प्रावधान

अध्याय तीस


निर्गमन 16:1-18

Ron Meyers

1फिर एलीम से कूच करके इस्राएलियों की सारी मण्डली, मिस्र देश से निकलने के बाद दूसरे महीने के पंद्रहवें दिन को, सीन नामक जंगल में, जो एलीम और सीनै पर्वत के बीच में है, आ पहुँची। 2जंगल में इस्राएलियों की सारी मण्डली मूसा और हारून के विरुद्ध बकबक करने लगी। 3इस्राएली उनसे कहने लगे, “जब हम मिस्र देश में मांस की हांडियों के पास बैठकर मनमाना भोजन करते थे, तब यदि हम यहोवा के हाथ से मार डाले भी जाते तो उत्तम वही था; पर तुम हम को इस जंगल में इसलिये निकाल ले आए हो कि इस सारे समाज को भूखों मार डालो।” 4तब यहोवा ने मूसा से कहा, “देखो, मैं तुम लोगों के लिये आकाश से भोजन वस्तु बरसाऊँगा; और ये लोग प्रतिदिन बाहर जाकर प्रतिदिन का भोजन इकट्ठा करेंगे, इससे मैं उनकी परीक्षा करूँगा कि ये मेरी व्यवस्था पर चलेंगे कि नहीं। 5और ऐसा होगा कि छठवें दिन वह भोजन अन्य दिनों से दूना होगा, इसलिये जो कुछ वे उस दिन बटोरें उसे तैयार कर रखें।” 6तब मूसा और हारून ने सारे इस्राएलियों से कहा, “साँझ को तुम जान लोगे कि जो तुम को मिस्र देश से निकाल ले आया है वह यहोवा है, 7और भोर को तुम्हें यहोवा का तेज देख पड़ेगा, क्योंकि तुम जो यहोवा पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं कि तुम हम पर बुड़बुड़ाते हो।” 8फिर मूसा ने कहा, “यह तब होगा जब यहोवा साँझ को तुम्हें खाने के लिये मांस और भोर को रोटी मनमाने देगा; क्योंकि तुम जो उस पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं? तुम्हारा बुड़बुड़ाना हम पर नहीं यहोवा ही पर होता है।” 9फिर मूसा ने हारून से कहा, “इस्राएलियों की सारी मण्डली को आज्ञा दे कि यहोवा के सामने वरन् उसके समीप आए, क्योंकि उसने उनका बुड़बुड़ाना सुना है।” 10और ऐसा हुआ कि जब हारून इस्राएलियों की सारी मण्डली से ऐसी ही बातें कर रहा था कि उन्होंने जंगल की ओर दृष्‍टि करके देखा, और उनको यहोवा का तेज बादल में दिखलाई दिया। 11तब यहोवा ने मूसा से कहा, 12”इस्राएलियों का बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है; उनसे कह दे कि गोधूलि के समय तुम मांस खाओगे और भोर को तुम रोटी से तृप्‍त हो जाओगे; और तुम यह जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ।” 13तब ऐसा हुआ कि साँझ को बटेरें आकर सारी छावनी पर बैठ गईं; और भोर को छावनी के चारों ओर ओस पड़ी। 14और जब ओस सूख गई तो वे क्या देखते हैं कि जंगल की भूमि पर छोटे छोटे छिलके पाले के किनकों के समान पड़े हैं। 15यह देखकर इस्राएली, जो न जानते थे कि यह क्या वस्तु है, वे आपस में कहने लगे यह तो मन्ना है। तब मूसा ने उनसे कहा, “यह वही भोजनवस्तु है, जिसे यहोवा तुम्हें खाने के लिये देता है। 16जो आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है : तुम उसमें से अपनी आवश्यकता के अनुसार खाने के लिये बटोरा करना, अर्थात् अपने अपने प्राणियों की गिनती के अनुसार, प्रति मनुष्य के पीछे एक एक ओमेर बटोरना; जिसके डेरे में जितने हों वह उन्हीं के लिये बटोरा करे।” 17और इस्राएलियों ने वैसा ही किया; और किसी ने अधिक, और किसी ने थोड़ा बटोर लिया। 18जब उन्होंने उसको ओमेर से नापा, तब जिसके पास अधिक था उसके कुछ अधिक न रह गया, और जिसके पास थोड़ा था उसको कुछ घटी न हुई; क्योंकि एक एक मनुष्य ने अपने खाने योग्य ही बटोर लिया था।


