अब्राम का परिवार और उसकी बुलाहट

पहला अध्याय


उत्पत्ति 11:27-12:1

Ron Meyers

27तेरह की वंशावली यह है। तेरह से अब्राम, नाहोर और हारान का जन्म हुआ; और हारान से लूत का जन्म हुआ। 28हारान अपने पिता के सामने ही कसदियों के ऊर नामक नगर में, जो उसकी जन्मभूमि थी, मर गया। 29अब्राम और नाहोर दोनों ने विवाह किया। अब्राम की पत्नी का नाम सारै और नाहोर की पत्नी का नाम मिल्का था। यह उस हारान की बेटी थी, जो मिल्का और यिस्का दोनों का पिता था। 30सारै तो बाँझ थी; उसके सन्तान न हुई। 31तेरह अपने पुत्र अब्राम, और अपने पोते लूत, जो हारान का पुत्र था, और अपनी बहू सारै, जो उसके पुत्र अब्राम की पत्नी थी, इन सभों को लेकर कसदियों के ऊर नगर से निकल कनान देश जाने को चला; पर हारान नामक देश में पहुँचकर वहीं रहने लगा। 32जब तेरह दो सौ पाँच वर्ष का हुआ; तब वह हारान देश में मर गया।


12. 1यहोवा ने अब्राम से कहा, “अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।


अब्राम पहले ऊर से था, फिर हारान  से 11:27-32

यहीं से अब्राम की कहानी आरम्भ होती है, जिसका नाम दोनों नियमों में प्रसिद्ध है। हमारे पास एक अभिलेख है कि अब्राम का देश कसदियों का ऊर था। यह उसकी पैतृक भूमि थी, यह एक मूर्तिपूजक देश था, जहाँ एबेर के सन्तान भी पतित हो गई थी। जो लोग अनुग्रह के माध्यम से, प्रतिज्ञा की भूमि के उत्तराधिकारी हैं, उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि उनकी मूल भूमि कैसी थी, स्वभाव से उनकी भ्रष्ट और पापी अवस्था क्या थी, अर्थात् वह चट्टान जिसमें से उन्हें काटा गया था और उसके प्रति धन्यवाद देना चाहिए।


एक अगुवा को इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसका परिवार और सामाजिक वातावरण उसके आत्मिक विकास के लिए भला है या नहीं। आपको परिपक्वता, पवित्रता, समर्पण और प्रभाव के एक नए और उच्च स्तर पर लाने के लिए परमेश्‍वर आपसे लोगों के एक प्यारे चक्र को छोड़ने की माँग कर सकता है। क्या आप तैयार हैं?


अब्राम के संबंधों का उल्लेख उसके लिए और निम्नलिखित कहानी में उनके स्थानों के कारण किया गया है। उसका पिता तेरह था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने जल-प्रलय के बाद अन्य देवताओं की सेवा की थी, क्योंकि शीघ्रता से ही मूर्तिपूजा ने संसार में पैर जमा लिए थे, और उन लोगों के लिए भी संसार के विरुद्ध चलना बहुत अधिक कठिन होता है, जिनके पास कुछ अच्छे सिद्धान्त होते हैं। जब तेरह सत्तर वर्ष का था, तब उसने तीन पुत्रों, अब्राम, नाहोर और हारान को जन्म दिया, जो हमें गलत संकेत देता है कि अब्राम तेरह का सबसे बड़ा पुत्र था, जो उसके सत्तरवें वर्ष में पैदा हुआ था (उत्पत्ति 11:26)। उत्पत्ति 11:32 की तुलना करके, जो हमें बताता है कि तेरह अपने 205वें वर्ष में मर गया, प्रेरितों के काम 7:4 के साथ देखते हुए, जहाँ यह कहा गया है कि अब्राम ने तेरह की मृत्यु के बाद हारान को छोड़ दिया, यह तब हुआ होगा, जब अब्राम पचहत्तर वर्ष का था, जिस समय उसने हारान को छोड़ दिया (उत्पत्ति 12:4) अब्राम का जन्म तेरह के 130 वें वर्ष में हुआ था और वह तेरह का सबसे छोटा बेटा था। (तेरह के 130 वर्ष, जब अब्राम का जन्म हुआ + 75 = कुल 205 का था) परमेश्‍वर के साथ अक्सर अन्तिम पहले और पहले अन्तिम होते हैं। संभवतः उसके नाम का उल्लेख पहले इसलिए किया गया है, क्योंकि वह सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति है। हम एक सांसारिक सूची में अन्तिम हो सकते हैं, परन्तु परमेश्‍वर की सूची में यह पहला होता है। दाऊद भी इस बात को प्रमाणित करता है। 


