एक पुनर्मिलन

अध्याय तैंतालीस


उत्पत्ति 33

Ron Meyers

1याक़ूब ने आँखें उठाकर यह देखा कि एसाव चार सौ पुरुष संग लिये हुए चला आता है। तब उसने बच्‍चों को अलग–अलग बाँटकर लिआ: और राहेल और दोनों दासियों को सौंप दिया। 2और उसने सबसे आगे लड़कों समेत दासियों को, उसके पीछे लड़कों समेत लिआ: को और सब के पीछे राहेल और यूसुफ को रखा, 3और आप उन सब के आगे बढ़ा और सात बार भूमि पर गिर के दण्डवत् की, और अपने भाई के पास पहुँचा। 4तब एसाव उससे भेंट करने को दौड़ा, और उसको हृदय से लगाकर, गले से लिपटकर चूमा; फिर वे दोनों रो पड़े। 5तब उसने आँखें उठाकर स्त्रियों और बच्‍चों को देखा, और पूछा, “ये जो तेरे साथ हैं वे कौन हैं?” उसने कहा, “ये तेरे दास के लड़के हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने अनुग्रह करके मुझ को दिया है।” 6तब लड़कों समेत दासियों ने निकट आकर दण्डवत् किया; 7फिर लड़कों समेत लिआ: निकट आई और उन्होंने भी दण्डवत् किया; अन्त में यूसुफ और राहेल ने भी निकट आकर दण्डवत् किया। 8तब उसने पूछा, “तेरा यह बड़ा दल जो मुझ को मिला, उसका क्या प्रयोजन है?” उसने कहा, “यह कि मेरे प्रभु की अनुग्रह की दृष्‍टि मुझ पर हो।” 9एसाव ने कहा, “हे मेरे भाई, मेरे पास तो बहुत है; जो कुछ तेरा है वह तेरा ही रहे।” 10याक़ूब ने कहा, “नहीं नहीं, यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो, तो मेरी भेंट ग्रहण कर; क्योंकि मैं ने तेरा दर्शन पाकर, मानो परमेश्‍वर का दर्शन पाया है, और तू मुझ से प्रसन्न हुआ है। 11इसलिये यह भेंट जो तुझे भेजी गई है, ग्रहण कर; क्योंकि परमेश्‍वर ने मुझ पर अनुग्रह किया है, और मेरे पास बहुत है।” जब उसने उससे बहुत आग्रह किया, तब उसने भेंट को ग्रहण किया। 12फिर एसाव ने कहा, “आ, हम बढ़ चलें; और मैं तेरे आगे आगे चलूँगा।” 13याक़ूब ने कहा, “हे मेरे प्रभु, तू जानता ही है कि मेरे साथ सुकुमार लड़के, और दूध देनेहारी भेड़–बकरियाँ और गायें हैं; यदि ऐसे पशु एक दिन भी अधिक हाँके जाएँ, तो सब के सब मर जाएँगे। 14इसलिये मेरा प्रभु अपने दास के आगे बढ़ जाए, और मैं इन पशुओं की गति के अनुसार जो मेरे आगे हैं, और बच्‍चों की गति के अनुसार धीरे धीरे चलकर सेईर में अपने प्रभु के पास पहुँचूँगा।” 15एसाव ने कहा, “तो अपने साथियों में से मैं कई एक तेरे साथ छोड़ जाऊँ।” उसने कहा, “यह क्यों? इतना ही बहुत है कि मेरे प्रभु के अनुग्रह की दृष्‍टि मुझ पर बनी रहे।” 16तब एसाव ने उसी दिन सेईर जाने को अपना मार्ग लिया। 17परन्तु याक़ूब वहाँ से निकल कर सुक्‍कोत को गया, और वहाँ अपने लिये एक घर, और पशुओं के लिये झोपड़े बनाए। इसी कारण उस स्थान का नाम सुक्‍कोत पड़ा। 18याक़ूब जो पद्दनराम से आया था, उसने कनान देश के शकेम नगर के पास कुशल क्षेम से पहुँचकर नगर के सामने डेरे खड़े किए। 19और भूमि के जिस खण्ड पर उसने अपना तम्बू खड़ा किया, उसको उसने शकेम के पिता हमोर के पुत्रों के हाथ से एक सौ कसीतों में मोल लिया। 20वहाँ उसने एक वेदी बनाकर उसका नाम एल–एलोहे–इस्राएल रखा।