इस्राएल की सेना पहले महीने के पंद्रहवें दिन मिस्र से निकली और दूसरे महीने के पंद्रहवें दिन 'सीन' के जंगल में पहुँची। (1) ऐसा लगता है कि वे अपने साथ एक महीने तक चलने जितना पर्याप्त भोजन सामग्री ले गए होंगे, क्योंकि अब, एक महीने बाद, जब वह भोजन समाप्त हो गया, तो उन्हें भोजन की आवश्यकता हुई और उन्होंने फिर से शिकायत करना आरम्भ कर दिया। वचन 2 और 3 हमें यही बताते हैं: “जंगल में इस्राएलियों की सारी मण्डली मूसा और हारून के विरुद्ध बकबक करने लगी। इस्राएली उनसे कहने लगे, “जब हम मिस्र देश में मांस की हांडियों के पास बैठकर मनमाना भोजन करते थे, तब यदि हम यहोवा के हाथ से मार डाले भी जाते तो उत्तम वही था; पर तुम हम को इस जंगल में इसलिये निकाल ले आए हो कि इस सारे समाज को भूखों मार डालो।”” ऐसा प्रतीत होता है कि, यदि पूरी मण्डली नहीं, तो उनमें से अधिकांश लोगों ने इस शिकायत में हिस्सा लिया। उन्होंने सीधे तौर पर परमेश्‍वर के विरुद्ध तो नहीं बड़बड़ाया, परन्तु उसका परिणाम लगभग वैसा ही था—उन्होंने मूसा और हारून के विरुद्ध शिकायत की, जो परमेश्‍वर के प्रतिनिधि थे। उन्होंने अपनी शिकायत को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, और विपत्ति की पहली झलक मिलते ही यह मान लिया कि इस जंगल में उनकी मृत्यु निश्‍चित है। यदि प्रभु यहोवा उन्हें मारना चाहता है, तो वह आसानी से उन्हें लाल सागर में ही मार सकता था। परन्तु, ऐसा नहीं था! उसने उन्हें सुरक्षित रखा, और अब वह उतनी ही आसानी से उनके लिए भोजन की व्यवस्था भी कर सकता था। हर छोटी-मोटी परेशानी या खतरे की आशंका होने पर ही जीवन से निराश हो जाना और केवल शीघ्र मृत्यु की बातें करना—यह परमेश्‍वर, उसकी सामर्थ्य और उसकी भलाई पर गहरे अविश्‍वास का प्रमाण है। वे मूसा पर उन्हें भूखा मारने का आरोप लगाते हैं, जबकि वही उन्हें मिस्र से बाहर निकालकर लाया था। उसने जो कुछ भी किया था, वह परमेश्‍वर के आदेश पर और उनके भले को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया था। प्रिय अगुवों! यह कोई नई बात नहीं है कि सबसे बड़ी भलाइयों को गलत समझा जाए और उन्हें नीचतापूर्ण ढंग से सबसे बड़ी चोट या नुकसान के रूप में प्रस्तुत किया जाए। कभी-कभी सर्वोत्तम कार्यों की भी सबसे बुरी व्याख्याएँ की जाती हैं। उन्होंने मूर्खतापूर्ण ढंग से अपने छुटकारे (बचाव) के महत्व को इतना कम आँका कि वे यह इच्छा करने लगे कि काश कि वे मिस्र में ही मर गए होते—भले ही प्रभु यहोवा के हाथों ही क्यों न मरते; अर्थात्, उन विपत्तियों में से किसी एक के द्वारा, जिन्होंने मिस्रियों को घात किया था। वे ऐसा व्यवहार कर रहे थे, मानो उन्हें इस भूखे जंगल में लाने वाला प्रभु यहोवा का हाथ नहीं, बल्कि केवल मूसा का ही हाथ था। जब लोग यह नहीं समझते