परमेश्‍वर को संभालने देना

अध्याय अड़तीस


गिनती 12

Ron Meyers

1मूसा ने एक कूशी स्त्री के साथ विवाह कर लिया था। इसलिये मरियम और हारून उसकी उस विवाहिता कूशी स्त्री के कारण उसकी निन्दा करने लगे; 2उन्होंने कहा, “क्या यहोवा ने केवल मूसा ही के साथ बातें की हैं? क्या उसने हम से भी बातें नहीं कीं?” उनकी यह बात यहोवा ने सुनी। 3मूसा पृथ्वी भर के रहने वाले सब मनुष्यों से बहुत अधिक नम्र स्वभाव का था। 4इसलिये यहोवा ने एकाएक मूसा और हारून और मरियम से कहा, “तुम तीनों मिलापवाले तम्बू के पास निकल आओ।” तब वे तीनों निकल आए। 5तब यहोवा ने बादल के खम्भे में उतरकर तम्बू के द्वार पर खड़ा होकर हारून और मरियम को बुलाया; अत: वे दोनों उसके पास निकल आए। 6तब यहोवा ने कहा, “मेरी बातें सुनो : यदि तुम में कोई नबी हो, तो उस पर मैं यहोवा दर्शन के द्वारा अपने आप को प्रगट करूँगा, या स्वप्न में उससे बातें करूँगा। 7परन्तु मेरा दास मूसा ऐसा नहीं है; वह तो मेरे सब घरानों में विश्‍वासयोग्य है। 8उस से मैं गुप्‍त रीति से नहीं, परन्तु आमने–सामने और प्रत्यक्ष होकर बातें करता हूँ; और वह यहोवा का स्वरूप निहारने पाता है। इसलिये तुम मेरे दास मूसा की निन्दा करते हुए क्यों नहीं डरे?” 9तब यहोवा का कोप उन पर भड़का, और वह चला गया; 10तब वह बादल तम्बू के ऊपर से उठ गया, और मरियम कोढ़ से हिम के समान श्‍वेत हो गई। और हारून ने मरियम की ओर दृष्‍टि की और देखा कि वह कोढ़िन हो गई है। 11तब हारून मूसा से कहने लगा, “हे मेरे प्रभु, हम दोनों ने जो मूर्खता की वरन् पाप भी किया, यह पाप हम पर न लगने दे। 12और मरियम को उस मरे हुए के समान न रहने दे, जिसकी देह अपनी माँ के पेट से निकलते ही अधगली हो।” 13अत: मूसा ने यह कहकर यहोवा की दोहाई दी, “हे ईश्‍वर कृपा कर, और उसको चंगा कर।” 14यहोवा ने मूसा से कहा, “यदि उसका पिता उसके मुँह पर थूका ही होता, तो क्या सात दिन तक वह लज्जित न रहती? इसलिये वह सात दिन तक छावनी से बाहर बन्द रहे, उसके बाद वह फिर भीतर आने पाए। 15अत: मरियम सात दिन तक छावनी से बाहर बन्द रही, और जब तक मरियम फिर आने न पाई तब तक लोगों ने प्रस्थान न किया। 16उसके बाद उन्होंने हसेरोत से प्रस्थान करके पारान नामक जंगल में अपने डेरे खड़े किए।


