प्रतिनिधियों की नियुक्ति

अध्याय चौंतीस


निर्गमन 18:13-27

Ron Meyers

13दूसरे दिन मूसा लोगों का न्याय करने को बैठा, और भोर से साँझ तक लोग मूसा के आसपास खड़े रहे। 14यह देखकर कि मूसा लोगों के लिये क्या–क्या करता है, उसके ससुर ने कहा, “यह क्या काम है जो तू लोगों के लिये करता है? क्या कारण है कि तू अकेला बैठा रहता है, और लोग भोर से साँझ तक तेरे आसपास खड़े रहते हैं?” 15मूसा ने अपने ससुर से कहा, “इसका कारण यह है कि लोग मेरे पास परमेश्‍वर से पूछने आते हैं। 16जब जब उनका कोई मुक़द्दमा होता है तब तब वे मेरे पास आते हैं, और मैं उनके बीच न्याय करता, और परमेश्‍वर की विधि और व्यवस्था उन्हें समझाता हूँ।” 17मूसा के ससुर ने उससे कहा, “जो काम तू करता है, वह अच्छा नहीं। 18इससे तू क्या, वरन् ये लोग भी जो तेरे संग हैं निश्‍चय थक जाएँगे, क्योंकि यह काम तेरे लिये बहुत भारी है; तू इसे अकेला नहीं कर सकता। 19इसलिये अब मेरी सुन ले, मैं तुझ को सम्मति देता हूँ, और परमेश्‍वर तेरे संग रहे! तू इन लोगों के लिये परमेश्‍वर के सम्मुख जाया कर, और इनके मुक़द्दमों को परमेश्‍वर के पास तू पहुँचा दिया कर। 20इन्हें विधि और व्यवस्था प्रगट कर करके, जिस मार्ग पर इन्हें चलना, और जो जो काम इन्हें करना हो, वह इनको जता दिया कर। 21फिर तू इन सब लोगों में से ऐसे पुरुषों को छाँट ले, जो गुणी, और परमेश्‍वर का भय मानने वाले, सच्‍चे, और अन्याय के लाभ से घृणा करने वाले हों; और उनको हज़ार–हज़ार, सौ–सौ, पचास–पचास, और दस–दस मनुष्यों पर प्रधान नियुक्‍त कर दे। 22और वे सब समय इन लोगों का न्याय किया करें; और सब बड़े बड़े मुक़द्दमों को तो तेरे पास ले आया करें, और छोटे छोटे मुक़द्दमों का न्याय आप ही किया करें; तब तेरा बोझ हल्का होगा, क्योंकि इस बोझ को वे भी तेरे साथ उठाएँगे। 23यदि तू यह उपाय करे, और परमेश्‍वर तुझ को ऐसी आज्ञा दे, तो तू ठहर सकेगा, और ये सब लोग अपने स्थान को कुशल से पहुँच सकेंगे।”


अगले दिन मूसा के डेरे में मूसा, हारून और इस्राएल के बुजुर्गों के साथ जेवनार करने के बाद, मूसा के मिद्यान से आए ससुर, यित्रो, ने लोगों को छावनी के चारों ओर देखा और मूसा को सुबह से शाम तक लोगों के साथ बैठक करते हुए देखा, क्योंकि वचन 13 में कहा गया है, "दूसरे दिन मूसा लोगों का न्याय करने को बैठा, और भोर से साँझ तक लोग मूसा के आसपास खड़े रहे।" यित्रो ने इस्राएलियों और मूसा के बारे में अपनी टिप्पणियों से परमेश्‍वर के बारे में बहुत कुछ सीखा है और अब वह देखता है कि उसके पास मूसा को कुछ सलाह साझा करने का एक तरीका है। वह सोचता है कि यह मूसा और इस्राएल की सहायता कर सकता है। अधिकांश ज्ञान जो हम प्राप्त करते हैं, वह प्रभु परमेश्वर से ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह हमें अपने आत्मा और हमारे अनुभवों के माध्यम से सिखाता है। "नेतृत्व विकास" के बारे में सुनने से बहुत पहले से ही परमेश्‍वर अगुवों का विकास कर रहा होता है। हालाँकि, मूसा को एक आश्‍चर्यजनक स्रोत से एक महत्वपूर्ण सलाह मिलने वाली है।


