यूसुफ का अपने परिवार को बसाना
अध्याय बासठ
उत्पत्ति 47:1-12

Ron Meyers
1तब यूसुफ ने फ़िरौन के पास जाकर यह समाचार दिया, “मेरा पिता और मेरे भाई, और उनकी भेड़–बकरियाँ, गाय–बैल और जो कुछ उनका है, सब कनान देश से आ गया है; और अभी तो वे गोशेन देश में हैं।” 2फिर उसने अपने भाइयों में से पाँच जन लेकर फ़िरौन के सामने खड़े कर दिए। 3फ़िरौन ने उसके भाइयों से पूछा, “तुम्हारा उद्यम क्या है?” उन्होंने फ़िरौन से कहा, “तेरे दास चरवाहे हैं, और हमारे पुरखा भी ऐसे ही रहे।” 4फिर उन्होंने फ़िरौन से कहा, “हम इस देश में परदेशी की भाँति रहने के लिये आए हैं; क्योंकि कनान देश में भारी अकाल होने के कारण तेरे दासों को भेड़–बकरियों के लिये चारा न रहा; इसलिये अपने दासों को गोशेन देश में रहने की आज्ञा दे।” 5तब फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “तेरा पिता और तेरे भाई तेरे पास आ गए हैं, 6और मिस्र देश तेरे सामने पड़ा है; इस देश का जो सबसे अच्छा भाग हो, उसमें अपने पिता और भाइयों को बसा दे, अर्थात् वे गोशेन ही देश में रहें; और यदि तू जानता हो, कि उनमें से परिश्रमी पुरुष हैं, तो उन्हें मेरे पशुओं के अधिकारी ठहरा दे।” 7तब यूसुफ ने अपने पिता याक़ूब को ले आकर फ़िरौन के सम्मुख खड़ा किया; और याक़ूब ने फ़िरौन को आशीर्वाद दिया। 8तब फ़िरौन ने याक़ूब से पूछा, “तेरी आयु कितने दिन की हुई है?” 9याक़ूब ने फ़िरौन से कहा, “मैं एक सौ तीस वर्ष परदेशी होकर अपना जीवन बिता चुका हूँ; मेरे जीवन के दिन थोड़े और दु:ख से भरे हुए भी थे, और मेरे बापदादे परदेशी होकर जितने दिन तक जीवित रहे उतने दिन का मैं अभी नहीं हुआ।” 10और याक़ूब फ़िरौन को आशीर्वाद देकर उसके सम्मुख से चला गया। 11तब यूसुफ ने अपने पिता और भाइयों को बसा दिया, और फ़िरौन की आज्ञा के अनुसार मिस्र देश के अच्छे से अच्छे भाग में, अर्थात् रामसेस नामक प्रदेश में, भूमि देकर उनको सौंप दिया। 12और यूसुफ अपने पिता का, और अपने भाइयों का, और पिता के सारे घराने का, एक एक के बाल–बच्चों की गिनती के अनुसार, भोजन दिला दिलाकर उनका पालन–पोषण करने लगा।
एक अगुवे की एक मुख्य पहचान दूसरों की देखभाल की जिम्मेदारियों लेने और दूसरों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ स्वयं को लाभान्वित करने के अवसर प्रदान करने के लिए उनके विषयों का प्रबंधन करने की क्षमता और इच्छा होती है। यूसुफ अपने परिवार की देखभाल में इस क्षमता और इच्छा को प्रदर्शित करता है, जो अभी-अभी कनान से मिस्र चले आए थे। यदि आप एक मसीही अगुवा बनना चाहते हैं, तो यूसुफ की कहानी का यह हिस्सा आपको दोहराने की कोशिश करने के लिए एक अद्भुत नमूना दे सकता है।