कि परमेश्‍वर ही हर चीज का 'प्रथम कारण' हैं, तब पीड़ा, बीमारी या ठेस के बारे में ऐसी बातें कहना लोगों में सामान्य बात है। वे मूसा और परमेश्‍वर पर यह आरोप लगाते हैं कि वह उन्हें मार डालना चाहता है, जबकि वास्तव में वे दोनों मिलकर उन्हें जीवन देने के लिए काम कर रहे हैं। यह तो सरासर पागलपन है! वे मिस्र के उन मांस की हांडियों के पास मरना ज्यादा पसन्द करेंगे—जहाँ उनके पास खाने-पीने का सामान तो था, परन्तु कोई स्वतंत्रता नहीं थी—बजाय इसके कि वे जंगल में उस स्वर्गीय खम्भे के मार्गदर्शन में रहें और परमेश्‍वर के हाथों से उनका पालन-पोषण हो! वे परमेश्‍वर के पिता-तुल्य अनुशासन को सहने के बजाय—जो कि उसकी सन्तान की विश्‍वासयोग्यता की सिर्फ एक छोटी-सी, कुछ समय के लिए ली जाने वाली परीक्षा थी—पर वे परमेश्‍वर के शत्रुओं के साथ विनाश का शिकार होना ज्यादा सर्वोत्तम मानते हैं! हम यह नहीं मान सकते कि मिस्र में उनके पास बहुत ज्यादा सुख-सुविधाएँ थीं, भले ही अब वे मिस्र के उन मांस की हांडियों से मिलने वाले सुखों को कितना भी बढ़ा-चढ़ाकर क्यों न बताएँ। न ही वे जंगल में खाने की कमी से मरने का कोई वैद्य डर रख सकते थे, जबकि उनके साथ उनकी भेड़-बकरियों के झुंड भी थे। असंतोष अतीत की अच्छी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है, और वर्तमान की बुराइयों को बहुत ज्यादा बुरा बनाकर प्रस्तुत करता है। ऐसी सोच में सच्चाई या तर्क कहाँ है? वह समय उतना अच्छा नहीं था, जितना वे उसे बताते हैं, और यह समय उतना मुश्किल नहीं है, जितना वे होने का दिखावा कर रहे थे। जिस तरह से वे बातें करते हैं, वह मूर्खतापूर्ण और बेतुका है। उनका अधीर होना, कृतघ्न होना, और परमेश्‍वर पर अविश्‍वास करना इसलिए और भी ज्यादा बुरा था, क्योंकि उन्हें अभी हाल ही में इतने चमत्कारी वरदान मिले थे, और लाल सागर तथा मारा में ऐसे ठोस सबूत मिले थे, जिनसे यह साबित होता था कि परमेश्‍वर उनकी सहायता कर सकता है और अवश्य करेगा। वे उसके चमत्कारों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं। भजन संहिता 106:7-13 में कहा गया है, “मिस्र में हमारे पुरखाओं ने तेरे आश्‍चर्यकर्मों पर मन नहीं लगाया, न तेरी अपार करुणा को स्मरण रखा; उन्होंने समुद्र के किनारे अर्थात् लाल समुद्र के किनारे बलवा किया। तौभी उसने अपने नाम के निमित्त उनका उद्धार किया, जिससे वह अपने पराक्रम को प्रगट करे। तब उसने लाल समुद्र को घुड़का और वह सूख गया; और वह उन्हें गहिरे जल के बीच से मानो जंगल में से निकाल ले गया। उसने उन्हें बैरी के हाथ से उबारा, और शत्रु के हाथ से छुड़ा लिया। और उनके शत्रु जल में डूब गए; उनमें से एक भी न बचा। तब उन्होंने उसके वचनों का विश्‍वास किया; और उसकी स्तुति गाने लगे। परन्तु वे झट उसके कामों को भूल गए; और उसकी युक्‍ति के लिये न ठहरे।” काश मैं भी परमेश्‍वर की दयालुता से भरी बातों को और अधिक सर्वोत्तम तरीके से स्मरण रख पाता! मुझे यह सीखना होगा कि परमेश्‍वर की मुझ पर की गई कृपा—जिसके मैं योग्य नहीं हूँ—मुझे बिगाड़ न दे, या मुझे यह सोचने पर मजबूर न कर दे, कि मैं उस पाने के योग्य हूँ। इसके बजाय, उन्हें मुझे विनम्रता सिखानी चाहिए और मुझे उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए।