इस्राएल राष्ट्र के अगुवा के रूप में, लोगों के लिए मूसा का काम दर्शाता है कि उसके पास उनकी सेवा करने के लिए बहुत उत्साह और ऊर्जा है, परन्तु उसकी प्रशासनिक नीति में सुधार की आवश्यकता है। इस्राएल को दासता के घर से बाहर निकालने के लिए बुलाए जाने और सशक्त किए जाने के बाद, यह प्रदर्शित करने के लिए कि वह एक और प्रकार का मसीह है, व्यवस्था सृष्टिकर्ता और उसके बीच न्यायी के रूप में, अब उसे उसके गैर-यहूदी ससुर यित्रो द्वारा कुछ उपयोगी सलाह दी जाती है। अब तक वह न्याय के लिए उत्तर देने, लोगों को संदिग्ध विषयों में परमेश्‍वर की इच्छा से परिचित कराने और परमेश्‍वर की व्यवस्था की व्याख्या करने के लिए काम करता था, जो उन्हें पहले से ही सब्त के बारे में दिए गए थे, जो भक्ति, मानवीय संबंधों और समानता से संबंधित थे। मिस्र के सभी ज्ञान में शिक्षित, उसने शायद प्रकृति के कुछ नियमों को भी समझाया होगा। वचन 15 कहता है, "मूसा ने अपने ससुर से कहा, "इसका कारण यह है कि लोग मेरे पास परमेश्‍वर से पूछने आते हैं।"" उनके लिए यह हर्ष की बात थी कि उनके पास परामर्श करने के लिए इतना बुद्धिमान अगुवा था, जैसा कि हम स्वयं कई बार चाहते हैं कि हमारे पास परमेश्‍वर के मन को जानने का एक स्पष्ट तरीका होता, जब हम इस बात से वंचित रहते हैं कि अब आगे क्या करना है। मूसा उस परमेश्‍वर के प्रति विश्‍वासयोग्य था, जिसने उसे नियुक्त किया था और उन लोगों के प्रति भी, जो उससे सलाह लेते थे। वचन 16 हमें बताता है, "जब जब उनका कोई मुक़द्दमा होता है, तब तब वे मेरे पास आते हैं, और मैं उनके बीच न्याय करता, और परमेश्‍वर की विधि और व्यवस्था उन्हें समझाता हूँ।" उसका काम शायद व्यवस्था को बनाना ही नहीं था, जितना कि परमेश्‍वर के व्यवस्था को जानना था। उसका स्थान एक सेवक का था। उसे व्यवस्थाओं की व्याख्या भी करनी थी, और विचारों के अंतर से विषयों का निर्धारण करना था, एक व्यक्ति और उसके साथी के बीच न्याय देना था। यदि लोग एक दूसरे के साथ उतने ही झगड़ालू होते, जितने वे परमेश्‍वर के साथ थे, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसके पास बहुत सारे विषय लाए गए होंगे, और संभवतः उससे भी अधिक, जिसे हम सामान्य समझते हैं, क्योंकि उसके द्वारा दिए गए परामर्शदान में कोई खर्च नहीं आता था; यह उनके लिए महंगा नहीं था। इससे पहले, जब मिस्र में दो इब्री दासों के बीच झगड़ा हुआ था और मूसा ने दावेदारों के बीच सुलह करने की कोशिश की थी, तो एक ने पूछा, "किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" (निर्गमन 2:14)। परन्तु अब जब यह पहले के विवाद की बात थी, अब परमेश्‍वर ने उसे शासक और न्यायी बनाया था, इसलिए वे विनम्रता से उस व्यक्ति से सलाह लेते हैं, जिसे उन्होंने तब घमण्ड से अस्वीकार कर दिया था।


