निर्देश

अध्याय इकत्तीस


निर्गमन 16:19-36

Ron Meyers

19फिर मूसा ने उनसे कहा, “कोई इसमें से कुछ सबेरे तक न रख छोड़े।” 20तौभी उन्होंने मूसा की बात न मानी; इसलिये जब किसी किसी मनुष्य ने उसमें से कुछ सबेरे तक रख छोड़ा, तो उसमें कीड़े पड़ गए और वह बसाने लगा; तब मूसा उन पर क्रोधित हुआ। 21वे भोर को प्रतिदिन अपनी आवश्यकता के अनुसार खाने के लिये बटोर लेते थे, और जब धूप कड़ी होती थी, तब वह गल जाता था। 22फिर ऐसा हुआ कि छठवें दिन उन्होंने दूना, अर्थात् प्रति मनुष्य के पीछे दो दो ओमेर बटोर लिया, और मण्डली के सब प्रधानों ने आकर मूसा को बता दिया। 23उसने उनसे कहा, “यह वही बात है जो यहोवा ने कही, क्योंकि कल परमविश्राम, अर्थात् यहोवा के लिये पवित्र विश्राम होगा, इसलिये तुम्हें जो तन्दूर में पकाना हो उसे पकाओ, और जो सिझाना हो उसे सिझाओ, और इसमें से जितना बचे उसे सबेरे के लिये रख छोड़ो। 24जब उन्होंने उसको मूसा की इस आज्ञा के अनुसार सबेरे तक रख छोड़ा, तब न तो वह बसाया, और न उसमें कीड़े पड़े। 25तब मूसा ने कहा, “आज उसी को खाओ, क्योंकि आज यहोवा का विश्रामदिन है; इसलिये आज तुम को वह मैदान में न मिलेगा। 26छ: दिन तो तुम उसे बटोरा करोगे; परन्तु सातवाँ दिन विश्राम का दिन है, उसमें वह न मिलेगा।” 27तौभी लोगों में से कोई कोई सातवें दिन भी बटोरने के लिये बाहर गए, परन्तु उनको कुछ न मिला। 28तब यहोवा ने मूसा से कहा, “तुम लोग मेरी आज्ञाओं और व्यवस्था को कब तक नहीं मानोगे? 29देखो, यहोवा ने जो तुम को विश्राम का दिन दिया है, इसी कारण वह छठवें दिन को दो दिन का भोजन तुम्हें देता है; इसलिये तुम अपने अपने यहाँ बैठे रहना, सातवें दिन कोई अपने स्थान से बाहर न जाना।” 30अत: लोगों ने सातवें दिन विश्राम किया। 31इस्राएल के घराने ने उस वस्तु का नाम मन्ना रखा; और वह धनिया के समान श्‍वेत था, और उसका स्वाद मधु के बने हुए पूए का सा था। 32फिर मूसा ने कहा, “यहोवा ने जो आज्ञा दी वह यह है कि इसमें से ओमेर भर अपने वंश की पीढ़ी पीढ़ी के लिये रख छोड़ो, जिससे वे जानें कि यहोवा हमको मिस्र देश से निकालकर जंगल में कैसी रोटी खिलाता था।” 33तब मूसा ने हारून से कहा, “एक पात्र लेकर उसमें ओमेर भर लेकर उसे यहोवा के आगे रख दे कि वह तुम्हारी पीढ़ियों के लिये रखा रहे।” 34जैसी आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी, उसी के अनुसार हारून ने उसको साक्षी के सन्दूक के आगे धर दिया कि वह वहीं रखा रहे। 35इस्राएली जब तक बसे हुए देश में न पहुँचे तब तक, अर्थात् चालीस वर्ष तक मन्ना खाते रहे; वे जब तक कनान देश की सीमा पर नहीं पहुँचे तब तक मन्ना खाते रहे। 36एक ओमेर तो एपा का दसवाँ भाग है।