हारून और मरियम के ओर से मूसा के विरुद्ध बोलना उचित नहीं था, क्योंकि वचन 1 में कहा गया है, "मूसा ने एक कूशी स्त्री के साथ विवाह कर लिया था। इसलिये मरियम और हारून उसकी उस विवाहिता कूशी स्त्री के कारण उसकी निन्दा करने लगे।" यदि मूसा, जिसे परमेश्‍वर से इतना सम्मान मिला, फिर भी उसने मनुष्यों से इतने सारे अपमान प्राप्त किए, तो जब हमारे साथ ऐसा होता है, तो क्या हमें लगता है कि ऐसी परीक्षाएँ अजीब या असाधारण हैं? नहीं ऐसा नहीं है। यह अगुवों के साथ होता है। और यह गड़बड़ी किसने पैदा की? वे ही थे, जो स्वयं गंभीर और अच्छे थे, यहाँ तक कि मूसा, मरियम एक नबिया और हारून महायाजक के पास उत्कृष्ट अगुवा था, और वे दोनों इस्राएल के छुटकारे के लिए मूसा के साथ सेवा कर रहे थे? मीका 6:4 में तीनों भाई-बहनों को एक साथ रखा गया है, "मेरे विरुद्ध साक्षी दे! मैं तो तुझे मिस्र देश से निकाल ले आया, और दासत्व के घर में से तुझे छुड़ा लाया; और तेरी अगुवाई करने को मूसा, हारून और मरियम को भेज दिया।" विद्रोह दो लोगों की ओर से था, जो उसके सबसे निकट रिश्तेदार थे, उसके अपने भाई और बहिन थे, जो केवल उससे आने वाली आभा को प्राप्त करके और उसे प्रतिबिंबित करके इतने ज्यादा चमक गए? श्रेष्ठगीत  1:6 कहता है, "मुझे इसलिये न घूर कि मैं साँवली हूँ, क्योंकि मैं धूप से झुलस गई। मेरी माता के पुत्र मुझ से अप्रसन्न थे, उन्होंने मुझ को दाख की बारियों की रखवालिन बनाया; परन्तु मैं ने अपनी निज दाख की बारी की रखवाली नहीं की!" संबंधों के बीच आया झगड़ा एक विशेष तरीके से गंभीर होता है। एक मजबूत नगर की तुलना में रूठे हुए भाई को जीतना कठिन है। फिर भी यह मूसा के बुलाहट की पुष्टि करने में सहायता करता है, और दिखाता है कि उसकी वृद्धि विशुद्ध रूप से ईश्‍वरीय अनुग्रह से हुई थी, न कि उसके रिश्तेदारों के साथ किसी विशेष समझौते के कारण, जो स्वयं उसकी वृद्धि से ईर्ष्या कर रहे थे। यूहन्ना 7:5 कहता है कि यीशु के साथ भी ऐसा ही हुआ, "क्योंकि उसके भाई भी उस पर विश्‍वास नहीं करते थे।" ऐसा लगता है कि मरियम ने विरोध आरम्भ कर दिया था, और हारून, जिस से सत्तर बुजुर्गों के चुनाव किए जाने में हुई नियुक्त में या उससे किसी तरह का कोई परामर्श नहीं लिया गया था, वर्तमान में मूसा से कुछ हद तक घृणा करता रहा होगा, और इसलिए जल्द ही वह अपनी बहिन के साथ इस विरोध में जुड़ने के लिए आकर्षित हो गया था। हारून के सामान्य तौर पर धर्मी हाथ के द्वारा एक सोने के बछड़े बनाए जाने और अब इस बुरी योजना में शामिल देखकर कोई भी दु:खी होगा, परन्तु यहाँ भी एक छिपा हुआ सबक मिलता है। जो यह दिखाता है कि व्यवस्था ने ऐसे लोगों को याजक बनाया, जो सिद्ध नहीं थे। शैतान ने पहले हव्वा पर जय प्राप्त की, और उसके द्वारा आदम पर जय प्राप्त की और अब हम मरियम को हारून को भटकाते हुए देखते हैं। देखें कि हमें अपने रिश्तेदारों द्वारा झगड़ों में घसीटे जाने पर ध्यान देने की क्या आवश्यकता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि एक छोटी सी आग कितनी बड़ी बात को भड़का सकती है। हारून को स्मरण रखना चाहिए था कि कैसे मूसा उसका अच्छा मित्र बना रहा था, जब परमेश्‍वर सोने का बछड़ा बनाने और उसके साथ भलाई के बदले बुराई न का कारण उससे क्रोधित रहा था। वे मूसा के साथ दो बातों को लेकर झगड़ते हैं। पहला उसकी कूशी/इथियोपियाई पत्नी के बारे में था। स्मरण कीजिए कि इससे पहले हमने पता लगाया था कि मूसा ने एक इथियोपियाई से विवाह किया था, जब वह इथियोपिया में एक सैन्य अभियान पर था? यदि यह वही कूशी पत्नी है, जिसके बारे में यह घटना बोलती है, तो उसकी आलोचना करने के बजाय, उसे बधाई दी जानी चाहिए कि वह इस्राएलियों के साथ यात्रा करना चाहती थी और यह कि वह भी उस परमेश्‍वर से प्रेम करती थी, जिससे मूसा प्रेम करता था। सिप्पोरा, मूसा की मिद्यान से आई पत्नी, कूशी पत्नी से दु:खी नहीं थी; ईर्ष्यालु तो मरियम थी! यदि मूसा की कूशी पत्नी के प्रति कोई सोच थी, जो उसने मूसा के साथ साझा की होती और मूसा ने उसकी बात सुनी होती, तो किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति की तरह अपनी पत्नी की अच्छी सलाह सुनने के लिए मूसा की आलोचना करने वाली मरियम कौन थी? दूसरी बात जिस पर मरियम और हारून को आपत्ति थी, वह मूसा का शासकीय प्रशासन पर एकाधिकार था; इतना नहीं कि उसने कैसे नेतृत्व किया, बल्कि यह कि उसने उनसे परामर्श नहीं लिया था।