इसलिए सुनना, न्याय करना और सलाह देना स्पष्ट रूप से उस कार्य का एक प्रमुख हिस्सा बन गया, जिसके लिए मूसा को बुलाया गया था, क्योंकि इसमें दिन का अधिकांश समय खर्च हो जाता था। इसके अतिरिक्त, ऐसा प्रतीत होता है कि उसने इसे चतुराई से किया था, जो उसके बैठने से प्रतीत होता है, जब वह न्याय करने के लिए बैठता था, जैसा कि हमें वचन 13 में दिखाई देता है, "दूसरे दिन मूसा लोगों का न्याय करने को बैठा, और भोर से साँझ तक लोग मूसा के आसपास खड़े रहे।" हम अनुमान लगा सकते हैं कि वह संयमित और आत्मविश्‍वासी था। उसके नेतृत्व को अच्छी तरह से स्वीकार किया गया था, क्योंकि वचन 14 के अन्तिम भाग से पता चलता है, "क्या कारण है कि तू अकेला बैठा रहता है, और लोग भोर से साँझ तक तेरे आसपास खड़े रहते हैं?" यह हमें उन लोगों की सेवा करने के लिए उनकी विनम्र संवेदना को दर्शाता है, जो उसके आसपास खड़े थे। वह सुलभ से मिलने वाला जन था, उसके पास सबसे सामान्य इस्राएली का भी स्वागत था कि वह अपने स्वयं के मुक़द्दमे को उसके सामने लाए। बड़ी निष्ठा और जिम्मेदारी की भावना के साथ मूसा ने पूरे दिन प्रश्नों को सुना, सोचा और उत्तर दिए।


हालाँकि यित्रो, उसका ससुर, उसके साथ था, शायद इससे उन्हें छुट्टी मनाने का एक अच्छा बहाना मिल जाता, क्योंकि वह उस दिन के लिए अदालत की कार्यवाही स्थगित कर सकता था—या कम-से-कम उसे छोटा तो कर ही सकता था—फिर भी यित्रो के आने के ठीक अगले ही दिन, वह सुबह से सांझ तक अदालत में बैठे रहा। आवश्यक आत्मिक और मसीही नेतृत्व कामों के अन्य विषयों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। यह हमारे मित्रों के लिए बहुत बड़ी प्रशंसा है कि वे परमेश्‍वर के प्रति उनके कर्तव्य से पहले उसकी संगति का आनन्द लेना पसन्द करते हैं, जो किया जाना चाहिए। (परमेश्‍वर हमारा मार्गदर्शन कर सकता है, ताकि मित्रों के साथ संगति के लिए भी समय दिया जा सके।) हालाँकि मूसा को बहुत ज्यादा सम्मान दिया गया था, फिर भी उसने अपनी जिम्मेदारियों को हल्के में नहीं लिया। जबकि उसके डेरे में एक अतिथि था, तब भी वह अपने काम में लगा रहा। मूसा ने सोचा कि उसके सम्मानित पद ने उसे सेवा से छूट देने के बजाय, उसके लिए इसे और अधिक अनिवार्य बना दिया। जो लोग स्वयं को दैनिक जिम्मेदारियों से ऊपर समझते हैं, वे उच्च और पराक्रमी लोगों की तरह होते हैं, जो भले काम करने के लिए स्वयं को सबसे छोटा समझते हैं। सेवा करने योग्य होना स्वयं स्वर्गदूतों के लिए भी सम्मान की बात है। हालाँकि लोगों ने उसे उकसाया था, और वे उसे पत्थर मारने के लिए तैयार थे, जैसा कि मूसा ने निर्गमन 17:4 में कहा था, "ये सब मुझ पर पथराव करने को तैयार हैं” फिर भी उसने स्वयं को सभी का सेवक बना लिया। यद्यपि दूसरे हमारे प्रति अपने कर्तव्य में विफल रहते हैं, फिर भी हमें उनके प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हालाँकि वह एक बूढ़ा व्यक्ति था, फिर भी वह सुबह से रात तक अपने काम को करते रहा, और वह ऐसा करना अपना कर्तव्य मानता था। स्पष्ट है कि परमेश्‍वर ने उसे शरीर और मन दोनों में बहुत ज्यादा शक्ति दी थी, जिसने उसे आसानी और आनन्द के साथ बहुत सारे काम को करने में सक्षम बनाया होगा। परमेश्‍वर की सेवा में खर्च करने और खर्च होने के लिए हमारे प्रोत्साहन के लिए मूसा एक उदाहरण है। हम पवित्रशास्त्र से जानते हैं कि उसके सभी परिश्रमों के बाद भी मूसा की स्वाभाविक शारीरिक शक्ति कम नहीं हुई थी। जो लोग प्रभु और उसकी सेवा की प्रतीक्षा करते हैं, वे अपनी शक्ति को नवीनीकृत करेंगे। इस पाठ में अब तक मेरी यह सारी शिक्षा एक अच्छी कार्य संबंधी नैतिकता, कार्य संबंधी जिम्मेदारी के प्रति एक अच्छी व्यक्तिगत नीति है। मैं मसीही अगुवों को कड़े परिश्रम करने और अच्छी सेवा करने के लिए सिखाने से पीछे नहीं हटूँगा, जैसा कि मूसा ने किया था। परन्तु इस मुद्दे का एक और पक्ष है, प्रतिनिधिमंडल, और यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें काम और प्रतिनिधिमंडल के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है।