हम पिछले अध्याय में पढ़ते हैं कि कैसे याक़ूब को परमेश्‍वर के साथ सामर्थ्य प्राप्त हुई, और वह प्रबल हुआ; यहाँ हम पाते हैं कि मनुष्यों पर उसकी क्या सामर्थ्य थी, और कैसे उसके भाई एसाव को जल्दी से शांत किया गया और उसके साथ सुलह कर ली गई; जैसा कि नीतिवचन 16:7 में लिखा गया है, "जब किसी का चालचलन यहोवा को भावता है, तब वह उसके शत्रुओं का भी उस से मेल कराता है।"


जब याक़ूब को एसाव के दृष्टिकोण का पता चलता है, जैसा कि वचन 1 में वर्णित है, "याक़ूब ने आँख उठाकर देखा और वहाँ एसाव था” तो यह याक़ूब के लिए एक प्रतीकात्मक अर्थ हो सकता है, अर्थात् "आँख उठाकर देखा"। संभवतः उसकी आँखें ऊपर उठाना उसके हर्ष और आत्म-विश्‍वास को दर्शाता है, एक निराश मुख के विरोध में; प्रार्थना द्वारा परमेश्‍वर को अपना विषय सौंपने के बाद, वह अपना मुँह ऊपर उठाते हुए अपने मार्ग पर चला था। जब हन्ना ने महसूस किया कि उसकी प्रार्थना सुन ली गई है, तो 1 शमूएल 1:18 में लिखा है, "उसने कहा, “तेरी दासी तेरी दृष्‍टि में अनुग्रह पाए।” तब वह स्त्री चली गई और खाना खाया, और उसका मुँह फिर उदास न रहा।" जिस किसी ने भी अपनी चिंता परमेश्‍वर पर डाल दी है, वह उसके सामने संतोष और मन की शांति के साथ देख सकता है, आत्म-विश्‍वास से, यदि आनन्द से नहीं, तो यह आशा करते हुए कि जो कुछ भी हो सकता है, या जो कुछ भी होगा, वह परमेश्‍वर पर भरोसा करने वाले व्यक्ति के लिए कुछ भी गलत नहीं हो सकता है। याक़ूब ने ऊपर देखा। जैसे याक़ूब ने किया, चलिए प्रार्थना करते हैं, फिर ऊपर की ओर देखते हैं। 


याक़ूब ने एसाव का स्वागत करने के लिए अपने परिवार को सबसे अच्छे क्रम में व्यवस्थित किया, चाहे वह एक मित्र के रूप में आए या शत्रु के रूप में आए। इन दोनों भाइयों के समूहों का रूप बहुत ज्यादा अलग था। एसाव को 400 पुरुषों योद्धाओं के साथ देखा गया है, और वह बड़ा दिखता है, जबकि याक़ूब के पीछे असहाय स्त्रियों और सन्तान की एक बोझिल कारवाँ भरा चला आता है, जिसके वह देखभाल करता था, क्योंकि वह उनकी सुरक्षा के लिए चिंता करता है। फिर भी याक़ूब के पास पहिलौठे होने का अधिकार था, और उसके पास प्रभुत्व होना चाहिए था, और वह हर तरह से सर्वोतम व्यक्ति था। अपने परिवार और पारिवारिक विषयों में व्यक्तिगत उपस्थिति देना बड़े और भले लोगों के लिए कोई विरोधाभास या तुच्छता की बात नहीं है। याक़ूब ने अपने घराने के मुखिया के रूप में एसाव की तुलना में अपनी छोटी सेना के मुखिया के रूप में एक सर्वोतम उदाहरण स्थापित किया।