आइए देखें कि परमेश्‍वर उन पर कितना दयालु है। वह न्यायसंगत रूप से कह सकता था, "मैं इन बड़बड़ाने वालों पर आग और गंधक बरसाऊँगा, और उन्हें भस्म कर दूँगा" परन्तु, इसके विपरीत, वह उन पर रोटी बरसाने की प्रतिज्ञा करता है। सबसे पहले, परमेश्‍वर मूसा को अपनी दयालु मंशा के बारे में बताता है, ताकि मूसा स्वयं निश्‍चिंत हो सके और उसे यह सोचने का प्रलोभन न हो कि काश उसने उन्हें मिस्र में ही छोड़ दिया होता। परमेश्‍वर अपने लोगों की शिकायतों पर ध्यान देता है। वचन 12 कहता है, "इस्राएलियों का बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है; उनसे कह दे कि गोधूलि के समय तुम मांस खाओगे और भोर को तुम रोटी से तृप्‍त हो जाओगे; और तुम यह जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ।'" एक दयालु परमेश्‍वर के रूप में, वह उनकी उन आवश्यकताओं से अवगत था, जो उनकी बड़बड़ाहट का कारण थीं। और साथ ही, न्याय की दृष्टि से, हमारा पवित्र परमेश्‍वर अपने सेवक मूसा के विरुद्ध उनके नीच और अयोग्य आरोपों से भी अवगत था। वह इससे अप्रसन्न था। जब लोग परेशान और बेचैन होने लगते हैं, तो उन्हें यह सोचना चाहिए कि परमेश्‍वर हमारी सारी बड़बड़ाहट सुनता है, भले ही वे मन की चुप्पी में की गई बड़बड़ाहट ही क्यों न हों। पास्टरों के ऊपर बिशप, मसीहियों की देखरेख करना वाला पास्टर, बच्चों के माता-पिता, और कर्मचारियों के नियोक्ता—ये सभी उन लोगों की सारी बड़बड़ाहट नहीं सुन पाते, जिनके लिए वे जिम्मेदार हैं। यह अच्छा ही है कि वे इन्हें नहीं सुनते, क्योंकि शायद वे इसे सहन नहीं कर पाते; परन्तु परमेश्‍वर सुनता है, और फिर भी अपने लोगों के चरित्र पर काम करता रहता है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि परमेश्‍वर मनुष्यों के पापों का बदला तुरंत नहीं लेता, इसलिए वह उन पर ध्यान नहीं देता। नहीं, वह इस्राएल की बड़बड़ाहट सुनता है और उस पीढ़ी से दु:खी होता है, और फिर भी एक नासमझ, अनुभवहीन बच्चे के कोमल माता-पिता की तरह उनकी देखभाल करना जारी रखता है। वचन 4 में वह उनसे एक शीघ्रता से आने वाली, पर्याप्त और लगातार वाली आपूर्ति की प्रतिज्ञा करता है, “तब यहोवा ने मूसा से कहा, “देखो, मैं तुम लोगों के लिये आकाश से भोजन वस्तु बरसाऊँगा; और ये लोग प्रतिदिन बाहर जाकर प्रतिदिन का भोजन इकट्ठा करेंगे, इससे मैं उनकी परीक्षा करूँगा कि ये मेरी व्यवस्था पर चलेंगे कि नहीं।””  चूँकि मनुष्य मिट्टी से बना है, इसलिए उसके रचयिता ने बुद्धिमानी से उसके लिए भोजन की व्यवस्था भी मिट्टी से ही की है, जैसा कि भजन संहिता 104:14 में कहा गया है, “तू पशुओं के लिये घास, और मनुष्यों के काम के लिये अन्न आदि उपजाता है, और इस रीति भूमि से वह भोजन–वस्तुएँ उत्पन्न करता है।” चाहे वह घास हो, सब्जियाँ हों, फल हों या मन्ना, यह सब कुछ पृथ्वी से ही और परमेश्‍वर की ओर से आता है। इस तरह