अब मेरे साथ उस गहरे ज्ञान, विवेक और अंतर्दृष्टि पर ध्यान दें, जिसे यित्रो मूसा को देता है। यित्रो ने मूसा के तरीके में कमजोरी देखी, और वह उसके साथ इतना ज्यादा खुला हुआ था कि वह उसे इसके बारे में बात कर सकता था। जो कोई भी हमारे मुँह पर हमारे साथ बात करने के लिए पर्याप्त परवाह करता है, उसकी सलाह पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। वचन 14 कहता है, "यह देखकर कि मूसा लोगों के लिये क्या–क्या करता है, उसके ससुर ने कहा, “यह क्या काम है जो तू लोगों के लिये करता है? क्या कारण है कि तू अकेला बैठा रहता है, और लोग भोर से साँझ तक तेरे आसपास खड़े रहते हैं?" और वचन 17 और 18 में कहा गया है, "मूसा के ससुर ने उससे कहा, "जो काम तू करता है, वह अच्छा नहीं। इससे तू क्या, वरन् ये लोग भी जो तेरे संग हैं, निश्‍चय थक जाएँगे, क्योंकि यह काम तेरे लिये बहुत भारी है; तू इसे अकेला नहीं कर सकता।" यित्रो ने सोचा कि यह बहुत अधिक परिश्रमी काम था, मूसा के लिए अकेले बहुत अधिक न्याय देना, और यह कि यह उसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होगा और उसके लिए बहुत अधिक थकान वाला होगा। उसने यह भी सोचा कि इससे न्याय की प्रशासन व्यवस्था लोगों के लिए थकाऊ बना देगी; और इसलिए वे उससे स्पष्ट रूप से कहता है, यह तेरे लिए अच्छा नहीं है। भले काम में भी अत्याधिक परिश्रम हो सकता है, और इसलिए हमारा उत्साह सदैव विवेक से नियंत्रित होना चाहिए, ताकि हमारे द्वारा किए गए भले के बारे में बुरा न कहा जाए। हमें अपने कर्तव्य से कम करने में संतुष्ट नहीं होना चाहिए, परन्तु न ही हमें अपने सामर्थ्य से अधिक काम करना चाहिए। पहले कदम के रूप में, यित्रो मूसा को अधिक काम करने के नुकसान और खतरे के बारे में बताता है। यह उसके या लोगों के लिए अच्छा नहीं होगा। शैतान जानता है कि प्रभु की सेवा में हमें उत्तेजित करने के लिए हमारे अपने जुनून का उपयोग करके हमारा विरोध कैसे करें।

