लिंग और उत्तराधिकार संबंधी मुद्दे

अध्याय बयालीस


गिनती 27:1-23

Ron Meyers

1तब यूसुफ के पुत्र मनश्शे के वंश के कुलों में से सलोफाद, जो हेपेर का पुत्र और गिलाद का पोता और मनश्शे के पुत्र माकीर का परपोता था, उसकी बेटियाँ जिनके नाम महला, नोवा, होग्ला, मिल्का, और तिर्सा हैं वे पास आईं। 2और वे मूसा और एलीआज़ार याजक और प्रधानों और सारी मण्डली के सामने मिलापवाले तम्बू के द्वार पर खड़ी होकर कहने लगीं, 3”हमारा पिता जंगल में मर गया; परन्तु वह उस मण्डली में का न था जो कोरह की मण्डली के संग होकर यहोवा के विरुद्ध इकट्ठी हुई थी, वह अपने ही पाप के कारण मरा; और उसके कोई पुत्र न था। 4तो हमारे पिता का नाम उसके कुल में से पुत्र न होने के कारण क्यों मिट जाए? हमारे चाचाओं के बीच हमें भी कुछ भूमि निज भाग करके दे।” 5उनकी यह विनती मूसा ने यहोवा को सुनाई। 6यहोवा ने मूसा से कहा, 7”सलोफाद की बेटियाँ ठीक कहती हैं; इसलिये तू उनके चाचाओं के बीच उनको भी अवश्य ही कुछ भूमि निज भाग करके दे, अर्थात् उनके पिता का भाग उनके हाथ सौंप दे। 8और इस्राएलियों से यह कह, ‘यदि कोई मनुष्य निपुत्र मर जाए, तो उसका भाग उसकी बेटी के हाथ सौंपना। 9और यदि उसके कोई बेटी भी न हो, तो उसका भाग उसके भाइयों को देना। 10और यदि उसके भाई भी न हों, तो उसका भाग उसके चाचाओं को देना। 11और यदि उसके चाचा भी न हों, तो उसके कुल में से उसका जो कुटुम्बी सबसे समीप हो उनको उसका भाग देना कि वह उसका अधिकारी हो। इस्राएलियों के लिये यह न्याय की विधि ठहरेगी, जैसे कि यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी।’” 12फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “इस अबारीम नामक पर्वत के ऊपर चढ़के उस देश को देख ले जिसे मैं ने इस्राएलियों को दिया है। 13और जब तू उसको देख लेगा, तब अपने भाई हारून के समान तू भी अपने लोगों में जा मिलेगा, 14क्योंकि सीन नामक जंगल में तुम दोनों ने मण्डली के झगड़ने के समय मेरी आज्ञा को तोड़कर मुझ से बलवा किया, और मुझे सोते के पास उनकी दृष्‍टि में पवित्र नहीं ठहराया।” (यह मरीबा नामक सोता है जो सीन नामक जंगल के कादेश में है)। 15मूसा ने यहोवा से कहा, 16”यहोवा, जो सारे प्राणियों की आत्माओं का परमेश्‍वर है, वह इस मण्डली के लोगों के ऊपर किसी पुरुष को नियुक्‍त कर दे, 17जो उसके सामने आया जाया करे, और उनका निकालने और पैठानेवाला हो; जिससे यहोवा की मण्डली बिना चरवाहे की भेड़–बकरियों के समान न रहे।” 18यहोवा ने मूसा से कहा, “तू नून के पुत्र यहोशू को लेकर उस पर हाथ रख; वह ऐसा पुरुष है जिसमें मेरा आत्मा बसा है; 19और उसको एलीआज़ार याजक के और सारी मण्डली के सामने खड़ा करके उनके सामने उसे आज्ञा दे। 20और अपनी महिमा में से कुछ उसे दे, जिससे इस्राएलियों की सारी मण्डली उसकी माना करे। 21और वह एलीआज़ार याजक के सामने खड़ा हुआ करे, और एलीआज़ार उसके लिये यहोवा से ऊरीम की आज्ञा पूछा करे; और वह इस्राएलियों की सारी मण्डली समेत उसके कहने से जाया करे और उसी के कहने से लौट भी आया करे।” 22यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार मूसा ने यहोशू को लेकर, एलीआज़ार याजक और सारी मण्डली के सामने खड़ा करके, 23उस पर हाथ रखे, और उसको आज्ञा दी जैसा कि यहोवा ने मूसा के द्वारा कहा था।