उसने यह परखा कि क्या वे उस पर भरोसा करेंगे, और विश्‍वास वाली व्यवस्था पर चलेंगे या नहीं; उसने यह परखा कि क्या वे केवल उस दिन के भोजन पर ही निर्भर रहकर गुजारा कर सकते हैं, और भले ही वे इस बात से चिंतित हों कि उनका भोजन हर दिन समाप्त हो जाता है, क्या वे उस दिन की रोटी से ही संतुष्ट रह सकते हैं और अगले दिन की ताजी आपूर्ति के लिए परमेश्‍वर पर निर्भर रह सकते हैं? इस तरह उसने यह परखा कि क्या वे उसकी सेवा करेंगे, और ऐसे भले स्वामी के प्रति हमेशा विश्‍वासयोग्य रहेंगे, जो अपने सेवकों के लिए इतनी अच्छी व्यवस्था करता है। यहाँ हम यह सीख सकते हैं कि लोग कितने कृतघ्न हो सकते हैं और परमेश्‍वर कितना अद्भुत है। बुद्धिमान यशायाह, यशायाह 26:10 में कहता है, “दुष्‍ट पर चाहे दया भी की जाए तौभी वह धर्म को न सीखेगा; धर्मराज्य में भी वह कुटिलता करेगा, और यहोवा का माहात्म्य उसे सूझ न पड़ेगा।” एक मसीही अगुवे के लिए इस प्रवृत्ति से अवगत होना और लोगों को कृतज्ञता का पाठ पढ़ाना सहायक होता है।

हम मूसा के अच्छे उदाहरण से मसीही अगुवाई के बारे में सीख रहे हैं। देखिए कि मूसा ने कितनी जल्दी हारून को लोगों को भरोसा दिलाने का निर्देश दिया। यहाँ हारून स्पष्ट रूप से अब भी उसकी ओर से नबी था, जैसा कि वह फ़िरौन के लिए था। मूसा ने हारून को निर्देश दिया, जैसा कि वचन 9 में कहा गया है: “फिर मूसा ने हारून से कहा, “इस्राएलियों की सारी मण्डली को आज्ञा दे कि यहोवा के सामने वरन् उसके समीप आए, क्योंकि उसने उनका बुड़बुड़ाना सुना है।”” यह संभव है कि जब हारून मंडली को प्रभु यहोवा के सामने आने की सार्वजनिक घोषणा कर रहा था, तब मूसा परमेश्‍वर के साथ अकेले में प्रार्थना करने चला गया, और वचन 10 में वर्णित प्रभु यहोवा की महिमा का प्रकट होना मूसा की प्रार्थना का उत्तर था। “और ऐसा हुआ कि जब हारून इस्राएलियों की सारी मण्डली से ऐसी ही बातें कर रहा था कि उन्होंने जंगल की ओर दृष्‍टि करके देखा, और उनको यहोवा का तेज बादल में दिखलाई दिया।” निश्‍चित रूप से यह परमेश्‍वर के मूसा से कहे वचनों के अनुसार था और मूसा की प्रार्थना का उत्तर था। परमेश्‍वर इतनी कृपा करता है कि वह बड़बड़ाने वालों की बात भी निष्पक्षता से सुनता है। मसीही अगुवों को परमेश्‍वर के इस नमुने का पालन करना चाहिए और लोगों की बात सुननी चाहिए। अय्यूब 31:13-15 कहता है: “जब मेरे दास या दासी ने मुझ से मेरी शिकायत की, तब यदि मैं ने उनका हक मार दिया हो; तो जब ईश्‍वर उठ खड़ा होगा, तब मैं क्या करूँगा? जब वह आएगा तब मैं क्या उत्तर दूँगा? जिसने मुझे गर्भ में बनाया क्या वही उसका भी बनानेवाला नहीं? क्या एक ही ने हम दोनों की सूरत गर्भ में न रची थी?” मूसा ने उनकी बात सुनी, परन्तु साथ ही उन्हें उनकी बड़बड़ाहट की बुराई का भी एहसास भी दिलाया। उन्हें लगा कि उन्होंने केवल मूसा और हारून का अपमान किया है, परन्तु यहाँ उन्हें बताया गया है कि जब उन्होंने शिकायत की, तो वास्तव में उन्होंने परमेश्‍वर पर ही आक्रमण किया था। वचन 7 और 8 इसे स्पष्ट करते हैं, और आज के मसीही अगुवों के लिए इसे याद रखना अच्छा है। “‘...