सुरक्षा

अध्याय उन्तालीस


उत्पत्ति 31:25-42

Ron Meyers

25और लाबान याक़ूब के पास पहुँच गया। याक़ूब अपना तम्बू गिलाद नामक पहाड़ी देश में खड़ा किए पड़ा था; और लाबान ने भी अपने भाइयों के साथ अपना तम्बू उसी पहाड़ी देश में खड़ा किया। 26तब लाबान याक़ूब से कहने लगा, “तू ने यह क्या किया कि मेरे पास से चोरी से चला आया, और मेरी बेटियों को ऐसा ले आया, मानो तलवार के बल से बन्दी बनाई गई हों? 27तू क्यों चुपके से भाग आया, और मुझ से बिना कुछ कहे मेरे पास से चोरी से चला आया; नहीं तो मैं तुझे आनन्द के साथ मृदंग और वीणा बजवाते, और गीत गवाते विदा करता? 28तू ने तो मुझे अपने बेटे बेटियों को चूमने तक न दिया? तू ने मूर्खता की है। 29तुम लोगों की हानि करने की शक्‍ति मेरे हाथ में तो है; पर तुम्हारे पिता के परमेश्‍वर ने मुझसे बीती हुई रात में कहा, ‘सावधान रह, याक़ूब से न तो भला कहना और न बुरा।’ 30भला, अब तू अपने पिता के घर का बड़ा अभिलाषी होकर चला आया तो चला आया, पर मेरे देवताओं को तू क्यों चुरा ले आया है?” 31याक़ूब ने लाबान को उत्तर दिया, “मैं यह सोचकर डर गया था कि कहीं तू अपनी बेटियों को मुझसे छीन न ले। 32जिस किसी के पास तू अपने देवताओं को पाए, वह जीवित न बचेगा। मेरे पास तेरा जो कुछ निकले, उसे भाई–बन्धुओं के सामने पहिचानकर ले ले।” क्योंकि याक़ूब न जानता था कि राहेल गृहदेवताओं को चुरा ले आई है। 33यह सुनकर लाबान, याक़ूब और लिआ: और दोनों दासियों के तम्बुओं में गया; और कुछ न मिला। तब लिआ: के तम्बू में से निकलकर राहेल के तम्बू में गया। 34राहेल तो गृहदेवताओं को ऊँट की काठी में रखके उन पर बैठी थी। लाबान ने उसके सारे तम्बू में टटोलने पर भी उन्हें न पाया। 35राहेल ने अपने पिता से कहा, “हे मेरे प्रभु; इस से अप्रसन्न न हो कि मैं तेरे सामने नहीं उठी; क्योंकि मैं मासिकधर्म से हूँ।” अत: उसे ढूँढ़ने पर भी गृहदेवता उसको न मिले। 36तब याक़ूब क्रोधित होकर लाबान से झगड़ने लगा, और कहा, “मेरा क्या अपराध है? मेरा क्या पाप है कि तू ने इतना क्रोधित होकर मेरा पीछा किया है? 37तू ने जो मेरी सारी सामग्री को टटोलकर देखा, तो तुझ को अपने घर की सारी सामग्री में से क्या मिला? कुछ मिला हो तो उसको यहाँ अपने और मेरे भाइयों के सामने रख दे, और वे हम दोनों के बीच न्याय करें। 38इन बीस वर्षों तक मैं तेरे पास रहा; इनमें न तो तेरी भेड़–बकरियों के गर्भ गिरे, और न तेरे मेढ़ों का मांस मैं ने कभी खाया। 39जिसे बनैले जन्तुओं ने फाड़ डाला उसको मैं तेरे पास न लाता था, उसकी हानि मैं ही उठाता था; चाहे दिन को चोरी जाता चाहे रात को, तू मुझ ही से उसको ले लेता था। 40मेरी तो यह दशा थी कि दिन को तो घाम और रात को पाला मुझे खा गया; और नींद मेरी आँखों से भाग जाती थी। 41बीस वर्ष तक मैं तेरे घर में रहा; चौदह वर्ष तो मैं ने तेरी दोनों बेटियों के लिये, और छ: वर्ष तेरी भेड़–बकरियों के लिये सेवा की; और तू ने मेरी मज़दूरी को दस बार बदल डाला। 42मेरे पिता का परमेश्‍वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्‍वर, जिसका भय इसहाक भी मानता है, यदि मेरी ओर न होता तो निश्‍चय तू अब मुझे छूछे हाथ जाने देता। मेरे दु:ख और मेरे हाथों के परिश्रम को देखकर परमेश्‍वर ने बीती हुई रात में तुझे डाँटा।”