सलोफाद की बेटियाँ अपना मुकद्दमा सर्वोच्च न्यायालय में ले आईं, जिसमें शासन के प्रमुख के रूप में मूसा, न्याय देने वाले प्रधान, और मण्डली या लोगों के बुजुर्ग थे, जिन्हें उनके प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। वचन 2 से 4 के अनुसार, “2और वे मूसा और एलीआज़ार याजक और प्रधानों और सारी मण्डली के सामने मिलापवाले तम्बू के द्वार पर खड़ी होकर कहने लगीं, 3”हमारा पिता जंगल में मर गया; परन्तु वह उस मण्डली में का न था जो कोरह की मण्डली के संग होकर यहोवा के विरुद्ध इकट्ठी हुई थी, वह अपने ही पाप के कारण मरा; और उसके कोई पुत्र न था। 4तो हमारे पिता का नाम उसके कुल में से पुत्र न होने के कारण क्यों मिट जाए? हमारे चाचाओं के बीच हमें भी कुछ भूमि निज भाग करके दे।””  उनकी ओर से बोलने वाला कोई वकील वहाँ नहीं था, परन्तु उन्होंने अपने उद्देश्य को अच्छी तरह से उन्हें समझाया किया, जितना कि वे कर सकती थीं, क्योंकि वे सरल, ईमानदार और अपने लिए बोलने वाली थीं। वे अपने पिता के रिश्तेदारों के बीच कनान देश में अधिकार के लिए विनती को उनके सामने लाती हैं। वचन 4 में कहा गया है, "तो हमारे पिता का नाम उसके कुल में से पुत्र न होने के कारण क्यों मिट जाए? हमारे चाचाओं के बीच हमें भी कुछ भूमि निज भाग करके दे।" इन युवतियों को कनान देश को इस्राएल को विरासत में देने के बारे में परमेश्‍वर की सामर्थ्य और प्रतिज्ञा में दृढ़ विश्‍वास है। हालाँकि यह न तो जीत गया था और न ही अभी तक इस्राएल द्वारा छुआ गया था, और अभी भी स्थानीय लोगों के पूर्ण अधिकार में है, फिर भी वे इसमें अपने हिस्से के लिए उनके आगे विनती लाती हैं, जैसे कि यह सब पहले से ही उनका अपना था। वे प्रतिज्ञा की भूमि में एक स्थान और नाम की गंभीर इच्छा प्रदर्शित करती हैं, जो एक प्रकार का स्वर्ग था, जो कि आज हमारी विरासत का एक हिस्सा है। उनके उदाहरण से हमें स्वर्गीय विरासत के लिए हमारे हिस्से को सुनिश्‍चित करने के लिए हर संभव परिश्रम के साथ शीघ्रता करनी चाहिए। परमेश्‍वर के राज्य में, और विशेष रूप से, अनुग्रह की वाचा द्वारा कलीसिया में, पुरुष और स्त्री के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है, जैसा कि गलतियों 3:28 कहता है, "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी, न कोई दास न स्वतंत्र, न कोई नर न नारी, क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।" मुझे आशा है कि हम आत्मिक दृष्टि से इन बेटियों द्वारा माँगी गई भूमि की भौतिक विरासत या कब्जे से परे, सार्वजनिक क्षेत्र में भागीदारी के लिए विरासत, पद या पेशे के अवसर के सिद्धान्त या विचार को देखने में सक्षम होंगे, जो उस समय केवल संपत्ति या वस्तु के मिलने में निहित हो सकता है। उन्होंने जिस वस्तु, भूमि के लिए विनती की थी, उसके भौतिक या आँतरिक मूल्य से अधिक महत्वपूर्ण समानता का सिद्धान्त है, जिसके लिए उन्होंने विनती की थी।