और भोर को तुम्हें यहोवा का तेज देख पड़ेगा, क्योंकि तुम जो यहोवा पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं कि तुम हम पर बुड़बुड़ाते हो।”  फिर मूसा ने कहा, “यह तब होगा जब यहोवा साँझ को तुम्हें खाने के लिये मांस और भोर को रोटी मनमाने देगा; क्योंकि तुम जो उस पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं? तुम्हारा बुड़बुड़ाना हम पर नहीं यहोवा ही पर होता है?’” "तुम हमारे विरुद्ध शिकायत नहीं कर रहे हो, बल्कि प्रभु यहोवा के विरुद्ध कर रहे हो।" जब हम उन लोगों के विरुद्ध बड़बड़ाते हैं, जो परमेश्‍वर के दूत या प्रतिनिधि हैं—और जो अपने अधिकार के कारण हमें असहज महसूस करा सकते हैं, फिर चाहे यह सही हो या गलत—तो हमें यह सोचना चाहिए कि ऐसा करके हम परमेश्‍वर को कितना दर्शाते हैं; मनुष्य तो बस परमेश्‍वर के हाथ में है। जो लोग अपने बड़ों की डांट या निर्देशों से बुरा मनाते हैं—विशेषकर जब कोई संवेदनशील मुद्दा सामने आता है—तो वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, क्योंकि वे तो असल में अपने रचयिता से ही लड़ रहे होते हैं। बड़बड़ाने वालों का मुँह हमेशा के लिए यह सोचकर बंद हो जाना चाहिए, कि परमेश्‍वर के विरुद्ध बड़बड़ाना घोर अहंकार है—क्योंकि वह परमेश्‍वर है; और मनुष्य के विरुद्ध बड़बड़ाना घोर मूर्खता है—क्योंकि वे तो बस मनुष्य मात्र हैं।

मूसा उन्हें उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का भी भरोसा दिलाता है: चूंकि उन्होंने मांस की हांडियों की इतनी ज्यादा रट लगा रखी थी, इसलिए उस शाम उन्हें एक बार के लिए मांस (बटेर) भरपूर मात्रा में मिलेगा, अगली सुबह रोटी (मन्ना) मिलेगी, और उसके बाद हर दिन मन्ना मिलता रहेगा। बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिनके बारे में हम कहते हैं कि उन्हें शिक्षा से ज्यादा भोजन मिला है; परन्तु इस्राएलियों को भोजन इसलिए दिया गया था, ताकि उन्हें शिक्षा दी जा सके। व्यवस्थाविवरण 8:3 कहता है, "उसने तुझ को नम्र बनाया, और भूखा भी होने दिया, फिर वह मन्ना, जिसे न तू और न तेरे पुरखा ही जानते थे, वही तुझ को खिलाया; इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुँह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है।" इसके अतिरिक्त, यहाँ दो और बातें बताई गई हैं, जिन्हें वह उन्हें 'मन्ना' भेजकर सिखाना चाहता था। पहली बात यह कि उन्हें मिस्र से बाहर निकालने वाला मूसा नहीं, बल्कि प्रभु यहोवा स्वयं था। "तब मूसा और हारून ने सारे इस्राएलियों से कहा, “साँझ को तुम जान लोगे कि जो तुम को मिस्र देश से निकाल ले आया है, वह यहोवा है।'" यह सोचना नासमझी थी कि उन्हें बाहर निकालने वाला मूसा था। उन्हें मूसा से शिकायत नहीं करनी चाहिए थी। अब परमेश्‍वर ने उन्हें मन्ना भेजा, ताकि यह साबित हो सके कि उन्हें बाहर निकालने वाली सामर्थ्य और भलाई असीम थी, और यही उस काम को पूरा कर सकती थी, जिसका आरम्भ हुआ था। यदि उन्हें मिस्र से बाहर निकालने वाले केवल मूसा होता, तो वह उन्हें इस