यित्रो और होबाब की यात्रा
अध्याय तैंतीस
निर्गमन 18:1-12, गिनती 10:29-33

Ron Meyers
1जब मूसा के ससुर मिद्दान के याजक यित्रो ने यह सुना कि परमेश्वर ने मूसा और अपनी प्रजा इस्राएल के लिये क्या क्या किया है, अर्थात् यह कि किस रीति से यहोवा इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आया, 2तब मूसा का ससुर यित्रो मूसा की पत्नी सिप्पोरा को, जो पहले नैहर भेज दी गई थी, 3और उसके दोनों बेटों को भी ले आया; इनमें से एक का नाम मूसा ने यह कहकर गेर्शोम रखा था : “मैं अन्य देश में परदेशी हुआ हूँ।” 4और दूसरे का नाम उसने यह कहकर एलीएजेर रखा : “मेरे पिता के परमेश्वर ने मेरा सहायक होकर मुझे फ़िरौन की तलवार से बचाया।” 5मूसा की पत्नी और पुत्रों को, उसका ससुर यित्रो संग लिए मूसा के पास जंगल के उस स्थान में आया, जहाँ परमेश्वर के पर्वत के पास उसका डेरा पड़ा था। 6और आकर उसने मूसा के पास यह कहला भेजा, “मैं तेरा ससुर यित्रो हूँ, और दोनों बेटों समेत तेरी पत्नी को तेरे पास ले आया हूँ।” 7तब मूसा अपने ससुर से भेंट करने के लिये निकला, और उसको दण्डवत् करके चूमा; और वे परस्पर कुशल क्षेम पूछते हुए डेरे पर आ गए। 8वहाँ मूसा ने अपने ससुर से वर्णन किया कि यहोवा ने इस्राएलियों के निमित्त फ़िरौन और मिस्रियों से क्या–क्या किया, और इस्राएलियों ने मार्ग में क्या–क्या कष्ट उठाया, फिर यहोवा उन्हें कैसे–कैसे छुड़ाता आया है। 9तब यित्रो ने उस समस्त भलाई के कारण जो यहोवा ने इस्राएलियों के साथ की थी, कि उन्हें मिस्रियों के वश से छुड़ाया था, मग्न होकर कहा, 10”धन्य है यहोवा, जिसने तुम को फ़िरौन और मिस्रियों के वश से छुड़ाया, जिसने तुम लोगों को मिस्रियों की मुट्ठी में से छुड़ाया है। 11अब मैं ने जान लिया है कि यहोवा सब देवताओं से बड़ा है; वरन् उस विषय में भी जिससे उन्होंने इस्राएलियों के साथ अहंकारपूर्ण व्यवहार किया था।” 12तब मूसा के ससुर यित्रो ने परमेश्वर के लिये होमबलि और मेलबलि चढ़ाए, और हारून इस्राएलियों के सब पुरनियों समेत मूसा के ससुर यित्रो के संग परमेश्वर के आगे भोजन करने को आया।
गिनती 10:29 मूसा ने अपने ससुर रूएल मिद्यानी के पुत्र होबाब से कहा, “हम लोग उस स्थान की यात्रा करते हैं जिसके विषय में यहोवा ने कहा है कि मैं उसे तुम को दूँगा; इसलिये तू भी हमारे संग चल, और हम तेरी भलाई करेंगे; क्योंकि यहोवा ने इस्राएल के विषय में भला ही कहा है।” 30होबाब ने उसे उत्तर दिया, “मैं नहीं जाऊँगा; मैं अपने देश और कुटुम्बियों में लौट जाऊँगा।” 31फिर मूसा ने कहा, “हम को न छोड़, क्योंकि हमें जंगल में कहाँ कहाँ डेरा खड़ा करना चाहिये, यह तुझे ही मालूम है, तू हमारे लिये आँखों का काम देना। 32और यदि तू हमारे संग चले, तो निश्चय जो भलाई यहोवा हम से करेगा उसी के अनुसार हम भी तुझ से वैसा ही करेंगे।” 33फिर इस्राएलियों ने यहोवा के पर्वत से प्रस्थान करके तीन दिन की यात्रा की; और उन तीनों दिनों के मार्ग में यहोवा की वाचा का सन्दूक उनके लिये विश्राम का स्थान ढूँढ़ता हुआ उनके आगे आगे चलता रहा।