जब उसे परमेश्‍वर की ओर से निर्देश मिला था, तो वह उनसे सलाह क्यों लें? वचन 2 कहता है, "उन्होंने कहा, "क्या यहोवा ने केवल मूसा ही के साथ बातें की हैं? क्या उसने हम से भी बातें नहीं कीं?" उनकी यह बात यहोवा ने सुनी।"" क्या केवल मूसा को ही उन लोगों का चुनाव करना चाहिए था, जिन पर भविष्यद्वाणी का आत्मा आएगा? "क्या उसने हम से भी बातें नहीं कीं?" मानो यह ऐसा कहना था कि, "क्या इस विषय में हमारा भी कोई हाथ नहीं हो सकता था, और क्या हमने अपने मित्रों को प्राथमिकता नहीं दी होती—ठीक वैसे ही, जैसे मूसा ने अपने मित्रों को दी थी?" वे इस बात से इनकार नहीं कर सकते थे कि परमेश्‍वर ने मूसा के माध्यम से बात की थी, परन्तु यह स्पष्ट था कि उसने कभी-कभी उनके माध्यम से भी बात की थी और वे स्वयं को मूसा के बराबर रखने का मंशा रखते थे, भले ही परमेश्‍वर ने कई अर्थों में उसे उनसे अधिक प्रतिष्ठित किया था। सबसे बड़ा बनने का प्रयास करना एक पाप है, जो आसानी से मसीही अगुवों पर आक्रमण ले आता है, और यह पापपूर्ण है। यहाँ तक कि जो मसीही अच्छी तरह से पसन्द किए जाते हैं, वे शायद ही कभी प्रसन्न होते हैं, जबकि उनकी तुलना में दूसरों को अधिक पसन्द किया जाता है। जो उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं, उनसे सामान्य तौर पर ईर्ष्या की जाती है। यह मसीही अगुवों सहित लोगों के बीच होता है। हमें सावधान रहना चाहिए।