उनकी मुलाकात में, दयालुता की अभिव्यक्तियों का आश्‍चर्यजनक रूप से अच्छे तरीके से आदान-प्रदान किया गया है। याक़ूब ने एसाव को झुक कर दण्डवत् की, क्योंकि वचन तीन में कहा गया है, "और आप उन सब के आगे बढ़ा और सात बार भूमि पर गिर के दण्डवत् की, और अपने भाई के पास पहुँचा।" हालाँकि वह एसाव से एक शत्रु के रूप में डरता था, फिर भी वह एक बड़े भाई के रूप में उसके सामने शायद यह जानते हुए और स्मरण करते हुए झुक गया कि जब हाबिल की भेंट को उसके बड़े भाई कैन से पहले प्राथमिकता दी गई थी, फिर भी परमेश्‍वर के पास कैन के लिए अच्छे निर्देश थे, क्योंकि परमेश्‍वर ने उसकी भी देखभाल की थी। "इस कारण यहोवा ने उस से कहा, “जो कोई कैन को घात करेगा उस से सात गुणा बदला लिया जाएगा।” और यहोवा ने कैन के लिये एक चिह्न ठहराया ऐसा न हो कि कोई उसे पाकर मार डाले" (उत्पत्ति 4:15)। ये शब्द, कुछ हद तक, एसाव पर भी लागू हो सकते हैं। जहाँ शांति टूटी है, वहाँ उसे फिर से प्राप्त करने का तरीका अपना कर्तव्य निभाना, और लगातार सम्मान देना है, जैसे कि यह कभी नहीं टूटा था। यह उन घटनाओं को स्मरण रखना और दोहराना है, जो मित्रों को अलग करती हैं और अलगाव को स्थिर बनाए रखती हैं। एक विनम्रता भरी मनोवृत्ति क्रोध को दूर करने की दिशा में एक लंबा मार्ग तय करती है। कई लोग स्वयं को विनम्र करके बचा लेते हैंः तीर उसके ऊपर से उड़ कर निकल जाता है।


जब याक़ूब ने अपने डर से प्रेरित होकर पिछली रात प्रार्थना की थी, तो क्या वह कल्पना कर सकता था कि परमेश्‍वर उसकी प्रार्थना का इतना अद्भुत उत्तर देगा? एसाव क्रोध में नहीं, बल्कि प्रेम में याक़ूब से मिलने के लिए दौड़ा; और, जैसे कि किसी ने उसके साथ मन से सुलह की, उसने उसे सभी कल्पनाओं के साथ प्राप्त किया, उसे गले लगाया, उसके कंधों पर झुक गया, और उसे चूमा। याक़ूब विवेक और धैर्य वाला व्यक्ति था, और हम यह नहीं मान सकते कि उसे एक आधारहीन भय था; वह डर गया था, क्योंकि वहाँ एक वास्तविक खतरा था। ध्यान दीजिए कि यदि परमेश्‍वर के आत्मा ने उसे ऐसी प्रार्थना करने के लिए प्रेरित नहीं किया होता, जैसा कि उसने छुटकारे के लिए की थी, यदि खतरा केवल काल्पनिक होता। हालाँकि यह सच है कि हम कल्पना कर सकते हैं कि वास्तव में होने वाली चीजों की तुलना में हम ज्यादा चीजों से डर सकते हैं, परन्तु यह भी सच है कि परमेश्‍वर बचाता है। यदि भय का कारण वास्तविक है, तो सर्वोतम होगा कि प्रार्थना की जाए। यदि एसाव की आत्मा में वास्तव में कोई अद्भुत परिवर्तन नहीं हुआ था, तो याक़ूब के मल्लयुद्ध को मनुष्यों के साथ इतनी शक्ति प्राप्त करने के लिए कैसे कहा जा सकता है, जिसमें परमेश्‍वर ने उसे प्रधान कहा था? परमेश्‍वर के हाथों में सभी मनुष्यों के मन हैं, और एक गुप्त, मौन, परन्तु प्रतिरोध न करने वाली शक्ति द्वारा उन्हें जब और जैसे चाहें वह बदल सकता है। परमेश्‍वर पर भरोसा करना और मुसीबत के दिन उसे पुकारना व्यर्थ नहीं है। जो कोई भी ऐसा करता है, वह अक्सर पाता है कि स्थिति उनकी अपेक्षा से बहुत ज्यादा सर्वोतम हो जाती है।


