भदियों की रिपोर्ट

अध्याय उनतालीस


गिनती 13:1-3,26-33,14:1-9

Ron Meyers

1फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2”कनान देश जिसे मैं इस्राएलियों को देता हूँ उसका भेद लेने के लिये पुरुषों को भेज; वे उनके पितरों के प्रति गोत्र के एक–एक प्रधान पुरुष हों।” 3यहोवा से यह आज्ञा पाकर मूसा ने ऐसे पुरुषों को पारान जंगल से भेज दिया, जो सब के सब इस्राएलियों के प्रधान थे।...26और पारान जंगल के कादेश नामक स्थान में मूसा और हारून और इस्राएलियों की सारी मण्डली के पास पहुँचे; और उनको और सारी मण्डली को संदेशा दिया, और उस देश के फल उनको दिखाए। 27उन्होंने मूसा से यह कहकर वर्णन किया, “जिस देश में तू ने हम को भेजा था उसमें हम गए; उसमें सचमुच दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, और उसकी उपज में से यही है। 28परन्तु उस देश के निवासी बलवान् हैं, और उसके नगर गढ़वाले हैं और बहुत बड़े हैं; और फिर हम ने वहाँ अनाकवंशियों को भी देखा। 29दक्षिण देश में अमालेकी बसे हुए हैं; और पहाड़ी देश में हित्ती, यबूसी, और एमोरी रहते हैं; और समुद्र के किनारे किनारे और यरदन नदी के तट पर कनानी बसे हुए हैं।”...30पर कालेब ने मूसा के सामने प्रजा के लोगों को चुप कराने के विचार से कहा, “हम अभी चढ़ के उस देश को अपना कर लें; क्योंकि नि:सन्देह हम में ऐसा करने की शक्‍ति है।” 31पर जो पुरुष उसके संग गए थे उन्होंने कहा, “उन लोगों पर चढ़ने की शक्‍ति हम में नहीं है; क्योंकि वे हम से बलवान् हैं।” 32और उन्होंने इस्राएलियों के सामने उस देश की जिसका भेद उन्होंने लिया था यह कहकर निन्दा भी की, “वह देश जिसका भेद लेने को हम गए थे ऐसा है, जो अपने निवासियों को निगल जाता है; और जितने पुरुष हम ने उसमें देखे वे सब के सब बड़े डील–डौल के हैं। 33फिर हम ने वहाँ नपीलों को, अर्थात् नपीली जातिवाले अनाकवंशियों को देखा; और हम अपनी दृष्‍टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे, और ऐसे ही उनकी दृष्‍टि में मालूम पड़ते थे।”


14:1तब सारी मण्डली चिल्‍ला उठी; और रात भर वे लोग रोते ही रहे। 2और सब इस्राएली मूसा और हारून पर बुड़बुड़ाने लगे; और सारी मण्डली उनसे कहने लगी, “भला होता कि हम मिस्र ही में मर जाते! या इस जंगल ही में मर जाते! 3यहोवा हम को उस देश में ले जाकर क्यों तलवार से मरवाना चाहता है? हमारी स्त्रियाँ और बाल–बच्‍चे तो लूट में चले जाएँगे; क्या हमारे लिये अच्छा नहीं कि हम मिस्र देश को लौट जाएँ?” 4फिर वे आपस में कहने लगे, “आओ, हम किसी को अपना प्रधान बना लें, और मिस्र को लौट चलें।” 5तब मूसा और हारून इस्राएलियों की सारी मण्डली के सामने मुँह के बल गिरे। 6और नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालिब, जो देश के भेद लेनेवालों में से थे, अपने अपने वस्त्र फाड़कर, 7इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। 8यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा। 9केवल इतना करो कि तुम यहोवा के विरुद्ध बलवा न करो; और न उस देश के लोगों से डरो, क्योंकि वे हमारी रोटी ठहरेंगे; छाया उनके ऊपर से हट गई है, और यहोवा हमारे संग है; उन से न डरो।”


