फिर से एक साथ

अध्याय उनसठ


उत्पत्ति 45:1-15

Ron Meyers

1तब यूसुफ उन सब के सामने जो उसके आस पास खड़े थे, अपने को और रोक न सका; और पुकार के कहा, “मेरे आस पास से सब लोगों को बाहर कर दो।” भाइयों के सामने अपने को प्रगट करने के समय यूसुफ के संग और कोई न रहा। 2तब वह चिल्‍ला चिल्‍लाकर रोने लगा; और मिस्रियों ने सुना, और फ़िरौन के घर के लोगों को भी इसका समाचार मिला। 3तब यूसुफ अपने भाइयों से कहने लगा, “मैं यूसुफ हूँ, क्या मेरा पिता अब तक जीवित है?” इसका उत्तर उसके भाई न दे सके; क्योंकि वे उसके सामने घबरा गए थे। 4फिर यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा,* “मेरे निकट आओ।” यह सुनकर वे निकट गए। फिर उसने कहा, “मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूँ, जिसको तुम ने मिस्र आने वालों के हाथ बेच डाला था। 5अब तुम लोग मत पछताओ, और तुम ने जो मुझे यहाँ बेच डाला, इससे उदास मत हो; क्योंकि परमेश्‍वर ने तुम्हारे प्राणों को बचाने के लिये मुझे तुम्हारे आगे भेज दिया है। 6क्योंकि अब दो वर्ष से इस देश में अकाल है; और अब पाँच वर्ष और ऐसे ही होंगे कि उनमें न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा। 7इसलिये परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे आगे इसी लिये भेजा कि तुम पृथ्वी पर जीवित रहो, और तुम्हारे प्राणों के बचने से तुम्हारा वंश बढ़े। 8इस रीति अब मुझ को यहाँ पर भेजनेवाले तुम नहीं, परमेश्‍वर ही ठहरा; और उसी ने मुझे फ़िरौन का पिता सा, और उसके सारे घर का स्वामी, और सारे मिस्र देश का प्रभु ठहरा दिया है। 9अत: शीघ्र मेरे पिता के पास जाकर कहो, ‘तेरा पुत्र यूसुफ यह कहता है कि परमेश्‍वर ने मुझे सारे मिस्र का स्वामी ठहराया है; इसलिये तू मेरे पास बिना विलम्ब किए चला आ। 10तेरा निवास गोशेन देश में होगा, और तू बेटे, पोतों, भेड़–बकरियों, गाय–बैलों, और अपने सब कुछ समेत मेरे निकट रहेगा। 11और अकाल के जो पाँच वर्ष और होंगे, उनमें मैं वहीं तेरा पालन–पोषण करूँगा; ऐसा न हो कि तू और तेरा घराना, वरन् जितने तेरे हैं, वे भूखों मरें।’ 12और तुम अपनी आँखों से देखते हो, और मेरा भाई बिन्यामीन भी अपनी आँखों से देखता है कि जो हम से बातें कर रहा है वह यूसुफ है। 13तुम मेरे सब वैभव का, जो मिस्र में है और जो कुछ तुम ने देखा है, उस सब का मेरे पिता से वर्णन करना; और तुरन्त मेरे पिता को यहाँ ले आना।” 14तब वह अपने भाई बिन्यामीन के गले से लिपटकर रोया; और बिन्यामीन भी उसके गले से लिपटकर रोया। 15वह अपने सब भाइयों को भी चूमकर रोया, और इसके पश्‍चात् उसके भाई उससे बातें करने लगे।


यहूदा ने अपना भावनात्मक रूप से भरा हुआ और तार्किक रूप से प्रेरक निवेदन समाप्त किया, फिर वह और उसके भाई मिस्र के प्रधान मंत्री से प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगे। क्या वह उदार और दयालु होगा या नहीं या वह क्रोधित होगा और अधिक माँग करेगा? इसलिए वे यह जानकर पूरी तरह से आश्‍चर्यचकित और चकित रह गए कि एक न्यायी की गंभीरता के बजाय, वे अपने खोए हुए भाई से एक पिता या भाई के स्वाभाविक स्नेह को शायद उससे उनकी अपनी भाषा, इब्रानी में सुनेंगे। यह कितना बड़ा झटका था!