जब वे बीस वर्ष के अलगाव के बाद मिले, तो याक़ूब और एसाव दोनों रोए। हम मान सकते हैं कि यह दोनों के लिए एक भावनात्मक अनुभव था। उनमें से प्रत्येक ने अलग-अलग भावनाओं को महसूस किया, परन्तु फिर भी दोनों के पास गहरी भावनाएँ थीं, जिन्हें शब्दों में नहीं, बल्कि रोने के साथ व्यक्त किया जा सकता था। राहत, आनन्द, छुटकारा, सुख, शर्म, दुःख, बचपन के अनुभवों को स्मरण करना - ये सभी भावनात्मक मिश्रण का हिस्सा हो सकते थे।


इसके बाद हम दोनों भाइयों के बीच बातचीत को देखते हैं, जो पुराने झगड़े के संदर्भ के बिना स्वतंत्र और मैत्रीपूर्ण प्रतीत होती है। इसके बारे में कुछ न कहना ही सर्वोतम था। वे याक़ूब के साथ लोगों और जानवरों के समूह पर चर्चा करते हैं। वचन 5-7 कहता है, "तब उसने आँखें उठाकर स्त्रियों और बच्‍चों को देखा, और पूछा, “ये जो तेरे साथ हैं वे कौन हैं?” उसने कहा, “ये तेरे दास के लड़के हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने अनुग्रह करके मुझ को दिया है।” तब लड़कों समेत दासियों ने निकट आकर दण्डवत् किया; फिर लड़कों समेत लिआ: निकट आई और उन्होंने भी दण्डवत् किया; अन्त में यूसुफ और राहेल ने भी निकट आकर दण्डवत् किया।"


याक़ूब ने उसे अपनी संपत्ति में वृद्धि का विवरण भेजा था, परन्तु उसने अपने सन्तान का कोई उल्लेख नहीं किया था; शायद इसलिए कि वह एसाव के क्रोध के लिए उन्हें उजागर नहीं करना चाहता था, यदि एसाव उसे एक शत्रु के रूप में मिले, या यदि वह उससे एक मित्र के रूप में मिले, तो अप्रत्याशित दृश्य से उसे आनन्दित करेगा। इसलिये एसाव के पास यह पूछने का कारण था, "ये तेरे साथ कौन हैं? याक़ूब बस इतना कह सकता था, "वे मेरी सन्तान है” परन्तु मित्रता से भरे हुए होने और परमेश्‍वर को सम्मान देने के प्रयास में वह एक पूर्ण उत्तर देता है। "ये तेरे दास के लड़के हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने अनुग्रह करके मुझ को दिया है।" याक़ूब अपने उत्तर का उपयोग स्वयं को एसाव का सेवक कहकर एसाव का सम्मान करने के लिए करता है और यह स्वीकार करके परमेश्‍वर का सम्मान करता है कि परमेश्‍वर ने उसे उन ग्यारह बच्चों को दिया था, जिन्हें एसाव अब देख सकता था। याक़ूब का अनुभव निश्‍चित रूप से भजन संहिता 107:41 के उस व्यक्ति के वर्णन से मेल खाता है, जिस पर परमेश्‍वर की कृपा है, "वह दरिद्रों को दु:ख से छुड़ाकर ऊँचे पर रखता है, और उनको भेड़ों के झुण्ड सा परिवार देता है।" मुझे इसमें दो सबक दिखाई देते हैं। 1, कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि सन्तान प्रभु की ओर से एक बड़ा आशीर्वाद हैं और 2. कि हमारे लगभग जो भी बातचीत का विषय होता है, उसमें हम प्रभु को सम्मान देने की कोशिश कर सकते हैं।