इस विचार पर विस्तार करने से पहले आइए हम देखें कि परमेश्‍वर ने मूसा से क्या कहा और फिर उस सिद्धान्त का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अनुप्रयोग देखें, जो यहाँ उस भौतिक अधिकार में प्रदर्शित किया गया है, जिसके लिए उन्होंने माँगा था। उनका समाज एक कृषि प्रधान समाज था, इसलिए भूमि, खेत, भेड़ और जानवर उन दिनों विरासत में मिलने वाली महत्वपूर्ण संपत्ति थे। उन्हें वस्तु, संपत्ति, भूमि और जानवरों की आवश्यकता थी। परन्तु आज की जीवन-शैली, भेंट, अभिषेक, आत्मिक वरदान, पद, जिम्मेदारियाँ या शिक्षा के साथ जीने वाली स्त्रियों के बारे में क्या कहा जाए, जो उन्हें बिना किसी भूमि, खेत या भेड़ के भी समाज में भाग लेने में सक्षम बनाती हैं। आज बहुत सी व्यावसायिक स्त्रियाँ मूसा की सोच के अनुसार परमेश्‍वर की प्रतिक्रिया में दिखाए गए सिद्धान्त को मानती हैं, सार्थक जीवन जीती हैं, समाज में योगदान देती हैं, जीविकोपार्जन करती हैं, परमेश्‍वर के राज्य के निर्माण में सहायता करती हैं और यह सब बिना किसी भूमि या घर के। सलोफाद की बेटियों ने एक ठोस बात माँगी, परन्तु स्त्रियों के अमूर्त समान अधिकार मूसा के माध्यम से परमेश्‍वर द्वारा उन्हें दिए गए उत्तर में निहित हैं। इसलिए आज इस सिद्धान्त का अनुप्रयोग भूमि या जानवरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक रूप से अधिक समावेशी अर्थ और अनुप्रयोग है। गिनती 27 बाइबल का स्त्रियों के संबंध में अधिकारों वाला अध्याय है। इसके निहितार्थ दूरगामी हैं।


उन्होंने लोगों के बीच सर्वोच्च अधिकारी के सामने अपना मुकद्दमा प्रस्तुत किया, परन्तु एक और भी उच्च अधिकारी वहाँ विद्यमान था और मूसा ने उसे अपने प्रश्न को संबोधित किया। उनका मुकद्दमा मूसा के लिए परमेश्‍वर के वचन द्वारा निर्धारित किया गया था। मूसा ने स्वयं न्याय देने का अनुमान नहीं लगाया, क्योंकि, हालाँकि उनका अनुरोध उचित और सह लग रहा था, फिर भी उसे स्पष्ट आदेश मिला था कि भूमि को उन लोगों के बीच विभाजित किया जाए, जो गिने गए थे, और जो केवल पुरुष थे; इसलिए वह उनका मुकद्दमा प्रभु यहोवा के सामने लाता है, और उसके न्याय की प्रतीक्षा करता है, जो वचन 5-7 में वर्णित है, "उनकी यह विनती मूसा ने यहोवा को सुनाई। यहोवा ने मूसा से कहा, "सलोफाद की बेटियाँ ठीक कहती हैं; इसलिये तू उनके चाचाओं के बीच उनको भी अवश्य ही कुछ भूमि निज भाग करके दे, अर्थात् उनके पिता का भाग उनके हाथ सौंप दे।"" वह न केवल राष्ट्रों के, बल्कि निजी परिवारों और उन परिवारों की स्त्रियों के विषयों से अवगत है, और उसकी इच्छा के अनुसार उन्हें न्याय करने का आदेश देता है। विनती स्वीकार कर ली जाती है। जो प्रतिज्ञा के देश में विरासत चाहते हैं, उन्हें