पिलानेहारा
अध्याय पचास
उत्पत्ति 39:19-40:19

Ron Meyers
39:19अपनी पत्नी की ये बातें सुनकर कि तेरे दास ने मुझ से ऐसा ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का। 20और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया; अत: वह उस बन्दीगृह में रहा। 21पर यहोवा यूसुफ के संग संग रहा और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दारोगा के अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई। 22इसलिये बन्दीगृह के दारोगा ने उन सब बन्दियों को, जो कारागार में थे, यूसुफ के हाथ में सौंप दिया; और जो जो काम वे वहाँ करते थे, वह उसी की आज्ञा से होता था। 23यूसुफ के वश में जो कुछ था उसमें से बन्दीगृह के दारोगा को कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती थी; क्योंकि यहोवा यूसुफ के साथ था; और जो कुछ वह करता था, यहोवा उसको उसमें सफलता देता था।
40:1इन बातों के पश्चात् ऐसा हुआ, कि मिस्र के राजा के पिलानेहारे और पकानेहारे ने अपने स्वामी के विरुद्ध कुछ अपराध किया। 2तब फ़िरौन ने अपने उन दोनों हाकिमों, अर्थात् पिलानेहारों के प्रधान, और पकानेहारों के प्रधान, पर क्रोधित होकर 3उन्हें कैद कराके अंगरक्षकों के प्रधान के घर के उसी बन्दीगृह में, जहाँ यूसुफ बन्दी था, डलवा दिया। 4तब अंगरक्षकों के प्रधान ने उनको यूसुफ के हाथ सौंपा, और वह उनकी सेवा–टहल करने लगा; अत: वे कुछ दिन तक बन्दीगृह में रहे। 5मिस्र के राजा का पिलानेहारा और पकानेहारा, बन्दीगृह में बन्द थे, उन दोनों ने एक ही रात में, अपने अपने होनहार के अनुसार स्वप्न देखा। 6सबेरे जब यूसुफ उनके पास अन्दर गया, तब उन पर उसने जो दृष्टि की तो क्या देखता है कि वे उदास हैं। 7इसलिये उसने फ़िरौन के उन हाकिमों से, जो उसके साथ उसके स्वामी के घर के बन्दीगृह में थे, पूछा, “आज तुम्हारे मुँह क्यों उदास हैं?” 8उन्होंने उससे कहा, “हम दोनों ने स्वप्न देखा है, और उनके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं।” यूसुफ ने उनसे कहा, “क्या स्वप्नों का फल कहना परमेश्वर का काम नहीं है? मुझे अपना अपना स्वप्न बताओ।” 9तब पिलानेहारों का प्रधान अपना स्वप्न यूसुफ को यों बताने लगा : “मैं ने स्वप्न में देखा कि मेरे सामने एक दाखलता है; 10और उस दाखलता में तीन डालियाँ हैं; और उसमें मानो कलियाँ लगीं हैं, और वे फूलीं और उसके गुच्छों में दाख लगकर पक गई। 11फ़िरौन का कटोरा मेरे हाथ में था; और मैं ने उन दाखों को लेकर फ़िरौन के कटोरे में निचोड़ा, और कटोरे को फ़िरौन के हाथ में दिया।” 12तब यूसुफ ने उससे कहा, “इसका फल यह है : तीन डालियों का अर्थ तीन दिन हैं; 13इसलिये अब से तीन दिन के भीतर फ़िरौन तेरा सिर ऊँचा करेगा, और फिर से तेरे पद पर तुझे नियुक्त करेगा, और तू पहले के समान फ़िरौन का पिलानेहारा होकर उसका कटोरा उसके हाथ में फिर दिया करेगा। 14अत: जब तेरा भला हो जाए तब मुझे स्मरण करना, और मुझ पर कृपा करके फ़िरौन से मेरी चर्चा चलाना, और इस घर से मुझे छुड़वा देना। 