इन आरोपों के अधीन आत्म-नियंत्रित और नम्र मूसा के अद्भुत धैर्य पर ध्यान दें, क्योंकि उसने उनके अपमान को अनदेखा कर दिया, जैसा कि वचन 3 में कहा गया है, "मूसा पृथ्वी भर के रहने वाले सब मनुष्यों से बहुत अधिक नम्र स्वभाव का था।" मूसा ने निश्‍चित रूप से इसे देखा, परन्तु यह यहोवा ही था, जिसने इसके बारे में कुछ किया, जैसा कि वचन 4 में कहा गया है, "इसलिये यहोवा ने एकाएक मूसा और हारून और मरियम से कहा, "तुम तीनों मिलापवाले तम्बू के पास निकल आओ।" तब वे तीनों निकल आए।" यहाँ दो महत्वपूर्ण बातें देखने को मिलती हैं। (1.) यह प्रभु यहोवा था, मूसा नहीं, जिसने कार्य किया और (2.) परमेश्‍वर ने उन तीनों को बाहर आने के लिए कहा। हारून और मरियम के नेतृत्व में हुए अपमान से नाराज होने के लिए परमेश्‍वर के पास बहुत ज्यादा कारण थे। यह बुरा और गलत समय पर हुआ था, जब लोग पहले से ही विद्रोह पर विचार कर रहे थे, और हाल ही में मूसा को बहुत अधिक आलोचना का सामना करना पड़ा था। जब परमेश्‍वर के सम्मान का प्रश्न उठा था, जैसे कि सोने के बछड़े के विषय में, मूसा से अधिक उत्साही कोई नहीं था; परन्तु, जब उसके अपने सम्मान प्रश्न में आया, तो कोई भी व्यक्ति उससे अधिक नम्र नहीं था। वह परमेश्‍वर के लिए सिंह की तरह साहसी था, परन्तु अपने स्वयं के लिए एक भेड़ के मेम्ने की तरह नम्र था। यहाँ मूसा की तरह प्रभु यहोवा से सुरक्षा प्राप्त करने का तरीका दिखाई देता है। यह सपन्याह 2:3 में ऐसा कहा गया है। "हे पृथ्वी के सब नम्र लोगो, हे यहोवा के नियम के माननेवालो, उसको ढूँढ़ते रहो; धर्म को ढूँढ़ो, नम्रता को ढूँढ़ो; सम्भव है तुम यहोवा के क्रोध के दिन में शरण पाओ।" कुछ लोग अपनी विनम्रता की गरिमा के कारण दूसरों से अधिक विशिष्ट होते हैं। कुछ, मूसा की तरह, जो इस तरह से उस काम के लिए अच्छी तरह से मेल खाते हैं, जिसके लिए परमेश्‍वर ने उन्हें बुलाया है, वे मजबूत हो सकते हैं और फिर भी परमेश्‍वर स्वयं को उनके लिए लड़ने दे। कभी-कभी हमारे मित्रों या परिवारों की निर्दयता हमारे शत्रुओं की द्वेष की तुलना में हमारी विनम्रता की बड़ी परीक्षा होती है। मत्ती 11:29 में यीशु ने कहा है, "मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।" नम्रता कमजोरी से बहुत दूर है। नम्रता नियंत्रण में रहने वाली सामर्थ्य है। परमेश्‍वर हमें लोगों के साथ शांत, नियंत्रित और संयमी रहने के साथ-साथ प्रार्थना में शक्तिशाली, गतिशील और सामर्थी होने में सक्षम बनाएगा। हम परमेश्‍वर को इसे संभालने देने से सीख सकते हैं।


मूसा स्पष्ट रूप से इस दिन या तो अपनी चोट से नाराज नहीं हुआ या अपनी भावनाओं को बहुत अच्छी तरह से नियंत्रित नहीं किया। उसने न तो परमेश्‍वर से इसकी शिकायत की, न ही उससे कोई आग्रह किया; परन्तु परमेश्‍वर को यह पसन्द नहीं आया। वह उन सभी की सुनता है, जो लोग अपने जुनून में बोलते हैं, और वह उनके फुर्ती वाले भाषणों के बोले जाने से एक शीघ्रता वाला गवाह बन जाता है। यह एक अच्छा कारण है कि हमें अपनी जीभ को दृढ़ता से दबाना चाहिए, कि हम दूसरों के बारे में बुरा न कहें, और हमें धैर्यपूर्वक अपने कान क्यों बंद कर लेने चाहिए, और यदि दूसरे हमारे बारे में बुरा बोलते हैं, तो इसका ध्यान क्यों नहीं रखना चाहिए। भजन संहिता 38:13-15 से ज्ञान प्राप्त करें। जो कहता है, "परन्तु मैं बहरे के समान सुनता ही नहीं, और मैं गूँगे के समान मुँह नहीं खोलता। वरन् मैं ऐसे मनुष्य के तुल्य हूँ, जो कुछ नहीं सुनता, और जिसके मुँह से विवाद की कोई बात नहीं निकलती। परन्तु, हे यहोवा, मैं ने तुझ ही पर अपनी आशा लगाई है; हे प्रभु, मेरे परमेश्‍वर, तू ही उत्तर देगा।" हम अपने उद्देश्य की रक्षा करने में जितना अधिक चुप रहते हैं, उतना ही अधिक परमेश्‍वर इसकी वकालत करने में लगे रहता है। अभियुक्त निर्दोष व्यक्ति को बहुत कम कहने की आवश्यकता होती है, यदि वह जानता है कि न्यायी स्वयं उसका वकील होगा। परमेश्‍वर को इसे संभालने दें।