वही मिलेगा, जिसे वे चाहते हैं, और अन्य चीजें उनके साथ जोड़ी जाएँगी। ये ऐसे दावे हैं, जिनका परमेश्‍वर समर्थन करता है। इस पाठ का मूल तथ्य यह है कि परमेश्‍वर स्त्रियों के अधिकारों का समर्थन करता है। यह मुद्दा भविष्य की पीढ़ियों में अन्य अनुप्रयोगों को निर्धारित करता है। सलोफाद की इन बेटियों ने न केवल अपने विश्राम और अपने परिवार के श्रेय के लिए, बल्कि दूर-दूर तक की स्त्रियों के सम्मान और हर्ष के लिए विनती की। यह वचन 8 में निहित है, "और इस्राएलियों से यह कह, "यदि कोई मनुष्य निपुत्र मर जाए, तो उसका भाग उसकी बेटी के हाथ सौंपना।"" केवल एक छोटा सा अंतर था, क्योंकि विरासत सबसे बड़े पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि सभी बेटियों को समान रूप से साझा करने और बाँटने के लिए थी। परमेश्‍वर की यह घोषणा एक गहरे और आगे बढ़ने वाले विचार या सिद्धान्त का समर्थन करती है कि स्त्रियों को लोगों के साथ समान अधिकार हैं और यह कि बुलाहट, वरदान देने, शिक्षा, कलीसियाई-जीवन और सार्वजनिक समाज में सेवा करने और भाग लेने के अवसरों के मुद्दे लिंग के मुद्दों से पहले आते हैं, जैसे कि कोई पुरुष है या स्त्री, यहूदी है या गैर-यहूदी है या गुलाम है या स्वतंत्र है। पौलुस ने गलातियों में जो लिखा है, वह एक अधिक स्पष्ट और पूरी तरह से विकसित कथन है, जो केवल सलोफाद की बेटियों के बारे में मूसा की सोच के लिए परमेश्‍वर की प्रतिक्रिया में निहित है। हम देखते हैं कि यह बात बाइबल में मरियम, दबोरा, एस्तेर, हुल्दा, मरियम, फीबे, प्रिस्किल्ला और भविष्यद्वाणी करने वाली फिलिप्पुस की चार बेटियों के जीवन में दिखाई देती है। इन सभी स्त्रियों ने इस्राएल में और फिर कलीसिया में महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका निभाई। सलोफाद की बेटियों के साथ मूसा के व्यवहार के माध्यम से परमेश्‍वर ने स्त्रियों के लिए समान अवसरों को जारी रखने की नींव रखी। इसमें कलीसिया के बाहर सार्वजनिक पेशा और कलीसिया के भीतर नेतृत्व की भूमिकाएँ शामिल हैं। वरदान और बुलाहट लिंग (पुरुष या स्त्री) जातियता (यहूदी या गैर-यहूदी) या सामाजिक स्थिति (गुलाम या स्वतंत्र) की तुलना में व्यक्ति की भूमिका को अधिक पूरी तरह से और महत्वपूर्ण रूप से परिभाषित करते हैं। कलीसिया में कोई भी यहूदी और गैर-यहूदी या गुलाम और स्वतंत्र की समान स्थिति पर प्रश्न नहीं उठा सकता, इसलिए कलीसिया में लोगों और स्त्रियों की भूमिकाओं में समान स्थिति भी समझने योग्य होनी चाहिए। गलातियों 3:28 कहता है, "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी, न कोई दास न स्वतंत्र, न कोई नर न नारी, क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।" 