15क्योंकि सचमुच इब्रानियों के देश से मुझे चुरा कर लाया गया है; और यहाँ भी मैं ने कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके कारण मैं इस कारागार में डाला जाऊँ।”16यह देखकर कि उसके स्वप्न का फल अच्छा निकला, पकानेहारों के प्रधान ने यूसुफ से कहा, “मैं ने भी स्वप्न देखा है, वह यह है : मैं ने देखा कि मेरे सिर पर सफेद रोटी की तीन टोकरियाँ हैं; 17और ऊपर की टोकरी में फ़िरौन के लिये सब प्रकार की पकी पकाई वस्तुएँ हैं; और पक्षी मेरे सिर पर की टोकरी में से उन वस्तुओं को खा रहे हैं।” 18यूसुफ ने कहा, “इसका फल यह है : तीन टोकरियों का अर्थ तीन दिन है। 19अब से तीन दिन के भीतर फ़िरौन तेरा सिर कटवाकर तुझे एक वृक्ष पर टंगवा देगा, और पक्षी तेरे मांस को नोच नोच कर खाएँगे।”
परमेश्वर ने यूसुफ की रक्षा की और उसे बन्दीगृह में और अधिक सफलता दी। इस धटना में यह नहीं कहा गया है कि पोतीपर यूसुफ से गुस्से में था, बस इतना कि वह गुस्से में था। पोतीपर अपनी पत्नी के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के स्वभाव को अच्छी तरह से जानता होगा। वह अपनी पत्नी के नैतिक स्तर को जानता था और यूसुफ के उच्च नैतिक चरित्र से भी अवगत था। यदि पोतीपर को विश्वास होता कि यूसुफ उसकी पत्नी के लगाए आरोप का दोषी था, तो वह यूसुफ को मार डालता। चूँकि पोतीपर ने केवल यूसुफ को बन्दीगृह में डाला था, इसलिए हम अनुमान लगा सकते हैं कि पोतीपर जानता था कि यूसुफ निर्दोष था। यूसुफ की प्रतिष्ठा उसके लिए पहले से ही काम कर रही थी। शायद बन्दीगृह की सलाखों का उद्देश्य यूसुफ को अंदर रखना नहीं था, बल्कि पोतीपर की पत्नी को बाहर रखना था। नैतिकता के लिए यूसुफ की प्रतिष्ठा ने उसे बचा लिया। मसीह की देह में प्रभाव रखने वाले एक मसीही के रूप में, आप भी आरोपों का अनुभव करेंगे। आपका सबसे अच्छा बचाव पवित्रता, शिष्टाचार, नैतिक व्यवहार, विश्वसनीयता और ईमानदारी में है। जैसे यूसुफ ने किया, इसलिए स्वयं को पहले से ही इनके साथ लैस करें।
यूसुफ ने आगे भी वृद्धि की और बन्दीगृह में दूसरों की सेवा भी की। हम सोच सकते हैं कि यूसुफ पहले से ही बहुत ज्यादा सहन कर चुका था, पर्याप्त रूप से परखा जा चुका था, और स्वयं को सच प्रमाणित कर चुका था। परन्तु परमेश्वर ने उसे विकसित करना समाप्त नहीं किया था। जब उसके साथी कैदियों ने अपने स्वप्नों की व्याख्या माँगी, तो यूसुफ उन्हें आसानी से उत्तर दे सकता था, "हाँ! तुम स्वप्न देखते हो। उनका कोई मतलब नहीं होता है। "परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। यूसुफ जानता था कि स्वप्नों के अर्थ हो सकते हैं, और उसने उनके लिए उनके स्वप्नों की व्याख्या की।