यित्रो और संभवतः उसके पुत्र होबाब की यात्रा मूसा के जीवन की घटनाओं के क्रम में, रपीदीम में दो विजयों के बाद और सीनै में व्यवस्था दिए जाने से पहले इस पड़ाव पर हुई थी। बाद में, व्यवस्था देने के बाद, मूसा के ससुर के पुत्र होबाब ने स्पष्ट रूप से इस्राएल के साथ कनान की ओर यात्रा जारी रखने के लिए मूसा के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। हम इस पाठ में कहानी के उस हिस्से पर बाद में चर्चा करेंगे।
निर्गमन 18 मूसा की पत्नी, बेटों और ससुर, यित्रो के साथ एक सुखद पुनर्मिलन को वर्णित करता है, जो उनसे मिलने आया और इस्राएल की पसन्नता, और अपने दामाद मूसा के सम्मान को देखता है, और उसे बधाई देता है। अब यित्रो सोचता है कि जब मूसा फ़िरौन से भागा था, तो उसने मिद्यान में उसके संकट में मूसा पर जो दया दिखाई थी, उसके लिए उसे अच्छा मूल्य चुकाना चाहिए। वह यह भी देखने में सक्षम हुआ कि उसकी पुत्री उससे सर्वोत्तम स्थिति में है, जिसकी वह आशा कर सकता था। यित्रो उस समाचार को सुनने के बिना नहीं रह सका, जो अन्यजातियों में फैल रहा था, अपने लोगों इस्राएल के लिए परमेश्वर के महाप्रतापी रूपों का समाचार। यित्रो पता लगाने के लिए आता है, और स्वयं को भजन 111:2 में उल्लिखित विचारशील व्यक्ति के रूप में पूरी तरह से सूचित करता है, "यहोवा के काम बड़े हैं, जितने उनसे प्रसन्न रहते हैं, वे उन पर ध्यान लगाते हैं।" वह उनके साथ एक ऐसे व्यक्ति के रूप में आनन्दित होने के लिए वहाँ था, जो उनके और उनके परमेश्वर दोनों के लिए सच्चा सम्मान रखता था। वचन 1 कहता है, "जब मूसा के ससुर मिद्दान के याजक यित्रो ने यह सुना कि परमेश्वर ने मूसा और अपनी प्रजा इस्राएल के लिये क्या क्या किया है, अर्थात् यह कि किस रीति से यहोवा इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आया।" हालाँकि, एक मिद्यानवासी के रूप में, वह प्रतिज्ञा किए गए देश में उनके साथ भाग नहीं लेना चाहता था, फिर भी वह उनके उद्धार के आनन्द में उनके साथ भाग लेता है। हम भी इस तरह से दूसरों की आशीषों को अपनी हर्ष का स्रोत बना सकते हैं, जैसा परमेश्वर करता है, धर्मियों की भलाई में आनन्द लेते हुए।
यित्रो मूसा की पत्नी और बच्चों को मूसा के पास लाता है। स्पष्ट है कि मूसा ने मिस्र पहुँचने के कुछ समय बाद उन्हें वापस भेज दिया था। उस अवधि के दौरान उनके समय की विपत्तियाँ और शर्तें आसान नहीं होतीं, यदि उन्हें अपने परिवार के लिए भी जिम्मेदार होना पड़ता। उनकी सुरक्षा के लिए और संभवतः इस डर से कि वे एक बाधा प्रमाणित हो सकते हैं, उसने उन्हें अपने ससुर के घर भेज दिया था। संभवतः उसने पहले ही समझ लिया था कि फ़िरौन के दरबार में उसे किन तरह की निराशाओं का सामना करना पड़ सकता है, और इसलिए वह अपने परिवार में से किसी को भी मिस्र में अपने साथ नहीं रखेगा। उसका मिशन यीशु के शिष्यों के विपरीत नहीं था, जिनके पास समय-समय पर ऐसी जिम्मेदारियाँ भी थीं, जिनके लिए उन्हें अस्थायी रूप से अपने परिवार को छोड़ने की आवश्यकता होती थी। मत्ती 19:29 कहता है, "और जिस किसी ने घरों, या भाइयों, या बहिनों, या पिता, या माता, या बाल–बच्चों, या खेतों को मेरे नाम के लिए छोड़ दिया है, उसको सौ गुना मिलेगा, और वह अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।" हालाँकि, कुछ भी हो कुछ समय के लिए अपनी पत्नी और परिवार से अलग होने का धार्मिकता से भरा और अच्छा कारण हो सकता है, फिर भी उन्हें जल्द से जल्द फिर से एक साथ आना चाहिए। 