लाबान और उसके रिश्तेदारों ने गिलाद में याक़ूब, उसके परिवार और पशुओं को पकड़ लिया। "और लाबान याक़ूब के पास पहुँच गया। याक़ूब अपना तम्बू गिलाद नामक पहाड़ी देश में खड़ा किए पड़ा था; और लाबान ने भी अपने भाइयों के साथ अपना तम्बू उसी पहाड़ी देश में खड़ा किया" (वचन 25)। हम उनकी गरमाहट भरी बातचीत, आरोपों और बचाव से क्या सीख सकते हैं?


लाबान याक़ूब को एक विद्रोही भगोड़ा मानता है, जिसने अनुचित तरीके से उसकी सेवा छोड़ दी थी। याक़ूब का एक अपराधी के रूप में प्रतिनिधित्व करने के लिए, लाबान उन लोगों को यह विश्‍वास करवाता कि वह अपनी बेटियों के प्रति दया करने का मंशा रखता है कि वह उन्हें प्रेम और सम्मान के सभी प्रतीकों के साथ छोड़ देता, जो कि हो सकता है कि वह इसे एक गंभीर समस्या बना देता, अर्थात् अपने छोटे पोते-पोतियों को चूमता (और, संयोग से, वह उनके साथ बस इतना ही करता है) और, देश की एक खोखली प्रथा के अनुसार, उन्हें केवल नृत्य के साथ किसी भी वास्तविक सार्थक पदार्थ या गंभीर विचार के कुछ भी नहीं देते हुए दूर भेज देता है। "तू क्यों चुपके से भाग आया, और मुझ से बिना कुछ कहे मेरे पास से चोरी से चला आया; नहीं तो मैं तुझे आनन्द के साथ मृदंग और वीणा बजवाते, और गीत गवाते विदा करता? तू ने तो मुझे अपने बेटे बेटियों को चूमने तक न दिया? तू ने मूर्खता की है" (वचन 27 और 28)।


हम आसानी से लाबान के कथित उत्सवों की तुलना 120 वर्ष पहले उसी परिवार द्वारा रिबका की विदाई से कर सकते हैं। वह विदाई प्रार्थनाओं और आशीर्वादों से भरी हुई थी, जैसा कि उत्पत्ति 24:60 में वर्णित है, "और उन्होंने रिबका को आशीर्वाद दे के कहा, “हे हमारी बहिन, तू हज़ारों लाखों की आदिमाता हो, और तेरा वंश अपने बैरियों के नगरों का अधिकारी हो।" अच्छा महसूस करने की तुलना में अच्छा होना बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। परमेश्‍वर को स्वीकार करने और खोजने की तुलना में केवल खेल, मौज-मस्ती और एक जेवनार तुच्छ और उथली है। ये एक बहुत ही अधिक सर्वोतम मूल्य पद्धति के निशान हैं। आनन्द से भरी एक जेवनार करें, परन्तु अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा न करें। लाबान नाटक करता है कि अलग होने पर उनके साथ सम्मान के साथ व्यवहार किया गया जाता, परन्तु उसका पिछला रवैया और व्यवहार दिखाता है कि यह केवल ढोंग मात्र था। क्या हम परमेश्‍वर को यह दिखाने की अनुमति दे सकते हैं कि गतिविधियाँ शब्दों से अधिक बल की माँग करती हैं? आइए हम अच्छे कार्यों और व्यवहार के साथ अपनी ईमानदारी दिखाएँ, और दूसरों में भी इसकी खोज करें। यदि दूसरों के भले शब्द ईमानदारी के साथ अच्छे व्यवहार से मेल नहीं खाते हैं, तो किसी की चापलूसी में न पड़ें।