इस संघर्ष में पक्षों को तम्बू के द्वार पर बुलाया जाता है, क्योंकि वचन 4 और 5 में कहा गया है, "इसलिये यहोवा ने एकाएक मूसा और हारून और मरियम से कहा, "तुम तीनों मिलापवाले तम्बू के पास निकल आओ।" तब वे तीनों निकल आए। तब यहोवा ने बादल के खम्भे में उतरकर तम्बू के द्वार पर खड़ा होकर हारून और मरियम को बुलाया; अत: वे दोनों उसके पास निकल आए।" मूसा ने अक्सर परमेश्‍वर के सम्मान के लिए ईर्ष्या दिखाई थी, और अब परमेश्‍वर ने मूसा की प्रतिष्ठा के लिए ईर्ष्या दिखाई; जो लोग परमेश्‍वर का सम्मान करते हैं, उनके लिए वह सम्मान करेगा, न ही वह कभी किसी को त्याग देगा और न ही छोड़ देगा, जो उसे दिखाई देता है। प्राचीन काल के न्यायी और राजा कारण जानने के लिए नगर के फाटक पर बैठे थे, और इसलिए यहाँ हम देखते हैं कि परमेश्‍वर महिमा के बादल में तम्बू के द्वार पर खड़ा है, और हारून और मरियम, अपराधियों के रूप में, न्यायी के दरबार में बुलाए गए हैं। जब हम परमेश्‍वर को मूसा की रक्षा करते हुए देखते हैं, तो आइए हम भी अपनी रक्षा करने के लिए उस पर भरोसा करना सीखें। परमेश्‍वर को इसकी देखभाल करने दें। वह इसे हमसे सर्वोत्तम कर सकता है। चूँकि वह कर सकता है, इसलिए, हमें करने की आवश्यकता नहीं है।