1 पतरस 3:7 में पतरस पतियों को ऐसी शिक्षा देता है, "वैसे ही हे पतियो, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो, और स्त्री को निर्बल पात्र जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिससे तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ।" यित्रो, हम मान सकते हैं, अपनी पुत्री की संगति से प्रसन्न था, और उसके बच्चों से प्रेम करता था, फिर भी वह उसे उसके पति से, और न ही उन्हें उनके पिता से दूर रखना चाहता था, इसलिए वह उन्हें उसके पास ले गया और उसे पहले से ही सूचित किया कि वह आ रहा है। क्योंकि वचन 5 और 6 में ऐसे कहा गया है, "मूसा की पत्नी और पुत्रों को, उसका ससुर यित्रो संग लिए मूसा के पास जंगल के उस स्थान में आया, जहाँ परमेश्वर के पर्वत के पास उसका डेरा पड़ा था। और आकर उसने मूसा के पास यह कहला भेजा, "मैं तेरा ससुर यित्रो हूँ, और दोनों बेटों समेत तेरी पत्नी को तेरे पास ले आया हूँ।"" मसीही अगुवों के लिए जिम्मेदार परिवार के अगुवा होने के महत्व पर चर्चा करने के लिए यह उतनी ही अच्छा स्थान है। आपको पवित्रशास्त्र में ऐसा कोई वचन नहीं मिलेगा, जो पारिवारिक जिम्मेदारियों से पहले सार्वजनिक सेवकाई को उचित ठहराता हो। पवित्रशास्त्र में कई वचन ऐसे मिलते हैं, जो इस विचार का समर्थन करते हैं, जैसे कि 1 तीमुथियुस 3:4, 5 ऐसे कहता है, "अपने घर का अच्छा प्रबन्ध करता हो, और अपने बाल–बच्चों को सारी गम्भीरता से अधीन रखता हो। जब कोई अपने घर ही का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली कैसे करेगा?" मूसा के साथ उसका परिवार होना चाहिए, ताकि जब वह परमेश्वर की मण्डली पर शासन करे, तो वह परिवारिक-शासन में विवेक का एक अच्छा उदाहरण स्थापित कर सके। मूसा के पास अब बहुत अधिक सम्मान और देखभाल की बातें दोनों थीं, और यह उचित था कि उसकी पत्नी उसके साथ दोनों में भाग लेने के लिए उसके साथ हो।
मूसा और उसके ससुर के बीच जो अभिवादन हुआ, वह बहुत दयालुता से भरा हुआ था, क्योंकि वचन 7 में कहा गया है, "तब मूसा अपने ससुर से भेंट करने के लिये निकला, और उसको दण्डवत् करके चूमा; और वे परस्पर कुशल क्षेम पूछते हुए डेरे पर आ गए।" हालाँकि मूसा प्रभु यहोवा का एक साहसी भविष्यद्वक्ता था, फिर भी उसने अपने ससुर के प्रति बहुत ज्यादा विनम्रता भरा सम्मान दिखाया। ईश्वर-भक्ति अच्छे शिष्टाचार को नष्ट नहीं करती। यह वर्णन कि मूसा ने अपने ससुर को उन बड़े कामों के बारे में बताया, जो परमेश्वर ने इस्राएल के लिए किए थे, यित्रो को आश्वस्त कर रहा था। मूसा यित्रो को आज तक के समाचार को बताने में प्रसन्न था, जैसा कि वचन 8 इंगित करता है, "वहाँ मूसा ने अपने ससुर से वर्णन किया कि यहोवा ने इस्राएलियों के निमित्त फ़िरौन और मिस्रियों से क्या–क्या किया, और इस्राएलियों ने मार्ग में क्या–क्या कष्ट उठाया, फिर यहोवा उन्हें कैसे–कैसे छुड़ाता आया है।" यह उन बातों में से एक होगी, जिसके लिए यित्रो आया