यूसुफ प्रतिशोधी नहीं था, परन्तु उसने परमेश्‍वर की योजना को स्वीकार किया। क्षमा महानता की निशानी होती है। मूर्ख सदैव यह प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं कि वे सही हैं, सिद्ध होने की कोशिश करते हैं, और मान्यता या सम्मानित होने की इच्छा रखते हैं। उदास और विनम्र यूसुफ अब अपने स्वप्नों के बारे में डींग नहीं मार रहा था और गर्व से अपनी श्रेष्ठता की घोषणा कर रहा था। यह दयालु, प्रेम करने वाला और समझदार था। ये महान चरित्र के लक्षण हैं।


यूसुफ ने पहचाना कि परमेश्‍वर ने उसके भाइयों के विश्‍वासघात, अपने मालिक की लुभाने वाली पत्नी के प्रलोभन, अन्यायपूर्ण रीति से बन्दीगृह में रहने के वर्षों और मिस्र के प्रधान मंत्री के रूप में उसके सफल प्रशासनिक वर्षों के माध्यम से काम किया था। परमेश्‍वर उन लोगों का उपयोग कर सकता है, जो अपनी करतूतों को पहचानते हैं। जो लोग दूसरों को दोष देते हैं और द्वेष रखते हैं, वे परमेश्‍वर के हाथों में अच्छे पात्र नहीं होते हैं। जिनका चरित्र उनके दयालु, क्षमाशील और दयालु हृदय का प्रतिबिंब है, जिनके साथ मिलना आसान है और जिनसे आसानी से अनुरोध किया जाता है, वे हैं, जो उनका सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व करते हैं। ये वे पात्र हैं, जिनका वे सबसे अधिक उपयोग करते हैं। परमेश्‍वर के हाथों में उस तरह का औजार बनने का प्रयास करें। 


यूसुफ ने अपने सभी सेवकों को कहीं और जाने का आदेश दिया। उत्पत्ति 45:1 निश्‍चित रूप से इस कहानी में एक महत्वपूर्ण वचन है। "तब यूसुफ उन सब के सामने जो उसके आस पास खड़े थे, अपने को और रोक न सका; और पुकार के कहा, "मेरे आस पास से सब लोगों को बाहर कर दो।" सो जब यूसुफ ने अपने भाइयों को अपना परिचय दिया, तब उसके साथ कोई न था। मित्रों की निजी बातचीत सबसे अधिक स्वतंत्रता में होती है। जब यूसुफ पर प्रेम उमण्ड जाता, तो वह उसे एकान्त में छोड़ देते हैं और उसके सेवकों के लिए उसके भाइयों के साथ इस निजी समय में उसके साथ रहना उचित नहीं था। बहुत सीमा तक उसी तरह से जिस तरह यीशु हमसे घनिष्ठता और दयालुता से बात करता है, वह स्वयं को और अपने लोगों के प्रति अपनी प्रेमपूर्ण - दया को संसार की दृष्टि और सुनने से बाहर रखता है।


हमें इस धटना में यूसुफ की ईमानदारी पर प्रश्न उठाने की आवश्यकता नहीं है। यह कोई नाटक नहीं था। आँसू उसकी चर्चा की प्रस्तावना या परिचय थे। "तब वह चिल्‍ला चिल्‍लाकर रोने लगा; और मिस्रियों ने सुना, और फ़िरौन के घर के लोगों को भी इसका समाचार मिला।" उसने अपनी भावनाओं को इस तरह से छोड़ने के लिए रोक रखा था और लंबे समय तक इस धारा को बहाने से रोका था, परन्तु अब यह इतनी अधिक हो गई कि वह इसे रोक नहीं सका, इसलिए उसने उन्हें बाहर कर दिया और जोर से रोया। जिन सेवकों को उसने उसे देखने से मना किया था, वे उसे सुने बिना नहीं रह सकते थे। ये कोमलता और प्रबल स्नेह के आँसू थे, और इनके साथ उसने कड़े आरोपों के उस दिखावे वाले मुख को उतार फेंका, जिसके साथ उसने अब तक अपने भाइयों के प्रति व्यवहार किया था। वह इसे और अधिक सहन नहीं कर सकता था। यह लौटने वाले पश्‍चातापियों के प्रति ईश्‍वरीय करुणा का प्रतिनिधित्व करता है, जितना कि भागे हुए बेटे की पिता से। क्या आपको उस पिता की कहानी स्मरण है, जिसने अपने लंबे समय से खोए हुए, परन्तु अब लौट रहे बेटे का स्वागत किया था? लूका 15:20 कहता है, "तब वह उठकर, अपने पिता के पास चला : वह अभी दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा।"