प्रभु के निर्देश पर, मूसा कनान में 12 भदियों को भेजता है, जैसा कि वचन 1 और 2 में कहा गया है, परन्तु, रुचिपूर्ण रूप से कहना, यह लोगों के अनुरोध के उत्तर में है, जो कि व्यवस्थाविवरण 1:22 और 23 के अनुसार ऐसे कहते हैं, "और तुम सब मेरे पास आकर कहने लगे, ‘हम अपने आगे पुरुषों को भेज देंगे, जो उस देश का पता लगाकर हम को यह सन्देश दें, कि कौन से मार्ग से होकर चलना होगा और किस किस नगर में प्रवेश करना पड़ेगा?’ इस बात से प्रसन्न होकर मैं ने तुम में से बारह पुरुष, अर्थात् गोत्र पीछे एक पुरुष चुन लिया।" क्या यह काम सन्देह से हुआ था या यह बुद्धिमानी से की जाने वाली तैयारी थी? दोनों ही संभव हैं। घटना स्पष्ट नहीं है। उन्होंने परमेश्‍वर के इस वचन पर विश्‍वास नहीं किया कि वह एक अच्छी भूमि थी, और यह कि वह उन्हें बिना किसी चूक के, उस पर अधिकार दिला देगा। वे उन्हें मार्ग दिखाने के लिए बादल और आग के खम्भा पर भरोसा नहीं कर सकते थे, परन्तु परमेश्‍वर के ज्ञान की तुलना में अपनी राजनीति के बारे में सर्वोत्तम सोच रखते थे। क्या उनके लिए यह बुद्धिमानी या सन्देह भरा था कि वे उस देश का भेद लें, जिसकी स्वयं परमेश्‍वर ने उनके लिए उस देश में जाने का मार्ग खोजने के लिए जासूसी की थी; जब परमेश्‍वर ने स्वयं उन्हें मार्ग दिखाने का बीड़ा उठाया था? परन्तु इस तरह हम स्वयं को नाश कर देते हैं, यदि हम ईश्‍वरीय प्रकाशन की तुलना में लोगों की रिपोर्टों को अधिक श्रेय देते हैं; हम अपना आँखों के दिखाए चलते हैं, विश्‍वास से नहीं। किसी भी विषय में, परमेश्‍वर किसी भी तरह से उनके द्वारा किए जाने वाले पाप का भागीदार नहीं था; 12 भदियों को भेजा जाना उनके अन्तिम सन्देह के पाप का कारण नहीं था। यदि भदियों ने अपना और लोगों ने अपना कर्तव्य निभाया होता, तो यह उनके विश्‍वास और बुद्धिमानी से की जाने वाली तैयारी की पुष्टि हो सकती थी। भदियों का प्रमुख हिस्सा, अर्थात् 10 भेदिए, लोगों को कनान जाने से हतोत्साहित करता है और मनुष्यों के निर्णय में इतना अधिक विश्‍वास रखने के लिए, न्यायपूर्ण रूप से इस्राएलियों को आगे सन्देह करने के प्रलोभन के लिए छोड़ दिया जाता है, जबकि उनके पास विश्‍वास करने के लिए परमेश्‍वर का वचन था। वे इस बात से इनकार नहीं कर सकते थे कि कनान देश बहुत ज्यादा फलदायी था; जो अंगूर वे वहाँ से अपने साथ लाए थे, वह इसका एक स्पष्ट प्रमाण था, जैसा कि वचन 27 में वर्णित है, "उन्होंने मूसा से यह कहकर वर्णन किया, "जिस देश में तू ने हम को भेजा था उसमें हम गए; उसमें सचमुच दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, और उसकी उपज में से यही है।" परमेश्‍वर ने उनसे दूध और शहद से बहने वाली भूमि देने की प्रतिज्ञा की थी, और सन्देह करने वाले भेदिए स्वयं स्वीकार करते हैं कि यह वैसी ही भूमि है। शत्रुओं के मुँह से भी परमेश्‍वर की महिमा होगी और उसकी प्रतिज्ञाओं की सच्चाई की पुष्टि होगी। फिर भी बाद में वे स्वयं का खंडन करते हैं, जब वे कहते हैं, जो कि वचन 32 में वर्णित है, "और उन्होंने इस्राएलियों के सामने उस देश की जिसका भेद उन्होंने लिया था, यह कहकर निन्दा भी की, "वह देश जिसका भेद लेने को हम गए थे, ऐसा है, जो अपने निवासियों को निगल जाता है; और जितने पुरुष हम ने उसमें देखे वे सब के सब बड़े डील–डौल के हैं।"" हम इसे ऐसा कह सकते हैं, हालाँकि इसमें दूध, मधु और अंगूर थे, परन्तु यह हमारे लिए उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने इस पर विजय पाने को पूरी तरह से अव्यवहारिक बताया और कहा कि इसका प्रयास करने से कोई लाभ नहीं मिलेगा। क्योंकि वहाँ के लोग डील-डौल वाले थे, जैसा कि वचन 28 में कहा गया है, "परन्तु उस देश के निवासी बलवान् हैं, और उसके नगर गढ़वाले हैं और बहुत बड़े हैं; और फिर हम ने वहाँ अनाकवंशियों को भी देखा।" और, इससे भी ज्यादा, वे हमसे ज्यादा मजबूत थे, ऐसा उन्होंने वचन 31 में कहा। "पर जो पुरुष उसके संग गए थे, उन्होंने कहा, "उन लोगों पर चढ़ने की शक्‍ति हम में नहीं है; क्योंकि वे हम से बलवान् हैं।"" नगरों को अभेद्य; "दृढ़" गढ़ वाले कहा जाता है। परन्तु उनके बुरे उद्देश्य को पूरा करने के लिए, उन बलवान लोगों के बारे में बताना सबसे ज्यादा आवश्यक था, जिन पर वे बहुत जोर देते हैं; हमने उन बलवान लोगों को देखा, जो बड़े कद के थे, "हम ने वहाँ नपीलों को, अर्थात् नपीली जातिवाले अनाकवंशियों को देखा (अनाक के वंशज नपीलियों से आए हैं)।" वे इस तरह बात कर रहे थे, मानो उनका वर्णन होते ही वे काँपने के लिए तैयार थे—ठीक वैसे ही, जैसे उन्हें देखते ही वे काँप उठते। ओह, ये कितने विशालकाय दानव हैं!