था, अर्थात्, अधिक पूरी तरह से और विशेष रूप से उन बड़े बातों को जानने के लिए, जिनके बारे में उसने केवल सामान्य रूप से सुना था। परमेश्वर के अद्भुत कार्यों के बारे में बातचीत करना अच्छा और लाभदायक है। ये दो लोग, दो मित्र, इस बातचीत में भजन 105:2 में पाए जाने वाले ज्ञान को प्रमाणित कर रहे थे, "उसके लिये गीत गाओ, उसके लिये भजन गाओ, उसके सब आश्चर्यकर्मों पर ध्यान करो!" कुछ लोग खेल, राजनीति, या कई अन्य चीजों के बारे में बात करते हैं, परन्तु मसीही अगुवे मूसा और यित्रो की तरह बातचीत में आनन्दित होंगे, जैसा कि भजन 145:10-12 में स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया था, "हे यहोवा, तेरी सारी सृष्टि तेरा धन्यवाद करेगी, और तेरे भक्त लोग तुझे धन्य कहा करेंगे! वे तेरे राज्य की महिमा की चर्चा करेंगे, और तेरे पराक्रम के विषय में बातें करेंगे; कि वे आदमियों पर तेरे पराक्रम के काम और तेरे राज्य के प्रताप की महिमा प्रगट करें।" प्रश्न पूछना, कहानी सुनाना, समाचार प्रसारित करना और परमेश्वर के कार्यों पर चर्चा करना न केवल स्वीकार्य वार्तालाप का मसीही मनोरंजन हैं, बल्कि इससे हम अपने जीवन के विवरणों में भी परमेश्वर की वैभवशाली भागीदारी पर ध्यान देते हुए लोगों को उनके विश्वास में निर्माण करने में सक्षम होते हैं।
उनकी बातचीत ने स्पष्ट रूप से यित्रो पर बहुत अच्छा प्रभाव डाला और उसने परमेश्वर के इस्राएल को बधाई दीः यित्रो ने वचन 9 के कहने पर आनन्द मनाया, "तब यित्रो ने उस समस्त भलाई के कारण जो यहोवा ने इस्राएलियों के साथ की थी, कि उन्हें मिस्रियों के वश से छुड़ाया था, मग्न होकर कहा।" वह न केवल उसके दामाद को दिए गए सम्मान से आनन्दित था, बल्कि इस्राएल के लिए किए गए सभी अच्छे कामों से भी आनन्दित था। जब इस्राएली स्वयं परमेश्वर की सभी भलाई के बावजूद अपनी कठिनाइयों के बारे में बुड़बुड़ाते थे, तो यहाँ एक मिद्यानवासी के लिए इसमें आनन्द का बात थी। क्या हम यहाँ एक मूल्यवान बात को देख सकते हैं? इस्राएलियों ने जो अनुभव किया, उसे सुनकर एक मिद्यानवासी आनन्दित हुआ, परन्तु इस्राएलियों ने ऐसा करते समय बुड़बुड़ाया और शिकायत की। पवित्रशास्त्र में यह एकमात्र समय नहीं दिया हुआ, जब एक अन्यजाति के विश्वास ने यहूदियों के अविश्वास को शर्मिंदा किया। मत्ती 8:10 में लिखा है, "यह सुनकर यीशु को अचम्भा हुआ, और जो उसके पीछे आ रहे थे उनसे कहा, “मैं तुम से सच कहता हूँ कि मैं ने इस्राएल में भी ऐसा विश्वास नहीं पाया।" जो लोग साथ खड़े थे, वे परमेश्वर द्वारा इस्राएल पर दिखाए गए अनुग्रहों से उन लोगों की तुलना में अधिक प्रभावित हुए, जिन्होंने उन्हें प्राप्त किया था। यित्रो ने इस्राएल के परमेश्वर की महिमा की, जैसा कि वचन 10 से स्पष्ट है, "धन्य है यहोवा, जिसने तुम को फ़िरौन और मिस्रियों के वश से छुड़ाया, जिसने तुम लोगों को मिस्रियों की मुट्ठी में से छुड़ाया है।" यित्रो के विश्वास की पुष्टि हुई, और उसने इस अवसर पर इसका एक खुला अंगीकार किया, क्योंकि वचन 11 में कहा गया है, "अब मैं ने जान लिया है कि यहोवा सब देवताओं से बड़ा है; वरन् उस विषय में भी जिससे उन्होंने इस्राएलियों