हमारे पास उसके भाइयों का कुछ विवरण है। नाहोर, जिसके परिवार से इसहाक और याक़ूब दोनों ने पत्नियाँ प्राप्त की थीं। नाहोर का परिवार स्पष्ट रूप से हारान की यात्रा नहीं करता है। फिर भी नाहोर के परिवार ने बाद में अब्राहम के वंशजों के लिए अच्छी लड़कियाँ/पत्नियाँ, इसहाक के लिए रिबका और याक़ूब के लिए राहेल, पद्दनराम में प्रदान कीं। स्पष्ट है कि नाहोर के माध्यम से तेरह के ये वंशज कनान देश के मूर्तिपूजक निवासियों की तुलना में नैतिक रूप से श्रेष्ठ थे। 


लूत के पिता हारान की मृत्यु उसके पिता तेरह से पहले ही हो गई थी। सन्तानें यह सुनिश्‍चित नहीं कर सकती थी कि वे अपने माता-पिता के द्वारा बचा लिए जाएँगे; क्योंकि मृत्यु सदैव वरिष्ठता को देखते हुए नहीं होती है, सबसे बड़े को पहले लेना। मृत्यु का आगमन बिना किसी क्रम के आधार पर है। इसी तरह कहा जाता है कि परिवार को उस मूर्तिपूजक देश को छोड़ने का आशीर्वाद मिलने से पहले, उसकी मृत्यु कसदियों के ऊर में हुई थी। हमें जल्द ही पापपूर्ण स्थानों को छोड़ देना चाहिए, ताकि मृत्यु हमें आश्‍चर्यचकित न कर दे। अब्राम की पत्नी का नाम सारै था। अब्राम कहता है कि वह उसके पिता की बेटी थी, परन्तु उसकी माँ की नहीं। मैंने उत्पत्ति 17:17 में पढ़ा है कि जब अब्राम 100 वर्ष का था, तब सारै 90 वर्ष की थी, जिसका अर्थ है कि वह अब्राम से दस वर्ष छोटी थी।


अब्राम अपने पिता तेरह, अपने भतीजे लूत और अपने परिवार के बाकी सदस्यों के साथ, परमेश्‍वर की बुलाहट का पालन करते हुए, कसदियों के ऊर से चला। यह अध्याय उन्हें हारान, या चारान नामक स्थान में छोड़ देता है, जो ऊर और कनान के बीच में एक जगह है, जहाँ वे तेरह की मृत्यु तक रहे। यह संभव है कि तेरह ने अपने मृत बेटे के नाम पर इस स्थान का नाम हारान या चारान रखा हो। यदि ऐसा है, तो यह संकेत दे सकता है कि तेरह ने अपने बड़े बेटे, हारान की मृत्यु पर विलाप करते हुए पीछे मुड़कर देखा, जबकि अब्राम ने आगे कनान की ओर देखा, जिसे परमेश्‍वर ने उसके लिए रखा था, जहाँ जाने की वह प्रतीक्षा कर रहा था। हम तेरह के बारे में बहुत कुछ नहीं सुनते, परन्तु सारा संसार अब्राम के बारे में जानता है। कई लोग हारान/चारान तक पहुँचते हैं, परन्तु कभी कनान तक नहीं पहुँचते हैं; वे प्रतिज्ञा के देश से दूर नहीं हैं, परन्तु वे उससे हजारों मील की दूरी पर भी रहते हैं, क्योंकि वे वहाँ कभी नहीं पहुँच पाते हैं। विश्‍वास और दूरदर्शिता वाला पुरुष या महिला प्रतिज्ञा की भूमि की ओर आगे बढ़ेगा। मेरे मित्र, मुझे आशा है कि आप उस तरह के दूरदर्शी अगुवा हैं।


