आखिरकार स्वतंत्र

अध्याय बाईस


निर्गमन 12:29-51

Ron Meyers

29ऐसा हुआ कि आधी रात को यहोवा ने मिस्र देश में सिंहासन पर विराजनेवाले फ़िरौन से लेकर गड़हे में पड़े हुए बँधुए तक, सबके पहिलौठों को, वरन् पशुओं तक के सब पहिलौठों को मार डाला। 30और फ़िरौन रात ही को उठ बैठा, और उसके सब कर्मचारी, वरन् सारे मिस्री उठे; और मिस्र में बड़ा हाहाकार मचा, क्योंकि एक भी ऐसा घर न था जिसमें कोई मरा न हो। 31तब फ़िरौन ने रात ही रात में मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “तुम इस्राएलियों समेत मेरी प्रजा के बीच से निकल जाओ; और अपने कहने के अनुसार जाकर यहोवा की उपासना करो। 32अपने कहने के अनुसार अपनी भेड़–बकरियों और गाय–बैलों को साथ ले जाओ; और मुझे आशीर्वाद दे जाओ।” 33मिस्री जो कहते थे, ‘हम तो सब मर मिटे हैं,’ उन्होंने इस्राएली लोगों पर दबाव डालकर कहा, “देश से झटपट निकल जाओ।” 34तब उन्होंने अपने गुंधे–गुंधाए आटे को बिना ख़मीर दिए ही कठौतियों समेत कपड़ों में बाँधकर अपने अपने कन्धे पर डाल लिया। 35इस्राएलियों ने मूसा के कहने के अनुसार मिस्रियों से सोने–चाँदी के गहने और वस्त्र माँग लिये; 36और यहोवा ने मिस्रियों को अपनी प्रजा के लोगों पर ऐसा दयालु किया कि उन्होंने जो जो माँगा वह सब उनको दिया। इस प्रकार इस्राएलियों ने मिस्रियों को लूट लिया। 37तब इस्राएली रामसेस से कूच करके सुक्‍कोत को चले, और बाल–बच्‍चों को छोड़ वे कोई छ: लाख पैदल चलनेवाले पुरुष थे। 38उनके साथ मिली–जुली हुई एक भीड़ गई, और भेड़–बकरी, गाय–बैल, बहुत से पशु भी साथ गए। 39और जो गूँधा आटा वे मिस्र से साथ ले गए थे उसकी उन्होंने बिना ख़मीर दिए रोटियाँ बनाईं; क्योंकि वे मिस्र से ऐसे बरबस निकाले गए कि उन्हें अवसर भी न मिला कि मार्ग में खाने के लिये कुछ पका सकें, इसी कारण वह गूँधा हुआ आटा बिना ख़मीर का था। 40मिस्र में बसे हुए इस्राएलियों को चार सौ तीस वर्ष बीत गए थे। 41और उन चार सौ तीस वर्षों के बीतने पर, ठीक उसी दिन, यहोवा की सारी सेना मिस्र देश से निकल गई। 42यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से निकाल लाया, इस कारण वह रात उसके निमित्त मानने के योग्य है; यह यहोवा की वही रात है जिसका पीढ़ी पीढ़ी में मानना इस्राएलियों के लिये अवश्य है। 43फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “पर्व की विधि यह है : कोई परदेशी उसमें से न खाए; 44पर जो किसी का मोल लिया हुआ दास हो, और तुम लोगों ने उसका खतना किया हो, वह तो उसमें से खा सकेगा। 45पर परदेशी और मज़दूर उसमें से न खाएँ। 46उसका खाना एक ही घर में हो; अर्थात् तुम उसके मांस में से कुछ घर से बाहर न ले जाना; और बलिपशु की कोई हड्डी न तोड़ना। 47पर्व का मानना इस्राएल की सारी मण्डली का कर्तव्य है। 48और यदि कोई परदेशी तुम लोगों के संग रहकर यहोवा के लिये पर्व को मानना चाहे, तो वह अपने यहाँ के सब पुरुषों का खतना कराए, तब वह समीप आकर उसको माने; और वह देशी मनुष्य के तुल्य ठहरेगा। पर कोई खतनारहित पुरुष उसमें से न खाने पाए। 49उसकी व्यवस्था देशी और तुम्हारे बीच में रहनेवाले परदेशी दोनों के लिये एक ही हो।” 50यह आज्ञा जो यहोवा ने मूसा और हारून को दी उसके अनुसार सारे इस्राएलियों ने किया। 51और ठीक उसी दिन यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से दल दल करके निकाल ले गया।