हारून और मरियम को यह बताया गया कि वे जितने योग्य हैं, उसकी तुलना में उन्हें मूसा के बराबर होने का नाटक नहीं करना चाहिए, और न ही स्वयं को उसके प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करना चाहिए। वचन 6-8 इस बात को स्पष्ट करता है। "तब यहोवा (परमेश्‍वर) ने कहा, "मेरी बातें सुनो : यदि तुम में कोई नबी हो, तो उस पर मैं यहोवा दर्शन के द्वारा अपने आप को प्रगट करूँगा, या स्वप्न में उससे बातें करूँगा। परन्तु मेरा दास मूसा ऐसा नहीं है; वह तो मेरे सब घरानों में विश्‍वासयोग्य है। उस से मैं गुप्‍त रीति से नहीं, परन्तु आमने–सामने और प्रत्यक्ष होकर बातें करता हूँ; और वह यहोवा का स्वरूप निहारने पाता है। इसलिये तुम मेरे दास मूसा की निन्दा करते हुए क्यों नहीं डरे?"" मूसा के बारे में यह इसे अर्थों में कहा जा सकता है, बल्कि वह तो और भी ज्यादा है। यह सच था कि परमेश्‍वर ने भविष्यद्वक्ताओं को बहुत अधिक सम्मान दिया। हालाँकि लोगों ने उनका ठट्ठा उड़ाया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया, हालाँकि वे स्वर्ग के पसन्दीदा थे। जब वे सो रहे होते थे, तो परमेश्‍वर उन्हें स्वयं को स्वप्नों से या जब वे जाग रहे होते थे, तो दर्शनों से प्रकट करता था, और उनके द्वारा दूसरों को स्वयं को ज्ञात कराता था। और वे जो आनन्दित हैं, वे शूरवीर हैं, वास्तव में बड़े हैं, वास्तव में प्रसन्न हैं, जिन पर परमेश्‍वर स्वयं को प्रकट करता है। अभी भी वह कभी-कभी स्वप्नों और दर्शन से बात करता है, जैसा कि पहले किया करता था, परन्तु ज्ञान और प्रकाशन की आत्मा से भी, जो उन बातों को बालकों को बताता है, जिन्हें भविष्यद्वक्ता और राजा देखना चाहते थे और नहीं देख सकते थे। फिर भी मूसा को दिया गया सम्मान मरियम और हारून के द्वारा किए गए विरोध को विनम्रता और धैर्य से सहन करने के लिए उसे मान्यता और प्रतिफल देने के लिए कहीं अधिक है। परमेश्‍वर ने न केवल उसे मान्यता दी, बल्कि उसकी प्रशंसा भी की। मूसा ने इस विषय के संबंध में वह सब कहा और किया, क्योंकि वह एक ईमानदार भला व्यक्ति था, जो परमेश्‍वर के सम्मान और इस्राएल के कल्याण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं करता था। मूसा को किसी भी अन्य भविष्यद्वक्ता की तुलना में परमेश्‍वर के मन की स्पष्ट खोजों और परमेश्‍वर के साथ अधिक घनिष्ठ सहभागिता के साथ सम्मानित किया गया था। वह किसी भी अन्य नबी की तुलना में परमेश्‍वर से अधिक स्पष्ट रूप से और विशिष्ठता के साथ सुनता था। अन्य नबियों के माध्यम से परमेश्‍वर ने अपने लोगों को फटकारें भेजीं, और अच्छे या बुरे भविष्य की भविष्यद्वाणियाँ कीं—जिन्हें उचित रूप से ही गूढ़ वचनों, प्रतीकों, दृष्टांतों और उपमाओं के रूप में व्यक्त किया गया था; परन्तु मूसा के द्वारा उसने अपने लोगों को व्यवस्था दी और पवित्र नीतियों की स्थापना की—जिन्हें किसी भी प्रकार से गूढ़ वचनों में व्यक्त नहीं किया जा सकता था, बल्कि उन्हें अत्यंत स्पष्ट और सुबोध ढंग से ही प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य था। मूसा ने किसी भी अन्य भविष्यद्वक्ता की तुलना में परमेश्‍वर को अधिक देखा, जैसा कि हमने निर्गमन 34 से सीखा, जब परमेश्‍वर ने मूसा के आगे से निकलते हुए विशिष्ट रूप से अपनी महिमा प्रकट की। मरियम और हारून द्वारा उसकी आलोचना करना गलत था।