यूसुफ पर उसके स्वामी ने अन्याय किया था, जिसने शायद इस आरोप पर विश्वास नहीं किया होगा, परन्तु उसे उसकी पत्नी "की इज्जत बचाने" के लिए कुछ तो करना पड़ता। यूसुफ ने सच कहने की हिम्मत नहीं की, क्योंकि यह उसकी मालकिन पर बहुत अधिक बुरा प्रभाव डालेगा, इसलिए उसे स्वयं के बचावे के लिए कोई उपाय नहीं मिलता है। यूसुफ को स्थायी बन्दीगृह की दण्ड सुनाई जाता है, "और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया; अत: वह उस बन्दीगृह में रहा" (वचन 20)। परमेश्वर ने पोतीपर के क्रोध को रोक दिया, नहीं तो वह उसे मार देता; और वह क्रोध जिसने उसे कैद कर लिया, उसे तो परमेश्वर ने अपनी महिमा लाने के लिए रचा गया था। परमेश्वर ने इसकी व्यवस्था की, ताकि यूसुफ को राजा के कैदियों, राज्य-कैदियों के बीच अंतर करते हुए बंद किया जाए। भजन संहिता 105:18 कहता है, "लोगों ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डालकर उसे दु:ख दिया; वह लोहे की साँकलों से जकड़ा गया।" यह यूसुफ का अनुभव हो सकता है या नहीं भी हो सकता है, परन्तु हम जानते हैं कि अगला वाक्य क्या कहता है, "अत: वह उस बन्दीगृह में रहा। पर यहोवा यूसुफ के संग संग रहा" (वचन 20, 21)। परमेश्वर ने उसके आगे बढ़ने के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए निर्माण कार्य को किया। वह राजा की बन्दीगृह में रहने के लिए प्रतिबद्ध था, ताकि उसे वहाँ से अंततः स्वयं राजा के पास भेजा जा सके। अन्यायपूर्ण बन्दीगृह की कई कार्यवाहियाँ, उस बड़े दिन में, परमेश्वर के लोगों के शत्रुओं और सताने वालों के विरुद्ध गवाही देंगी। हमारा प्रभु यीशु भी, यहाँ यूसुफ की तरह, बंधे हुआ था, और अपराधियों के साथ पहचाना गया था।
यूसुफ को उसके परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया गया था और उसे धर्मी ठहराया गया था, जो सभी सताए गए निर्दोष लोगों के लिए धर्मी और सामर्थी मित्र और प्रभावी समर्थक है और होगा। यूसुफ अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों से दूर था, और उसे सांत्वना देने, उसकी सेवा करने या उसके लिए मध्यस्थता करने के लिए कोई भी उसके साथ नहीं था। परन्तु यहोवा यूसुफ के साथ रहा और उस पर दया की। देखें कि वचन 21 क्या कहता है, "...पर यहोवा यूसुफ के संग संग रहा और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दारोगा के अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई।" भजन संहिता 69:33 कहता है, "क्योंकि यहोवा दरिद्रों की ओर कान लगाता, और अपने लोगों को जो बन्दी हैं तुच्छ नहीं जानता।" कोई भी द्वार या फाटक उसके लोगों से परमेश्वर की दयालुता भरी उपस्थिति को रोक नहीं कर सकता है। वह अपनी प्रतिज्ञा निभाता है कि वह उसे कभी नहीं छोड़ेगा। यदि बन्दीगृह में आपका विवेक अच्छा है, तो आपके पास एक अच्छा परमेश्वर भी है। हम जहाँ कहीं भी हों, ईमानदारी और धार्मिकता हमें ईश्वरीय अनुग्रह के लिए योग्य बनाती है।
यूसुफ लंबे समय तक कैदी नहीं रहता है, जब तक कि वह बन्दीगृह में भी एक छोटा शासक नहीं बन जाता। ऐसा दारोगा के उसके पक्ष में आने के कारण है। परमेश्वर ने बन्दीगृह के रखवाले की दृष्टि में उस पर अनुग्रह किया। परमेश्वर अपने लोगों के लिए मित्र बना सकता है, तब भी जब और जहाँ वे उसे खोजने की बहुत कम आशा करते हैं, और उन्हें उन लोगों से भी उचित करुणा प्राप्त करने में सहायता कर सकता है, जो उन्हें बंदी बना देते हैं। भजन संहिता 106:46 में लिखा है, "और जो उन्हें बन्दी बना कर ले गए थे उन सबसे उन पर दया कराई।"