मिस्र के पहिलौठे पुत्र मारे गए हैं, जैसा कि वचन 29, 30 में वर्णित है, "ऐसा हुआ कि आधी रात को यहोवा ने मिस्र देश में सिंहासन पर विराजनेवाले फ़िरौन से लेकर गड़हे में पड़े हुए बँधुए तक, सबके पहिलौठों को, वरन् पशुओं तक के सब पहिलौठों को मार डाला। और फ़िरौन रात ही को उठ बैठा, और उसके सब कर्मचारी, वरन् सारे मिस्री उठे; और मिस्र में बड़ा हाहाकार मचा, क्योंकि एक भी ऐसा घर न था जिसमें कोई मरा न हो।" यदि फ़िरौन ने इस महामारी के बारे में मिली चेतावनी को स्वीकार कर लिया होता, और इस्राएल को छोड़ दिया होता, तो कितने ही प्रिय और मूल्यवान जीवन बच सकते थे! देखें कि हठ अविश्‍वासी लोगों के लिए क्या लाता है। यह आधी रात को हुआ, जिसका एक अतिरिक्त आतंक जोड़ने वाला प्रभाव हो सकता है। पिछली तीन रातें अंधेरे की विपत्ति से भयानक हो गई थीं, जिन्हें महसूस किया जा सकता था। निश्‍चित रूप से इसने उनके विश्राम को बाधित कर दिया होगा और अब, जब वे एक शांत रात के विश्राम की आशा कर रहे थे, तो आधी रात को एक बड़ी चेतावनी दी जाती है। दाऊद के समय में जब मृत्यु के दूत ने यरूशलेम के विरुद्ध अपनी तलवार निकाली, तो यह दिन का समय था, जैसा कि 2 शमूएल 24:15 कहता है, "तब यहोवा इस्राएलियों में सबेरे से ले ठहराए हुए समय तक मरी फैलाए रहा; और दान से लेकर बेर्शेबा तक रहनेवाली प्रजा में से सत्तर हज़ार पुरुष मर गए।" भयानक था, परन्तु मिस्र में विनाश और भी अधिक बुरा था। मिस्र को अभी-अभी एक भयानक अंधेरे का सामना करना पड़ा था, परन्तु अब वे आधी रात को एक बहुत बड़े, आक्रामक, व्यापक और पूर्ण खतरे और विलाप का अनुभव करते हैं। विपत्ति उनके सभी पहिलौठों पुत्रों पर आई, उनके संबंधित परिवारों के हर्ष और आशा पर। उन्होंने इब्रियों के बच्चों को मार डाला था, और अब परमेश्‍वर ने उनके बच्चों को मार डाला। वह सिंहासन से लेकर चक्की पीसने वाले के घर तक पहुँची। राजकुमार और किसान परमेश्‍वर के दण्डों के सामने एक ही स्तर पर खड़े हैं; उसके यहाँ किसी का कोई पक्षपात नहीं है। अय्यूब 34:19, 20 कहता है, क्या वह परमेश्‍वर नहीं है? "...जो हाकिमों का पक्ष नहीं करता और धनी और कंगाल दोनों को अपने बनाए हुए जानकर उनमें कुछ भेद नहीं करता। आधी रात को पल भर में वे मर जाते हैं, और प्रजा के लोग हिलाए जाते और जाते रहते हैं; और प्रतापी लोग बिना हाथ लगाए उठा लिए जाते हैं।" स्पष्ट है, मिस्र में एक बड़ा विलाप हुआ था, यह उनके अपने एकलौते पुत्र के लिए सार्वभौमिक रूप से विलाप और रोना था, यदि उनके पास केवल एक ही पुत्र था और हर परिवार ने अपने पहिलौठे को खो दिया था। यदि एक ही परिवार के साथ ऐसा होता है, तो वे सहायता या विश्राम के लिए रिश्तेदारों या पड़ोसियों को बुला सकते हैं, परन्तु इस विषय में सभी रिश्तेदार और पड़ोसी अपने स्वयं के समान दुःख में व्यस्त थे। इस पर मनुष्य की उचित प्रतिक्रिया दो भागों में मिलती है। पहली, परमेश्‍वर के सामने काँपने के लिए, और उसके दण्डों से डरने के लिए, जैसा कि भजन 119:120 कहता है, "तेरे भय से मेरा शरीर काँप उठता है, और मैं तेरे नियमों से डरता हूँ।" कौन उसके सामने खड़ा हो सकता है, या उसका विरोध करने की हियाव करता है? दूसरी, अपने और अपने परिवारों की दैनिक सुरक्षा के लिए परमेश्‍वर के प्रति कृतज्ञ होना। हमारे पास ऐसा कहने के कई कारण हैं कि यह केवल परमेश्‍वर की दया है कि हम भस्म नहीं हुए हैं।