उस सम्मान पर ध्यान दें, जो यूसुफ ने फ़िरौन के अधीन रहते हुए अपने राजा को दिखाया था। भले ही यूसुफ राजा का पसंदीदा और राज्य का प्रधान मंत्री था, और उसे अपने पिता को मिस्र लाने के लिए फ़िरौन से विशेष आदेश मिले थे, फिर भी यूसुफ ने अपने पिता और भाइयों को तब तक बसने नहीं दिया, जब तक कि वह फ़िरौन को सब कुछ नहीं बता लिया। दूसरे शब्दों में, यूसुफ ने फ़िरौन के अधीन अच्छी तरह से काम किया और अपने परिवार के लिए जिम्मेदार था। वह दोनों दिशाओं में जिम्मेदार और वार्तालापी था। वचन 1 कहता है, "तब यूसुफ ने फ़िरौन के पास जाकर यह समाचार दिया, "मेरा पिता और मेरे भाई, और उनकी भेड़–बकरियाँ, गाय–बैल और जो कुछ उनका है, सब कनान देश से आ गया है; और अभी तो वे गोशेन देश में हैं।"" यीशु भी, हमारा यूसुफ, अपने राज्य में अपने अनुयायियों के लिए पिता की योजना के अनुसार चीजों की व्यवस्था करता है। यीशु हमारे ऊपर और पिता के अधीन है। हर अगुवे के पास विवरण देने के लिए कोई न कोई होता है, यहाँ तक कि यीशु भी। यह अच्छी बात है। मत्ती 20:23 कहता है, "उसने उनसे कहा, "तुम मेरा कटोरा तो पीओगे, पर अपने दाहिने और बाएँ किसी को बैठाना मेरा काम नहीं, पर जिनके लिये मेरे पिता की ओर से तैयार किया गया, उन्हीं के लिये है।"" एक अच्छा अगुवा स्वयं को अधिकार की श्रृँखला में अपने स्थान पर सहज बनाता है। दूसरों पर हमारा अधिकार और जिम्मेदारी होती है, परन्तु हमें उन लोगों के अधिकार में भी रहना चाहिए, जो हमारे प्रति जिम्मेदार हैं।
हम यह भी देख सकते हैं कि यूसुफ ने एक भाई के रूप में अपने भाइयों के प्रति जो सम्मान दिखाया, वह जीवन में पहले उनसे मिली सभी निर्दयता के बावजूद था। हालाँकि वह एक बड़ा व्यक्ति था, और वे तुलनात्मक रूप से नीच और घृणित थे, विशेष रूप से मिस्र में, फिर भी यूसुफ ने उन्हें स्वीकार किया। संसार में जो धनी और बड़ा है, वह इस उदाहरण से सीखे कि किसी भी खराब रिश्ते को अनेदखा या तिरस्कार न किया जाए। वृक्ष की हर शाखा एक ऊपरी शाखा नहीं होती है, परन्तु केवल इसलिए कि यह एक निचली शाखा है, क्या यह वृक्ष की नहीं है? हमारा प्रभु यीशु, यहाँ यूसुफ की तरह ही, हमें भाई कहने में शर्मिंदा नहीं है।
ग्यारह में से पाँच भाइयों का एक नमूना, जो परदेशी, चरवाहे हैं और राजा के दरबार में सामाजिक शिष्टाचार के आदी नहीं हैं, उन्हें फ़िरौन से परिचित कराया जाता है, उसे अभिवादन करने के लिए, इसके द्वारा मिस्रियों के बीच उन्हें सम्मान देने का मनसा की गई है। इसी तरह यीशु अपने भाइयों को स्वर्ग के दरबार में प्रस्तुत करता है, और उनकी प्रतिष्ठा में सुधार लाता है, भले ही वे अपने आप में इसके लिए अयोग्य हैं और मिस्र के दरबार में चरवाहों से बहुत ज्यादा तुलनीय हैं, तथापि मिस्रियों के लिए घृणित है। फ़िरौन के सामने प्रस्तुत किए जाने पर, इसमें कोई सन्देह नहीं कि यूसुफ ने उन्हें जो सावधानीपूर्वक निर्देश दिए होंगे, वे फ़िरौन को बताते हैं कि उसका क्या काम था, उसका क्या उद्यम था - कि वे चरवाहे थे। यूसुफ एक चतुर व्यक्ति था और निश्चित रूप से जानता था कि फ़िरौन के पहले प्रश्नों में से एक क्या होगा। वचन 3 कहता है, "फ़िरौन ने उसके भाइयों से पूछा, "तुम्हारा उद्यम क्या है?" उन्होंने फ़िरौन से कहा, "तेरे दास चरवाहे हैं, और हमारे पुरखा भी ऐसे ही रहे।" फ़िरौन इसे इस तरह से हल्के में लेता है कि उनके पास करने के लिए कुछ था, अन्यथा मिस्र में उनके लिए कोई स्थान नहीं होनी चाहिए। मिस्र व्यर्थ भटकने वालों के लिए कोई बंदरगाह नहीं था। यदि वे काम नहीं करेंगे, तो उन्हें इस कमी के समय में उसकी भोजन-वस्तु नहीं खानी चाहिए। संसार में जो भी लोग रहते हैं, उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार कोई न कोई काम मिलना चाहिए, चाहे वह दिमागी हो या हाथ का हो। जिन लोगों को अपनी रोटी कमाने के लिए काम करने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें तौभी कुछ करना होगा, ताकि उन्हें आलस्य से बचाया जा सके।