इसके बाद वे उन उपहारों पर चर्चा करते हैं, जो याक़ूब ने प्रस्तुत किए थे और अपने आगे उसके लिए भेजे थे। एसाव ने विनम्रता से इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उसके पास पर्याप्त था, और उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी, यह कहते हुए कि "हे मेरे भाई, मेरे पास तो बहुत है; जो कुछ तेरा है वह तेरा ही रहे" (वचन 9)। उसका कारण यह है कि मेरे पास पर्याप्त है, मेरे पास इतना है (इसलिए यहाँ शब्द 'बहुत' का उपयोग हुआ है) कि वह अपने भाई की किसी भी चीज को लेने को तैयार नहीं था। एसाव के पास वह था, जिसका उसे प्रतिज्ञा की गई थी, पृथ्वी पर उपजाऊ भूमि से दूरी और उसकी तलवार के बल से प्राप्त आजीविका। यह उन लोगों के लिए एक अच्छी बात है, जिनके पास यह जानने के लिए बहुत कुछ है कि उनके पास पर्याप्त है, हालाँकि उनके पास उतना नहीं होता है, जितना कुछ अन्य लोगों के पास होता है। यहाँ तक कि एसाव भी कह सकता था, मेरे पास पर्याप्त है। जो लोग अपने पास जो है, उससे संतुष्ट हैं, उन्हें दूसरों के पास जो है, उसका लालच न करके इसे दिखाना चाहिए। एसाव ने याक़ूब से अपने पास जो कुछ था, उसे अपने पास यह मानते हुए रखने के लिए कहा कि उसे इसकी अधिक आवश्यकता थी। एसाव को, उसकी ओर से, इसकी आवश्यकता नहीं है, या तो उसे आपूर्ति करने के लिए, क्योंकि वह धनी था, या उसे शांत करने के लिए, क्योंकि वह पहले से ही सुलह कर चुका था। हम नहीं चाहते कि हमारा लोभ दूसरों के शिष्टाचार और उदारता का अनावश्यक लाभ उठाए।


याक़ूब ने वचन 10 और 11 में एसाव से प्रेम से उपहार स्वीकार करने का आग्रह किया, और कहा, ''नहीं नहीं, यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो, तो मेरी भेंट ग्रहण कर; क्योंकि मैं ने तेरा दर्शन पाकर, मानो परमेश्‍वर का दर्शन पाया है, और तू मुझ से प्रसन्न हुआ है। इसलिये यह भेंट जो तुझे भेजी गई है, ग्रहण कर; क्योंकि परमेश्‍वर ने मुझ पर अनुग्रह किया है, और मेरे पास बहुत है।” जब उसने उससे बहुत आग्रह किया, तब उसने भेंट को ग्रहण किया।'' याक़ूब ने इसे डर के कारण आगे भेजा था, परन्तु, अब डर खत्म होने के बाद, वह एसाव से इसे प्रेम के कारण स्वीकार करने का आग्रह यह दिखाने के लिए करता है, कि वह अपने भाई की मित्रता चाहता था, और उसके गुस्से से डरता नहीं है। वह एसाव की कृपा से आनन्दित था, परन्तु उसका क्या मतलब था, जब उसने कहा कि यह परमेश्‍वर का मुँह देखने जैसा था? पनीएल में याक़ूब ने परमेश्‍वर का मुँह देखा था और अब परमेश्‍वर ने उसकी गंभीर और हताश प्रार्थना के लिए जो उत्तर दिया, उसे देखकर, यह परमेश्‍वर के मुँह या परमेश्‍वर के रूप को देखने जैसा था, अर्थात, परमेश्‍वर का चेहरा देखना। इस अभिव्यक्ति की अन्य व्याख्याएँ संभव हैं, परन्तु मैं इसका समर्थन करता हूँ। मानवीय आवश्यकताएँ वास्तव में हमारे लिए सांत्वना होती हैं, जब उन्हें प्रार्थना के उत्तर के रूप में दिया जाता है, और परमेश्‍वर के साथ हमारी स्वीकृति के संकेत होते हैं। यह उन लोगों के लिए बहुत आनन्द की बात है, जो शांतिपूर्ण और स्नेही स्वभाव के होते हैं, उन संबंधों की मित्रता को पुनर्प्राप्त करने के लिए, जिनके साथ वे भिन्न रहे हैं। याक़ूब के पास भी पर्याप्त था, केवल इब्रानी शब्द 'बहुत' ही अधिक दृढ़ता से बताया गया है। एसाव के लिए "बहुत" अनुवाद किया है, जबकि "याक़ूब के पास" वह सब था, जो उसे चाहिए था।" यदि इस संसार में हमारे पास जो कुछ है, वह बढ़ता है, तो हमें इसे कृतज्ञता के साथ, परमेश्‍वर की महिमा के लिए ध्यान में रखना चाहिए, और यह स्वीकार करना चाहिए कि उसने हमारे साथ दयालुता से व्यवहार किया है, जो हमारी योग्यता से सर्वोतम है। एसाव के पास बहुत था, परन्तु याक़ूब पर्याप्त था। एक धार्मिक व्यक्ति, हालाँकि उसके पास संसार में बहुत कम होता है, फिर भी वह वास्तव में कह सकता है, "मेरे पास सब कुछ है।" जिसके पास सभी का परमेश्‍वर है, उसके पास सब कुछ है; यदि आपके पास परमेश्‍वर है, तो सब कुछ आपका है। जिसके पास बहुत कुछ है, वह सामान्य तौर पर अधिक चाहता है; परन्तु जो समझता है कि उसके पास सब कुछ है, उसे निश्‍चय है कि उसके पास पर्याप्त है। उसके पास सब कुछ संभावना में है; उसके पास जल्द ही सब कुछ होगा, जब वह स्वर्ग में आएगा। इस सिद्धान्त पर याक़ूब ने एसाव से आग्रह किया, और उसने उसकी भेंट को ले लिया। यह एक बहुत अच्छी बात है, जब लोगों का धर्म उन्हें उदार, स्वतंत्र मन और खुले हाथों से सस्ते और भ्रामक काम करने के लिए तिरस्कार करने के लिए प्रेरित करता है।