यहाँ दो महत्वपूर्ण शब्द: निर्भरता और ईश्‍वरीय प्रावधान मिलते हैं। हम आश्रित हैं और परमेश्‍वर प्रभुता सम्पन्न है। हमारे पास आवश्यकताएँ हैं और वह प्रेम से और पर्याप्त रूप से हमारी आवश्यकताओं को पूरा करता है। इसलिए, हमें उसके निर्देशों का पालन करना चाहिए। उसके द्वारा प्रदान किए गए मन्ना से आनन्द लेने और लाभ उठाने के उचित तरीके के बारे में मूसा के निर्देश वचन 19 से आरम्भ होते हैंः "फिर मूसा ने उनसे कहा, “कोई इसमें से कुछ सबेरे तक न रख छोड़े।" यह ऐसा कहने के समान था, उन्हें बिछौने पर जाना और चैन से सोना सीखना चाहिए, हालाँकि उनके तम्बू में या उनके पूरे शिविर में उनके पास थोड़ी सी भी रोटी इस विश्‍वास के साथ नहीं है कि अगले दिन परमेश्‍वर उनके लिए रोज की रोटी लाएगा। यह उनके अपने भंडार की तुलना में परमेश्‍वर के भंडार में अधिक निश्‍चित और सुरक्षित था, और इसलिए उनके पास अधिक मीठा और स्वादिष्ट भोजन आता था। मत्ती 6:25 कहता है, "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएँगे और क्या पीएँगे; और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे। क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?" यहाँ जमाखोरी की मूर्खता को देखें। जो मन्ना कुछ लोगों द्वारा रखा गया था, जो स्वयं को अपने आज्ञाकारी पड़ोसियों की तुलना में बुद्धिमान और सर्वोत्तम प्रबंधक मानते थे, और जो आत्मनिर्भरता की हवा के साथ अगले दिन विफल होने की स्थिति में स्वयं के लिए प्रदान करने का मंशा रखते थे, उनका मन्ना खराब हो गया। उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि परमेश्‍वर के पास अपने निर्देशों को लागू करने का एक प्रभावी तरीका है; वे अगले दिन अपनी सावधानीपूर्वक सहेजी गई रोटी पाएँगे, जो सड़ी हुई, कीड़ों से भरी हुई और बिना किसी लाभ के अच्छे से भी बदतर थी। सबसे अधिक बरबाद वही चीज साबित होती है, जिसे प्रतिदिन की आवश्यकताओं के लिए—परमेश्‍वर पर भरोसा न करते हुए—लालच और अविश्‍वास के साथ जमा करके रखा जाता है। वह धन-संपत्ति भ्रष्ट हो जाती है, जैसा कि याकूब 5:2, 3 में जोर देकर बताया गया है; यह उस निर्देश का हिस्सा है, जो हमें बुरे दिनों के लिए बचत करने की अपनी क्षमता पर निर्भर रहने से रोकता है, और इसके बजाय हमें परमेश्‍वर पर निर्भर रहना सिखाता है। "तुम्हारा धन बिगड़ गया है और तुम्हारे वस्त्रों को कीड़े खा गए हैं। तुम्हारे सोने–चाँदी में काई लग गई है; और वह काई तुम पर गवाही देगी, और आग के समान तुम्हारा मांस खा जाएगी। तुम ने अन्तिम युग में धन बटोरा है।" आइए हम अपनी मानसिक शक्तियों को परमेश्‍वर की महान सामर्थ्य पर विचार करने में लगाएँ, जिसने जंगल में इस्राएल को खिलाया, और आश्‍चर्यकर्मों को उनकी दैनिक रोटी बना दिया। यह परमेश्‍वर क्या नहीं कर सकता, जिसने जंगल में एक मेज तैयार की, और इसे उन लोगों के लिए भी समृद्ध रूप से तैयार किया, जो प्रश्न करते थे कि वह कर सकता है या नहीं? भजन संहिता 78:19 और 20 वे परमेश्‍वर के विरूद्ध बोले, "वे परमेश्‍वर के विरुद्ध बोले, और कहने लगे, “क्या परमेश्‍वर जंगल में