यदि आप अपने देश में एक राजनीतिक अगुवा हैं, तो आपके लिए अपनी प्रजा के उद्यम के बारे में पूछताछ करना बुद्धिमानी होगी। आपके ऊपर लोक कल्याण की देखभाल और जिम्मेदारी है। व्यर्थ लोग छत्ते में छेद की तरह होते हैं; वे समुदाय के लिए हानि पहुँचाने वाले बोझ होते हैं। फ़िरौन ने अपने प्रश्न में एक अन्य पहलू के बारे में भी सोचा होगा। विशेष रूप से, मिस्र में उनका क्या व्यवसाय था? वे इस प्रश्न के लिए तैयार थे। वचन 4 कहता है, "फिर उन्होंने फ़िरौन से कहा, "हम इस देश में परदेशी की भाँति रहने के लिये आए हैं; क्योंकि कनान देश में भारी अकाल होने के कारण तेरे दासों को भेड़–बकरियों के लिये चारा न रहा; इसलिये अपने दासों को गोशेन देश में रहने की आज्ञा दे।" उन्होंने इस महत्वपूर्ण वाक्यांश को शामिल किया, "कुछ समय के लिए अर्थात् परदेशी की भाँति।" उनकी मंशा मिस्रवासी बनने या वहाँ चिरस्थाई रूप से रहने की नहीं थी। वे वहाँ सदैव के लिए नहीं बसेंगे, बल्कि केवल कुछ समय के लिए वहाँ की यात्रा करेंगे। यह ठीक उसी समय होना था, जब कनान में अकाल पड़ा था, जो बहुत भारी थी, जिससे कि यह चरवाहों के लिए रहने योग्य नहीं था। मिस्र की तुलना में वहाँ चारा बहुत अधिक खत्म हो गया था, जो कि बहुत कम हो गया था, और जहाँ पर, हालाँकि अन्न समाप्त हो गया था, वहाँ स्पष्ट रूप से भेड़ों के लिए अभी भी रहने के लिए कुछ योग्य अच्छी चरागाह थी। यूसुफ ने अपने भाइयों को अच्छी तरह से तैयार किया था। जिस तरह से यूसुफ ने मिस्र के राजा और कनान के चरवाहों की इस मुलाकात को सुगम बनाया, क्या आप एक अच्छे अगुवा के निशान देख सकते हैं?
यूसुफ ने अपने भाइयों के लिए गोशेन देश में एक क्षेत्र प्राप्त किया। वचन 5 एवं 6 कहते हैं, "तब फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, "तेरा पिता और तेरे भाई तेरे पास आ गए हैं, और मिस्र देश तेरे सामने पड़ा है; इस देश का जो सबसे अच्छा भाग हो, उसमें अपने पिता और भाइयों को बसा दे, अर्थात् वे गोशेन ही देश में रहें; और यदि तू जानता हो, कि उनमें से परिश्रमी पुरुष हैं, तो उन्हें मेरे पशुओं के अधिकारी ठहरा दे।"" यह यूसुफ के कारण फ़िरौन से मिलने वाला एक लाभ था। फ़िरौन यूसुफ का आभारी था, क्योंकि यूसुफ उसके और उसके राज्य के लिए ऐसा आशीर्वाद था। अब वह यूसुफ के संबंधों के प्रति दयालु होगा, विशुद्ध रूप से यूसुफ के लिए। उसने उन्हें अपने मवेशियों पर चरवाहों के रूप में कार्य करने के लिए प्राथमिकता दी, बशर्ते वे सक्रिय रूप से कार्य करें। बाइबल सिखाती है कि जो व्यक्ति अपने व्यवसाय में परिश्रमी होता है, वह राजाओं के सामने खड़ा होगा। पुनः हम पवित्रशास्त्र में एक संकेत पाते हैं कि हमारा पेशा या रोजगार जो भी हो, हमें उसमें उत्कृष्ट होने का लक्ष्य रखना चाहिए और स्वयं को कुशल और परिश्रमी प्रमाणित करना चाहिए।