यित्रो ने उसे न्याय के प्रशासन की एक पद्धति की सलाह दी, जो मूसा की अपनी मंशा को सर्वोत्तम ढंग से पूरा करेगी, यदि वह अधिक संकीर्ण रूप से परिभाषित करे कि उसे स्वयं क्या करना चाहिए, जैसा कि वचन 19 में कहा गया है, "इसलिये अब मेरी सुन ले, मैं तुझ को सम्मति देता हूँ, और परमेश्‍वर तेरे संग रहे! तू इन लोगों के लिये परमेश्‍वर के सम्मुख जाया कर, और इनके मुक़द्दमों को परमेश्‍वर के पास तू पहुँचा दिया कर।" यह एक जिम्मेदारी थी और एक ऐसा सम्मान था, जिसमें किसी और को उनके साथ साझा करना उचित नहीं था। गिनती 12:6-8 उसने कहा, "तब यहोवा ने कहा, "मेरी बातें सुनो : यदि तुम में कोई नबी हो, तो उस पर मैं यहोवा दर्शन के द्वारा अपने आप को प्रगट करूँगा, या स्वप्न में उससे बातें करूँगा। परन्तु मेरा दास मूसा ऐसा नहीं है; वह तो मेरे सब घरानों में विश्‍वासयोग्य है। उस से मैं गुप्‍त रीति से नहीं, परन्तु आमने–सामने और प्रत्यक्ष होकर बातें करता हूँ; और वह यहोवा का स्वरूप निहारने पाता है। इसलिये तुम मेरे दास मूसा की निन्दा करते हुए क्यों नहीं डरे?"" इसके अतिरिक्त जो कुछ भी सामान्य रूप से पूरी मण्डली से संबंधित है, उसे उसके आगे से गुजरना चाहिए, जैसा कि यित्रो ने वचन 20 में भी कहा है, "इन्हें विधि और व्यवस्था प्रगट कर करके, जिस मार्ग पर इन्हें चलना, और जो जो काम इन्हें करना हो, वह इनको जता दिया कर।" मूसा के पास जिम्मेदारियाँ थीं, जिन्हें केवल वही पूरा कर सकता था और ऐसे ही ये आपके भी है। परन्तु, यित्रो कहता है, मूसा को कई गोत्रों और परिवारों में न्यायियों को नियुक्त करना चाहिए, जो एक जन और दूसरे जन के बीच न्याय का काम करें, और उन्हें कम शोर मचाए और अधिक कुशलता के साथ निर्धारित करें, उस सामान्य सभा की तुलना में, जिसमें मूसा ने स्वयं अध्यक्षता की थी। इस तरह उसे एक राष्ट्र के रूप में एक राजा द्वारा सर्वोच्च के रूप में शासन करना चाहिए, और उसके द्वारा छोटे न्यायियों को भेजा और नियुक्त किया जाना चाहिए। 1 पतरस 2:13 कहता है,"प्रभु के लिये मनुष्यों के ठहराए हुए हर एक प्रबन्ध के अधीन रहो, राजा के इसलिये कि वह सब पर प्रधान है, और हाकिमों के, क्योंकि वे कुकर्मियों को दण्ड देने और सुकर्मियों की प्रशंसा के लिये उसके भेजे हुए हैं।" यित्रो की सोच में, कई लोग हल्का काम करेंगे, मुक़द्दमे जल्द सुने जाएँगे, और लोग अपने डेरे-दरवाजों के निकट ही न्याय को प्राप्त करके सहज हो जाएँगे। फिर भी, यदि कोई उचित कारण होता, तो इन निचली अदालतों से सीधे मूसा के पास अपील की जा सकती थी—कम-से-कम तब तो अवश्य, जब न्यायी उस मुक़द्दमे को हल न कर पाते। वचन 22 में कहा गया है, "और वे सब समय इन लोगों का न्याय किया करें; और सब बड़े बड़े मुक़द्दमों को तो तेरे पास ले आया करें, और छोटे छोटे मुक़द्दमों का न्याय आप ही किया करें; तब तेरा बोझ हल्का होगा, क्योंकि इस बोझ को वे भी तेरे साथ उठाएँगे।" इस तरह मूसा, वह बुद्धिमान जन, केवल बड़े विषयों में कार्यरत होकर अधिक से अधिक सेवा करने योग्य होगा। जिनके वरदान और स्थान सबसे प्रमुख हैं, वे अभी भी उन लोगों की सहायता से अपने काम में बहुत आगे बढ़ सकते हैं, जो हर तरह से अपने निचले स्तर पर हैं, इसलिए उन्हें तिरस्कार नहीं करना चाहिए। सिर को हाथों और पैरों की आवश्यकता होती है, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 12:21 में पुष्टि की गई है, "आँख हाथ से नहीं कह सकती, "मुझे तेरी आवश्यकता नहीं," और न सिर पाँवों से कह सकता है, "मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं!" प्रभावी अगुवों को न केवल स्वयं उपयोगी होने के लिए शिक्षित करना चाहिए, बल्कि गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उनकी क्षमताओं के अनुसार दूसरों को कैसे उपयोगी बनाया जाए। यह यित्रो की सलाह है, जिसके द्वारा यह प्रतीत होता है कि हालाँकि मूसा ने उसे भविष्यद्वाणी में श्रेष्ठ बनाया, परन्तु वह प्रशासनिक ज्ञान में मूसा से श्रेष्ठ था।