अब मरियम और हारून विचार करें कि उन्होंने किसका अपमान कियाः क्या तुम मेरे दास मूसा के विरुद्ध बोलने से नहीं डरे? यह ऐसा कहने जैसा था, "तुम्हारा हियाव कैसे हुआ मेरे किसी भी सेवक के साथ दुर्व्यवहार करो, विशेष रूप से मूसा जैसे सेवक को, जो एक मित्र, एक विश्‍वासपात्र और मेरे सारे घराने का प्रबंधक है?" उन्होंने उस व्यक्ति के दुःख और तिरस्कार के बारे में बात करने की हियाव कैसे किया, जिसकी परमेश्‍वर इतनी प्रशंसा करता है? क्या वे यह आशा नहीं कर सकते कि परमेश्‍वर इससे क्रोधित होगा, और इसे अपने अपमान के रूप में लेगा? हमारे पास परमेश्‍वर के सेवकों के विरुद्ध कुछ भी कहने या करने से डरने का कारण है। यदि हम ऐसा करते हैं, तो यह हमारे लिए खतरा है, क्योंकि परमेश्‍वर उनका पक्ष लेगा, और मान लेगा कि जो उन्हें छूता है, वह उसकी आँख की पुतली को छूता है। जैसा कि मत्ती 18:6 कहता है, "पर जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्‍वास करते हैं, एक को ठोकर खिलाए, उसके लिये भला होता कि बड़ी चक्‍की का पाट उसके गले में लटकाया जाता, और वह गहरे समुद्र में डुबाया जाता।" परन्तु न केवल छोटे से छोटी सन्तान को, बल्कि मसीही अगुवों को आहत करना भी गलत है। मैं इस पाठ में अगुवों से आग्रह करना चाहता था कि वे परमेश्‍वर को उनकी समस्याओं को संभालने दें और बदला लेने या अपना बचाव करने की कोशिश न करें। हालाँकि, इस शिक्षा का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है, यह सच्चाई कि हमें अगुवों पर आक्रमण नहीं करना चाहिए। परमेश्‍वर इससे प्रसन्न नहीं होगा।


परमेश्‍वर, द्वारा उन्हें उनकी गलती और मूर्खता दिखाने के बाद, उन्हें वचन 9 में अपनी अप्रसन्नता दिखाता है, "तब यहोवा का कोप उन पर भड़का, और वह चला गया।" बादल भर गए और वहाँ से चले गए। यह परमेश्‍वर की नाराजगी का एक स्पष्ट पर्याप्त भौतिक प्रमाण था। परमेश्‍वर की उपस्थिति को हमसे हटाना हमारे विरुद्ध उसकी अप्रसन्नता का एक बहुत ही निश्‍चित और दु:खद संकेत है। हाय, हम पर, यदि वह चला जाता है; परन्तु वह कभी नहीं छोड़ता, जब तक कि हम अपने पाप और मूर्खता में उसे हमसे दूर नहीं कर देते।

परमेश्‍वर ने मरियम को उसकी गलती (और हमारी शिक्षा के लिए) के लिए दण्ड दिया, क्योंकि वचन 10 में कहा गया है, "तब वह बादल तम्बू के ऊपर से उठ गया, और मरियम कोढ़ से हिम के समान श्‍वेत हो गई। और हारून ने मरियम की ओर दृष्‍टि की और देखा कि वह कोढ़िन हो गई है।" हारून ने उसकी ओर मुड़कर देखा कि उसे चमड़ी को एक अशुद्ध करने वाली बीमारी लग गई है। परमेश्‍वर की नाराजगी इस बात से दिखाई देती है कि मरियम कोढ़ी हो गई थी। जब परमेश्‍वर जाता है, तो बुराई आती है; जब परमेश्‍वर चले जाता है, तो अच्छे की आशा न करें। कोढ़ एक ऐसी बीमारी है, जो अक्सर किसी विशेष पाप की दण्ड के रूप में परमेश्‍वर के तत्काल हाथ से आती है, जैसे कि गेहजी पर एलीशा से झूठ बोलने के लिए और उज्जियाह पर मंदिर में याजकीय सेवकाई पर आक्रमण करने के लिए, और यहाँ मरियम पर मूसा की आलोचना करने के लिए।


जब यह घटित हुआ, तो हारून एक विनम्र भावना दिखाता है, जैसा कि वचन 11 और 12 में व्यक्त किया गया है, "तब हारून मूसा से कहने लगा, "हे मेरे प्रभु, हम दोनों ने जो मूर्खता की वरन् पाप भी किया, यह पाप हम पर न लगने दे। और मरियम को उस मरे हुए के समान न रहने दे, जिसकी देह अपनी माँ के पेट से निकलते ही अधगली हो।" यह भी हमारे सीखने के लिए है। यदि हमने पाप किया है, तो पाप का शीघ्रता के साथ स्वीकार करना सबसे अच्छा है, जिसे हम कर सकते हैं। हारून मूसा के सामने स्वयं को विनम्र करता है, अपनी गलती स्वीकार करता है और क्षमा माँगता है। वह जो एक पल पहले अपनी बहिन के साथ मूसा के विरुद्ध बोलने में शामिल हो गया था, वह यहाँ अपने और अपनी बहिन के लिए पश्‍चातापपूर्ण क्षमा और अंगीकार करने के लिए मजबूर है। अपने बचाव के लिए, हारून आखिरकार सही काम करता है।