इसके बाद आइए हम एक पुत्र के रूप में यूसुफ द्वारा अपने पिता के प्रति दिखाए गए सम्मान पर ध्यान दें। उसने उसे फ़िरौन के सामने भी प्रस्तुत किया। वचन 7 कहता है, "तब यूसुफ ने अपने पिता याक़ूब को ले आकर फ़िरौन के सम्मुख खड़ा किया; और याक़ूब ने फ़िरौन को आशीर्वाद दिया...।" हर किसी को अपने माता-पिता पर घमण्ड करना चाहिए। क्या आप यूसुफ का मुँह देख सकते हैं, जब वह अपने बूढ़े पिता को फ़िरौन के सामने प्रस्तुत करता है? फिर फ़िरौन ने याक़ूब से वचन 8 में वर्णित एक सामान्य प्रश्न पूछा। "तेरी आयु कितने दिन की हुई है?" यह एक सम्मानजनक प्रश्न है, जो सामान्य तौर पर वृद्ध पुरुषों से पूछा जाता है, क्योंकि हमारे लिए वृद्धावस्था की महिमा और सम्मान करना स्वाभाविक है। लैव्यव्यवस्था 19:32 कहता है, "पक्के बालवाले के सामने उठ खड़े होना, और बूढ़े का आदरमान करना, और अपने परमेश्वर का भय निरन्तर मानना; मैं यहोवा हूँ।" यह बहुत ही अस्वाभाविक है और बुढ़ापे का तिरस्कार करना अच्छा नहीं लगता है, जैसा कि यशायाह ने यशायाह 3:5 में बुरे समय की बुराई का वर्णन किया है, "प्रजा के लोग आपस में एक दूसरे पर, और हर एक अपने पड़ोसी पर अंधेर करेंगे; और जवान वृद्ध जनों से और नीच जन माननीय लोगों से असभ्यता का व्यवहार करेंगे।" यह भी संभव है कि मिस्र में लोग सामान्य तौर पर कनान में उतने लंबे समय तक नहीं रहते थे। फ़िरौन ने शायद याक़ूब को आश्चर्य और एक तरह की प्रशंसा के साथ देखा होगा। याक़ूब की यात्रा फ़िरौन के दरबार में एक सम्मानजनक घटना हो सकती है। और हमारे लिए, समय-समय पर जब हम अपनी उपलब्धियों को मापते या नापते हैं, तो हम भी स्वयं से पूछ सकते हैं, "हमारी आयु कितनी है?"
याक़ूब ने फ़िरौन को शायद वचन 9 में वर्णित अपेक्षा से अधिक लंबा उत्तर दिया, "याक़ूब ने फ़िरौन से कहा, "मैं एक सौ तीस वर्ष परदेशी होकर अपना जीवन बिता चुका हूँ; मेरे जीवन के दिन थोड़े और दु:ख से भरे हुए भी थे, और मेरे बापदादे परदेशी होकर जितने दिन तक जीवित रहे उतने दिन का मैं अभी नहीं हुआ।"" याक़ूब ने एक ऐसे तरीके से बात की, जो एक कुलपिता के लिए, गंभीरता की हवा के साथ, फ़िरौन के निर्देश के लिए और हम में से किसी के लिए भी जो इस बुद्धिमान बूढ़े व्यक्ति से सीखना चाहते हैं, उपयुक्त था। हालाँकि हमारी वाणी सदैव शालीनता भरी नहीं होती है, फिर भी यह सदैव शालीनता के साथ होनी चाहिए। याक़ूब अपने जीवन को तीर्थयात्रा कहता है, अर्थात् स्वयं को इस संसार में एक परदेशी और दूसरे संसार की ओर एक अग्रसर यात्री के रूप में देखता है। पृथ्वी उसकी सराय थी, उसका घर नहीं। इब्रानियों ने 11:13 में इस सत्य पर विचार किया गया है। "ये सब विश्वास ही की दशा में मरे; और उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ नहीं पाईं, पर उन्हें दूर से देखकर आनन्दित हुए और मान लिया कि हम पृथ्वी पर परदेशी और बाहरी हैं।" उन्होंने न केवल अब स्वयं को एक तीर्थयात्री माना, जब वह मिस्र में था, एक अजीब देश, जिसमें वह पहले कभी नहीं गया था; बल्कि उसका पूरा जीवन, तब भी जब वह अपने जन्म के देश में था। यह सब एक तीर्थयात्रा थी, और जो लोग इसे इस तरह से मानते हैं, वे अपनी मूल भूमि से अनुपस्थिति की असुविधा को सर्वोतम ढंग से सहन कर सकते हैं।