इसके पीछे यूसुफ की व्यावसायिक कुशाग्रता भी एक कारक रही थी। बन्दीगृह के दारोगा अर्थात् रखवाले ने देखा कि परमेश्वर उसके साथ है, और उसके हाथ के अधीन सब कुछ समृद्ध होता है; और इसलिए उसे बन्दीगृह के विषयों का प्रबंधन सौंपा गया। जब हम वचन 22 और 23 पढ़ते हैं, तो पोतीपर और बन्दीगृह के रखवाले के विचारों के बीच समानता पर ध्यान दें, "इसलिये बन्दीगृह के दारोगा ने उन सब बन्दियों को, जो कारागार में थे, यूसुफ के हाथ में सौंप दिया; और जो जो काम वे वहाँ करते थे, वह उसी की आज्ञा से होता था। यूसुफ के वश में जो कुछ था उसमें से बन्दीगृह के दारोगा को कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती थी; क्योंकि यहोवा यूसुफ के साथ था; और जो कुछ वह करता था, यहोवा उसको उसमें सफलता देता था।" बुद्धि और भले काम सबसे संकीर्ण स्थानों पर चमक सकते हैं। एक भला व्यक्ति जहाँ भी होगा, वह भला ही करेगा, और बंधनों और निर्वासन में भी वह दूसरों के लिए एक आशीर्वाद होगा। प्रभु यहोवा का आत्मा बाध्य नहीं है और न ही निर्वासित है, जैसा कि हम पौलुस के अनुभव में भी देखते हैं, जिसका संकेत फिलिप्पियों 1:12 और 13 में दिया गया है। "हे भाइयो, मैं चाहता हूँ कि तुम यह जान लो कि मुझ पर जो बीता है, उससे सुसमाचार ही की बढ़ती हुई है। यहाँ तक कि कैसर के राजभवन की सारी पलटन और शेष सब लोगों में यह प्रगट हो गया है कि मैं मसीह के लिये कैद हूँ।"
कहानी का अगला भाग वहाँ नहीं होता सिवाय इसके कि परमेश्वर यूसुफ की कोठरी के साथियों के चुनने के द्वारा काम कर रहा था। फ़िरौन का पिलानेहारा और पकानेहारा भी वहीं थे। फ़िरौन के दरबार के ये दो अधिकारी, राजा को क्रोधित करने के बाद, उसी समय बन्दीगृह में बंद हैं, जब यूसुफ वहाँ है। ऊँचे स्थान फिसलन भरे स्थान होते हैं, जिसमें प्रधानों का पक्ष सामान्य तौर पर स्थायी होने की बात नहीं होती है। जो परमेश्वर की कृपा को अपना सुख बनाते हैं, और उसकी सेवा को अपना उद्यम बनाते हैं, वे उन्हें फ़िरौन से सर्वोतम स्वामी पाएँगे। परमेश्वर इतना अधिक उग्र नहीं हैं कि वह उत्सुकता से यह जानने की कोशिश करें कि वे क्या गलत करते हैं। हमें फ़िरौन के इन सेवकों के दण्ड के स्वभाव के बारे में नहीं बताया गया है। हो सकता है कि उन्होंने उसके प्राण लेने लिए एक गंभीर प्रयास किया होगा, या शायद यह फ़िरौन के प्याले में केवल एक मक्खी या उसकी रोटी के लिए रेत का एक दाना मिला होगा। जो कुछ भी था, परमेश्वर ने उन्हें उस बन्दीगृह में लाने के लिए इस साधन का उपयोग किया, जहाँ यूसुफ था। बात बस इतनी ही है। जो कुछ भी था, परमेश्वर ने उसका उपयोग किया।