यहाँ एक सबसे रुचिपूर्ण वाक्य हैः "और हम अपनी दृष्‍टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे, और ऐसे ही उनकी दृष्‍टि में मालूम पड़ते थे।" वे यह कहने में सक्षम हुए, कि वे अपनी ही आँखों में उनकी तुलना में केवल टिड्डियों की तरह लग रहे थे, परन्तु वे यह नहीं जान सके कि वे कनान के लोगों की आँखों में कैसे दिखाई दिए। उनके पूर्ण गलत निर्णय के प्रमाण के रूप में, मैं आपको यहोशू 2:8-11 के वचनों को प्रस्तुत करता हूँ, जिसमें राहाब, यरीहो में रहने वाली एक वेश्या, यहोशू के भदियों को बताती है कि देश के लोग वास्तव में इस्राएलियों के बारे में क्या सोचते थे। भदियों के रात को सोने से पहले, वह छत पर चढ़ गई और उनसे कहा, "ये लेटने न पाए थे कि वह स्त्री छत पर इनके पास जाकर इन पुरुषों से कहने लगी, "मुझे तो निश्‍चय है कि यहोवा ने तुम लोगों को यह देश दिया है, और तुम्हारा भय हम लोगों के मन में समाया है, और इस देश के सब निवासी तुम्हारे कारण घबरा रहे हैं। क्योंकि हम ने सुना है कि यहोवा ने तुम्हारे मिस्र से निकलने के समय तुम्हारे सामने लाल समुद्र का जल सुखा दिया। और तुम लोगों ने सीहोन और ओग नामक यरदन पार रहनेवाले एमोरियों के दोनों राजाओं का सत्यानाश कर डाला है। और यह सुनते ही हमारा मन पिघल गया, और तुम्हारे कारण किसी के जी में जी न रहा; क्योंकि तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा ऊपर के आकाश का और नीचे की पृथ्वी का परमेश्‍वर है।"" मूसा के नेतृत्व में इस्राएली उस भूमि को अपने अधीन कर सकते थे।