मेज लगा सकता है? उसने चट्टान पर मार के जल बहा तो दिया, और धाराएँ उमण्ड चलीं, परन्तु क्या वह रोटी भी दे सकता है? क्या वह अपनी प्रजा के लिए मांस भी तैयार कर सकता?” क्या कभी इस तरह का पर्याप्त प्रावधान हुआ है, जिसमें प्रतिदिन छह लाख लोगों और उनकी पत्नियों और बच्चों को बिना पैसे और बिना किसी लागत के खाने के लिए पर्याप्त भोजन दिया जाता था? क्या कभी ऐसा पूरा भंडार रखा गया था, जिसे परमेश्‍वर ने चालीस वर्षों तक जंगल में रखा था, और न ही इस तरह का नि:शुल्क और भरपूर मनोरंजन प्रदान किया गया था? क्षयर्ष ने अपने राज्य की समृद्धि और अपनी महिमा के सम्मान को दिखाने के लिए जो जेवनार दी, वह इससे कम थी। एस्तेर 1:1-8 में लिखा है, "क्षयर्ष नामक राजा के दिनों में ये बातें हुईं: यह वही क्षयर्ष है, जो एक सौ सत्ताईस प्रान्तों पर, अर्थात् हिन्दुस्तान से लेकर कूश देश तक राज्य करता था। उन्हीं दिनों में जब क्षयर्ष राजा अपनी उस राजगद्दी पर विराजमान था, जो शूशन नामक राजगढ़ में थी। वहाँ उसने अपने राज्य के तीसरे वर्ष में अपने सब हाकिमों और कर्मचारियों को भोज दिया। फ़ारस और मादै के सेनापति और प्रान्त–प्रान्त के प्रधान और हाकिम उसके सम्मुख आ गए। वह उन्हें बहुत दिन वरन् एक सौ अस्सी दिन तक अपने राजसी वैभव का धन और अपने माहात्म्य के अनमोल पदार्थ दिखाता रहा। इन दिनों के बीतने पर राजा ने क्या छोटे क्या बड़े उन सभों को भी जो शूशन नामक राजगढ़ में इकट्ठा हुए थे, राजभवन की बारी के आँगन में सात दिन तक भोज दिया। वहाँ के परदे श्‍वेत और नीले सूत के थे, और सन और बैंजनी रंग की डोरियों से चाँदी के छल्‍लों में, संगमर्मर के खम्भों से लगे हुए थे; और वहाँ की चौकियाँ सोने–चाँदी की थीं; और लाल और श्‍वेत और पीले और काले संगमर्मर के बने हुए फ़र्श पर धरी हुई थीं। उस भोज में राजा के योग्य दाखमधु भिन्न भिन्न रूप के सोने के पात्रों में डालकर राजा की उदारता से बहुतायत के साथ पिलाया जाता था। पीना तो नियम के अनुसार होता था, किसी को विवश करके नहीं पिलाया जाता था; क्योंकि राजा ने अपने भवन के सब भण्डारियों को आज्ञा दी थी, कि जो अतिथि जैसा चाहे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना।"

परमेश्‍वर की दैनिक जेवनार उससे बहुत अलग थी। वचन 21 में कहा गया है, "वे भोर को प्रतिदिन अपनी आवश्यकता के अनुसार खाने के लिये बटोर लेते थे, और जब धूप कड़ी होती थी, तब वह गल जाता था।" यह ऐसा था, मानो हर सुबह जो बचा रहता था, वह सूर्य की गर्मी से हवा में खींच लिया जाता था, शायद अगले दिन की फसल के आरम्भ के लिए और इसलिए उनके लिए परमेश्‍वर का आश्‍चर्यकर्म प्रतिदिन चलता रहा। यह निश्‍चित रूप से भजन 136:25 में वर्णित परमेश्‍वर के उस निरंतर प्रावधान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, "वह सब प्राणियों को आहार देता है, उसकी करुणा सदा की है।" वह एक महान गृहस्थ है, जो सभी प्राणियों का भरण-पोषण करता है। वही ज्ञान, सामर्थ्य और भलाई, जो अब प्रतिदिन बादलों से भोजन लाती है, प्रकृति के निरंतर जीवन-चक्र में कार्यरत है, जो पृथ्वी से वर्षा और भोजन लाती है, और हमें आनन्द लेने के लिए सभी चीजें समृद्ध रूप से देती है।