तरह भोजन नहीं खिला पाता; इसलिए उन्हें यह मानना ​​ही होगा कि यह प्रभु यहोवा का ही काम था। बाद में यीशु ने यूहन्ना 6:32 में सिखाया, "यीशु ने उनसे कहा, "मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि मूसा ने तुम्हें वह रोटी स्वर्ग से नहीं दी, परन्तु मेरा पिता तुम्हें सच्‍ची रोटी स्वर्ग से देता है।"" दूसरी बात, जैसा कि वचन 6 में मिलता है, "तब मूसा और हारून ने सारे इस्राएलियों से कहा, "साँझ को तुम जान लोगे कि जो तुम को मिस्र देश से निकाल ले आया है, वह यहोवा है।"" और वचन 12 में भी, कि परमेश्‍वर ही उनका प्रभु और उनका परमेश्‍वर था। "इस्राएलियों का बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है; उनसे कह दे कि गोधूलि के समय तुम मांस खाओगे और भोर को तुम रोटी से तृप्‍त हो जाओगे; और तुम यह जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ।'" इससे प्रभु यहोवा के रूप में उसकी सामर्थ्य का, और उनके परमेश्‍वर के रूप में उन पर उसकी विशेष कृपा का प्रमाण मिला। जब परमेश्‍वर ने मिस्रियों पर विपत्तियाँ भेजीं, तो ऐसा इसलिए किया, ताकि उन्हें पता चल जाए कि वह ही प्रभु यहोवा है; परन्तु जब उसने इस्राएलियों के लिए भोजन का प्रबंध किया, तो ऐसा इसलिए किया, ताकि उन्हें पता चल जाए कि वह ही उनका प्रभु है। यह ऐसा कहने जैसा था, "तो फिर, मूसा के विरुद्ध शिकायत करना बंद करो!!" यह परमेश्‍वर ने किया था, और परमेश्‍वर ही परमेश्‍वर है।


यात्रियों की देखभाल सीधे परमेश्‍वर के हाथों होने लगी। रात में, उसने उनके लिए एक जेवनार की तैयारी की, जिसमें स्वादिष्ट पक्षी थे, टिड्डियाँ नहीं। भजन संहिता 78:27 कहता है, “और उनके लिये मांस धूल के समान बहुत बरसाया, और समुद्र के बालू के समान अनगिनित पक्षी भेजे।” फिर, अगली सुबह उन्होंने उन पर ‘मन्ना’ बरसाया, जो उनके प्रतिदिन के भोजन के तौर पर उन्हें लगातार मिलता रहा। उन्हें जो भोजन मिला, वह मन्ना था, जो बादलों से ओस की तरह नीचे उतरा; इसलिए, एक लाक्षणिक अर्थ में, यह कहा जा सकता है कि वे स्वर्ग से आए हुए भोजन पर जीवित रहे। यह ओस के रूप में नीचे आया और पिघल गया, फिर भी इसकी बनावट ऐसी थी कि यह बिना किसी और चीज की तरह, एक पौष्टिक और शक्ति देने वाले भोजन का काम कर सके। उन्होंने इसे ‘मन्ना’ या ‘मनहू’ कहा, जिसका अर्थ है: “यह क्या है?” इस प्रश्न का मतलब यह हो सकता था: “यह कितनी हल्की सी चीज है!”—अर्थात् इसे तुच्छ समझना; या, “यह कितनी अजीब चीज है!”—अर्थात् इसकी प्रशंसा करना। ज्यादा आवश्यक बात यह है कि यह चाहे जो भी हो, यह वह चीज है, जो हमारे परमेश्‍वर ने हमारे लिए ठहराई है, और हम इसे स्वीकार करेंगे और इसके लिए आभारी रहेंगे। वचन 14 और 15 कहते हैं: “और जब ओस सूख गई तो वे क्या देखते हैं कि जंगल की भूमि पर छोटे छोटे छिलके पाले के किनकों के समान पड़े हैं। यह देखकर इस्राएली, जो न जानते थे कि यह क्या वस्तु है, वे आपस में कहने लगे, यह तो मन्ना है। तब मूसा ने उनसे कहा, “यह वही भोजनवस्तु है, जिसे यहोवा तुम्हें खाने के लिये देता है।’” यह एक स्वादिष्ट भोजन