उसने पद्दनराम में बीस वर्ष और मिस्र में सत्रह वर्ष बिताए। हम जैसे हैं, वह अभी भी एक तीर्थयात्री जैसा था और जब तक वह पृथ्वी पर है, तब तक रहेगा। वह अपने जीवन की गणना दिनों से करता है, वर्षों से नहीं। हमें निश्चय नहीं है कि हम इसके अंत में एक और दिन जीवित रहेंगे। हमें एक घड़ी से भी कम समय की चेतावनी पर इस तम्बू से निकाल दिया जा सकता है। भजन संहिता 90:12 कहता है, "हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएँ।" और उन्हें नापें, जैसा कि भजन संहिता 39:4 में कहा गया है, "हे यहोवा, ऐसा कर कि मेरा अन्त मुझे मालूम हो जाए, और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं; जिससे मैं जान लूँ कि मैं कैसा अनित्य हूँ!" यदि हम अपने दिनों को गिनेंगे और उन्हें मापेंगे, तो हम पृथ्वी के विषयों पर समय गवाँने की संभावना को कम करेंगे और जब परमेश्वर बुलाता है, तो उससे मिलने के लिए अधिक तैयार होंगे। ध्यान दें कि वह अपने दिनों के बारे में क्या दृश्य देता है। पहले तो वे थोड़े थे। हालाँकि वह अब 130 वर्ष जीवित रह चुका था, परन्तु अनन्त काल के दिनों, अनन्त परमेश्वर और अनन्त अवस्था की तुलना में उसे वे कुछ ही दिन लगते थे। उस अवस्था में एक हजार वर्ष, जो पहले से कहीं अधिक लंबी अवधि है, एक दिन के समान है। जीवन छोटा है, इसलिए इसे नाश न करें। दूसरा, उसके दिन बुरे थे। यह सामान्य रूप से उस व्यक्ति के बारे में सच है, क्योंकि अय्यूब 14:1 कहता है, "मनुष्य जो स्त्री से उत्पन्न होता है, वह थोड़े दिनों का और दु:ख से भरा रहता है।" चूँकि उसके दिन बुरे हैं, हाँ! यह अच्छी बात है कि वे थोड़े हैं। याक़ूब का जीवन, विशेष रूप से, बुरे दिनों से मिलकर बना था, हालाँकि उनमें से सबसे सुखद अभी भी उसके सामने थे। तीसरा, उसके दिन उसके पूर्वजों के दिनों से कम थे। उसके दिन उतने ज्यादा नहीं थे और उतने सुखद भी नहीं थे, जितने कि उनके दिन थे। बुढ़ापा उसके कुछ पूर्वजों की तुलना में उसे जल्दी आ गया। जैसे जवान व्यक्ति को अपनी शक्ति या सुंदरता पर घमण्ड नहीं होना चाहिए, वैसे ही बूढ़े व्यक्ति को अपनी आयु पर घमण्ड नहीं होना चाहिए। उसके सफेद बालों वाला मुकुट, हालाँकि अन्य लोग इसे महिमा का मुकुट मानते हैं, केवल तभी वैभवशाली होता है, जब यह एक धर्मी व्यक्ति के जीवन में मिलता है।
यहाँ एक बड़ी भूमि वाला राजा है, एक बड़ी सभ्यता का ऊँचा और शक्तिशाली शासक उत्तर के रेगिस्तान से आए एक मामूली चरवाहे से मिल रहा है। फिर भी ध्यान दें कि कौन किसे आशीर्वाद देता है। याक़ूब के स्वयं को फ़िरौन को संबोधित करने के बाद उसे आशीर्वाद देने के साथ उससे विदाई ली। इसका दो बार उल्लेख किया गया है, एक बार वचन 7 में और फिर वचन 10 में। "तब यूसुफ ने अपने पिता याक़ूब को ले आकर फ़िरौन के सम्मुख खड़ा किया; और याक़ूब ने फ़िरौन को आशीर्वाद दिया।" और "और याक़ूब फ़िरौन को आशीर्वाद देकर उसके