ऐसा हो सकता है कि बुरे लोग, जब वे अपनी बुरी योजनाओं को पूरा करने में असमर्थ होते हैं, तो नाटक करते हैं कि उनकी मंशा कुछ भी नहीं थी, परन्तु उचित और दयालुता भरी मात्र थी। जब वे वह गलत नहीं कर सकते हैं, जिसकी उन्होंने मंशा की होती, तो वे यह स्वीकार नहीं करते कि उन्होंने कभी ऐसा करने की मंशा की थी। जब उन्होंने वह नहीं किया, जो उन्हें करना चाहिए था, तो वे बहाना बनाते हैं कि उन्होंने ऐसा किया होगा। मनुष्य इससे धोखा खा सकते हैं, परन्तु परमेश्‍वर के साथ ऐसा नहीं हो सकता है। हम किसका अनुग्रह चाहते हैं?


लाबान इसी तरह का सुझाव देता है कि याक़ूब का चोरी छिपे जाना एक बुरा उद्देश्य और इच्छा से था, जैसे कि याक़ूब ने अपने अधिकार अर्थात् धन-सम्पत्ति को बंदियों की तरह ले लिया था। वचन 26 कहता है, "तब लाबान याक़ूब से कहने लगा, "तू ने यह क्या किया कि मेरे पास से चोरी से चला आया, और मेरी बेटियों को ऐसा ले आया, मानो तलवार के बल से बन्दी बनाई गई हों?"" कुछ लोग जो दूसरे के साथ बुराई करने की मंशा रखते हैं, उनमें रचनात्मक परन्तु पापी क्षमता होती है, जिससे कि वे दूसरों के निर्दोष तरीके से किए जाने की सबसे खराब व्याख्या को सामने रख सकते हैं।


लाबान अगली बार अपने कथित बल का दावा करता है। "तुम लोगों की हानि करने की शक्‍ति मेरे हाथ में तो है; पर तुम्हारे पिता के परमेश्‍वर ने मुझसे बीती हुई रात में कहा, "सावधान रह, याक़ूब से न तो भला कहना और न बुरा"" (वचन 29)। उसे लगता है कि उसके पक्ष में अधिकार और बल दोनों ही थे। इनमें से केवल एक ही सच था। हो सकता है कि उसके पास बल हो, परन्तु वह उसकी मनसा में सही नहीं था, अन्यथा परमेश्‍वर को उसे डाँटना नहीं पड़ता। परमेश्‍वर ने उसे रोक दिया, इसलिए परिणाम यह हुआ कि उसने उस बल का उपयोग करने का हियाव नहीं किया। हमें कभी पता नहीं चलेगा कि क्या वह याक़ूब के परिवार को प्रभावी नुकसान पहुँचा सकता था, क्योंकि उसने अंततः एक गैर-आक्रामकता भरा समझौता किया था। बुरे लोग सामान्य तौर पर चोट पहुँचाने की अपनी शक्ति के बारे में अपनी बढ़ी हुई धारणा से स्वयं को महत्व देते हैं, जबकि अच्छा करने की शक्ति का विनम्रता भरा अधिकार बहुत अधिक मूल्य रखता है। हम दूसरों की सहायता करने की अपनी क्षमता बढ़ाकर स्वयं को मूल्यवान बनाने का विकल्प चुन सकते हैं या हम स्वयं को डराने का विकल्प चुन सकते हैं।

 

लाबान, अपने श्रेय के लिए, स्वीकार करता है कि परमेश्‍वर ने उसे रोका और, हालाँकि यह याक़ूब के श्रेय और सांत्वना के लिए बहुत कुछ पैदा करता है, वह उसे उस चेतावनी को बताने से बच नहीं पाया, जो परमेश्‍वर ने उसे एक रात पहले स्वप्न में दी थी। मैं यहाँ कई सबकों को देखता हूँ। (1) हमें समझदार होने की आवश्यकता है। आत्माओं को परखना आत्मा का एक वरदान है। भले ही वह एक बुरा व्यक्ति था, परन्तु लाबान को अपने बारे में कुछ अच्छा कहने में आनन्द मिलता है। वह जितना बुरा था, उसने उस व्यक्ति को चोट पहुँचाने का हियाव नहीं किया, जिसे वह परमेश्‍वर की विशेष देखभाल में देखता था। हम इसे परमेश्‍वर की व्यक्तिगत चेतावनी के लिए लाबान द्वारा महसूस किए गए कुछ कर्तव्यनिष्ठ सम्मान के उदाहरण के रूप में देख सकते हैं। बहुत सारी समस्याओं को रोका जा सकता था, यदि लोग रात में परमेश्‍वर द्वारा दी गई चेतावनियों को सुनते, अपने विवेक के माध्यम से उस से बात करते और बुराई करने से पहले उन्हें गलत के बारे में चेतावनी देते, जिससे वे बच सकते थे। यहाँ तक कि हम मसीही अगुवे भी रात में परमेश्‍वर की बातों को सुनना सीख सकते हैं। यदि स्वार्थी लाबान परमेश्‍वर से सुन सकता है और अधिक सतर्क हो सकता है, तो निश्‍चित रूप से हम भी ऐसा कर सकते हैं।