हालाँकि, दो और मुद्दों को संबोधित करने की आवश्यकता थी। सबसे पहले, उन लोगों के चयन में बहुत ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, जिन्हें इस न्यायिक कार्य में भर्ती किया जाना चाहिए, जैसा कि वचन 21 में कहा गया है, "फिर तू इन सब लोगों में से ऐसे पुरुषों को छाँट ले, जो गुणी, और परमेश्‍वर का भय मानने वाले, सच्‍चे, और अन्याय के लाभ से घृणा करने वाले हों; और उनको हज़ार–हज़ार, सौ–सौ, पचास–पचास, और दस–दस मनुष्यों पर प्रधान नियुक्‍त कर दे।" वे सक्षम पुरुष होने चाहिए। यह आवश्यक था कि वे न्याय और संकल्प के लिए सबसे अच्छे चरित्र वाले जन, सक्षम व्यक्ति, अच्छी समझ वाले लोग, कार्य को समझने वाले और साहसी लोग होने चाहिए, जो दूसरों की राय से अनुचित रूप से प्रभावित नहीं हों। साफ़-सुथरे दिमाग और मजबूत मन अच्छे न्यायी बनाते हैं। उन्हें धर्मी होना चाहिए - जैसे कि परमेश्‍वर का भय मानने वाला चाहिए, क्योंकि उनके ऊपर एक परमेश्‍वर है, जिसकी दृष्टि उन पर है, जिसके प्रति वे जवाबदेह हैं, और जिसके दण्ड से वे डरें। उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति होना चाहिए, जो कोई बुनियादी काम करने का हियाव नहीं करता, हालाँकि जिसे वे अत्यन्त गुप्त रीति से और सुरक्षित रूप से कर सकते हैं। परमेश्‍वर का भय वह सिद्धान्त है, जो मनुष्य को अन्याय के प्रलोभन के विरुद्ध सबसे जयादा मजबूती से कार्य करेगा। नहेम्याह 5:15 कहता है, "परन्तु पिछले अधिपति जो मुझ से पहले थे, वे प्रजा पर भार डालते थे, और उनसे रोटी, और दाखमधु, और इसके साथ चालीस शेकेल चाँदी लेते थे, वरन् उनके सेवक भी प्रजा के ऊपर अधिकार जताते थे; परन्तु मैं ऐसा नहीं करता था, क्योंकि मैं यहोवा का भय मानता था।" और उत्पत्ति 42:18 हमें यूसुफ के चरित्र का स्मरण दिलाया गया है, "तीसरे दिन यूसुफ ने उनसे कहा, "एक काम करो तब जीवित रहोगे; क्योंकि मैं परमेश्‍वर का भय मानता हूँ।"" छोटे न्यायियों के पास सत्यनिष्ठा और ईमानदारी होनी चाहिए, ऐसे सत्यवादी व्यक्ति, जिनकी वाणी पर कोई भी विश्‍वास कर सकता है, और जिनकी सत्य के प्रति निष्ठा विश्‍वनीय हो, जो संसार के सामने झूठ नहीं बोलेंगे, विश्‍वासघात नहीं करेंगे, या धोखेबाजी वाले कार्य नहीं करेंगे। उनमें सांसारिक धन के प्रति बहुत ज्यादा विरोध और उदारता भरा तिरस्कार होना चाहिए, लोभ से घृणा करनी चाहिए, न कि केवल रिश्‍वत माँगनी चाहिए और न ही स्वयं को समृद्ध करने का लक्ष्य रखना चाहिए, बल्कि इसके विचार से घृणा करनी चाहिए। यशायाह 33:15 कहता है, "जो धर्म से चलता और सीधी बातें बोलता, जो अन्धेर के लाभ से घृणा करता, जो घूस नहीं लेता; जो खून की बात सुनने से कान बन्द करता, और बुराई देखने से आँख मूँद लेता है। वही ऊँचे स्थानों में निवास करेगा।"