सम्मुख से चला गया।" यह कार्य न केवल सभ्यता संबंधी कार्य था, क्योंकि उसने उसे सम्मान दिया और उसकी दया के लिए धन्यवाद व्यक्त किया, बल्कि ईश्वर-भक्ति का कार्य भी था – उसने उसके लिए एक भविष्यद्वक्ता और एक कुलपति के अधिकार के रूप में प्रार्थना की। हालाँकि सांसारिक धन में फ़िरौन सबसे बड़ा था, फिर भी, परमेश्वर, जगत का सृष्टिकर्ता और राजा के संबंध में, याक़ूब सबसे बड़ा था। "मेरे अभिषिक्तों को मत छूओ, और न मेरे नबियों की हानि करो!" (भजन संहिता 105:15)। एक कुलपिता के आशीर्वाद का तिरस्कार नहीं किया जाना था, नहीं, एक शक्तिशाली राजा द्वारा भी नहीं। दारा राजा, एक अन्य समय और स्थान पर भी अपने और अपने बेटों के लिए धर्मी लोगों की प्रार्थनाओं को महत्व देता था। "...इसलिये कि वे स्वर्ग के परमेश्वर को सुखदायक सुगन्धवाले बलि चढ़ाकर, राजा (जिसका अर्थ दारा राजा से है) और राजकुमारों के दीर्घायु के लिये प्रार्थना किया करें" (एज्रा 6:10)। फ़िरौन ने दयालुता से याक़ूब का स्वागत किया, और, चाहे वह एक भविष्यद्वक्ता के रूप में हो या नहीं, उसे एक भविष्यद्वक्ता का प्रतिफल मिला। यह उसे उसके साथ उसकी विनम्र बातचीत के लिए और याक़ूब और उसके परिवार के प्रति फ़िरौन की अन्य सभी दयालुता के लिए पर्याप्त रूप से प्रतिफल देता है।
यूसुफ ने याक़ूब और उसके परिवार के लिए अच्छी व्यवस्था की, "तब यूसुफ ने अपने पिता और भाइयों को बसा दिया, और फ़िरौन की आज्ञा के अनुसार मिस्र देश के अच्छे से अच्छे भाग में, अर्थात् रामसेस नामक प्रदेश में, भूमि देकर उनको सौंप दिया" (वचन 12)। यूसुफ ने अपने पिता, अपने भाइयों और अपने पिता के सारे घराने को उनकी सन्तान की सँख्या के अनुसार भोजन दिया। इससे पता चलता है कि यूसुफ, अपने सभी नेतृत्व गुणों और योग्यताओं के साथ एक भला व्यक्ति था, जिसने अपने खराब संबंधों की इतनी कोमलता से देखभाल की, और परमेश्वर, एक भले परमेश्वर, के हाथ में उपयोग किए जाने के लिए एक साधन था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसे परमेश्वर ने इस उद्देश्य के लिए खड़ा किया था, और उसे इस पद पर रखा और उसे ऐसा करने की क्षमता और अधिकार दिया। आपको स्मरण होगा कि एस्तेर भी अपने दिनों में ऐसे समय के लिए ही राज्य में आई थी - अर्थात् ऐसे समय के लिए, जो उसके दिनों में हुआ था। परमेश्वर ने यहाँ याक़ूब के लिए जो किया, उसने वास्तव में, उसके उन सभों के लिए करने का प्रतिज्ञा की है, जो उसकी सेवा करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। चाहे हम परमेश्वर के वचन, ज्ञान या भौतिक प्रावधान की आवश्यकता पर चर्चा करें, वह चाहता है कि आप आज एक यूसुफ बनें। भजन संहिता 37:19 में कहा गया है, "विपत्ति के समय उनकी आशा न टूटेगी और न वे लज्जित होंगे, और अकाल के दिनों में वे तृप्त रहेंगे।" आज आप यूसुफ हैं। अपनी जिम्मेदारी और अवसर के अनुसार आगे बढ़ें। परमेश्वर द्वारा इस कहानी को बाइबल में रखने का कारण यह है कि आपको यह पता चल जाए।
आइए हम दूसरों के लिए (जिन पर परमेश्वर ने हमें रखा है) और दूसरों के लिए (जिनके अधीन परमेश्वर ने हमें रखा है) जिम्मेदार होना सीखें।