इस दण्ड ने फ़िरौन पर जय प्राप्त की और उसे मूसा की सभी शर्तों के साथ बिना शर्त और पूर्ण आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया। लोग जब तक चाहें, तब तक आपत्ति जता सकते हैं; सर्वोत्तम होगा कि वे पहले परमेश्‍वर की शर्तों पर आ जाएँ, क्योंकि वह कभी भी उसकी शर्तों पर खरे नहीं उतरेंगे। फ़िरौन का घमण्ड कम हो गया है, और वह मूसा के आग्रह के अनुसार सब कुछ करता है, "तब फ़िरौन ने रात ही रात में मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “तुम इस्राएलियों समेत मेरी प्रजा के बीच से निकल जाओ; और अपने कहने के अनुसार जाकर यहोवा की उपासना करो" (वचन 31)। यहाँ तक कि उसने वचन 32 में विशेष रूप से पशुओं के समूहों का उल्लेख किया है, "अपने कहने के अनुसार अपनी भेड़–बकरियों और गाय–बैलों को साथ ले जाओ; और मुझे आशीर्वाद दे जाओ।" परमेश्‍वर का वचन स्थिर रहेगा, और हमें इस पर विवाद करने या इसके अधीन होने में देरी करने से कुछ नहीं मिलेगा। इस पड़ाव तक इस्राएलियों को मिस्र छोड़ने की अनुमति नहीं थी, परन्तु अब चीजें अन्तिम छोर पर पहुँच गई थीं। और इसका क्या परिणाम निकलता है? उन्हें जाने देने आदेश दिया जाता हैः उठो, जाओ, जाओ! फ़िरौन ने मूसा से कहा कि वह अब उसका मुँह नहीं देखना चाहता था; परन्तु अब वह उसे बुलाता है। वे अपने संकट में जल्दी परमेश्‍वर की खोज करेंगे, जिन्होंने पहले उसकी अवहेलना की थी। अब वह इतना डर गया था कि उसने रात में ही उनके छुटकारे का आदेश दिया, इस डर से कि यदि वह और देरी करता है, तो वह स्वयं ही उसके बाद मर जाएगा। रुचिपूर्ण बात यह है कि हम आशीर्वाद के लिए फ़िरौन के अनुरोध में एक छिपा हुआ अर्थ देख सकते हैं। यह कि वह मूसा से डरता था, वचन 32 में उसके विनम्र अनुरोध से स्पष्ट रूप से पता चलता है, "अपने कहने के अनुसार अपनी भेड़–बकरियों और गाय–बैलों को साथ ले जाओ; और मुझे आशीर्वाद दे जाओ।" मुझे भी आशीर्वाद दे जाओ; मेरे लिए प्रार्थनाओं को करते जाओ, ताकि मैं अतीत के लिए विलाप न करता रहूँ, जब तुम यहाँ से चले जाओगे। जो लोग परमेश्‍वर की मण्डली के शत्रु हैं, वे अपने स्वयं के शत्रु हैं, और जल्द या बाद में, उन्हें इसे दिखाया जाएगा। उन्हें जाने के लिए मिस्र के लोगों द्वारा खर्च अदा किया जाता है; वे पुकार उठते हैं, "हम तो सब मर मिटे हैं।" वचन 33 में। जब मृत्यु हमारे घरों में आती है, तो हमारे लिए अपनी मृत्यु के बारे में सोचना उचित होता है। क्या हमारे रिश्तेदार मर चुके हैं? इससे यह अनुमान लगाना आसान है कि हम मर रहे हैं, और वास्तव में यह कहना कि पहले से ही मृत लोग हैं, ज्यादा सही रहेगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि वे जल्द से इस्राएलियों को वहाँ से जाने देने के लिए तैयार थे, जिससे इस्राएलियों को उनका बहुमूल्य सामान लूटने से बहुत ज्यादा लाभ हुआ, जैसा कि वचन 35, 36 में कहा गया है, "इस्राएलियों ने मूसा के कहने के अनुसार मिस्रियों से सोने–चाँदी के गहने और वस्त्र माँग लिये; और यहोवा ने मिस्रियों को अपनी प्रजा के लोगों पर ऐसा दयालु किया कि उन्होंने जो जो माँगा वह सब उनको दिया। इस प्रकार इस्राएलियों ने मिस्रियों को लूट लिया।" जब मिस्रवासियों ने उनसे जाने का आग्रह किया, तो उनके लिए यह कहना आसान था, क्योंकि मिस्रवासियों ने उन्हें निर्धन रखा था और वे खाली हाथ ऐसी यात्रा नहीं कर सकते थे। ऐसा लग रहा था कि वे वास्तव में कह रहे थे, यदि तुम हमें हमारी मजदूरी देते हो, तो हम जाएँगे। और इसमें हम देख सकते हैं कि परमेश्‍वर वैचारिक रूप से चीजों को इस चरम सीमा तक आने की अनुमति देकर उनके लिए काम कर रहा था, कि इस्राएली, जो मिस्रवासियों को एक दृढ़ सेना प्रतीत होते थे, केवल माँगने भर से ही वह सब कुछ पा सकते थे, जिसे वे चाहते थे। प्रभु यहोवा ने भी, लोगों के मन पर अपने प्रभाव से, मिस्रवासियों के मनों को वह प्रदान करने के लिए झुका दिया, जिसे वे लेना चाहते थे। शायद वे अपने उपहारों को देने के द्वारा प्रायश्‍चित करने की मंशा रखते थे, ताकि विपत्तियों को रोका जा सके, क्योंकि बाद में पलिश्तियों ने, जब उन्होंने शमूएल के दिनों में परमेश्‍वर का सन्दूक लौटा दिया, तो अपराध-की-भेंट के लिए इसके साथ एक उपहार भेजा, शायद इस घटना को ध्यान में रखते हुए। इस्राएली जो कुछ "लूट" में लेते थे, उसे प्राप्त कर सकते थे और रख सकते थे, या हमें मिस्रवासियों के बारे में इसे "शर्त सहित" देना कहना चाहिए। यह था