ऐसा लगता है कि वह अचानक से उन्हें बताता है कि वह कौन थाः मैं यूसुफ हूँ। वे उन्हें केवल उसके मिस्र के नाम, सापनत्पानेह से जानते थे, क्योंकि शायद उसका इब्रानी नाम मिस्र में खो गया था और भुला दिया गया था। परन्तु अब वह उन्हें अपने इब्रानी नाम से बुलाना सिखाता हैः मैं यूसुफ हूँ, निस्संदेह अब मैं पहली बार तुमसे अपने इब्री नाम का प्रयोग करते हुए इब्री में बात कर रहा हूँ। वे सन्देह नहीं कर सके कि यह इसी नाम का कोई अन्य व्यक्ति था, वह स्वयं के बारे में उन्हें समझाता है, "यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, 'मेरे पास आओ।' जब उसने ऐसा किया, तो उसने कहा, "मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूँ, जिसे तुमने मिस्र में बेच दिया था।"" मैं यूसुफ हूँ, तुम्हारा भाई। यह उन्हें उसे बेचने में उनके पाप के लिए और भी अधिक विनम्र बना देगा, और शायद उन्हें दयालुता भरा व्यवहार पाने की आशा करने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकता है, या इससे प्रतिशोध का डर भी हो सकता है। उसी तरह, जब मसीह ने पौलुस को समझाना चाहा तो उसने कहा, मैं यीशु हूँ; और जब वह अपने चेलों को सांत्वना देता है, तो उसने कहा, यह मैं हूँ, डरो मत। स्वयं की यह सरल पहचान, सबसे पहले, यूसुफ के भाइयों को चौंका देगी; वे डर के कारण पीछे हट गए, या कम से कम अभी भी आश्‍चर्यचकित थे। परन्तु क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि यूसुफ दयालुता से और परिचित रूप से उन्हें पुकार कर कहता हैः "मेरे निकट आओ?" एक बार फिर, जब यीशु अपने लोगों को स्वयं को दिखाता है, तो वह उन्हें प्रोत्साहित करता है कि वे उसके पास आएँ और उससे डरें नहीं। शायद, जब वे उसे बेचने के बारे में बात करने वाले थे, ऐसा न हो कि मिस्र के लोग सुन लें, तो वह जोर से बात नहीं करना चाहता था, यदि मिस्र के लोग उसके बेच जाने के बारे में सुनेंगे, तो यह इब्रियों को उनके लिए और भी घृणित बना देगा। वह चाहता था कि वे पास आएँ, ताकि वह उनके साथ फुसफुसा कर बात कर सके, जो अब जब उसके जुनून की गर्मी थोड़ी खत्म हो गई थी, तो वह ऐसा करने में सक्षम हुआ, जबकि पहले वह ऐसा नहीं कर सकता पर रोने को छोड़कर। 