स्वयं अंगरक्षकों के प्रधान ने, जो कि पोतीपर था, ने यूसुफ को इन दो लोगों की जिम्मेदारी सौंपी। "तब अंगरक्षकों के प्रधान ने उनको यूसुफ के हाथ सौंपा, और वह उनकी सेवा–टहल करने लगा; अत: वे कुछ दिन तक बन्दीगृह में रहे" (वचन 4)। इससे पता चलता है कि पोतीपर अब यूसुफ के साथ सुलह करने लगा, और शायद अपने निर्दोष होने के बारे में आश्वस्त होने के लिए, हालाँकि उसने अपनी पत्नी के साथ समस्या पैदा करने के डर से उसे छोड़ने की हिम्मत नहीं की। हेरोदियास को आनन्दित करने के लिए यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को अपना सिर खोना पड़ा था।
इस संबंध पर ध्यान दें, जिसे कुछ लोग "संयोग" कहते हैं। राजा के दो अधिकारी एक ही समय पर बन्दीगृह में हैं, जबकि यूसुफ वहाँ था। उनमें से प्रत्येक को उसी रात असामान्य स्वप्न आते हैं। एक अपना स्वप्न पूरा कर सकता था और दूसरा इसे बताने के लिए जीवित रह सकता था। परमेश्वर के पास रात में भी मनुष्यों के मन तक तत्काल पहुँच है और वह उन्हें किसी भी प्रकार का स्वप्न दे सकता है। ऐसा वह अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कर सकता है, जैसा भी वह चाहे, वह किसी और की चिंताओं से पूरी तरह से स्वतंत्र है। उसके लिए सभी के मन खुले हुए हैं और वह न केवल अपने लोगों से, बल्कि दूसरों से भी, स्वप्न में बात कर सकता है, जैसा कि अय्यूब 33:15 कहता है, "स्वप्न में, या रात को दिए हुए दर्शन में, जब मनुष्य घोर निद्रा में पड़े रहते हैं, या बिछौने पर सोते समय।"
"सबेरे जब यूसुफ उनके पास अन्दर गया, तब उन पर उसने जो दृष्टि की तो क्या देखता है कि वे उदास हैं" (वचन 6)। इन स्वप्नों ने उन दोनों को अशांत कर दिया और अंततः दोनों ने अपने स्वप्नों के बारे में यूसुफ को बताया। यह भी परमेश्वर की भागीदारी के कारण था, संयोग के कारण नहीं। परमेश्वर काम कर रहा था।
दयालु यूसुफ उनकी स्थितियों में रुचि दिखाता है और उनके प्रति बहुत कोमलता और करुणा प्रदर्शित करता है। उसने चिंता के साथ पूछा "इसलिये उसने फ़िरौन के उन हाकिमों से, जो उसके साथ उसके स्वामी के घर के बन्दीगृह में थे, पूछा, "आज तुम्हारे मुँह क्यों उदास हैं?" (वचन 7)। यूसुफ उनका रखवाला था, और उस पद पर वह कोमलता भरा व्यवहार दिखाता है। जब हम अपने आस-पास के लोगों के दु:खों पर ध्यान देते हैं, तो यह हमारे लिए और परमेश्वर के लिए अच्छा लगता है, जिसका हम प्रतिनिधित्व करते हैं। यूसुफ क्लेश में उनका साथी था, अब वह उनके साथ एक कैदी था, और एक स्वप्न देखने वाला भी था। दु:खों में सहभागिता उन लोगों के प्रति करुणा दिखाने में सहायता करती है, जो पीड़ित हैं। आइए हम इससे सीखें कि दूसरों के दु:खों और परेशानियों में स्वयं उनकी चिंता करें, और आस-पास के लोगों के दु:ख का कारण जानें। हो सकता है कि परमेश्वर हमें उनके पास या उन्हें हमारे पास भेज रहा हो, जैसा कि उसने यहाँ यूसुफ की बन्दीगृह में किया था। अपने भाइयों के मुख पर ध्यान दें; हमें अक्सर सताने गए हुओं के आँसूओं पर विचार करना चाहिए, जैसा कि हम सभोपदेशक 4:1 से अनुमान लगा सकते हैं, "तब