हमारे लिए विचार करने के लिए अगला विचार शायद एक आश्‍चर्य है। हम सोच सकते हैं कि मूसा ने सब्त की स्थापना तब की, जब वह दस आज्ञाएँ प्राप्त करने के बाद पहाड़ से उतरा, परन्तु ऐसा नहीं था। मूसा ने यहाँ अभी तक व्यवस्था प्राप्त नहीं की थी या उसे यह नहीं दी गई थी, जिसमें शारीरिक विश्राम और आत्मिक विश्राम के दिन के रूप में सब्त मनाने के बारे में निर्देश शामिल थे। फिर भी वचन 5 में कहा गया है, "और ऐसा होगा कि छठवें दिन वह भोजन अन्य दिनों से दूना होगा, इसलिये जो कुछ वे उस दिन बटोरें उसे तैयार कर रखें।" यह सातवें दिन के विश्राम का पालन करने का एक स्पष्ट संकेत है, न केवल सीनै पर्वत पर व्यवस्था देने से पहले, बल्कि मिस्र से इस्राएल को बाहर लाने से पहले, और इसलिए, आरम्भ से ही जैसा कि उत्पत्ति 2:3 में उल्लेख किया गया है, "और परमेश्‍वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्‍टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।" हम जानते हैं कि मूसा ने उत्पत्ति लिखी थी, इसलिए इसका मतलब है कि मूसा सब्त के बारे में जानता था और शायद उसका पालन करता था, जैसा कि स्पष्ट रूप से धर्मी लोगों ने आदम के समय से किया था। यदि सब्त का दिन अभी आरम्भ ही हुआ होता, तो मूसा कैसे समझ सकता था, कि परमेश्‍वर ने उससे छठे दिन इकट्ठा किए जाने वाले दोहरे हिस्से के बारे में बिना सब्त का कोई स्पष्ट उल्लेख किए क्या कहा था? वचन 22 में कहा गया है, "फिर ऐसा हुआ कि छठवें दिन उन्होंने दूना, अर्थात् प्रति मनुष्य के पीछे दो दो ओमेर बटोर लिया, और मण्डली के सब प्रधानों ने आकर मूसा को बता दिया।" मूसा द्वारा सब्त के बारे में निर्देश दिए जाने की घोषणा करने से पहले भी लोग इतनी आसानी से निर्देश कैसे प्राप्त कर सकते थे, यदि उन्हें इस घटना से पहले सब्त के बारे में कुछ जानकारी नहीं थी? इससे पता चलता है कि पवित्र कार्य और विश्राम के लिए सात दिनों में से एक दिन अलग करना, शायद तब से एक प्रसिद्ध ईश्‍वरीय ठहराव था, जब से परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर मनुष्य को बनाया था। इसलिए यह परमेश्‍वर के लोगों के लिए सबसे प्राचीन व्यवस्थाओं में से एक होगी। सब्त-की-पवित्रता का तरीका अच्छा पुराना तरीका है। परमेश्‍वर ने इस्राएलियों के लिए जो दोहरा प्रबंध किया था, और जिसे उन्हें छठे दिन अपने लिए इकट्ठा करना था, वह इस बात का संकेत देता है। परमेश्‍वर ने छठे दिन उन्हें दो दिनों की रोटी दी, जो सब्त के विश्राम की एक सुस्थापित पद्धति की भी पुष्टि करती है। वचन 29 कहता है, "देखो, यहोवा ने जो तुम को