लाबान यह स्वीकार नहीं करता कि उसने याक़ूब को भागने का कोई कारण दिया था, बल्कि कहता है कि याक़ूब अपने पिता के पास लौटना चाहता था। "भला, अब तू अपने पिता के घर का बड़ा अभिलाषी होकर चला आया तो चला आया, पर मेरे देवताओं को तू क्यों चुरा ले आया है?" एक अधर्मी चाचा की सेवा करने के बाद एक धर्मी पिता के पास लौटना एक बुरा विचार नहीं है। उस व्यक्ति पर दया दिखाएँ, जिसके पास एक धर्मी पिता नहीं है, जिसके पास वह लौट सकता हो। और हम सभी के पास एक अद्भुत स्वर्गीय पिता है, जिसके पास हम जब चाहें लौट सकते हैं, या आ सकते हैं, या भाग कर पहुँच सकते हैं।


उस निर्धन लाबान पर दया दिखाएँ, जो स्वीकार करता है कि उसके पास असहाय देवता हैं, जो अपनी रक्षा नहीं कर सकते हैं। इस तरह के देवताओं का होना पहले से ही मूर्खतापूर्ण है, परन्तु उन पर अपना दावा करना और भी अधिक है। "... पर मेरे देवताओं को तू क्यों चुरा ले आया है?" लाबान के देवता न केवल किसी की रक्षा कर सकते थे, वे अपनी देखभाल भी नहीं कर सकते थे। क्या लाबान उन देवताओं से सुरक्षा की आशा कर सकता था, जो न तो प्रतिरोध कर सकते थे और न ही अपने आक्रमणकारियों की खोज कर सकते थे? धन्य हैं वे, जिनके पास अपने परमेश्‍वर के लिए प्रभु यहोवा है, क्योंकि उनके पास एक ऐसा परमेश्‍वर है, जिसे चुराया नहीं जा सकता। शत्रु हमारा सामान चुरा सकते हैं, परन्तु हमारा परमेश्‍वर नहीं। 

याक़ूब अपना बचाव करता है। "तब याक़ूब ने लाबान को उत्तर दिया, "मैं यह सोचकर डर गया था कि कहीं तू अपनी बेटियों को मुझसे छीन न ले।" याक़ूब अपना असली कारण बताकर स्वयं को स्पष्ट करता है कि वह क्यों अज्ञात रूप से लाबान के पास से चला आया था। उसे डर था कि कहीं ऐसा न हो कि लाबान जबरदस्ती उसकी बेटियों को छीन कर ले जाएगा। यह याक़ूब के लाबान के साथ बीस वर्षों के अनुभव पर आधारित था। याक़ूब को छोड़ना बुद्धिमानी थी। यदि लाबान अन्याय करता, तो वह अन्याय करता क्यों नहीं रहता? यदि लाबान ने याक़ूब को उसकी मजदूरी में धोखा दिया, तो उसकी पत्नियों को क्यों नहीं?