मैं ने वह सब अन्धेर देखा जो संसार में होता है। और क्या देखा, कि अन्धेर सहनेवालों के आँसू बह रहे हैं, और उनको कोई शान्ति देनेवाला नहीं! अन्धेर करनेवालों के हाथ में शक्ति थी, परन्तु उनको कोई शान्ति देनेवाला नहीं था।" यह उन लोगों के लिए कुछ राहत की बात है, जो मुसीबत में हैं। क्या लोगों के दु:ख के कारणों का पता लगाने में बहुत अधिक खर्च आता है? आप एक अगुवा बनना चाहते हैं और दूसरों की चिंता नहीं करते हैं? यह एक विरोधाभास है।
एक बात जिसने इन कैदियों को परेशान किया होगा, वह यह थी कि कैद में होने के कारण उन्हें मिस्र के उन जादू-टोना करने वालों पहुँच नहीं रही होगी, जो स्वप्नों की व्याख्या करने का नाटक करते थे। उन्हें अभी तक यह एहसास नहीं है कि स्वप्नों का सबसे अच्छा व्याख्याकार उनके साथ है। वह ऐसा व्याख्याकार है, जिन्हें कैदी अपने साथ रखना चाहेंगे, ताकि उन्हें परमेश्वर के संकेतों के अर्थ और ढाँचे के बारे में निर्देश दिया जा सके। ऐसा लगता है कि एलीहू सुझाव देता है कि एक भरोसेमंद व्याख्याकार दुर्लभ मिलता है। अय्यूब 33:23 "यदि उसके लिये कोई बिचवई स्वर्गदूत मिले, जो हज़ार में से एक ही हो, जो भावी कहे, और जो मनुष्य को बताए कि उसके लिये क्या ठीक है” और वह उस व्यक्ति के प्रति दयालु होता है और परमेश्वर से कहता है, 'उन्हें गड्ढे में जाने से बचा, मैंने उनके लिए फिरौती पा ली है-' वास्तव में एक व्याख्याकार दुर्लभता से ही मिलता है, जो किसी के विवेक का मार्गदर्शन करे, न कि केवल उनकी जिज्ञासा को संतुष्ट करे। हमारे उदाहरण यूसुफ ने एक अच्छे अगुवा के रूप में उन्हें निर्देशित किया कि उन्हें किस ओर देखना चाहिए। क्या व्याख्याएँ परमेश्वर की नहीं हैं? उसका अर्थ है, उस परमेश्वर के लिए है, जिसकी वह आराधना करता था और वह ज्ञान जो केवल वही दे सकता है। क्या आप ऐसे व्याख्याकार होना चाहेंगे? या आप लोगों को केवल वही बताएँगे, जो आपको लगता है कि वे सुनना चाहते हैं?
परमेश्वर आने वाली चीजों के बारे में बता सकता है। "मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूँ जो अब तक नहीं हुई। मैं कहता हूँ, ‘मेरी युक्ति स्थिर रहेगी और मैं अपनी इच्छा को पूरी करूँगा" (यशायाह 46:10)। इसलिए उसके पास दूरदर्शिता के उन सभी वरदानों की प्रशंसा होनी चाहिए, जो मनुष्यों के पास हैं, साधारण या असाधारण। यूसुफ अपनी स्वयं को महिमा मिलने के विरुद्ध एक चेतावनी के साथ आरम्भ करता है, और व्याख्या देने से पहले ही परमेश्वर को महिमा देने के लिए सावधान रहता है। यूसुफ सुझाव देता है, "क्या स्वप्नों का फल कहना परमेश्वर का काम नहीं है? तो वह एक स्वतंत्र प्रतिनिधि है, और जिस सामर्थ्य को वह चाहता है, उसे वही दे सकता है, और इसलिए मुझे अपना स्वप्न बताओ।"