(1.) जैसे कि सेवक अपने मालिकों से किए गए काम के लिए मजदूरी प्राप्त करते हैं, और यदि यदि इसे रोककर रखा जाए, तो इसकी मांग की जा सकती थी। (2.) जैसे विजेता अपने शत्रुओं की लूट लेते हैं, जिन्हें उन्होंने तब से वश में किया था, जब से फ़िरौन इब्रियों के परमेश्‍वर के विरुद्ध विद्रोह कर रहा था, जिसके द्वारा अब उसका सब कुछ लूट लिया जाता है। (3.) जैसे प्रजा अपने राजा द्वारा उन्हें दी गई धन-सम्पत्ति से प्राप्त करती है। परमेश्‍वर भूमि और उसकी परिपूर्णता का मालिक है और यदि वह एक से लेकर दूसरे को देता है, तो उसे कौन कहेगा, कि तू ऐसा क्या कर रहा है? यह परमेश्‍वर के विशेष आदेश और नियुक्ति से था कि इस्राएलियों ने वही किया, जो उन्होंने किया, जो उन्हें सही ठहराने और उन्हें पर्याप्त साहस देने के लिए पर्याप्त था; परन्तु उन्होंने जो किया, वह किसी भी तरह से दूसरों को ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं करेगा, जो ऐसा करने का दावा नहीं कर सकते। आइए हम स्मरण रखें कि राजाओं का राजा कोई गलत काम नहीं कर सकता है और वह उन लोगों का भला करेगा, जिन्हें लोग चोट पहुँचाते हैं। भजन संहिता 146:7 कहता है, "वह पिसे हुओं का न्याय चुकाता है; और भूखों को रोटी देता है। यहोवा बन्दियों को छुड़ाता है।" परमेश्‍वर कैदियों को मुक्त करता है, यह इस तरह है कि पापी का धन अक्सर प्रमाणित करता है कि यह न्याय के लिए रखा गया है, जैसा कि नीतिवचन 13:22 कहता है, "...पापी की सम्पत्ति धर्मी के लिये रखी जाती है।" और अय्यूब 27:16-17 आगे कहता है, "चाहे वह रुपया धूल के समान बटोर रखे, और वस्त्र मिट्टी के किनकों के तुल्य अनगिनित तैयार कराए, वह उन्हें तैयार भले ही कराए, परन्तु धर्मी उन्हें पहिन लेगा, और उसका रुपया निर्दोष लोग आपस में बाँटेंगे।"