भले ही उन्होंने केवल मानवीय संभावनाओं से सोच-विचार किया होता, वे अलग तरह से तर्क कर सकते थे। क्या इस्राएल की सेना बहुत अधिक नहीं थी? 600, 000 योद्धा पुरुष, अच्छी तरह से प्रेरित और उत्सुक, एक साथ मिलकर काम कर रहे थे, और रुचि और स्नेह में पूरी तरह से एक थे, जो स्वयं एक दुर्जेय सेना का गठन करते हैं। उनका सेनापति मूसा बुद्धिमान और बहादुर था और उसने इथियोपिया में एक सफल अभियान का नेतृत्व किया था। यदि लोगों को सही से बताया गया होता और उन्होंने बहादुरी से व्यवहार किया होता, तो उनके सामने क्या खड़ा हो सकता था? यह सच है कि कनानी बड़े बलवान पुरुष थे, परन्तु वे तितर-बितर हो गए थे, बिखरे हुए थे और अंततः, वास्तव में, यहोशू के अधीन एक समय में देश के एक हिस्से को हरा दिया गया था। बिखरे हुए होने के कारण वे इस्राएलियों के विरुद्ध एकजुट नहीं हो सके, क्योंकि वचन 29 में कहा गया है, "दक्षिण देश में अमालेकी बसे हुए हैं; और पहाड़ी देश में हित्ती, यबूसी, और एमोरी रहते हैं; और समुद्र के किनारे किनारे और यरदन नदी के तट पर कनानी बसे हुए हैं।" दूरियों के कारण वे जल्द ही एक साथ नहीं मिल सके, और अपने विभाजित हितों के कारण वे लंबे समय तक इस्राएल का विरोध करने के लिए एक साथ नहीं रह सके। देश बहुत बड़ी भूमि का होने के कारण एक सेना का भरण-पोषण कर सकता था, और हालाँकि नगरों की दीवारें थीं, यदि वे मैदान में स्थानीय राष्ट्रों को हरा सकते थे, तो मजबूत पकड़ भी उनके हाथों में आ जाती। जहाँ तक बलवान पुरुषों की बात है, उनका बढ़ा हुआ कद ही उन्हें बड़ा लक्ष्य बना देता; सबसे बड़े लोगों में सदैव सबसे अच्छा शारीरिक समन्वय या लड़ने की क्षमता नहीं होती है।


हालाँकि इस्राएली डरपोक कहे जाने के योग्य थे, परन्तु यह सबसे बुरा नहीं था, पवित्रशास्त्र उन्हें अविश्‍वासियों के लिए चिह्नित करता है। यह कोई मानवीय संभावना नहीं थी, जिस पर उन्हें निर्भर रहने की आवश्यकता थी। उनके साथ परमेश्‍वर की उपस्थिति थी, और उनके लिए उसकी सामर्थ्य का जुड़ाव था। कनानी इस्राएलियों से अधिक बलवान थे; मान लीजिए कि वे थे, परन्तु वे इस्राएल के परमेश्‍वर से अधिक बलवान नहीं थे। हम उनसे निपटने में सक्षम नहीं हैं, परन्तु क्या सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर सक्षम नहीं है? क्या वह हमारे साथ नहीं है? क्या वह हमारे आगे नहीं जाता? और क्या उसके लिए कुछ भी बहुत मुश्किल है? यदि हम दानवों के सामने टिड्डियों के रूप में दिखाई देते हैं, तो क्या वे परमेश्‍वर के सामने टिड्डियाँ नहीं हैं? उनके नगर हमारे विरुद्ध दीवार से घिरे हुए हैं, परन्तु क्या वे स्वर्ग के विरुद्ध दीवार से घिरे हुए हैं? उन्हें परमेश्‍वर की बाहों की लंबाई और सामर्थ्य का बहुत अच्छा अनुभव हुआ था, जो उनकी ओर से उठाया गया था और फैलाया गया था। क्या मिस्र के लोग कनानी लोगों की तुलना में अधिक शक्तिशाली नहीं थे? और फिर भी, इस्राएल द्वारा बिना तलवार खींचे या बिना वार किए, मिस्र के रथ और घुड़सवार बहुत बड़े रूप में नाश हो गए थे। अमालेकियों ने उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचाया था, और फिर भी इस्राएल ने उन्हें हरा दिया। वर्षों बाद भजन 106:24 लिखा गया है, जो ऐसे कहता है, "उन्होंने मनभावने देश को निकम्मा जाना, और उसके वचन की प्रतीति न की।" समस्या यह थी कि वे विश्‍वास नहीं करते थे। उन्हें सन्देह हुआ। कालेब, यहोशू, मूसा और हारून उन्हें अन्यथा मना नहीं सके।