वह तुरन्त उन चोटों के लिए उनके दु:ख को कम करना चाहता था, जो उसने उन्हें दिए थे, उन्हें यह दिखाकर कि उन्होंने जो कुछ भी किया था, परमेश्‍वर ने उसे भले के लिए उपयोग किया, और पहले से ही इसमें से बहुत अधिक भलाई को ले आया था। वचन 5 में लिखा है, "अब तुम लोग मत पछताओ, और तुम ने जो मुझे यहाँ बेच डाला, इससे उदास मत हो; क्योंकि परमेश्‍वर ने तुम्हारे प्राणों को बचाने के लिये मुझे तुम्हारे आगे भेज दिया है।" पापियों को अपने पापों के लिए दु:खी होना चाहिए, और स्वयं से क्रोधित होना चाहिए, भले ही परमेश्‍वर अपनी सामर्थ्य से उनमें से भलाई निकालता है। इसके लिए पापी को कोई धन्यवाद नहीं मिलना चाहिएः परन्तु सच्चे पश्चाताप करने वालों को बहुत अधिक प्रभावित और आभारी होना चाहिए, जब वे परमेश्‍वर को इतनी बुद्धिमानी से बुराई से भलाई निकालते हुए देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमारी बुराई बुराई नहीं थी, परन्तु यह परमेश्‍वर की महानता को दर्शाती है। और यह हमें दूसरों के साथ अधिक उदार होने में सहायता कर सकती है, जिन्होंने शायद हमें नाराज किया होगा, जब हम महसूस करते हैं कि परमेश्‍वर ने इसकी मंशा की थी और इसे अपने शाश्‍वत उद्देश्य के लिए उपयोग किया था। यूसुफ यहाँ ऐसा ही करता है, क्योंकि उसके भाइयों को डरने की आवश्यकता नहीं थी कि वह बदला लेगा। नहीं, यहाँ कोई प्रतिशोध नहीं है। प्रतिशोध उस चीज को पूर्ववत कर देगा, जिसे परमेश्‍वर की बुद्धि ने उसके और उसके परिवार के लाभ के लिए बनाया था।

फिर यूसुफ उन्हें बताता है कि अकाल कितने समय तक रहने की संभावना थी, वचन 6 में कहा गया है, "क्योंकि अब दो वर्ष से इस देश में अकाल है; और अब पाँच वर्ष और ऐसे ही होंगे कि उनमें न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा।" अब उन्हें परमेश्‍वर की योजना दिखाई देने लगी। और वे समझ सकते थे कि परमेश्‍वर प्रभारी था, वचन 8 कहता है, "इस रीति अब मुझ को यहाँ पर भेजनेवाले तुम नहीं, परमेश्‍वर ही ठहरा; और उसी ने मुझे फ़िरौन का पिता सा, और उसके सारे घर का स्वामी, और सारे मिस्र देश का प्रभु ठहरा दिया है।" देखें कि यूसुफ ने उस चोट के बारे में क्या अनुकूल व्याख्या की, जो उन्होंने उसे पर की थीः परमेश्‍वर ने मुझे तुमसे पहले भेजा था। मिस्र की तुलना में परमेश्‍वर का इस्राएल परमेश्‍वर की विशेष चिंता का विषय है। यूसुफ ने सोचा कि उसका ऊँचा उठाया जाना मिस्र के एक पूरे राज्य को बचाने के लिए इतनी नहीं थी कि इस्राएलियों के एक छोटे से परिवार को बचाया जा सकेः क्योंकि प्रभु का हिस्सा उसके लोग हैं; दूसरों का जो कुछ भी हो, उसके लोग सुरक्षित हो जाएँगे।


परमेश्‍वर की बुद्धिमान से भरी योजना एक लंबा मार्ग तय करती है, और इसका एक दूरगामी पहलू है। समृद्धि के वर्षों से बहुत पहले भी, अकाल के वर्षों में परमेश्‍वर याक़ूब के घराने की आपूर्ति के लिए तैयारी कर रहा था। भजन संहिता 105:17 में लिखा है, "उसने यूसुफ नामक एक पुरुष को उनसे पहले भेजा था, जो दास होने के लिये बेचा गया था।" परमेश्‍वर आरम्भ से अंत तक अपने काम को देखता है, परन्तु हम नहीं देखते हैं। सभोपदेशक 3:11 कहता है, "उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं; फिर उसने मनुष्यों के मन में अनादि–अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है, तौभी जो काम परमेश्‍वर ने किया है, वह आदि से अन्त तक मनुष्य समझ नहीं सकता।" ईश्‍वरीय प्रावधान की परियोजनाएँ कितनी सराहनीय है! यहेजकेल की दृष्टि का उपयोग करते हुए समझे कि पहिये जीवधारियों के साथ उठते थे; क्योंकि उनकी आत्मा पहियों में थी! इसलिए आइए हम समय से पहले कुछ भी निर्णय न करें।