दोनों भाई अपनी यात्रा की प्रगति के बारे में भी बात करते हैं, क्योंकि एसाव स्वयं को उसका मार्गदर्शक और साथी बनने की प्रस्ताव करता है, जैसा कि वचन 12 में वर्णित है, "फिर एसाव ने कहा, “आ, हम बढ़ चलें; और मैं तेरे आगे आगे चलूँगा।" हम कभी नहीं पाते कि याक़ूब और एसाव एक-दूसरे के साथ इतने मिलनसार और इतने स्नेही थे, जितना कि वे अब थे। परमेश्‍वर का कार्य पूर्ण है। उसने एसाव को न केवल एक शत्रु, बल्कि एक मित्र भी बनाया। एसाव को अचानक याक़ूब की संगति पसन्द आ गई और वह उसे सेईर पर्वत पर आमंत्रित करता है। फिर भी याक़ूब ने विनम्रता से इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वह अपने परिवार और झुंडों के लिए एक अच्छे चरवाहे और एक अच्छे पिता की तरह कोमल चिंता दिखाता है। उसे सन्तान और छोटे झुंडों के बारे में सोचना चाहिए, और एक का नेतृत्व नहीं करना चाहिए, न ही दूसरे को बहुत तेजी से चलाना चाहिए। याक़ूब की इस समझदारी और कोमलता का अनुकरण हम में से उन लोगों को करना चाहिए, जो परमेश्‍वर की बातों में युवाओं की देखभाल और जिम्मेदारी रखते हैं। आरम्भ में, उन्हें धार्मिक सेवाओं में भारी कार्यों से अत्याधिक प्रेरित नहीं होना चाहिए, बल्कि नेतृत्व करना चाहिए, जितना कि वे सहन कर सकते हैं, अपने काम को जितना संभव हो उतना आसान और अपने लिए उपयुक्त बनाना चाहिए।

याक़ूब नहीं चाहता कि एसाव अनावश्यक रूप से अपनी गति को धीमा कर दे। दूसरों को अपनी गति से बाँधना अनुचित है; हम विश्राम के साथ, अंत में, उसी यात्रा के अंत तक आ सकते हैं। हम में से प्रत्येक की अपनी चाह योग्य और उपयुक्त गति है। हम दूसरों के साथ नहीं चल सकते हैं, न ही उनके साथ आगे बढ़ सकते हैं। याक़ूब उसे सूचित करता है कि सेईर पर्वत पर उसके पास आना उसकी वर्तमान की योजना थी; और हम मान सकते हैं कि अंततः उसने ऐसा किया, जब उसने अपने परिवार और सरोकारों को कहीं और बसने दिया, हालाँकि उस यात्रा को वर्णित नहीं किया गया है।