गुलामों ने कोई समय नहीं गंवाया, अपना छुटकारा प्राप्त करने के बाद, वे बिना किसी देरी के वहाँ से निकल पड़े, और अधिक सुविधाजनक ऋतु की प्रतीक्षा नहीं की। मूसा एक अच्छा, भविष्य की सोच रखने वाला अगुवा था और उसने लोगों की इस बड़ी भीड़ को जल्दी से आगे बढ़ने में सक्षम होने के लिए तैयार किया था। फ़िरौन अब एक अच्छे मन में था, परन्तु अनुभव से इस्राएलियों के पास यह सोचने का कारण था कि वह लंबे समय तक ऐसा नहीं करेगा, और इसलिए यह रुकने का समय नहीं था। वहाँ कितने लोग थे? वचन 37 इस प्रश्न का उत्तर देता है, "बाल–बच्‍चों को छोड़ वे कोई छ: लाख पैदल चलनेवाले पुरुष थे।" यदि प्रत्येक पुरुष की एक पत्नी और दो सन्तान होती, तो वे 1,800,000 लोगों को जोड़ देते। इसे 600,000 लोगों में जोड़ें और आपको कुल 2,400,000 मिलेंगे। यह केवल एक अनुमान है। हालाँकि, यह उन 70 लोगों से कहीं अधिक है, जो केवल 200 वर्ष पहले याक़ूब और यूसुफ के समय में मिस्र गए थे! सताए गए दासों की सँख्या में वृद्धि हुई। उस आशीर्वाद की सामर्थ्य और प्रभावकारिता को देखें, जब परमेश्‍वर इसे आज्ञा देता है, फलदायी बनाता और गुणन करता है। यह उस भीड़ के लिए भी विशिष्ट था, जो सुसमाचार द्वारा कलीसिया में लाई गई थी, जब यह पहली बार स्थापित की गई थी; इस तरह से परमेश्‍वर का वचन शक्तिशाली रूप से विकसित हुआ, और प्रबल हुआ।