जहाँ तक लाबान के देवताओं को चुराने के आरोप का प्रश्न है, वह स्वयं को निर्दोष मानता है। "जिस किसी के पास तू अपने देवताओं को पाए, वह जीवित न बचेगा। मेरे पास तेरा जो कुछ निकले, उसे भाई–बन्धुओं के सामने पहिचानकर ले ले।” क्योंकि याक़ूब न जानता था कि राहेल गृहदेवताओं को चुरा ले आई है" (वचन 32)। तब याक़ूब को पता न चला कि राहेल ने देवताओं को चुरा लिया था। याक़ूब ने तो उन्हें स्वयं नहीं लिया, वह उन्हें नहीं चाहता था और न ही उसे पता था कि उन्हें ले आया गया था। हालाँकि, उसके लिए राहेल को मृत्यु का दण्ड उच्चारण करने के लिए इतनी जल्दबाजी में बोलना मूर्खतापूर्ण था, क्योंकि वह बैतलहम के फाटक पर ही मर गई। "... जिस किसी के पास तू अपने देवताओं को पाए, वह जीवित न बचेगा।"


लाबान ने अपने देवताओं के लिए एक परिश्रमी परन्तु अनुत्पादक खोज की, वह आंशिक रूप से याक़ूब के लिए घृणा के कारण और आंशिक रूप से अपने देवताओं के लिए प्रेम के कारण बनी। हमें यह नहीं पाते कि उसने याक़ूब के झुंड और पशुओं में चोरी के जानवरों की खोज की या नहीं; परन्तु उसने याक़ूब के तम्बुओं में चोरी के देवताओं की खोज अवश्य की। लाबान से सबक लें। यदि हम अपने परमेश्‍वर की दृष्टि खो देते हैं, तो हमें उन्हें खोजने के लिए बहुत अधिक उत्सुक होना चाहिए। यदि वह न्याय के साथ हमसे अलग हो जाता है, तो हमें कितनी सावधानी से पूछना चाहिए, जैसा कि अय्यूब ने 23:3 में किया था, "भला होता, कि मैं जानता कि वह कहाँ मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता!" अपनी सारी खोजबीन के बाद, लाबान अपने देवताओं को नहीं ढूँढ पाया और चकित रह गया, परन्तु हमारा परमेश्‍वर न केवल उन लोगों को मिलता है, जो उसे ढूँढते हैं, बल्कि वह ढूँढ़ने वाले को अपना भरपूर प्रतिफल देता है। वह उन लोगों का प्रतिफल देने वाला है, जो लगन से उसे ढूँढते हैं।


हम इस कहानी में एक अच्छे विवेक के विश्राम के बारे में एक मूल्यवान सबक पाते हैं। यह याक़ूब के लिए आनन्द की बात थी कि जब लाबान ने उस पर आरोप लगाया, तो उसकी अपने विवेक ने उसे बरी कर दिया, और उसके लिए गवाही दी कि वह ईमानदारी से जीने के लिए हर चीज में तैयार और सावधान था। इब्रानियों का लेखक भी यही दावा करता है। "हमारे लिये प्रार्थना करते रहो, क्योंकि हमें भरोसा है कि हमारा विवेक शुद्ध है : और हम सब बातों में अच्छी चाल चलना चाहते हैं" (इब्रानियों 13:18)। जिन लोगों ने किसी भी नौकरी में ईमानदारी से काम किया है, भले ही पुरुषों द्वारा इसे स्वीकार नहीं किया गया हो, फिर भी वे अपने स्वयं के मनों में बहुत अधिक सांत्वना पाएँगे। वे जानते हैं कि परमेश्‍वर उन्हें जानता है। वह उनका दर्शक है, जिनके लिए हम प्रदर्शन करते हैं, एक ऐसा न्यायी जिसके सामने हम रहते हैं और एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जिसकी सोच या हमारे जीवन का मूल्यांकन वास्तव में अर्थ रखता है। कभी-कभी यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।