दूसरी बात, यित्रो को यह भी पता था कि मूसा को इस विषय में परमेश्‍वर का निर्देश लेना चाहिए। यह मूसा को उसकी सलाह का सबसे अच्छा हिस्सा हो सकता है। परमेश्‍वर से प्रार्थना करें। मैंने तुझे मेरी सलाह दी है, परन्तु तू परमेश्‍वर से माँग। "यदि तू ऐसा करता है और परमेश्‍वर ऐसा आदेश देता है, तो तू तनाव को सहन कर पाएगा, और ये सभी लोग संतुष्ट होकर घर जाएँगे।" यित्रो जानता था कि मूसा के पास उससे भी अधिक सर्वोत्तम सलाहकार है, और वह मूसा को सलाह के उस बड़े स्रोत की ओर संदर्भित करता है। परमेश्‍वर के वचन और ज्ञान के प्रति विनम्र समर्पण के साथ सलाह दी जानी चाहिए, जो हम में से किसी को भी देने या प्राप्त करने वाली किसी भी सलाह को सदैव खारिज कर देती है।


मूसा ने इस सलाह का तिरस्कार नहीं किया, भले ही यह किसी ऐसे व्यक्ति से आई हो, जो शायद परमेश्‍वर की वाणी से उतना परिचित नहीं था, जितना कि वह स्वयं था। उसने अपने ससुर की आवाज सुनी, क्योंकि वचन 24 में कहा गया है, "अपने ससुर की यह बात मान कर मूसा ने उसके सब वचनों के अनुसार किया।" जब उसने इस विचार पर कार्य किया होगा, तो उसे अपने ससुर के प्रस्ताव की तर्कसंगतता को देखा होगा और इसे व्यवहार में लाने का संकल्प लिया, जो उसने बाद में किया, जब उसे परमेश्‍वर से सत्यापन और निर्देश प्राप्त हुए। लोग उतने बुद्धिमान नहीं होते हैं, जितना वे चाहते हैं कि दूसरे सोचें कि वे हैं, यदि वे स्वयं को बहुत ज्यादा बुद्धिमान समझते हैं कि उन्हें सलाह नहीं दी जा सकती है। एक सच्चा बुद्धिमान व्यक्ति सुनेगा, और सीखने में वृद्धि करेगा, और अच्छी सलाह को कम नहीं आंकेगा, भले ही यह एक छोटे व्यक्ति द्वारा दी गई हो। लोगों द्वारा चुने गए लोगों में से, मूसा ने स्वयं उन्हें नियुक्त किया, कुछ को बड़े कार्यों के लिए, दूसरों को छोटे कार्यों के लिए, छोटे से लेकर बड़े न्याय के लिए।