विश्राम का दिन दिया है, इसी कारण वह छठवें दिन को दो दिन का भोजन तुम्हें देता है; इसलिये तुम अपने अपने यहाँ बैठे रहना, सातवें दिन कोई अपने स्थान से बाहर न जाना।" उनके लिए सातवें दिन को विश्राम करने के लिए नियुक्त करते हुए, उसने ध्यान रखा कि वे इससे पीछे न हटें; और परमेश्‍वर की सेवा करने से कोई कभी पीछे नहीं हटता। उस दिन उन्हें दो दिनों के लिए इकट्ठा करना था, और इसकी तैयार के लिए वचन 23 के अनुसार, "उसने उनसे कहा, "यह वही बात है जो यहोवा ने कही, क्योंकि कल परमविश्राम, अर्थात् यहोवा के लिये पवित्र विश्राम होगा, इसलिये तुम्हें जो तन्दूर में पकाना हो उसे पकाओ, और जो सिझाना हो उसे सिझाओ, और इसमें से जितना बचे उसे सबेरे के लिये रख छोड़ो।" व्यवस्था बहुत कठोर थी, जिसमें उन्हें इसे एक दिन पहले इसे पकाना या सिझाना चाहिए, न कि सब्त के दिन। यह अब हमारे लिए प्रभु के दिन भोजन तैयार करना गैरकानूनी नहीं बनाता है, परन्तु हमें अपने पारिवारिक विषयों का प्रबंधन करने का निर्देश देता है, ताकि वे सब्त के दिन हमारे विश्राम और आत्मिक अभ्यासों को कम से कम बाधित कर सकें। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उस दिन आवश्यक कार्य किए जाने चाहिए; परन्तु उस दिन जितना संभव हो उतना कम करना आवश्यक है, ताकि हम आत्मिक और शांत चीजों के लिए स्वयं को अधिक गहराई से लागू कर सकें, जो सबसे अधिक आवश्यक हैं। सब्त के दिन उन्होंने अपने भोजन के लिए जो कुछ रखा, वह सड़ता नहीं था, जैसा कि वचन 24 में कहा गया है, "जब उन्होंने उसको मूसा की इस आज्ञा के अनुसार सबेरे तक रख छोड़ा, तब न तो वह बसाया, और न उसमें कीड़े पड़े।" 

जब उन्होंने इसे एक आदेश के विरोध में रखा, तो यह वचन 20 के अनुसार बदबूदार था, "तौभी उन्होंने मूसा की बात न मानी; इसलिये जब किसी किसी मनुष्य ने उसमें से कुछ सबेरे तक रख छोड़ा, तो उसमें कीड़े पड़ गए और वह बसाने लगा; तब मूसा उन पर क्रोधित हुआ।" इसलिए मूसा उन पर क्रोधित हो गया। परन्तु जब उन्होंने इसे एक आज्ञा को पालन किया, तो यह मीठा और अच्छा बना रहा। जब हम निर्देश पुस्तिका का पालन करते हैं, तो हमारे लिए चीजें अच्छी होती हैं। सब्त के दिन भूमि पर मन्ना नहीं गिरा। परमेश्‍वर ने तब इसे नहीं भेजा था, और इसलिए उन्हें इसके आने की आशा नहीं करनी चाहिए, और न ही किसी को इकट्ठा करने की आशा में बाहर जाना चाहिए। वचन 25 और 26 में कहा गया है, "तब मूसा ने कहा, "आज उसी को खाओ, क्योंकि आज यहोवा का विश्रामदिन है; इसलिये आज तुम को वह मैदान में न मिलेगा। छ: दिन तो तुम उसे बटोरा करोगे; परन्तु सातवाँ दिन विश्राम का दिन है, उसमें वह न मिलेगा।"" यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है कि यह प्राकृतिक कारणों से नहीं बनाया गया था, बल्कि व्यवस्था के ईश्‍वरीय अधिकार की पुष्टि थी, जिसे मूसा द्वारा अभी तक नहीं दिया गया था। इस तरह परमेश्‍वर