत दु:ख की अग्रिम सूचना देकर गलत मार्गों पर चलने से दूर नहीं किया जाता है, जबकि यहाँ और अब भी इस संसार में, बिना किसी डर के, वे अपना सब कुछ खोने का जोखिम उठाते हैं, जो उन्हें प्रिय है। भला व्यक्ति, मूसा, एक पवित्र क्रोध के लिए उकसाया गया था, वह फ़िरौन के मन की कठोरता से दु:खी था। सभी प्रकार के प्रयासों, निष्पक्ष चेतावनियों और इसे रोकने के लिए उपयोग किए जाने वाले तरीकों के बावजूद, लोगों को नाश करने के लिए सिर हिलाते हुए देखना भले सेवकों की आत्माओं के लिए एक बड़ी पीड़ा है।


बाइबल कहती है कि क्रोध तो करो पर पाप न करो। पाप पर क्रोधित होना, जैसा कि मूसा फ़िरौन के सामने पहले खड़ा हुआ था, के लिए क्रोधित होना समझने योग्य है, न कि पाप का। मूसा, ईमानदारी से फ़िरौन को अपना संदेश देने के बाद, उस पिछली सूचना पर विचार करता है, जो परमेश्‍वर ने उसे दी थी कि ऐसा होगा। और यहोवा ने मूसा से कहा था, कि फ़िरौन तेरी न सुनेगा, और मिस्र में मेरे आश्‍चर्यकर्म बहुत बढ़ जाएँगे। यह फ़िरौन के बारे में था, परन्तु उन कई लोगों के बारे में क्या कहा जाए, जो आज विश्‍वास नहीं करते हैं? आइए हम कभी भी यीशु के शुभ सन्देश के बारे में केवल इसलिए न सोचें कि लोग इस पर प्रकाश डालते हैं या इस पर विश्‍वास करने से इनकार करते हैं। हमें भी पहले बताया गया है कि इसे कैसे अस्वीकार किया जाएगा और इसका कितना अच्छा स्वागत होगा। 


यहाँ वचन 10 में, मूसा ने स्वयं इस बारे में पहले कही गई सभी बातों को दोहराया है कि मूसा ने इन सभी चमत्कारों को दिखाया, जैसा कि वे यहाँ वर्णित हैं, फ़िरौन के सामने और फिर भी जीत नहीं सके। "मूसा और हारून ने फ़िरौन के सामने ये सब चमत्कार किए; पर यहोवा ने फ़िरौन का मन और कठोर कर दिया, इसलिये उसने इस्राएलियों को अपने देश से जाने न दिया।" आने वाली पीढ़ियों में जो कोई भी यीशु के सुसमाचार को अस्वीकार करता है, वह इस तरह की घोर मूर्खता करता है। अनन्त विनाश की नीरस और दु:खद पृष्ठभूमि के विरुद्ध सुसमाचार इतना सुंदर है कि कोई सोच सकता है कि सभी इसके लिए जल्दी से अनुकूल प्रतिक्रिया दें। परन्तु ऐसा नहीं है। जब लोग सुसमाचार की ज्योति के विरुद्ध स्वयं को कठोर कर लेते हैं, तो परमेश्‍वर, फ़िरौन की तरह, लोगों को विश्‍वास न करने देगा। परमेश्‍वर मनुष्य द्वारा उसकी स्वतंत्र इच्छा के उपयोग का सम्मान करता है, भले ही वे इसका बुरा उपयोग करते हों।


"व्यवस्था" समाप्त हो गई है और परमेश्‍वर कार्यवाही करने के लिए तैयार है।