तीन वचन इस अध्याय के केंद्र बिन्दु को उत्तराधिकार पर ध्यान देने के स्त्रियों के अधिकार से बदल देते हैं। ये वचन 12-14 हैं, जो ऐसा कहते हैं, "फिर यहोवा ने मूसा से कहा, "इस अबारीम नामक पर्वत के ऊपर चढ़के उस देश को देख ले जिसे मैं ने इस्राएलियों को दिया है। और जब तू उसको देख लेगा, तब अपने भाई हारून के समान तू भी अपने लोगों में जा मिलेगा,  क्योंकि सीन नामक जंगल में तुम दोनों ने मण्डली के झगड़ने के समय मेरी आज्ञा को तोड़कर मुझ से बलवा किया, और मुझे सोते के पास उनकी दृष्‍टि में पवित्र नहीं ठहराया।" (यह मरीबा नामक सोता है जो सीन नामक जंगल के कादेश में है)"" पानी मिलने के विषय में क्रोधित होने और परमेश्‍वर का अपमान करने के अपने पाप के कारण मूसा इस्राएलियों को प्रतिज्ञा किए हुए देश में नहीं ले गया। लोग मर रहे हैं। आपके अगुवा मर जाएँगे। आप मर जाओगे। यह हमारे लिए मूर्खतापूर्ण है कि हम किसी को प्रभु के कार्य में अपना स्थान लेने के लिए तैयार न करें, जबकि हम सभी जानते हैं कि हम किसी दिन मर जाएँगे। कितनी कलीसियाओं को नुकसान हुआ है, क्योंकि उनके अगुवों ने पास्टर की मृत्यु के बाद एक पास्टर के नेतृत्व से दूसरे में परिवर्तन की योजना नहीं बनाई थी? मूसा के अनुभव के माध्यम से परमेश्‍वर हमें इसके लिए तैयार रहना सिखा रहा है।


परमेश्‍वर मूसा को उसकी गलती के बारे में बताता है, वह झगड़े के पानी के बीच अपने होंठों से बिना सोचे समझे बोल रहा था, जहाँ उसने परमेश्‍वर और इस्राएल दोनों के सम्मान के बारे में इतनी सावधानी से व्यक्त नहीं किया, जितना कि उसे करना चाहिए था। हालाँकि मूसा प्रभु यहोवा का सेवक था, वह एक विश्‍वासयोग्य सेवक था, फिर भी एक बार उसने परमेश्‍वर की आज्ञा के विरुद्ध विद्रोह किया था, और अपने कर्तव्य में विफल रहा था। हालाँकि वह एक बहुत ही सम्मानित सेवक था, और अत्याधिक अनुग्रह प्राप्त था, फिर भी उसने अपनी गलती के बारे में एक और बार सुना, और पूरा संसार बार-बार इसके बारे में सुनेगा। परमेश्‍वर पाप के विरुद्ध अपने कोप को दिखाएगा, यहाँ तक कि उन लोगों को भी जो उनके सबसे निकट और प्रिय हैं। जिन लोगों के पास बुद्धि और सम्मान के विषय में अच्छी प्रतिष्ठा है, उन्हें अपने शब्दों और तरीकों के बारे में लगातार सावधान रहने की आवश्यकता है, ऐसा न हो कि वे किसी भी समय मूसा की तरह कुछ ऐसा कहें या करें, जो उनकी भलाई, या प्रतिष्ठा, या दोनों को उनसे छीन ले। परमेश्‍वर ने मूसा को उसकी मृत्यु के बारे में बताया। मूसा को मर जाना चाहिए, परन्तु प्रतिज्ञा की भूमि को देखने का संतोष सबसे पहले उसे मिलता है। परमेश्‍वर की मंशा कनान के इस दृश्य के साथ उसे भड़काने की नहीं था, या उसे उस पाप को करने में उसकी मूर्खता से डराने की नहीं थी, जिसने उसे कम कर दिया, और न ही मूसा पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ा, परन्तु परमेश्‍वर ने इसे ठहराया और मूसा ने इसे एक अनुग्रह के रूप में स्वीकार किया। कनान के इस दृश्य का उपयोग मूसा के एक उदाहरण के रूप में किया जा सकता है, जो सर्वोत्तम देश, अर्थात् स्वर्गीय की संभावना में विश्‍वास करता है, जो हमें मरते हुए संतों के लिए सांत्वना देता है। मूसा को मर जाना चाहिए, परन्तु मृत्यु उसे पराजित नहीं