परमेश्‍वर अक्सर विपरीत तरीके से काम करता है। इन भाइयों की ईर्ष्या और विवाद ने एक परिवार के नाश होने को खतरे में डाल दिया था, फिर भी, इस उदाहरण में, वे याक़ूब के परिवार को बचाने का अवसर प्रमाणित करते हैं। यूसुफ कभी भी इस्राएल का चरवाहा और पत्थर नहीं हो सकता था, यदि उसके भाइयों ने उस पर गोली नहीं चलाई होती और उससे घृणा नहीं की होती; यहाँ तक कि जिन्होंने दुष्टता से यूसुफ को मिस्र में बेच दिया था, वे भी परमेश्‍वर द्वारा लाए गए भले कामों का लाभ उठाते थे। इसी तरह, जिन्होंने मसीह को मार डाला, उनमें से कई उसकी मृत्यु से बच गए। परमेश्‍वर के पास अपने लोगों को समय के अनुसार बचाने की सारी महिमा होनी चाहिए, चाहे वे किसी भी तरह से प्रभावित हों। यह तुम नहीं थे, जिन्होंने मुझे यहाँ भेजा था, परन्तु परमेश्‍वर था। एक तरफ, उन्हें इस पर चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह नाटक बहुत अच्छी तरह से समाप्त हुआ था, तो दूसरी तरफ, उन्हें इस पर गर्व नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह परमेश्‍वर ने किया था, न कि यह उनका काम था। उन्होंने उसके स्वप्नों को विफल करने के लिए उसे मिस्र में बेचकर योजना बनाई, परन्तु परमेश्‍वर ने इसके द्वारा उन्हें पूरा करने के लिए योजना बनाई।


यूसुफ अकाल के शेष वर्षों के दौरान अपने पिता और पूरे परिवार की देखभाल करने का प्रतिज्ञा करता है। वह चाहता है कि उसके पिता को उसके जीवन और गरिमा के समाचार से जल्द ही आनन्दित किया जाए। उसके भाइयों को जल्दी से कनान जाना चाहिए, और याक़ूब को सूचित करना चाहिए कि उसका बेटा यूसुफ पूरे मिस्र का स्वामी था, जैसा कि वचन 9 में कहा गया है, "अत: शीघ्र मेरे पिता के पास जाकर कहो, ‘तेरा पुत्र यूसुफ यह कहता है कि परमेश्‍वर ने मुझे सारे मिस्र का स्वामी ठहराया है; इसलिये तू मेरे पास बिना विलम्ब किए चला आ।" वह जानता था कि यह उसके सफेद बालों वाले सिर के लिए एक ताज़ा तेल और उसकी आत्मा के लिए एक प्रभुता से भरा हुआ प्रोत्साहन होगा। यदि कुछ भी उसे फिर से जवान बना देगा, तो यह वही होगा। वह उन्हें अपनी बात की सच्चाई का वास्तविक गवाह बनाता है, जैसा कि हम वचन 12 में देखते हैं, "और तुम अपनी आँखों से देखते हो, और मेरा भाई बिन्यामीन भी अपनी आँखों से देखता है कि जो हम से बातें कर रहा है, वह यूसुफ है।" यदि वे अपने मन में उसकी छवि को ठीक कर लेते हैं, तो वे उसकी विशेषताओं, वाणी आदि के बारे में कुछ स्मरण रख सकते हैं और संतुष्ट हो सकते हैं।

यूसुफ बहुत ज्यादा उत्सुक है कि उसका पिता और उसका सारा परिवार उसके पास मिस्र आए, क्योंकि वह उन्हें वचन 9 में आमंत्रित करता है, "अत: शीघ्र मेरे पिता के पास जाकर कहो, ‘तेरा पुत्र यूसुफ यह कहता है कि परमेश्‍वर ने मुझे सारे मिस्र का स्वामी ठहराया है; इसलिये तू मेरे पास बिना विलम्ब किए चला आ।" ऐसा लगता है कि उसके पास उन्हें गोशेन का क्षेत्र देने की शक्ति है, मिस्र का वह हिस्सा, जो कनान की ओर है, यह संभवतः इसलिए कि वे कनान को स्मरण कर सकें, जहाँ से वे आने वाले थे। वह वचन 11 में वह उनके भरण-पोषण को करने की प्रतिज्ञा करता है, "और अकाल के जो पाँच वर्ष और होंगे, उनमें मैं वहीं तेरा पालन–पोषण करूँगा; ऐसा न हो कि तू और तेरा घराना, वरन् जितने तेरे हैं, वे भूखों मरें।" हमारा प्रभु यीशु, यूसुफ की तरह, ऊपरी संसार के सर्वोच्च सम्मान और शक्तियों के लिए ऊँचे पर विराजमान है, यह उसकी इच्छा है कि जो कोई भी उसके हैं, वे उनके साथ हों जहाँ वे हैं। यूहन्ना 17:24 में यीशु ने कहा, "हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जिन्हें तू ने मुझे दिया है, जहाँ मैं हूँ, वहाँ वे भी मेरे साथ हों, कि वे मेरी उस महिमा को देखें, जो तू ने मुझे दी है, क्योंकि तू ने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझ से प्रेम रखा।" यह उसकी आज्ञा है कि हम विश्‍वास और आशा और स्वर्गीय वार्तालाप में उसके साथ रहें; और यह उसका प्रतिज्ञा है कि हम सदैव उसके साथ रहेंगे।