इसके बाद हम उन लोगों पर विचार करते हैं, जो इस्राएलियों के साथ चले आए थे। वचन 38 के अनुसार, "उनके साथ मिली–जुली हुई एक भीड़ गई" ये उस बड़े परिवार पर आश्रित रहे होंगे—जिनमें से कुछ शायद अपना देश छोड़ने को भी तैयार रहे होंगे, क्योंकि यह विपत्तियों द्वारा नाश कर दिया गया था, अन्य अपने नियति की खोज में थे, अन्य जिज्ञासा के कारण वहाँ से निकल आए थे, शायद इस्राएलियों को अपने परमेश्‍वर के लिए बलिदान करते हुए देखने के लिए, जिन्हें अब बहुत ज्यादा प्रतिष्ठा मिली थी, कुछ शायद जंगल में उनके लिए इब्री परमेश्‍वर के कुछ वैभवशाली रूपों को देखने की आशा कर रहे थे, मिस्र में वे अपने लिए उनके परमेश्‍वर के ऐसे वैभवशाली रूपों को देख रहे थे। भजन संहिता 78:12 कहता है, "उसने तो उनके बापदादों के सम्मुख मिस्र देश के सोअन के मैदान में अद्भुत कर्म किए थे।" मैं उन्हें और अधिक देखने की इच्छा के लिए दोष नहीं दे सकता। कुछ लोग निश्‍चित रूप से राहाब जैसे भले कारणों से निकल आए, जिन्होंने केवल चमत्कारों के बारे में सुना और सच्चे परमेश्‍वर से डरते थे। फिर भी अन्य लोग एक अशिष्ट और संभवतः असंवेदनशील भीड़ मात्र थी, जिन्हें नहीं पता था कि वे क्यों उनके पीछा जा रही थी और बाद में उनके लिए एक समस्या भी प्रमाणित हो सकती थी। गिनती 11:4 कहता है, "फिर जो मिली–जुली भीड़ उनके साथ थी वह कामुकता करने लगी; और इस्राएली भी फिर रोने और कहने लगे, ”हमें मांस खाने को कौन देगा।" जब उन्हें पता चला कि यात्रा कार्यक्रम में चालीस वर्ष तक जंगल में भटकना शामिल था, तो उनमें से कुछ शायद मिस्र लौट आए। इस्राएलियों में सदैव ऐसे लोग रहे थे, जो इस्राएली नहीं थे, और आज भी कलीसिया में पाखंडी मिलते हैं, जो समस्या पैदा करते हैं, परन्तु अंततः उनका समाधान किया जाएगा। मसीही अगुवों को इन संभावनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए और प्रत्येक "मन-परिवर्तित" को एक अवसर देना चाहिए। उनके साथ गाय-बैलों और भेड़-बकरियों के झुंड थे, यहाँ तक कि बहुत सारे मवेशी भी। मिस्र में जानवरों के विनाश को देखते हुए उनके पास जानवरों को होना उल्लेखनीय हैं। मिस्र में मिस्र के जानवरों की तुलना में इस्राएली जानवरों ने जंगल में सर्वोत्तम प्रदर्शन किया। यदि मैं एक गाय होती, तो मैं एक इस्राएली की होना चाहती!

वे अपने थैलों में कुछ आटा अपने साथ लिए मिस्र से बाहर आए। वे अगले दिन बाहर जाने की तैयारी में पकाने के लिए तैयार था, यह समझते हुए कि यह पहुँचना बहुत निकट था; परन्तु, जितना उन्होंने सोचा था, उससे जल्दी दूर होने के कारण, उन्होंने बिना खमीर के आटा ले लिया। जब वे सुक्कोत में आए, जो उनका पहला पड़ाव था, तो उन्होंने अखमीरी रोट पकाई, और हालाँकि ये, निश्‍चित रूप से, सादी और लगभग बेस्वाद थी, फिर भी अब वे जिस स्वतंत्रता और आजादी का आनन्द ले रहे थे, उसने इसे अपने जीवन में अब तक का सबसे आनन्दमयी भोजन बना दिया था। परमेश्‍वर के सेवकों को अपनी भूख का गुलाम नहीं होना चाहिए, न ही उस भूख की पूर्ति के लिए स्वयं को दे दिया जाना चाहिए, जो केवल स्वादिष्ट भोजन का स्वाद लेने पर ध्यान केंद्रित करती है। हमें परमेश्‍वर के साथ शीघ्रता से जाने में उपेक्षा या विलम्ब करने के बजाय सूखी या अखमीरी रोटी का भी मूल्याँकन करने के लिए तैयार रहना चाहिए।