करती है; यह केवल उसे अपने लोगों के साथ मिला देती है, उसे उन पवित्र कुलपतियों के साथ विश्राम करने के लिए जाती है, जो उससे पहले गए थे। अब्राहम, इसहाक और याक़ूब उसके लोग थे, जो उसकी पसन्द और प्रेम के लोग थे, और उन्हें मृत्यु ने उसके साथ इकट्ठा किया। हम क्या सीखते हैं? हम अपने पिता या भाइयों से सर्वोत्तम नहीं हैं, यदि वे चले गए हैं, तो हम भी जाएँगे; यदि वे पहले से ही मिल चुके हैं, तो हमें जल्द ही मिल जाना होगा। यह घटना हमारे लिए आतंक के बिना मृत्यु के बारे में सोचने और यहाँ तक कि इसके लिए पूर्वानुमानों और अपेक्षाओं के साथ स्वयं को प्रसन्न करने के लिए एक प्रोत्साहन हो सकती है। कई लोगों ने हर्ष के साथ अपने जीवन पूरा किया है; इसलिए हम मृत्यु की छाया की घाटी से गुजर सकते हैं और फिर भी किसी बुराई से न डरें।

मूसा उत्तराधिकारी के लिए प्रार्थना करता है। जब परमेश्‍वर ने उससे कहा था कि उसे मरना होगा, तो उसने ईमानदारी से विनती की कि परमेश्‍वर का काम जारी रखा जा सकता है, हालाँकि उसे इसे पूरा करने का सम्मान नहीं मिल सकता है। ईर्ष्यालु आत्माएँ अपने उत्तराधिकारियों से प्रेम नहीं करतीं, परन्तु मूसा इनमें से एक नहीं था। हमें अपनी प्रार्थनाओं और अपने प्रयासों दोनों में, उभरती हुई पीढ़ी के लिए चिंता करनी चाहिए, ताकि परमेश्‍वर में विश्‍वास पनप सके, और जब हम अपनी कब्रों में हों तो मनुष्यों के बीच परमेश्‍वर के राज्य के हितों को बनाए रखा जा सके और आगे बढ़ाया जा सके। इस प्रार्थना में मूसा ने इस्राएल के लोगों के लिए एक नम्र चिंता व्यक्त कीः कि प्रभु की मण्डली उन भेड़ों के समान न हो, जिनका कोई चरवाहा न हो। परमेश्‍वर अपनी कलीसिया की भलाई के लिए या तो लोगों को उपयुक्त रीति से खोजने में सक्षम है या उन्हें अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सेवा के लिए उपयुक्त बना सकता है। मूसा परमेश्‍वर से प्रार्थना करता है कि वह एक दूत को न भेजे, बल्कि मण्डली पर एक व्यक्ति को नियुक्त करे, अर्थात्, एक व्यक्ति को नामित करे और अभिषिक्त करे, जिसे वह अपने लोगों इस्राएल के शासक के रूप में योग्य और अपना बनाएगा। इससे पहले कि परमेश्‍वर ने इस्राएल को यह आशीर्वाद दिया, उसने मूसा को इसके लिए प्रार्थना करने के लिए उकसाया। फिर, परमेश्‍वर, मूसा की प्रार्थना के उत्तर में, उसके लिए एक उत्तराधिकारी यहोशू को नियुक्त करता है, जिसने लंबे समय से अमालेकियों से लड़ने में अपने साहस, मूसा की सेवा करने में अपनी विनम्रता, और अविश्‍वासी भेदियों की रिपोर्ट के विरुद्ध गवाही देने में अपने विश्‍वास और ईमानदारी से स्वयं को प्रतिष्ठित किया था। यह वह व्यक्ति है, जिसे परमेश्‍वर ने मूसा के उत्तराधिकारी बनने की अनुशंसा की है और यहाँ वे निर्देश दिए गए हैं, जो परमेश्‍वर ने मूसा को दिए थे। वे वचन 18 से 20 में मिलते हैं। "यहोवा ने मूसा से कहा, "तू नून के पुत्र यहोशू को लेकर उस पर हाथ रख; वह ऐसा पुरुष है जिसमें मेरा आत्मा बसा है;  और उसको