अब्राम का बुलाहट उत्पत्ति 12:1

यहाँ उस बुलाहट का विवरण मिलता है, जिसके द्वारा अब्राम को उसकी जन्म वाली मूर्तिपूजक भूमि से और हारान से बाहर, कनान के आधे मार्ग में, प्रतिज्ञा के देश में ले जाया गया था। इस बुलाहट ने उसके विश्‍वास और आज्ञाकारिता की परीक्षा ली और उसे सबसे अलग कर दिया और उसे परमेश्‍वर के लिए, विशेष सेवाओं के लिए और आशीर्वादों के लिए अलग कर दिया, जो परमेश्‍वर ने उसके लिए बनाए थे। हमें कुछ हद तक इन अवस्थाओं और अब्राम के बुलाहट की परिस्थितियों के बारे में हमारे ज्ञान में सहायता मिल सकती है और प्रेरितों के काम 7:2 में स्तिफनुस के प्रचार के अतिरिक्त प्रकाश से जानकारी मिलती है। इसमें कहा गया है, "हमारा पिता अब्राहम हारान में बसने से पहले जब मेसोपोटामिया में था; तो तेजोमय परमेश्‍वर ने उसे दर्शन दिया, और उससे कहा, ‘तू अपने देश और अपने कुटुम्ब से निकलकर उस देश में जा, जिसे मैं तुझे दिखाऊँगा।’" यदि महिमा का परमेश्‍वर उसे यह बुलाहट देने के लिए प्रकट हुआ, तो हम बुलाहट और परमेश्‍वर की महिमा के बीच एक संबंध देख सकते हैं, जैसा कि मूसा और यशायाह के साथ भी हुआ था। परमेश्‍वर की महिमा की एक झलक हमें आश्‍चर्य में छोड़ सकती है, जैसे ही यह अब्राम को छोड़ती है, बुलाहट के ईश्‍वरीय अधिकार पर सन्देह करने के लिए कोई स्थान नहीं है। परमेश्‍वर ने बाद में उससे अलग-अलग तरीकों से बात की, परन्तु यह पहली बार था, स्पष्ट है कि वह उसे महिमा के परमेश्‍वर अर्थात् तेजोमय परमेश्‍वर के रूप में दिखाई दिया, और उससे बात की। क्या आपने अपनी आत्मिक आँखों से परमेश्‍वर की महिमा देखी है? क्या आप अपने मन की गहराई में विश्‍वास करते हैं कि वह तेजोमय है? यदि नहीं, तो आप उसकी सेवा क्यों करना चाहते हैं? यदि आपने अपनी आत्मिक आँखों से कम से कम परमेश्‍वर की महिमा की एक झलक नहीं देखी है, तो आप निश्‍चित रूप से अनुभव करने वाली परीक्षाओं और जाँचो के माध्यम से ईमानदारी से उसकी सेवा कैसे कर सकते हैं? यदि ऐसा है, तो आप उसकी सेवा कैसे नहीं कर सकते?