वचन 13 में हम देखते हैं कि मूसा स्वेच्छा से मरियम के लिए मध्यस्थता करता है। यह वचन छोटा और शीघ्रता के साथ समाप्त हो जाता है, "अत: मूसा ने यह कहकर यहोवा की दोहाई दी, "हे ईश्‍वर कृपा कर, और उसको चंगा कर!" उसने परमेश्‍वर को पुकारा, क्योंकि बादल, परमेश्‍वर की उपस्थिति का प्रतीक, हटा दिया गया था और कुछ दूरी पर खड़ा था, और इस विनती में उसकी उग्रता व्यक्त करने के लिए, "हे ईश्‍वर कृपा कर, और उसको चंगा कर!" एक छोटी और स्पष्ट रूप से गहन प्रार्थना से मूसा ने यह प्रदर्शित किया कि उसने मरियम द्वारा उसके लिए की गई चोट को अपने हृदय से क्षमा कर दिया है, और वह परमेश्‍वर के सामने उस पर आरोप नहीं लगाता है, न ही उसके विरुद्ध दण्ड की माँग करता है। अब, जबकि परमेश्‍वर ने मूसा के सम्मान की परवाह करते हुए उसके घमण्डी आक्रमण को दण्डित किया था, तो वह पहला व्यक्ति था, जिसने दण्ड को उलटने के लिए विनती की थी। इस उदाहरण से हमें सिखाया जाता है कि हम उन लोगों के लिए प्रार्थना करें, जो अपमानजनक रूप से हमारा उपयोग करते हैं; और उन लोगों पर परमेश्‍वर या मनुष्य द्वारा दिए गए सबसे धर्मी दंड का भी आनन्द न लें, जिन्होंने हमें घायल किया है।


वचन 15 हमें मरियम को दिए गए सम्मान को दर्शाता है कि पूरे शिविर ने मरियम के दण्ड खत्म होने तक उसकी प्रतीक्षा की, इससे पहले कि वे आगे बढ़ते। "अत: मरियम सात दिन तक छावनी से बाहर बन्द रही, और जब तक मरियम फिर आने न पाई, तब तक लोगों ने प्रस्थान न किया। परमेश्‍वर ने वहाँ से बादल को नहीं हिलाया, और इसलिए उन्होंने वहाँ से शिविर को नहीं हिलाया। हमारे स्वर्गीय कनान की ओर बढ़ने में कई चीजें हमारा विरोध करती हैं, परन्तु पाप की तरह कुछ भी हमें बाधित नहीं करता है।


महिमा, यीशु, को सारी महिमा मिले, जो हमारे लिए युद्ध करता हैं। हम तेरी स्तुति करते हैं, हे यीशु, हम तेरी स्तुति करते हैं; तेरे साथ सदैव जय प्राप्त होती है।


कई बार इस्राएलियों ने मूसा के विरुद्ध शिकायत की। कोरह के नेतृत्व में विद्रोह भी निश्‍चित रूप से उसके नेतृत्व पर एक बड़ा आक्रमण था। इन सभी विद्रोहों और शिकायतों के माध्यम से सीखा जाने वाला सबक एक ही है, जो हम इस अध्याय से सीख सकते हैं। हमें परमेश्‍वर को इसे संभालने देना सीखना चाहिए। यदि हम उसे करने देते हैं, तो वह काम करेगा। यदि हम इसे स्वयं ही इसे संभालने की कोशिश करते हैं, तो वह ऐसा नहीं करेगा। यदि हम इसे स्वयं संभालने की कोशिश करते हैं, तो परमेश्‍वर के पास दो समस्याएँ हैं - मूल आक्रमण और इसके प्रति हमारी बुरा प्रतिक्रिया।