एलीआज़ार याजक के और सारी मण्डली के सामने खड़ा करके उनके सामने उसे आज्ञा दे। और अपनी महिमा में से कुछ उसे दे, जिससे इस्राएलियों की सारी मण्डली उसकी माना करे।"" परमेश्‍वर मूसा को निर्देश देता है कि यहोशू के उत्तराधिकार को कैसे सुरक्षित किया जाए। वचन 18 कहता है, "तब यहोवा ने मूसा से कहा, 'नून के पुत्र यहोशू को ले लो, जिस में नेतृत्व का आत्मा है, और उस पर हाथ रखो।'" यह मूसा द्वारा शासन वय्वस्था को उसके पास स्थानांतरित करने के प्रतीक के रूप में किया गया था, क्योंकि बलिदान पर हाथ रखने से भेंट करने वाले के स्थान और स्थान पर भेंट की जाती थी। यह कार्य यहोशू को परमेश्‍वर द्वारा आत्मा का आशीर्वाद देने का भी प्रतीक था, जिसे मूसा ने प्रार्थना द्वारा प्राप्त किया था। स्पष्ट रूप से मूसा ने यहोशू पर अपना हाथ रखा, जैसा कि वचन 18 में वर्णित है और फिर बाद में एलीआज़ार ने ऐसा ही किया, जैसा कि वचन 23 में कहा गया है। व्यवस्थाविवरण 34:9 कहता है, "और नून का पुत्र यहोशू बुद्धिमानी की आत्मा से परिपूर्ण था, क्योंकि मूसा ने अपने हाथ उस पर रखे थे; और इस्राएली उस आज्ञा के अनुसार जो यहोवा ने मूसा को दी थी उसकी मानते रहे।" तब इस्राएलियों ने उसकी बात सुनी और यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया। हाथ रखने का यह संस्कार हम नए नियम में सुसमाचार सेवकों को अलग करने में उपयोग करते हुए पाते हैं, जो उनके पद के प्रति एक गंभीर अनुशंसा और एक गंभीर इच्छा का प्रतीक है कि परमेश्‍वर उन्हें इसके लिए योग्य बनाएगा और उन्हें इसमें स्वीकार करेगा। यह जीवित बलिदानों के लिए मसीह और उसकी कलीसिया को उसकी भेंट है। सर्वोच्च अधिकारी को यह पता होना चाहिए कि उनसे भी उच्च व्यक्ति है। परमेश्‍वर और उसकी मण्डली के लिए संगठित होना एक सम्मान है; इस सम्मान का कुछ हिस्सा यहोशू को दिया जाना चाहिए, ताकि लोग, मूसा के जीवित रहने के दौरान उसका पालन करने के आदी होने के कारण, बाद में इसे और अधिक हर्ष से स्वीकार कर सकें। मूसा को न्याय की इस चपरास के साथ, महायाजक एलीआज़ार को अपना निजी सलाहकार नियुक्त करना होगा। उसे एलीआज़ार के सामने खड़ा होना है और उसके द्वारा दिए जाने वाले सभी निर्देशों को प्राप्त करने और उनका पालन करने के लिए तैयार परमेश्‍वर की इच्छा से परामर्श करना है। यह यहोशू के लिए एक निर्देश था। यद्यपि वह आत्मा से परिपूर्ण था, और उस पर यह सारा सम्मान रखा गया था, फिर भी उसे परमेश्‍वर की सलाह लिए बिना कुछ नहीं करना होगा, अपनी समझ पर निर्भर नहीं होना होगा। यह उसके लिए एक बड़ा प्रोत्साहन भी था। इस्राएल पर शासन करना, और कनान पर विजय प्राप्त करना, दो कठिन कार्य थे, परन्तु परमेश्‍वर उसे आश्‍वासन देता है कि दोनों में वह एक ईश्‍वरीय क्षमता के अधीन होगा। हर मुश्किल स्थिति में परमेश्‍वर उसे सलाह देता है कि सबसे अच्छा क्या होगा। मूसा के पास स्वयं परमेश्‍वर के मुँह और शब्दों तक पहुँच थी, परन्तु यहोशू और बाद के न्यायियों को महायाजक की