ने उन्हें सब्त के दिन के स्मरण के लिए एक उद्देश्यपूर्ण रूप से स्पष्ट कार्य किया; वे न तो इसे भूल सकते थे और न ही इसके लिए तैयारी के दिन को। वचन 27 के अनुसार कुछ लोग सातवें दिन मन्ना पाने की आशा में बाहर गए, परन्तु उन्हें कुछ नहीं मिला, "तौभी लोगों में से कोई कोई सातवें दिन भी बटोरने के लिये बाहर गए, परन्तु उनको कुछ न मिला।" जिन्हें मिलेगा उन्हें नियत समय में ढूँढना चाहिए। प्रभु को तब तक ढूँढो, जब तक वह मिल जाए।


जब लोगों ने आज्ञा न मानी और सब्त के दिन बाहर गए, तो परमेश्‍वर ने वचन 28 के अनुसार ऐसे कहा, "तब यहोवा ने मूसा से कहा, "तुम लोग मेरी आज्ञाओं और व्यवस्था को कब तक नहीं मानोगे?"" उसने मूसा से ऐसा क्यों कहा? वह अवज्ञाकारी नहीं था। नहीं, परन्तु वह एक अवज्ञाकारी लोगों का शासक था, और परमेश्‍वर ने मूसा को जिम्मेदार ठहराया, ताकि वह लोगों से अधिक दृढ़ता से आज्ञाकारिता की माँग कर सके। मूसा अब इस बात का अधिक ध्यान रखेगा कि उनकी अवज्ञा उसकी अपनी किसी भी उपेक्षा के कारण न हो। अगुवा दूसरों के लिए जिम्मेदार होते हैं। यदि हम उन्हें ठीक नहीं करते हैं, तो यह हमारी गलती है। उन्हें सातवें दिन मन्ना की खोज में बाहर जाने के लिए इस तरह से फटकार लगाई जानी थी। अवज्ञा, एक छोटी सी बात में भी, गंभीर होती है। परमेश्‍वर अपने विश्रामदिनों के सम्मान के प्रति ईर्ष्या करता है। 


यदि भोजन की खोज में सब्त के दिन बाहर जाने की इस तरह से निंदा की गई थी, तो आज किसी को कैसे उचित ठहराया जा सकता है, कि वह केवल अपने आनन्द को प्राप्त करने के लिए बाहर टहल रहा हो? टहलना एक प्रकार का काम है और दूसरी प्रकार का विश्राम है। परमेश्‍वर की सृष्टि की सराहना की जानी चाहिए और उसका आनन्द लिया जाना चाहिए। दंपति और परिवारों को टहलने जाना चाहिए और परमेश्‍वर ने उन्हें जो देखने के लिए दिया है, उसका आनन्द लेना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो विश्रामदायक है, वह अन्य लोगों के लिए विश्रामदायक से बहुत ज्यादा अलग हो सकता है।


परमेश्‍वर ने मन्ना को अपने लोगों का भोजन, जंगल में एक निरंतर जेवनार के रूप में प्रदान किया है, हमें एक और रुचिपूर्ण विवरण भी बताया गया है, इस तरह इसकी स्मृति को सुरक्षित किया गया था। इस मन्ना का एक ओमेर (लगभग 5.1/2 पाउंड) एक सोने के बर्तन में रखा गया था, जैसा कि हमें बताया गया है, और इसे वाचा के सन्दूक में रखा गया था, जब इसे बाद में बनाया गया। इस समय वाचा का सन्दूक विद्यमान नहीं था, परन्तु इसके बनने के बाद, मन्ना का एक नमूना सोने के बर्तन में रखा जाना था और सन्दूक के अंदर रखा जाना था। यह सब वचन 32 से 34 तक से स्पष्ट किया गया है, जिसमें कहा गया है, "फिर मूसा ने कहा, "यहोवा ने जो आज्ञा दी वह यह है कि इसमें से ओमेर भर अपने वंश की पीढ़ी पीढ़ी के लिये रख छोड़ो, जिससे वे जानें कि यहोवा हमको मिस्र देश से