अब कैलेंडर के बारे में सोचें, इस बड़ी घटना की तिथि। यह उत्पत्ति 12:2 में अब्राहम से की गई प्रतिज्ञाएँ के केवल 430 वर्ष बाद का समय था, जिसमें परमेश्‍वर ने कहा था, "और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान् करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा।" गलातियों 3:17 हमें इस घटना के समय को देखने में सहायता करता है, "पर मैं यह कहता हूँ : जो वाचा परमेश्‍वर ने पहले से पक्‍की की थी, उसको व्यवस्था चार सौ तीस वर्ष के बाद आकर नहीं टाल सकती कि प्रतिज्ञा व्यर्थ ठहरे।" 430 वर्षों तक अब्राहम के लिए परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा निष्क्रिय और अधूरा रही थी, परन्तु अब, अंत में, यह पुनर्जीवित हो गई थी, और चीजें इसे पूरा करने की दिशा में काम करने लगी थीं। देखें कि परमेश्‍वर अपनी प्रतिज्ञाएँ को निभाने में कितने समय-निष्ठ है। हालाँकि जल्दी नहीं, फिर भी निश्‍चित रूप से! वह अपनी ऋतु में पूरी हो जाएँगी।


वे कैसी स्मृतियाँ बना रहे थे! क्या वे गाते थे? क्या वे नाचते थे? बाइबल इसके विषय में कुछ नहीं बताती है। इसमें केवल वचन 42 में लिखा है, "यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से निकाल लाया, इस कारण वह रात उसके निमित्त मानने के योग्य है; यह यहोवा की वही रात है, जिसका पीढ़ी पीढ़ी में मानना इस्राएलियों के लिये अवश्य है।" मिस्रियों का विनाश और इस्राएलियों का छुटकारा कितना यादगार था! परमेश्‍वर अपने लोगों के लिए जो महान कार्य करता है, उन्हें स्मरण रखा जाना चाहिए, विशेष रूप से मसीह द्वारा हमारे उद्धार के कार्य को। फसह की यह पहली रात स्मरण रखने योग्य थी, परन्तु फसह की आखिरी रात, जिसमें मसीह को धोखा दिया गया था, बहुत अधिक देखी जाने वाली रात थी, जब मिस्र की तुलना में भारी जूआ हमारी गर्दन से टूट गया था, और कनान की तुलना में सर्वोत्तम भूमि हमारे सामने रख दी गई है। यह उनकी पीढ़ी में मनाया जाने वाला एक अस्थायी उद्धार था, परन्तु हमारे पास एक शाश्‍वत उद्धार है, जिसे वैभवशाली संतों की महिमा में सदैव और सदैव के लिए मनाया जाता है।


वचन 47 के अनुसार, सभी को उत्सव मनाना था। "पर्व का मानना इस्राएल की सारी मण्डली का कर्तव्य है।" फिर भी कोई भी फसह के पर्व का भोजन नहीं खा सकता है, परन्तु जो लोग दरवाजे से भीतर आए थे, जैसे कि अब कोई भी प्रभु के भोज के पास नहीं जा सकता है, जिसने पहले बपतिस्मा के आरंभिक आदेश को पालन नहीं किया है। लोगों को वचन द्वारा फिर से जन्म लेना चाहिए, इससे पहले कि वे इसके द्वारा पोषित हो सकें। न तो किसी को भी मसीह के बलिदान का लाभ मिलेगा, न ही उस जेवनार का, जिनका पहले मन से खतना नहीं हुआ है। खतना अब एक आत्मिक विषय है, जैसा कि कुलुस्सियों 2:11 स्पष्ट करता है। "उसी में तुम्हारा ऐसा खतना हुआ है जो हाथ से नहीं होता, अर्थात् मसीह का खतना, जिससे शारीरिक देह उतार दी जाती है।" जब मसीह द्वारा आपका खतना किया गया था, तो शरीर द्वारा शासित आपके स्वयं को उतार गया था।