कालेब ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, हालाँकि यहोशू ने उनका समर्थन किया, क्योंकि वचन 30 में कहा गया है, "पर कालेब ने मूसा के सामने प्रजा के लोगों को चुप कराने के विचार से कहा, "हम अभी चढ़ के उस देश को अपना कर लें; क्योंकि नि:सन्देह हम में ऐसा करने की शक्‍ति है।"" यदि यहोशू ने उठे हुए ज्वार को रोकना आरम्भ कर दिया होता, तो उसे मूसा के प्रति पक्षपात का सन्देह होता, जिसका वह सेवक था; और इसलिए उसने समझदारी से इसे कालेब के प्रबंधन कार्य पर छोड़ दिया, जो यहूदा के गोत्र, अगुवाई करने में प्रमुख गोत्र से था, और इसलिए, सबसे पहले सुने जाने के लिए यह सबसे अच्छा है। कालेब ने भी, बाकी दस भदियों की ही तरह ही, वहाँ के निवासियों की शक्ति को देखा और परखा था। फिर भी वह लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, और वह बहादुरी के साथ उनका नेतृत्व करने का संकल्प लेते हुए बोलता है। वह यह नहीं कहता, “चलो, हम चढ़ कर उस देश को अपना कर लें;” बल्कि वह इसे ऐसा मानता है, कि मानो यह काम पहले ही हो चुका हो; इसके बजाय वह कहता है, “चलो, हम अभी चढ़ के उस देश को अपना कर लें; अब हमें और कुछ नहीं करना है, बस इसके भीतर जाना है और उस अधिकार को ग्रहण करना है, जिसे हमारे महान प्रभु यहोवा परमेश्‍वर हमें देने के लिए तत्पर है।”


हम मूसा से यह सीखने की कोशिश कर रहे हैं कि हम नेतृत्व के बारे में क्या कर सकते हैं। घटना के इस भाग में, भले ही कालेब, यहोशू, मूसा और हारून इस्राएलियों को मनाने की कोशिश करते हैं कि वे चढ़ाई कर सकते थे और उन्हें भूमि को अपना कर लेना चाहिए, मूसा और ये सहायक उन्हें मना नहीं सके। देखें कि भीड़ की सोच कितनी संगठित थी। शायद 10 सन्देही भेदिये एक साथ मिले हुए थे और एक रणनीति के अधीन योजना बनाई गई थी। यहाँ अध्याय 24 के वचन 1-4 मिलता है। "तब सारी मण्डली चिल्‍ला उठी; और रात भर वे लोग रोते ही रहे। और सब इस्राएली मूसा और हारून पर बुड़बुड़ाने लगे; और सारी मण्डली उनसे कहने लगी, "भला होता कि हम मिस्र ही में मर जाते! या इस जंगल ही में मर जाते! यहोवा हम को उस देश में ले जाकर क्यों तलवार से मरवाना चाहता है? हमारी स्त्रियाँ और बाल–बच्‍चे तो लूट में चले जाएँगे; क्या हमारे लिये अच्छा नहीं कि हम मिस्र देश को लौट जाएँ? " फिर वे आपस में कहने लगे, "आओ, हम किसी को अपना प्रधान बना लें, और मिस्र को लौट चलें।"" उन्होंने परमेश्‍वर के वचन के बजाय 10 भदियों की नकारात्मक और सन्देहपूर्ण रिपोर्ट सुनी, और अपनी स्थिति को निराशाजनक माना। मूर्ख सन्तान की तरह, वे रोने लगते हैं, फिर भी वे नहीं जानते कि वे क्यों रोते हैं। रोने के लिए तब पर्याप्त समय होता, यदि शत्रु पहले ही उन्हें बुरी तरह से पीट चुका होता या यदि उन्होंने अपने शिविर के द्वार पर अनाक के पुत्रों को देखा होता, परन्तु जो कोई बिना किसी चोट के रोते हैं, वे स्वयं के लिए रोने के योग्य थे। परमेश्‍वर के प्रति अविश्‍वास या भरोसे की घटी स्वयं में ही अंतर्निहित दण्ड है। धैर्य अपना प्रतिफल है और अविश्‍वास अपना दण्ड है। जो परमेश्‍वर पर भरोसा नहीं करते हैं, वे लगातार परेशान रहते हैं। 