निकालकर जंगल में कैसी रोटी खिलाता था।" तब मूसा ने हारून से कहा, "एक पात्र लेकर उसमें ओमेर भर लेकर उसे यहोवा के आगे रख दे कि वह तुम्हारी पीढ़ियों के लिये रखा रहे।" जैसी आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी थी, उसी के अनुसार हारून ने उसको साक्षी के सन्दूक के आगे धर दिया कि वह वहीं रखा रहे।"" इब्रानियों 9:4, स्पष्ट रूप से एक और वाचा को दिए जाने के बाद के समय में लिखा गया, इस बात की पुष्टि करता है, क्योंकि यह हमें मन्ना के सोने के बर्तन के बारे में बताता है। "...उसमें सोने की धूपदानी, और चारों ओर सोने से मढ़ा हुआ वाचा का सन्दूक और इसमें मन्ना से भरा हुआ सोने का मर्तबान और हारून की छड़ी जिसमें फूल फल आ गए थे और वाचा की पटियाँ थीं।" इस मन्ना की सुरक्षा स्वयं में एक उत्कृष्ट आश्‍चर्यकर्म था और इसलिए यह इस अद्भुत भोजन का एक उचित स्मारक था। परमेश्‍वर कहता है, "आने वाली पीढ़ियों के लोग उस रोटी को देखेंगे," परमेश्‍वर कहता है, "जिससे मैंने तुझे जंगल में खिलाया था," वे देखेंगे कि यह किस तरह का भोजन था, और प्रत्येक व्यक्ति को उसके दैनिक अनुपात के अनुसार मिलता था, ताकि यह पता चल सके कि वे न तो सीमित मात्रा में था और न ही थोड़ी मात्रा में। लोग परमेश्‍वर और इस्राएल के बीच आसानी से निर्णय ले सकते थे कि क्या उनके पास बुड़बुड़ाने का कोई कारण था या उसके प्रावधानों में कोई दोष था, और इसके विपरीत कि क्या उनके पास और उनके बाद उनकी सन्तान के पास उनके लिए परमेश्‍वर की भलाई की कृतज्ञतापूर्वक गवाही देने का कोई बड़ा कारण नहीं था।

यह सुनने में अजीब सा लग सकता है, परन्तु जो रोटी खाई गई थी, उसे भुलाया नहीं जा सकता। परमेश्‍वर के आश्‍चर्यकर्मों और दया को स्मरण में रखा जाना चाहिए, ताकि हम हर समय उस पर भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित हो सकें। इस प्रावधान की दया तब तक जारी रही, जब तक उन्हें इसकी आवश्यकता थी। मन्ना तब तक गिरना नहीं रुका, जब तक कि वे कनान की सीमा पर नहीं पहुँचे, जहाँ पर्याप्त और अतिरिक्त रोटी थी। वचन 35 कहता है, "इस्राएली जब तक बसे हुए देश में न पहुँचे तब तक, अर्थात् चालीस वर्ष तक मन्ना खाते रहे; वे जब तक कनान देश की सीमा पर नहीं पहुँचे तब तक मन्ना खाते रहे।" इससे हम आसानी से देख सकते हैं कि परमेश्‍वर के प्रावधान की देखभाल कितनी निरंतर है; जब तक पृथ्वी बनी रहती है, तब तक पैदा होना और कटाई विफल नहीं होती है। इस्राएल ने जंगल में कई बार परमेश्‍वर को परीक्षा में डाला, फिर भी मन्ना कभी भी गिरने से विफल नहीं हुआ। परमेश्‍वर विश्‍वासयोग्य है और ठीक उसी तरह जैसे वह न्यायी और अन्यायी लोगों पर अपनी वर्षा बरसाता है और वह कभी-कभी गलत और सही व्यवहार के समय अपने आशीषों को जारी रखता है।