दूसरी ओर, द्वार चौड़ा है। जिस किसी भी परदेशी का खतना किया गया था, उसका फसह खाने के लिए स्वागत किया जा सकता है, यहाँ तक कि सेवकों को भी। क्या वचन 44 का यही अर्थ नहीं है? "पर जो किसी का मोल लिया हुआ दास हो, और तुम लोगों ने उसका खतना किया हो, वह तो उसमें से खा सकेगा।" यदि, खतने द्वारा, वे स्वयं को परमेश्‍वर के नियमों के अधीन कर देंगे, तो उनका स्वागत इसके पवित्र पर्वों के आनन्द में भाग लेने के लिए किया जाएगा, अन्यथा नहीं। केवल वचन 48 में यह सूचित किया गया है कि जो लोग परिवारों के स्वामी थे, उनका खतना न केवल स्वयं किया जाना चाहिए, बल्कि उनके सभी लोगों का भी खतना किया जाना चाहिए। "और यदि कोई परदेशी तुम लोगों के संग रहकर यहोवा के लिये पर्व को मानना चाहे, तो वह अपने यहाँ के सब पुरुषों का खतना कराए, तब वह समीप आकर उसको माने; और वह देशी मनुष्य के तुल्य ठहरेगा। पर कोई खतनारहित पुरुष उसमें से न खाने पाए।" इससे हम दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जिन्हें प्रत्येक मसीही अगुवे को ध्यान में रखना चाहिए। सुसमाचार समावेशी, सभी का स्वागत करने वाला और अनन्य दोनों है, जो उन लोगों तक सीमित है, जो परमेश्‍वर के प्रति अपनी सही प्रतिक्रिया से योग्य हैं। हर किसी के पास अवसर है, परन्तु केवल वही लोग द्वार में प्रवेश कर सकते हैं, जो परमेश्‍वर की शर्तों को स्वीकार करते हैं। द्वार चौड़ा है, परन्तु एक ही द्वार है। इस्राएली और परदेशी दोनों के लिए एक ही व्यवस्था है, जैसा कि वचन 49 में कहा गया है, "उसकी व्यवस्था देशी और तुम्हारे बीच में रहनेवाले परदेशी दोनों के लिये एक ही हो।" यह यहूदियों को सिखाता था कि यह परमेश्‍वर के प्रति उनका समर्पण था, न कि अब्राहम से उसके वंश के प्रति, जो उसके विशेषाधिकारों के हकदार थे। और इसने गैर-यहूदियों को सिखाया कि वे भी प्रवेश कर सकते हैं, यदि वे परमेश्‍वर के अधिकार को स्वीकार करते हैं और उसकी शर्तों के अधीन होते हैं। एक सच्चे मन से परिवर्तित व्यक्ति का एक मूल इस्राएली के रूप में फसह में स्वागत किया गया था। कई वर्षों के बाद यशायाह भविष्यद्वक्ता ने इस बात को यशायाह 56:6, 7 में स्पष्ट रूप से सिखाया, "परदेशी भी जो यहोवा के साथ इस इच्छा से मिले हुए हैं कि उसकी सेवा टहल करें और यहोवा के नाम से प्रीति रखें और उसके दास हो जाएँ, जितने विश्रामदिन को अपवित्र करने से बचे रहते और मेरी वाचा का पालन करते हैं, उनको मैं अपने पवित्र पर्वत पर ले आकर अपने प्रार्थना के भवन में आनन्दित करूँगा; उनके होमबलि और मेलबलि मेरी वेदी पर ग्रहण किए जाएँगे; क्योंकि मेरा भवन सब देशों के लोगों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा।" 


दास अंततः छटुकारा पा गए थे और परदेशी लोग मण्डली में शामिल हो सके थे! हालेल्यूयाह!