के साथ अहंकारपूर्ण व्यवहार किया था।" उसके विश्वास की बात यह है कि इस्राएल का परमेश्वर सभी ढोंग करने वालों से बड़ा है, सभी झूठे और नकली-देवताओं से, जो ईश्वरीय सम्मान को हड़प लेते हैं; वह उन्हें शान्त कर देता है, उन्हें वश में कर लेते हैं, और उन सभी के लिए उनका पालन करना बहुत अधिक कठिन है और इसलिए वही स्वयं एकमात्र जीवित और सच्चा परमेश्वर है। वह सभी राजाओं और सांसारिक शासकों से भी ऊँचा है, और उन पर निर्विवाद अधिकार रखता है और उन्हें नियंत्रित करने और उन पर शासन करने की न रुकने वाली सामर्थ्य रखता है। वह उन सभी का प्रबंध अपनी इच्छानुसार करता है और उनके साथ अपने किए गए व्यवहार से सम्मान प्राप्त करता है, चाहे वे कितना भी बड़ा स्वयं को क्यों न सोचें। डेरे में मूसा के साथ इस बातचीत ने उस बात की पुष्टि की, जिसे वह पहले से जानता था; यह उसके विश्वास की पुष्टि और सुधार था। अब मैं जान गया हूँ; हाँ, वह इसे पहले से जानता था, परन्तु अब वह इसे सर्वोत्तम रीति से अब जानता था; इसका विश्वनीय सबूत प्राप्त करने पर उसका विश्वास एक पूर्ण आश्वासन तक बढ़ गया। उन लोगों ने स्पष्ट ज्योति के विरुद्ध अपनी आँखें बंद कर लीं है, जो नहीं जानते कि परमेश्वर सभी देवताओं से बड़ा है।
यहाँ, इस समय, यित्रो ने परमेश्वर को बलि चढ़ाई और हारून ने इस्राएल के अन्य बुजुर्गों के साथ सभा में भाग लिया, जैसा कि वचन 12 में कहा गया है, "तब मूसा के ससुर यित्रो ने परमेश्वर के लिये होमबलि और मेलबलि चढ़ाए, और हारून इस्राएलियों के सब पुरनियों समेत मूसा के ससुर यित्रो के संग परमेश्वर के आगे भोजन करने को आया।" उन्होंने एक जेवनार में एक-दूसरे के साथ सहभागिता की और एक बलिदान में, यित्रो को मूसा और इस्राएल के बुजुर्गों के साथ संगति में, एक मिद्यानी होने के बावजूद, आनन्द के साथ प्रवेश दिया गया। वह भी अब्राहम की सन्तान था, हालाँकि इसहाक के वंश का नहीं था। वे धन्यवाद के बलिदान में शामिल हो गए।
यित्रो मिद्यान में एक याजक था, और सच्चे परमेश्वर का उपासक था। आपसी मित्रता को संयुक्त आराधना द्वारा पवित्र किया जाता है। उन लोगों के साथ परमेश्वर की आराधना करना अच्छा है, जो हमसे अलग हो सकते हैं, जब तक कि सच्चे परमेश्वर की आराधना की जा रही है। यह रिश्तेदारों और मित्रों के लिए बहुत अच्छी बात है, जब वे एक साथ आते हैं, और प्रार्थना और प्रशंसा में शामिल होते हैं। यीशु हमारी एकता का केंद्र है। वे आनन्द के साथ जेवनार में शामिल हुए, एक जेवनार जो एक बलिदान के लिए की गई थी। मूसा ने अपने रिश्तेदारों और मित्रों को अपने डेरे में भोजन करने के लिए आमंत्रित किया। यीशु ने भी ऐसे कई निमंत्रण स्वीकार किए। उन्होंने एक साथ भोजन खाया और हमें लगता है कि उन्होंने वही खाया, जो उनके पास था, अर्थात् मन्ना। यित्रो को स्वर्ग से उस रोटी को देखना और स्वाद लेना चाहिए, और, हालाँकि एक गैर-यहूदी का किसी भी तरह से एक इस्राएली की तरह स्वागत किया गया था। गैर-यहूदियों का अभी भी जीवन की रोटी खाने के लिए स्वागत है। क्या आप मेज पर बातचीत, हँसी, उत्सव और घटना की भावना की कल्पना कर सकते हैं, जब उन्होंने मूसा के ससुर के साथ भोजन किया था?