1 कुरिन्थियों 10:3 में मन्ना को आत्मिक भोजन कहा गया है। "और सब ने एक ही आत्मिक भोजन किया।" ऐसा संभवतः इसलिए था, क्योंकि यह स्वर्गीय चीजों में आत्मिक आशीषों की विशेषता थी। हमारे लिए, यीशु स्वयं सच्चा मन्ना है, जीवन की रोटी है, जिसका यह मन्ना केवल एक उदाहरण था। यूहन्ना 6:49 से 51 तक यीशु ने इसके बारे में क्या कहा। "तुम्हारे बापदादों ने जंगल में मन्ना खाया और मर गए। यह वह रोटी है, जो स्वर्ग से उतरती है, ताकि मनुष्य उस में से खाए और न मरे। जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी, मैं हूँ। यदि कोई इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा; और जो रोटी मैं जगत के जीवन के लिये दूँगा, वह मेरा मांस है।"" यीशु हमारी वह रोटी है, जो स्वर्ग से नीचे आई है। और परमेश्‍वर का वचन वह 'मन्ना' है, जिससे मत्ती 4:4 के अनुसार हमारी आत्माओं का पोषण होता है, "यीशु ने उत्तर दिया : ,"लिखा है, ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।""


आत्मा के विश्राम छिपे हुए मन्ना मिलते हैं, प्रकाशितवाक्य 2 वचन 17 के पहले भाग के अनुसार विश्‍वासियों के लिए एक प्रकार का गुप्त पोषण, "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है। जो जय पाए, उस को मैं गुप्‍त मन्ना में से दूँगा।" यह स्वर्ग से आता है, जैसा कि जंगल में मन्ना ने किया था, और मानवीय आत्मा में ईश्‍वरीय जीवन का समर्थन और विश्राम है, जब तक हम इस संसार के जंगल में हैं। यह परमेश्‍वर की आज्ञाकारी सन्तान के लिए केवल उन लोगों के लिए भोजन है, जो बादल और आग के खम्भा के नीचे चलते हैं। इसे इकट्ठा किया जाना है, इसका मतलब है कि हम में से हर एक को अपने लिए सुबह इकट्ठा करना चाहिए। यदि हम इसे जाने देते हैं, तो इकट्ठा होने में बहुत देर हो सकती है। उन्होंने जो मन्ना इकट्ठा किया था, वह जमा नहीं किया गया था, बल्कि खत्म किया जाना था और जिन्होंने मसीह को प्राप्त किया है, उन्हें हर नए दिन विश्‍वास से उस पर जीना चाहिए। वहाँ सभी के लिए पर्याप्त मन्ना था, प्रत्येक के लिए पर्याप्त, और किसी के पास बहुत अधिक नहीं था। इसी तरह, मसीह में एक पूर्ण पर्याप्तता है और केवल प्रदर्शन के लिए यह कोई अनावश्यक सतही या उथला प्रदर्शन नहीं है। हालाँकि, यह एक ऐसा पहलू है, जो उनके और हमारे बीच की तुलना से अधिक विपरीत हैः जंगल में जो लोग मन्ना खाते थे, वे फिर से भूखे थे और अंत में मर गए, जबकि हम में से जो आज विश्‍वास से मसीह को खाते हैं, वे कभी भूख से नहीं मरेंगे। जंगल में कई लोग परमेश्‍वर को प्रसन्न नहीं करते हैं, परन्तु जो लोग उचित रूप से यीशु, जीवित रोटी का खाते हैं, वे सदैव उसे प्रसन्न करेंगे। उसके राज्य में उनका स्वागत किया जाएगा और परमेश्‍वर सदैव उनके साथ प्रसन्न रहेगा। प्रभु हमें यह रोटी सदैव के लिए दे और उन्हें भी जो हमारे साथ यीशु का अनुसरण करते हैं! लोगों को यीशु हमारे मन्ना की ओर ले आना अच्छा, महत्वपूर्ण, जीवन देने वाला और शाश्‍वत रूप से मूल्यवान नेतृत्व है।