वे एक कारणहीन असंतोष के साथ पीछे मुड़कर देखते हैं। वे परमेश्‍वर के पक्ष में जीवित विजेताओं के बजाय परमेश्‍वर के दण्ड के अधीन अपराधियों को मारना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि वे कह रहे थे, 'कि हम मिस्र में या जंगल में मर गए होते!" ओह कि हम मर जाते! वे मर जाना चाहते थे। इन पतित इस्राएलियों की आत्माएँ कितनी कठोर थीं, जो अपने हाथों में तलवार लेकर सम्मान के साथ सैनिकों की तरह मरने के बजाय, जंगल में असहाय भेड़ों की तरह मरने की इच्छा रखते थे। इसके बाद हम एक बहुत ही मूर्खतापूर्ण योजना के बारे में सुनते हैं कि वे कनान जाने के बजाय मिस्र वापस चले जाना चाहते थे। प्रस्ताव सबसे पहले वचन 3 में एक प्रश्न के माध्यम से दिया जाता है, "क्या हमारे लिये अच्छा नहीं कि हम मिस्र देश को लौट जाएँ?" परन्तु ऊर्जा अधिक होने के कारण, और लोगों के उत्साह को किसी भी विकृत चीज का मनोरंजन करने के लिए तैयार किया जा रहा था, यह जल्द ही बिना किसी बहस के एक संकल्प के रूप में परिपक्व हो गया। "आओ, हम किसी को अपना प्रधान बना लें, और मिस्र को लौट चलें।" वे निश्‍चित रूप से जानते थे कि मूसा इस वापसी में उनका सेनापति नहीं होगा। मिस्र में जाने के लिए कामना करना, या यह सोचना कि यदि वे वहाँ होते, तो उनके लिए पहले से सर्वोत्तम होता, संसार की सबसे बड़ी मूर्खता थी। यदि वे कनान को आगे नहीं बढ़ते, तो मिस्र की ओर वापस जाने से सर्वोत्तम है कि वे जैसे थे, वैसे ही रहें। वे क्या चाहते थे? उन्हें किस बात की शिकायत करनी थी? उनके पास बहुत कुछ था, शांति थी, विश्राम था, एक अच्छे शासन के अधीन थे, अच्छी संगति थी, उनके पास परमेश्‍वर की उपस्थिति थी, और जंगल में भी उन्हें विश्राम करने के लिए पर्याप्त था, यदि नहीं था, तो बस उनके पास संतुष्ट होने के लिए मन नहीं था। परन्तु वे स्वयं को सर्वोत्तम बनाने के लिए कहाँ जाने के लिए उत्सुक थे? मिस्र की ओर! 

क्या वे इतनी जल्दी उस दु:खद दासता को भूल गए थे, जिसमें वे रह चुके थे? क्या वे फिर से अपने काम करवाने वाले सरदारों के अत्याचार और ईंट बनाने के कठिन परिश्रम के अधीन होंगे? और, उन सभी विपत्तियों के बाद जो मिस्र ने उनके कारण झेली थीं, क्या वे वहाँ पहले से बेहतर व्यवहार की अपेक्षा कर सकते थे—या, इसके विपरीत, कहीं ज्यादा बुरे व्यवहार की? कितने कम समय में, डेढ़ वर्ष भी नहीं हुआ था, कि वे अपनी दासता की सभी कठिनाइयों और अपने उद्धार के सभी गीतों को भूल गए थे! परमेश्‍वर ने मूसा को ऐसे समूह की चरवाही करने के लिए बुलाया। और आप जिस समूह की चरवाही करेंगे, उसके पास कम से कम इसके निशान होंगे और परमेश्‍वर ने आपको उसके लिए धैर्यवान अगुवा के रूप में बुलाया है। यहाँ इस्राएल के सच्चे मित्र यदि संभव हो तो उन्हें स्वयं को नाश करने से बचाने की कोशिश करते हैं, परन्तु व्यर्थ। उनकी भूमि के वैद्यों ने उन्हें ठीक करना चाहा होगा, परन्तु वे ठीक नहीं होंगे; उनके पहरेदारों ने उन्हें चेतावनी दी होंगी, परन्तु उन्होंने चेतावनी नहीं ली, और इसलिए उनका लहू उनके अपने सिर पर है।