अब सीनै से कनान की ओर जाने वाले इस्राएल के प्रस्थान के समय पर आगे बढ़ें और इसलिए आइए अब मेरे साथ गिनती 10:29-32 में वर्णित एक घटना को देखें। यह मूसा और यित्रो (रूएल) के पुत्र होबाब के बीच जो हुए वार्तालाप का एक विवरण है। यित्रो ने अपने पुत्र होबाब को मूसा के पास छोड़ दिया होगा। जब होबाब ने अपने देश के पास सीनै पर्वत पर डेरा डाला था, तब होबाब स्पष्ट रूप से इस्राएल के साथ रहने के लिए संतुष्ट था, परन्तु अब जब इस्राएल उत्तर की ओर कनान की ओर बढ़ रहा था, तब वह अपने देश लौटने का मंशा रखता था। वचन 29 कहता है, "मूसा ने अपने ससुर रूएल मिद्यानी के पुत्र होबाब से कहा, "हम लोग उस स्थान की यात्रा करते हैं, जिसके विषय में यहोवा ने कहा है कि मैं उसे तुम को दूँगा; इसलिये तू भी हमारे संग चल, और हम तेरी भलाई करेंगे; क्योंकि यहोवा ने इस्राएल के विषय में भला ही कहा है।"" मूसा होबाब को एक प्रतिज्ञा के साथ लुभाता है कि वे निश्चित रूप से उसके प्रति दयालु रहेंगे, और परमेश्वर के वचन को सुरक्षा के लिए रखता हैः "क्योंकि यहोवा ने इस्राएल के विषय में भला ही कहा है।" यह ऐसा था, मानो उसने कहा था, "आ, हमारे बीच अपने हिस्से को डाल, और जैसा हम भला करेंगे, वैसा ही तू भी भला करेगा; और हमारे पास परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि हम भला करेंगे।" यहाँ एक स्पष्ट सबक यह है कि जो लोग स्वर्गीय कनान को जाने के लिए बाध्य हैं, उन्हें अपने सभी रिश्तेदारों और मित्रों को अपने साथ जाने के लिए आमंत्रित और प्रोत्साहित करना चाहिए। लोगों को अपने साथ ले जाने के लिए इससे अधिक शक्तिशाली तर्क और क्या हो सकता है। "...क्योंकि यहोवा ने इस्राएल के विषय में भला ही कहा है।" यहाँ एक मसीही अगुवे के लिए एक और महत्वपूर्ण सबक यह है कि हम कुशल, जानकार, सूचित और योग्य लोगों से स्वयं को घेर लें। होबाब का झुकाव अपने देश वापस जाने का था, क्योंकि वचन 30 में कहा गया है, "होबाब ने उसे उत्तर दिया, "मैं नहीं जाऊँगा; मैं अपने देश और कुटुम्बियों में लौट जाऊँगा।" परन्तु मूसा उसे अपने साथ ले जाना चाहता था। मूसा ने यित्रो को जाने दिया था, परन्तु वह चाहता था कि होबाब अपने स्वयं के लाभ के लिए उनके साथ यात्रा करे। इससे दोनों को लाभ मिलेगा। "फिर मूसा ने कहा, "हम को न छोड़, क्योंकि हमें जंगल में कहाँ कहाँ डेरा खड़ा करना चाहिये, यह तुझे ही मालूम है, तू हमारे लिये आँखों का काम देना"" (वचन 31)। यदि तू हमारे साथ आता है, तो जो भी भली चीजें यहोवा हमें देता है, हम उसे तेरे साथ बाँटेंगे। होबाब उस भूमि को जानता था। हाँ, हम परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं, जो हमारा नेतृत्व करता है, परन्तु अगुवों को एक समूह विकसित करने के लिए जो कुछ भी वे कर सकते हैं, उन्हें करना चाहिए, स्वयं को सक्षम लोगों से घेरना