हम यहाँ एक अच्छे सेवक, और विशेष रूप से एक विश्‍वासयोग्य चरवाहे के चरित्र के बारे में सीख सकते हैं। याक़ूब ने स्वयं के लिए ऐसा ही स्वीकार किया था। वह बहुत अधिक सावधान था, ताकि, उसकी देखरेख या उपेक्षा के कारण, भेड़िये उसकी सन्तान को परेशान न करें। उसकी भक्तिपूर्ण ईमानदारी ने उसके स्वामी के जानवरों पर भी आशीर्वाद किया, जो उनके हाथों के अधीन थे। समूह के सदस्यों को इस बात का कम ध्यान नहीं रखना चाहिए कि उन्हें अपने अगुवों के द्वारा क्या सौंपा गया है, यदि वे अपने स्वयं के लिए इसके हकदार हैं। याक़ूब बहुत ही ज्यादा ईमानदार था, और अपने भोजन के लिए उसमें से कुछ भी नहीं लेता था, जिसकी उसे अनुमति नहीं थी। वह सामान्य भोजन से संतुष्ट था, और झुंड के मेढ़ों को नहीं खाता था। परमेश्‍वर के कार्यकर्ताओं को अपने भोजन में सही नहीं होना चाहिए, न ही उन चीजों की लालसा करनी चाहिए, जो उनके लिए वर्जित हैं, परन्तु उस में, और अन्य उदाहरणों में, साझा दृष्टि के प्रति विश्‍वासयोग्यता दिखाएँ। याक़ूब एक मजदूर था। "मेरी तो यह दशा थी कि दिन को तो घाम और रात को पाला मुझे खा गया; और नींद मेरी आँखों से भाग जाती थी" (वचन 40)। वह हर मौसम में अपने व्यवसाय पर टिका रहा और लगातार धैर्य के साथ गर्मी और ठंड दोनों को सहन किया। हमारी नेतृत्व टीमों के पुरुष और स्त्रियाँ, जो इसमें से कुछ बनने की मंशा रखते हैं, उन्हें कठोरता को सहन करने का संकल्प लेना चाहिए। याक़ूब यहाँ सेवकों के लिए एक उदाहरण है; वे चरवाहे भी हैं, जिनके लिए यह आवश्यक है कि वे अपने विश्‍वास के प्रति सच्चे रहें और अपनी बुलाहट की पूर्ति में असुविधा भुगतने के लिए तैयार रहें।

लाबान याक़ूब के लिए एक कठोर स्वामी था। यह आज के मसीही अगुवों के लिए एक सबक है, क्योंकि हम लाबान से बहुत अलग तरह का व्यवहार करने की कोशिश करते हैं। वे निर्धन अगुवे हैं, जो टीम के सदस्यों से माँग करते हैं कि वे बिना किसी गलती के कुछ भी खराब कर देंगे। लाबान के पास याक़ूब के लिए चीजें अच्छी तरह से करने के लिए संसाधन थे, परन्तु उसने उन संसाधनों का बुद्धिमानी से या उदारता से उपयोग नहीं किया। वह स्वार्थी था। याक़ूब को स्वयं उन चीजों के लिए भुगतान करना पड़ा, जिनके लिए उसे भुगतान नहीं करना चाहिए था। यदि गैर-जिम्मेदाराना या लापरवाही से उपेक्षा की गई है, तो इससे फर्क पड़ सकता है, परन्तु फिर भी अगुवा को उदार होना चाहिए और कृपा से भरी जिम्मेदारी सिखानी चाहिए या क्या किया जाना चाहिए था। गलती के अनुपात से अधिक दण्ड देना अन्यायपूर्ण है।


यहाँ अन्तिम सबक याक़ूब के लिए परमेश्‍वर की कृपापूर्ण देखभाल के बारे में है। "मेरे पिता का परमेश्‍वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्‍वर, जिसका भय इसहाक भी मानता है, यदि मेरी ओर न होता तो निश्‍चय तू अब मुझे छूछे हाथ जाने देता। मेरे दु:ख और मेरे हाथों के परिश्रम को देखकर परमेश्‍वर ने बीती हुई रात में तुझे डाँटा" (वचन 42)। परन्तु परमेश्‍वर ने मेरी कठिनाई और मेरे हाथों के परिश्रम को देखा, और पिछली रात उसने तुझे डाँटा। परमेश्‍वर को पता था कि याक़ूब के साथ क्या गलत किया गया था, और उसने उसे चुका दिया, जिसे लाबान खाली छोड़ देता। परमेश्‍वर ने लाबान को डाँटा और याक़ूब की रक्षा की।


वह आपके लिए भी ऐसा ही करेगा। परमेश्‍वर सताने वालों पर नायक और विजेता है। उसके जिन सेवकों पर अन्याय किया जाता है और फिर भी वे नाश नहीं होते, गिराए तो जाते हैं और फिर भी नष्ट नहीं होते, वे हमारे विश्‍वासयोग्य परमेश्‍वर पर निर्भर हो सकते हैं, जैसे कि हम उसके संरक्षण में स्वयं को स्वीकार करते हैं और उसे इसके लिए महिमा देते हैं। उदाहरण द्वारा नेतृत्व करें।