 

यह बुलाहट अब्राम को मेसोपोटामिया में मिली था, इससे पहले कि वह चारान/हारान में रहता था। इसलिए हम इसे सही रीति से पढ़ते हैं कि अब्राम ने ऊर और फिर हारान में रहते हुए बुलाहट का पालन किया। महासभा के सामने स्तिफनुस ने अपने बचाव प्रेरितों के काम 7:4 में आगे कहा है, "तब वह कसदियों के देश से निकलकर हारान में जा बसा। उसके पिता की मृत्यु के बाद परमेश्‍वर ने उसको वहाँ से इस देश में लाकर बसाया जिसमें अब तुम बसते हो।"


परमेश्‍वर यहोवा ने मूल रूप से कसदियों के ऊर में अब्राम से बात की थी; और, इस बुलाहट की सीधे आज्ञाकारिता में, जैसा कि स्तिफनुस आगे कहानी में बताता है, अब्राम ऊर से चला। तब परमेश्‍वर ने अब्राम को पहले की तरह एक नई आज्ञा दी। हमें अक्सर परमेश्‍वर से थोड़ी सी प्रेरणा की आवश्यकता होती है। यहाँ तक कि विश्‍वास के प्रसिद्ध व्यक्ति अब्राम को भी इसकी आवश्यकता थी। परमेश्‍वर ने उसे हरान में बहुत सहज नहीं होने दिया। परमेश्‍वर ने उसे कनान देश में भेज दिया। यदि परमेश्‍वर हमसे प्रेम करता है, और हम पर दया करता है, तो वह हमें कनान से दूर कहीं भी विश्राम करने की अनुमति नहीं देगा, परन्तु भले काम के पूरा होने तक अपनी बुलाहट को कृपापूर्वक दोहराएगा, और जिसे उसने आरम्भ किया है, जब तक वह पूरा नहीं हो जाता, और हमारे कंधे उसके हल्के जूए में सही आकार में नहीं आ जाते हैं, जिसकी उसने हमारे लिए योजना बनाई है। जब परमेश्‍वर हमें बुलाता है, तो हमारे पास एक आज्ञा और एक प्रतिज्ञा दोनों होती हैं। परमेश्‍वर की आज्ञाओं का अर्थ है कि उनका पालन करना संभव है। क्या वह हममें से किसी से कुछ ऐसा करने के लिए कहेगा, जो उसकी सहायता से हमारे लिए करना संभव नहीं था? 


परमेश्‍वर ने एक आज्ञा के साथ अब्राम की जाँच की, "उस देश को जा.... जो मैं तुझे दिखाऊँगा" (उत्पत्ति 12:1)। इस आदेश से अब्राम की जाँच की गई कि क्या वह अपनी मूल भूमि और सबसे प्यारे मित्रों से प्रेम करता था, और क्या वह स्वेच्छा से सब कुछ परमेश्‍वर के साथ जाने के लिए छोड़ सकता था। उसका देश मूर्तिपूजक हो गया था, उसके रिश्तेदार और उसके पिता का घर उसके लिए एक निरंतर प्रभाव और प्रलोभन था, और वह उनसे संक्रमित होने के खतरे के बिना उनके साथ नहीं रह सकता था। जो लोग पापपूर्ण स्थान पर हैं, उन्हें इससे जल्दी बाहर निकलने के लिए चिन्तित होना चाहिए। अपनी भलाई के लिए बाहर निकलें। जो लोग अपने पापों को छोड़ देते हैं, और परमेश्‍वर की ओर रुख करते हैं, वे स्वयं आने वाले परिवर्तन से अकथनीय लाभ के प्राप्त करने वाले होंगे। नीतिवचन 9:12 कहता है, "यदि तू बुद्धिमान हो, तो बुद्धि का फल तू ही भोगेगा,और यदि तू ठट्ठा करे, तो दण्ड केवल तू ही भोगेगा।"