सेवकाई का उपयोग करना होगा, और ऊरीम की आज्ञा से परामर्श लेना होगा। इस तरह इस्राएल की शासन व्यवस्था अब विशुद्ध रूप से ईश्‍वरीय थी, क्योंकि उनके अगुवों का चयन और निर्देश दोनों याजक के शब्द पर होना था, ऊरीम के निर्णय के अनुसार। यहोशू और सारे इस्राएल को बाहर जाना होगा और परमेश्‍वर के निर्देश के साथ भीतर आना होगा। जो इस तरह से मार्गदर्शन करता हुआ उनके बाहर जाने और उनके भीतर आने दोनों को बचाता है। वे सुरक्षित हैं, और शांति में हो सकते हैं, जो परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं, और अपने सभी तरीकों से उसे स्वीकार करते हैं।

मूसा उन निर्देशों के अनुसार करता है, जो परमेश्‍वर ने उसे वचन 22 और 23 में दिए थे, "यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार मूसा ने यहोशू को लेकर, एलीआज़ार याजक और सारी मण्डली के सामने खड़ा करके,  उस पर हाथ रखे, और उसको आज्ञा दी जैसा कि यहोवा ने मूसा के द्वारा कहा था।" हालाँकि इससे स्वयं उसकी अपनी महत्ता कम हो रही थी—और यह लगभग यहोशू के हाथों शासन सौंप देने जैसा ही था—फिर भी मूसा ने ऐसा किया। यदि मैं व्याकरण को सही ढंग से समझता हूँ, तो मूसा ने यहोशू को एलीआज़ार याजक और एलीआज़ार के सामने खड़ा किया, फिर उसने यहोशू पर हाथ रखा और उसे नियुक्त किया। मूसा बगल में मार्गदर्शक था, मंच पर पुरोहित के रूप में नहीं। वह इच्छुक था कि लोग उसे दूर होते देखें, और उगते हुए सूर्य को देखें। यह मूसा के श्रेय के लिए इतना अधिक नहीं होता, यदि वह इस तरह से अपने प्रतिष्ठित पद को अपने पुत्र के लिए छोड़ देता, परन्तु अपने हाथों से पहले एलीआज़ार को महायाजक नियुक्त करना और फिर एलीआज़ार को यहोशू का अभिषेक करने के लिए अनुकरणीय नमूना बनने देता है। 


इसके अतिरिक्त, मूसा ने यहोशू को—जो कि लेवी गोत्र का नहीं, बल्कि किसी दूसरे गोत्र का था—मुख्य शासक नियुक्त किया; जबकि उसकी अपनी सन्तान को कोई भी विशेष पद या प्राथमिकता नहीं दी गई, बल्कि उन्हें साधारण लेवियों के पद पर रहने दिया गया। यह विनम्र कार्य उसके परिवार की सर्वोच्च वृद्धि से अधिक उसकी अपनी महिमा में था। यह विनम्र कार्य पृथ्वी पर सबसे नम्र व्यक्ति के रूप में उसके चरित्र की पुष्टि करता है, और परमेश्‍वर के प्रति विश्‍वासयोग्यता है, जिसने उसे उसके पूरे घराने में नियुक्त किया है। इससे पता चलता है कि उसके पास एक सिद्धान्त था, जो उसे अन्य राष्ट्रों के राजाओं से ऊपर रखता था। उन्होंने अपने परिवारों को उस महानता के कुछ हिस्से में स्थापित करने का ध्यान रखा, जो उनके पास थी, परन्तु दूसरे गोत्र से यहोशू को चुनने, हाथ रखने और उसकी अनुशंसा करने में, ऐसा प्रतीत होता है कि मूसा ने स्वयं से काम नहीं किया, क्योंकि उसने अपने लिए ऐसा कोई काम नहीं किया। आज के मसीही अगुवों को विनम्रता से सही उत्तराधिकारी खोजना होगा और विनम्रता से उन्हें तैयार करने, उनकी अनुशंसा करने और नियुक्त करना होगा। यह अगुवे में सच्ची महानता को दर्शाता है।