था; यहूदी कहते हैं कि यह हर किसी को स्वादिष्ट लगता था, चाहे उनकी पसन्द कितनी भी अलग क्यों न हो। यह एक ठोस भोजन था, जिसे पचाना आसान था; और चिकित्सा स्रोत के अनुसार, यह उन्हें उन बीमारियों से मुक्त करने के लिए बहुत लाभकारी था, जिनके संक्रमण का खतरा उन्हें अपनी गुलामी के दिनों में रहा होगा। एक ठोस भोजन, किसी स्वादिष्ट या विलासितापूर्ण भोजन से कहीं ज्यादा आवश्यक होता है। इस व्यावहारिक, ठोस और सादे भोजन से हम स्वस्थ खान-पान का एक महत्वपूर्ण सबक सीख सकते हैं।

उन्हें इसे हर सुबह इकट्ठा करना होता था, जैसा कि वचन 21 में कहा गया है: “वे भोर को प्रतिदिन अपनी आवश्यकता के अनुसार खाने के लिये बटोर लेते थे, और जब धूप कड़ी होती थी, तब वह गल जाता था।” इस तरह, उन्हें ठीक हवा में उड़ने वाले पक्षियों की तरह ही, प्रतिदिन मिलने वाले भोजन पर ही निर्भर रहना होता था। जब यीशु हमें प्रार्थना करना सिखाता है, "हमें हमारे प्रतिदिन की रोटी दे," तो ऐसा लगता है कि वह इसी प्रतिदिन होने वाली मन्ना की वर्षा और उसे इकट्ठा करने की बात कर रहा है। बाइबल हमारे लिए बहुत अधिक व्यावहारिक और लाभकारी है। यह हमें अपने और अपने परिवार के लिए सही भोजन का प्रबन्ध करने में समझदारी और लगन सिखाती है। जो कुछ परमेश्‍वर कृपा करके हमें देता है, उसे हमें पूरे परिश्रम से इकट्ठा करना चाहिए; हमें शांति से काम करते हुए अपनी रोटी खानी चाहिए, न तो आलस की रोटी खानी चाहिए और न ही धोखे की। यहाँ तक कि जब मन्ना की वर्षा हुई थी, तब भी परमेश्‍वर की उदारता ने मनुष्य के कर्तव्य के लिए अपना स्थान छोड़ दिया था। उन्हें हर दिन उसे इकट्ठा करना पड़ता था; इस तरह वे संतोष और पर्याप्तता से मिलने वाली संतुष्टि के बारे में यह आवश्यक सिद्धांत सीख सकते थे। उन्हें हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकता के अनुसार इकट्ठा करना था। जितना पर्याप्त है, उतना ही लेना था। जितना पर्याप्त है, वह किसी जेवनार से कम नहीं है, और आवश्यकता से ज्यादा होना हमारी स्वास्थ्य के लिए बुरा है। जिनके पास आवश्यकता से ज्यादा है, वे भी उतना ही खा सकते थे, जितना उनके पेट में आ सकता था। जिनके पास बहुत सारे कपड़े हैं, वे भी एक समय में कपड़ों का केवल एक ही जोड़ा पहन सकते हैं। मन्ना के विषय में, जो ज्यादा इकट्ठा करता है, उसके पास कुछ भी बचता नहीं है, और जो कम इकट्ठा करता है, उसे किसी चीज की घटी नहीं होती थी। प्रतिदिन की रोटी के बारे में यीशु का विचार बहुत व्यावहारिक है। मसीही अगुवे इस घटना का उपयोग लोगों को इस बात से संतुष्ट होने में सहायता करने के लिए कर सकते हैं कि उनके पास जो कुछ है, वह पर्याप्त है। परमेश्‍वर जो कुछ देता है, उससे संतुष्ट रहने के लाभों के बारे में सोचिए। यह भी एक अच्छी अगुवाई है।


इस कहानी में हमें अगुवों के लिए दो आवश्यक सबक मिलते हैं। 1. अगुवों को लोगों की शिकायतों को स्वयं दूर करके परमेश्‍वर की ओर मोड़ना सीखना चाहिए। 2. परमेश्‍वर का प्रबन्ध शायद एक समय में केवल एक दिन के लिए ही हो, इसलिए हमें लगातार भरोसा करना सीखना चाहिए।