हमारा देश हमें प्रिय होता है, हमारे रिश्तेदार हमें अधिक प्रिय हैं, और हमारे पिता का घर सबसे प्रिय है; और फिर भी उन सभी से घृणा की जानी चाहिए। अर्थात्, हमें उन्हें मसीह से कम प्रेम करना चाहिए, उसके लिए हमारे प्रेम की तुलना में उनसे घृणा करनी चाहिए, और जब भी इनमें से कोई उसके साथ प्रतिस्पर्धा में आता है, तो उन्हें सबसे कम के रूप में अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए और एक बड़े प्रतिफल के लिए अलग कर दिया जाना चाहिए, और प्रभु यीशु की इच्छा और सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लूका 14:26 कहता है, "यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और बच्‍चों और भाइयों और बहिनों - वरन् अपने प्राण - को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।" जब हम यीशु के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को खतरे में डाले बिना इसे नहीं रख सकते हैं, तो हमें स्वेच्छा से हमारे लिए सबसे प्रिय चीज से दूर हो जाना चाहिए। संसार और उसमें हमारे सभी आनन्दों को एक पवित्र उदासीनता और सीधे तिरस्कार के साथ देखा जाना चाहिए; हमें इसे अब अपने देश या घर के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि अपने अस्थाई निवास स्थान के रूप में देखना चाहिए और तदनुसार इसके ऊपर रहना चाहिए और इसे छोड़ने के लिए किसी भी समय तैयार रहना चाहिए।


इस आज्ञा से अब्राम पर जाँच की गई कि क्या वह परमेश्‍वर पर उससे अधिक भरोसा कर सकता है, जितना उसने उसे देखा था; क्योंकि उसे अपना देश छोड़कर उस देश में जाना होगा, जो परमेश्‍वर उसे दिखाएगा। वह अभी तक यह नहीं कहता कि "यह वह भूमि है, जो मैं तुझे दूँगा” बल्कि केवल "एक ऐसी भूमि है, जो मैं तुझे दिखाऊँगा"। न ही वह उसे यह बताता है कि वह कौन सी भूमि थी, न ही किस तरह की भूमि; परन्तु उसे एक अंतर्निहित विश्‍वास के साथ परमेश्‍वर का अनुसरण करना होगा, और इसके लिए परमेश्‍वर के वचन को लेना होगा, सामान्य रूप से, उसे कोई विशेष सुरक्षा नहीं दी गई थी कि उसे परमेश्‍वर का अनुसरण करने के लिए अपना देश छोड़ने में कोई नुकसान नहीं होना चाहिए था। जो कोई भी परमेश्‍वर के साथ चलना चाहता है, उसे विश्‍वास में चलना चाहिए; इस विश्‍वास के आधार पर हमें उन चीजों को छोड़ना चाहिए, जो उन चीजों के लिए देखा जाता है, जो देखी नहीं जाती हैं, और एक महिमा की आशा में इस वर्तमान समय के कष्टों के अधीन होना चाहिए, जो अभी तक प्रकट नहीं हुई है, जैसा कि पौलुस ने रोमियों 8:18 में वर्णित किया है, "क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस समय के दु:ख और क्लेश उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं” और यूहन्ना ने 1 यूहन्ना 3:2 में उल्लेख किया है, "हे प्रियो, अब हम परमेश्‍वर की सन्तान हैं, और अभी तक यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं कि जब वह प्रगट होगा तो हम उसके समान होंगे, क्योंकि उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है।" परमेश्‍वर ने अब्राम को एक ऐसे देश में बुलाया, जिसे वह उसे दिखाएगा, और ऐसा करते हुए उसे उसके निर्देशन पर निरंतर निर्भरता में रहने के लिए सिखाना आरम्भ कर दिया, और ऐसा उसने सदैव अपने परमेश्‍वर की ओर अपनी दृष्टि लगाते हुए किया।

हे प्रभु, हम तेरी महिमा देखें। आइए हम अपने विश्‍वास की आँखों से देखें। आइए हम अपने विश्‍वास के अनुसार काम करना सीखें।