मूसा और हारून ने इस उथल-पुथल को शांत करने की पूरी कोशिश की और वह था, फिर से प्रार्थना में परमेश्‍वर के सामने अपने मुँह के बल नीचे गिरना। वचन 5 हमें बताता है, "तब मूसा और हारून इस्राएलियों की सारी मण्डली के सामने मुँह के बल गिरे।" हालाँकि यह उनके विरुद्ध था कि वे बुड़बुड़ाते थे, फिर भी उन्होंने बहादुरी से अपमान और ठेस को अनदेखा कर दिया, और स्वयं को उन लोगों के विश्‍वासयोग्य मित्र के रूप में दिखाया, जो उनके लिए अपमानजनक शत्रु बने हुए थे। संभवतः लोगों का कोलाहल और शोर इतना अधिक था कि मूसा और हारून को सुना ही नहीं जा सकता था; यदि वे अपने किसी सेवक को मौन रहने का आदेश देते, तो क्रोधित भीड़ शायद अधिक कोलाहल से भरी हुई होती; और इसलिए, पूरी सभा के सामने उन सभी का ध्यान खींचने के लिए, वे अपने मुँह के बल गिर गए, इस तरह इस उग्र समुद्र के शोर को शांत करने के लिए परमेश्‍वर से अपनी विनम्र प्रार्थना व्यक्त करने लगे। लोगों के साथ बड़ी गंभीरता से उनकी बुड़बुड़ाहट को रोकने के लिए; उन्हें आशा थी कि वे इस विनम्र मुद्रा से उन्हें प्रभावित करेंगे, और उन्हें उनके विद्रोह में बने रहने के ऊपर प्रबल होंगे। मूसा और हारून ने उनसे विनती की, मानो उनके द्वारा परमेश्‍वर स्वयं उनसे विनती कर रहा हो कि वे परमेश्‍वर के साथ मेल-मिलाप कर लें। उन्होंने लोगों से जो कहा, वही मूसा चालीस वर्षों बाद व्यवस्थाविवरण 1:29 में वर्णित इस कहानी के दुहराव में बताता है, "मैं ने तुम से कहा, ‘उनके कारण भय मत खाओ और न डरो।" जो पास्टर बहुमूल्य आत्माओं के उत्साही मित्र हैं, वे अपने उद्धार के लिए किसी भी चीज के लिए झुकेंगे। मूसा और हारून, सम्मान के पदों पर होने के बावजूद, लोगों को आगे गिर जाते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे स्वयं को नाश न करें।


कालेब और यहोशू दोनों ने भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों के पाप पर एक पवित्र क्रोध में आकर अपने कपड़े फाड़े, और परमेश्‍वर के क्रोध के एक पवित्र भय, उनके विरुद्ध भड़कने के लिए तैयार होते हुए देखा। इन भले लोगों के लिए यह सबसे बड़ी परेशानी थी, क्योंकि कोलाहल उन्हीं भेदियों द्वारा लाया गया था, जिनके साथ वे यात्रा कर चुके थे। वचन 7-9 उनकी ईमानदारी को दर्शाते हैं, "इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, "जिस देश का भेद लेने को हम इधर उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा। केवल इतना करो कि तुम यहोवा के विरुद्ध बलवा न करो; और न उस देश के लोगों से डरो, क्योंकि वे हमारी रोटी ठहरेंगे; छाया उनके ऊपर से हट गई है, और यहोवा हमारे संग है; उन से न डरो।"" उन्होंने उन कठिनाइयों के बारे में कुछ नहीं किया, जो उनकी प्रतिज्ञाएँ को अपने अधीन करने के लिए उनके मार्ग में खड़ी हुई थीं। जबकि हमारे पास परमेश्‍वर की उपस्थिति है, हमें अपने विरुद्ध सबसे शक्तिशाली शक्ति से डरने की आवश्यकता नहीं है।


आज मसीही अगुवे इस दु:खद घटना से क्या सीखते हैं, जिसमें वे विधिवत् रूप से नियुक्त किए गए और धर्मी अगुवे लोगों को कुछ ऐसा प्राप्त करने के लिए मनाने में असमर्थ थे, जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्‍वर ने की थी और जो उन्हें मिल सकता था? कभी-कभी लोग इसका पालन नहीं करेंगे। हमें उनकी विफलता को हमें नष्ट करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा करने के लिए विश्‍वास की आवश्यकता होती है। नेतृत्व के मुद्दे आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने मूसा के दिनों में थे। जब यात्रा कठिन हो जाती है, तो मूसा, हारून, यहोशू और कालेब की विश्‍वासयोग्यता को स्मरण रखें।