एसाव शायद याक़ूब की तुलना में भव्यता के बारे में अधिक चिन्तित था। वह सेईर के मार्ग में याक़ूब के समूह की रक्षा करने के लिए योद्धा पुरुषों का प्रस्ताव देता है, परन्तु याक़ूब परमेश्‍वर की सुरक्षा से संतुष्ट है, जैसा कि बाद में एज्रा था। यह एज्रा 8:22 में लिखा गया है। "क्योंकि मैं मार्ग के शत्रुओं से बचने के लिये सिपाहियों का दल और सवार राजा से माँगने से लजाता था, क्योंकि हम राजा से यह कह चुके थे, “हमारा परमेश्‍वर अपने सब खोजियों पर, भलाई के लिये कृपादृष्‍टि रखता है और जो उसे त्याग देते हैं, उसका बल और कोप उनके विरुद्ध है।" परमेश्‍वर ने याक़ूब और बाद में एज्रा के समूहों की रक्षा की। याक़ूब शकेम में सुरक्षित पहुँच गया और संभवतः एज्रा, जो इसके बारे में जानता था, कुस्रू की सुरक्षा के बजाय परमेश्‍वर की सुरक्षा पर भरोसा करता था। एज्रा भी सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य यरूशलेम पहुँच गया। परमेश्‍वर यात्रियों की रक्षा करता है। कोई भी पर्याप्त रूप से संरक्षित है, जिसकी सुरक्षा के लिए परमेश्‍वर है और याक़ूब की तरह वह परमेश्‍वर की सेनाओं के अधीन है।


याक़ूब एसाव से मैत्रीपूर्ण तरीके से अलग होने के बाद सुक्कोत आता है, जो वचन 16 में वर्णित अपने देश चला गया था। "तब एसाव ने उसी दिन सेईर जाने को अपना मार्ग लिया।" याक़ूब एक ऐसे स्थान पर पहुँचता है, जहाँ, ऐसा लगता है, वह कुछ समय के लिए विश्राम करता है, अपने मवेशियों के लिए झोपड़ियों को बनाता है, और अपने और परिवार के लिए अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करता है। बाद में इस स्थान को सुक्कोत के नाम से जाना जाता था, जो कि यरदन के दूसरी ओर गाद के गोत्र का एक शहर था। सुक्कोत का अर्थ झोंपड़ियाँ या तम्बू है। अपने दादा, अब्राहम के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, हालाँकि उसके पास भी पूरी भूमि की प्रतिज्ञा है, फिर भी वह एक खेत खरीदता है। भूमि पर दावा करने का अभी परमेश्‍वर का समय नहीं था। वह एक खेत खरीदता है, जैसा कि वचन 19 में वर्णित है, "और भूमि के जिस खण्ड पर उसने अपना तम्बू खड़ा किया, उसको उसने शकेम के पिता हमोर के पुत्रों के हाथ से एक सौ कसीतों में मोल लिया।" एक अन्य तरीके से अब्राहम के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, अब याक़ूब एक वेदी बनाता है, "वहाँ उसने एक वेदी बनाकर उसका नाम एल–एलोहे–इस्राएल रखा।" जहाँ हमारे पास एक तम्बू है, वहाँ परमेश्‍वर के लिए एक वेदी होनी चाहिए। उसने इस वेदी को एल-एलोहे-इस्राएल के सम्मान के लिए समर्पित किया - परमेश्‍वर, इस्राएल के परमेश्‍वर, परमेश्‍वर के सम्मान के लिए, सामान्य रूप से, एकमात्र जीवित और सच्चे परमेश्‍वर, सबसे अच्छे जन और सबसे पहले कारण के लिए; और इस्राएल के परमेश्‍वर के सम्मान के लिए, उसके साथ वाचा में एक परमेश्‍वर के रूप में। परमेश्‍वर ने हाल ही में उसे इस्राएल के नाम से बुलाया था, और अब वह परमेश्‍वर को इस्राएल का परमेश्‍वर कहता है; हालाँकि उसे परमेश्‍वर के साथ एक राजकुमार माना जाता है, फिर भी परमेश्‍वर उसके साथ एक राजकुमार होगा, वह उसका प्रभु और उसका परमेश्‍वर होगा।


आप एक मसीही अगुवे हैं और आपके पास वही परमेश्‍वर हैं, जो आपकी रक्षा और मार्गदर्शन करता है, जैसे याक़ूब ने किया था। मार्ग भले ही आसान न हो, परन्तु परमेश्‍वर आपको दृढ़ करने वाले हैं। आप परमेश्‍वर के साथ प्रबल हो सकते हैं और वह आपको लोगों के साथ प्रबल होने में सक्षम बनाएगा।