प्रधान पिलानेहारा का स्वप्न तीन दिनों के भीतर उसकी बहाली और पुनः प्रगति की एक सुखद भविष्यद्वाणी थी। यूसुफ ने प्रधान पिलानेहारे के छुटकारे की भविष्यद्वाणी की थी, परन्तु उसने अपने स्वयं के बारे में नहीं सोचा था। उसने बहुत पहले ही अपने सम्मान का स्वप्न देखा था, और यह कि उसके भाइयों को उसके प्रति क्या करना चाहिए। अब वह केवल उस स्मृति से स्वयं को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर सकता था। दूसरी ओर, प्रधान पकानेहारे के स्वप्न ने उसकी भयानक मृत्यु की भविष्यद्वाणी की। यह यूसुफ की गलती नहीं थी कि वह उसके लिए कोई सर्वोतम समाचार नहीं लाया। सेवक केवल व्याख्या देने वाले होते हैं, वे बातों को उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं बना सकते हैं; यदि वे विश्वासयोग्यता से व्यवहार करते हैं और उनका संदेश अप्रिय प्रमाणित होता है, तो यह उनकी गलती नहीं है। बुरे स्वप्न अच्छी व्याख्या की आशा नहीं कर सकते।
हालाँकि वह विनम्र था और उसने स्वप्नों की व्याख्या के लिए परमेश्वर की महिमा की, फिर भी यूसुफ को अनुचित रीति में बन्दीगृह में होने से स्वयं के छुटकारे के लिए आग्रह करने का अवसर लिया। "अत: जब तेरा भला हो जाए तब मुझे स्मरण करना, और मुझ पर कृपा करके फ़िरौन से मेरी चर्चा चलाना, और इस घर से मुझे छुड़वा देना। क्योंकि सचमुच इब्रियों के देश से मुझे चुरा कर लाया गया है; और यहाँ भी मैं ने कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके कारण मैं इस कारागार में डाला जाऊँ" (वचन 14 और 15)। हालाँकि यूसुफ को दिए गए सम्मान ने कारागार को बन्दीगृह जितना अच्छा बना दिया, फिर भी कोई भी उसे अपनी स्वतंत्रता के लिए दोषी नहीं ठहरा सकता है। वह अपने भाइयों को दोष नहीं देते हुए, अपनी धटना की एक मामूली प्रस्तुति देता है। वह केवल इतना ही कहता है, मुझे इब्रियों के देश से चुरा लिया गया था, अर्थात् अन्यायपूर्ण तरीके से यहाँ लाया गया, कुछ भी कहीं किसी ने गलती की है। न ही वह अपनी मालकिन और अपने न्यायी स्वामी द्वारा इस बन्दीगृह में डाल दिए जाने के गलत काम पर विचार करता है, परन्तु वह धीरे से अपने निर्दोष होने का दावा करता है। यहाँ मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि वे मुझे इस गड़हे में डालें। जब हमें स्वयं को प्रमाणित करने के लिए कहा जाता है, तो हमें दूसरों के बारे में बुरा बोलने से जितना अधिक संभव हो सके सावधानी से बचना चाहिए। आइए हम स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए संतुष्ट रहें, और दूसरों पर उनके अपराध का आरोप लगाने का शौक न रखें। वह एक विनम्रता भरा अनुरोध करता है। मुझे इस बन्दीगृह से बाहर निकाल दो। वह यह नहीं कहता, "मुझे फ़िरौन के घर ले आओ, मुझे दरबार में स्थान दो।" नहीं, वह छुटकारे के लिए दया माँगता है, पदोन्नति की नहीं। परमेश्वर कभी-कभी उन लोगों के लिए सबसे बड़े सम्मान की योजना बनाता है, जो उसे प्राप्त करने के लिए कम से कम लालची होते या युक्ति लगाते हैं।
दूसरों को प्राथमिकता दें। दूसरों का सम्मान करें। दूसरों की सहायता करें। दूसरों की सेवा करें। यूसुफ ने यही किया और देखें कि उसने जो बोया, उससे उसे क्या मिला। मसीही अगुवे, ध्यान दें।