मूसा ने ऐसा कब किया? व्यवस्थाविवरण के पहले अध्याय में मूसा और इस्राएल का अभिलेख मिलता है, जो व्यवस्था प्राप्त करने और देने के बाद होरेब छोड़ने की तैयारी कर रहे थे। यह स्पष्ट रूप से तब घटित हुआ, जब मूसा ने यित्रो की सलाह को लागू किया। उस अध्याय के वचन 9-15 में कहा गया है, "फिर उसी समय मैं ने तुम से कहा, ‘मैं तुम्हारा भार अकेले नहीं उठा सकता; क्योंकि तुम्हारे परमेश्‍वर यहोवा ने तुम को यहाँ तक बढ़ाया है कि तुम गिनती में आज आकाश के तारों के समान हो गए हो। तुम्हारे पितरों का परमेश्‍वर तुम को हज़ार गुणा और भी बढ़ाए, और अपने वचन के अनुसार तुम को आशीष भी देता रहे! परन्तु तुम्हारे झंझट, और बोझ, और झगड़े–रगड़े को मैं अकेला कहाँ तक सह सकता हूँ?  इसलिये तुम अपने अपने गोत्र में से बुद्धिमान और समझदार और प्रसिद्ध पुरुष चुन लो, और मैं उन्हें तुम पर मुखिया ठहराऊँगा।’ इसके उत्तर में तुम ने मुझ से कहा, ‘जो कुछ तू हम से कहता है उसका करना अच्छा है।’ इसलिये मैं ने तुम्हारे गोत्रों के मुख्य पुरुषों को जो बुद्धिमान और प्रसिद्ध पुरुष थे चुनकर तुम पर मुखिया नियुक्‍त किया, अर्थात् हज़ार–हज़ार, सौ–सौ, पचास–पचास, और दस–दस के ऊपर प्रधान और तुम्हारे गोत्रों के सरदार भी नियुक्‍त किए।" हम शासन को एक बड़ी दया के रूप में महत्व दे सकते हैं और व्यवस्था और विधियाँ देने के लिए परमेश्‍वर को धन्यवाद दे सकते हैं, ताकि हम मछली की तरह न रह सकें। बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा जाती हैं।


यित्रो की बुद्धिमानी से भरी सलाह की कहानी वचन 27 के साथ समाप्त होती है, जिसमें कहा गया है, "तब मूसा ने अपने ससुर को विदा किया, और उसने अपने देश का मार्ग लिया।" इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह परमेश्‍वर के बारे में अपने ज्ञान में किए गए सुधारों को अपने साथ अपनी भूमि पर ले गया, और उन्हें अपने पड़ोसियों को उन्हें निर्देश देने के लिए बताया। मूसा और यित्रो दोनों को उनके आदान-प्रदान से लाभ हुआ। कई वर्षों बाद पौलुस तीमुथियुस को यित्रो की तरह सलाह देता। 2 तीमुथियुस 2:2 "और जो बातें तू ने बहुत से गवाहों के सामने मुझ से सुनी हैं, उन्हें विश्‍वासी मनुष्यों को सौंप दे; जो दूसरों को भी सिखाने के योग्य हों। 3मसीह यीशु के अच्छे योद्धा के समान मेरे साथ दु:ख उठा।" मसीही अगुवों, पवित्र आत्मा आज आपको यह जानने का ज्ञान दे कि योग्य लोगों को कैसे खोजना है, ताकि उन्हें जिम्मेदारियाँ सौंपीं जाएँ। आप, वे और जिन लोगों की आप दोनों सेवा करते हैं, वे सभी विजेता होंगे। आप अधिक काम करने से नहीं थकेंगे और आपके आस-पास के अन्य लोग सौंपी गई जिम्मेदारी के अनुभवों के माध्यम से सीखेंगे और आगे बढ़ेंगे। मूसा ने यित्रो की सलाह को गंभीरता से लिया। आइए हम लोगों को आगे बढ़ने के लिए सौंपना और उन पर भरोसा करना सीखें।