उसके और उसके भाइयों के बीच सुखद विचारों का आदान-प्रदान हुआ। उसने सबसे छोटे, अपने ही भाई बिन्यामीन के साथ यात्रा आरम्भ की थी, जो शायद लगभग एक वर्ष का था, जब यूसुफ अपने परिवार से अलग हो गया था, और उस पर विशेष ध्यान दिया। वचन 14 कहता है, "तब वह अपने भाई बिन्यामीन के गले से लिपटकर रोया; और बिन्यामीन भी उसके गले से लिपटकर रोया।" यूसुफ ने शायद अपनी माँ राहेल के बारे में सोचा, जो बिन्यामीन को जन्म देते हुए जच्चा की पीड़ा से मर गई थी। हम नहीं जानते, परन्तु हम इसकी कल्पना कर सकते हैं। बिन्यामीन को गले लगाने के बाद, उसने उनमें से प्रत्येक के प्रति अपना स्नेह दिखाया, जैसा कि वचन 15 में कहा गया है, "वह अपने सब भाइयों को भी चूमकर रोया, और इसके पश्‍चात् उसके भाई उससे बातें करने लगे।" फिर उसके भाई उसके साथ अपने पिता के घर के सभी विषयों के बारे में खुलकर और परिचित रूप से बात करने लगे। मुझे आश्‍चर्य है कि किस बात ने उन्हें एक साथ हँसाया। किस बात ने उन्हें शांत किया? उन्होंने एक-दूसरे को कौन सी कहानियाँ सुनाई? अब उनके पास कितना अच्छा समय था कि वे फिर से एक साथ थे!


अब तक इस श्रृँखला में हमने इस बारे में बहुत कुछ सोचा है कि कैसे यूसुफ ने अपने भाइयों का परीक्षा ली। अब एक पल के लिए सोचिए कि यदि हम दूसरों को क्षमा कर दें, तो उन्हें और हम में से किसी को भी क्या-क्या बड़े लाभ हो सकते हैं। परमेश्‍वर ने हमें बहुत ज्यादा क्षमा किया है। इससे हमें क्षमाशील होने में सहायता मिलनी चाहिए। जब दूसरे मुझे क्षमा कर देते हैं, तो मुझे अच्छा लगता है। यदि हम उन्हें क्षमा कर दें, तो दूसरे भी करेंगे। यदि हम दूसरों को क्षमा नहीं करेंगे, तो परमेश्‍वर हमें क्षमा नहीं करेगा। यह एक वास्तविक जिम्मेदारी है। क्षमा न करना हमें नष्ट कर देता है, दूसरे व्यक्ति को नहीं। मैं अपने मन में किसी भी क्षमा से दूर नहीं करना चाहता हूँ। परमेश्‍वर क्षमा करने के लिए कहता है। मैं आज्ञा मानना चाहता हूँ। दूसरे परमेश्‍वर के सेवक हैं, हमारे नहीं। हमें दूसरों का न्याय करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे परमेश्‍वर के प्रति उत्तरदायी हैं, हमारे प्रति नहीं। क्षमा मुझे मुक्त कर देती है। डाह मुझे बाँध लेती है। मैं मुक्त होना चाहता हूँ। 

परमेश्‍वर हमें क्षमा करने में सहायता करें। यह यूसुफ की कहानी से मिलने वाला एक सबसे बड़ा सबक है।