चाहिए। यहाँ तक कि जो आश्चर्यकर्मों के नेतृत्व में भी, उन्हें सामान्य साधनों को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। शायद मूसा ने होबाब को यह बात इसलिए कही, ताकि इतने बड़े समूह के लिए उपयोगी होने के विचार से होबाब को प्रसन्न कर सकें। शायद मूसा होबाब को विकसित करना चाहता था। या शायद मूसा ने अधिकांश इस बारे में सोचा होगा कि होबाब इस्राएल के लिए क्या लाभ हो सकता है। दोनों ही अच्छे लक्ष्य हैं। हम वही दे सकते हैं, जो हमें मिलता है। हम अपने मित्रों के लिए इससे अधिक सेवा और दया नहीं दिखा सकते हैं, जितना कि परमेश्वर हमारे हाथ में शक्ति में डालने से प्रसन्न होता है। हम बस इतना ही प्रतिज्ञा करने का हियाव रखते हैं, उसना ही भला करते हैं, जितने के लिए परमेश्वर हमें सक्षम करेगा। जो लोग अपने परिश्रम और कठिनाइयों में परमेश्वर के इस्राएल के साथ भाग लेते हैं, वे उनके विश्राम और सम्मान में उसके साथ भाग लेंगे। जो लोग जंगल में अपने साथ अपना हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं, वे कनान में अपने लिए हिस्सा बचाए रखेंगे। एक योग्य समूह को इकट्ठा करना अच्छा नेतृत्व है। और इससे हमें समूह में शामिल होने का लाभ मिलता है। 2 तीमुथियुस 2:12 कहता है, "यदि हम धीरज से सहते रहेंगे, तो उसके साथ राज्य भी करेंगे; यदि हम उसका इन्कार करेंगे, तो वह भी हमारा इन्कार करेगा।" और लूका 22:28 और 29 कहते हैं, "तुम वह हो, जो मेरी परीक्षाओं में लगातार मेरे साथ रहे; और जैसे मेरे पिता ने मेरे लिये एक राज्य ठहराया है, वैसे ही मैं भी तुम्हारे लिये ठहराता हूँ।"
हमें ऐसा कोई उत्तर नहीं मिलता, जो होबाब ने दिया हो; उसकी चुप्पी ने सहमति दी। उसने हमारे लिए एक अच्छी घटना छोड़ी और उसकी भावी पीढ़ी को इसका लाभ मिला। न्यायियों 1:16 कहता है, "मूसा के साले, एक केनी मनुष्य की सन्तान, यहूदी के संग खजूर वाले नगर से यहूदा के जंगल में गए जो अराद के दक्षिण की ओर है, और जाकर इस्राएली लोगों के साथ रहने लगे।" बाद में भी मूसा के ससुर के वंशज अभी भी लाभान्वित हो रहे हैं। 1 शमूएल 15:6 "और शाऊल ने केनियों से कहा, "वहाँ से हटो, अमालेकियों के मध्य में से निकल जाओ, कहीं ऐसा न हो कि मैं उनके साथ तुम्हारा भी अन्त कर डालूँ; क्योंकि तुम ने सब इस्राएलियों पर उनके मिस्र से आते समय प्रीति दिखाई थी।""
यित्रो प्रभावित होकर घर लौटा और बदल चुका था। होबाब ने यात्रा की और मूसा की दृष्टि में एक उपयोगी उद्देश्य पूरा किया। नेतृत्व के सिद्धान्तः (1) हालाँकि मूसा एक अगुवा था, परन्तु उसने अपने विस्तारित परिवार को सम्मानित और प्रभावित किया। (2) मूसा ने पहचाना कि उसे एक होबाब की आवश्यकता है और उसने एक समूह बनाया। हे परमेश्वर, हमारी सहायता कर कि हम अपने परिवारों को न छोड़ें। परमेश्वर, एक अच्छे समूह को बनाने में हमारी सहायता करे।