याक़ूब का यूसुफ को आशीर्वाद देना और मर जाना

अध्याय छियासठ


उत्पत्ति 49:22-33

Ron Meyers

22 यूसुफ फलवन्त लता की एक शाखा है, वह सोते के पास लगी हुई फलवन्त लता की एक शाखा है; उसकी डालियाँ भीत पर से चढ़कर फैल जाती हैं। 23धनुर्धारियों ने उसको खेदित किया, और उस पर तीर मारे, और उसके पीछे पड़े हैं। 24पर उसका धनुष दृढ़ रहा, और उसकी बाँह और हाथ याक़ूब के उसी शक्‍तिमान परमेश्‍वर के हाथों के द्वारा फुर्तीले हुए, जिसके पास से वह चरवाहा आएगा, जो इस्राएल की चट्टान भी ठहरेगा। 25यह तेरे पिता के उस ईश्‍वर का काम है, जो तेरी सहायता करेगा, उस सर्वशक्‍तिमान् का जो तुझे ऊपर से आकाश में की आशीषें, और नीचे से गहिरे जल में की आशीषें, और स्तनों और गर्भ की आशीषें देगा। 26तेरे पिता के आशीर्वाद, मेरे पितरों के आशीर्वादों से अधिक बढ़ गए हैं और सनातन पहाड़ियों की मनचाही वस्तुओं के समान बने रहेंगे : वे यूसुफ के सिर पर, जो अपने भाइयों से अलग किया गया था, उसी के सिर के मुकुट पर फूले फलेंगे। 27बिन्यामीन फाड़नेवाला भेड़िया है, सबेरे तो वह अहेर भक्षण करेगा, और साँझ को लूट बाँट लेगा। 28इस्राएल के बारहों गोत्र ये ही हैं : और उनके पिता ने जिस जिस वचन से उनको आशीर्वाद दिया, वे ये ही हैं; एक एक को उसके योग्य आशीर्वाद के अनुसार उसने आशीर्वाद दिया। 29तब उसने यह कहकर उनको आज्ञा दी, “मैं अपने लोगों के साथ मिलने पर हूँ : इसलिये मुझे हित्ती एप्रोन की भूमिवाली गुफ़ा में मेरे बापदादों के साथ मिट्टी देना, 30अर्थात् उसी गुफ़ा में जो कनान देश में मम्रे के सामनेवाली मकपेला की भूमि में है; उस भू्मि को अब्राहम ने हित्ती एप्रोन के हाथ से इसी लिए मोल लिया था कि वह कब्रिस्तान के लिये उसकी निज भूमि हो। 31वहाँ अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को मिट्टी दी गई थी, और वहीं इसहाक और उसकी पत्नी रिबका को भी मिट्टी दी गई; और वहीं मैं ने लिआ: को भी मिट्टी दी। 32वह भूमि और उसमें की गुफ़ा हित्तियों के हाथ से मोल ली गई है।” 33याक़ूब जब अपने पुत्रों को यह आज्ञा दे चुका, तब अपने पाँव खाट पर समेट प्राण छोड़े, और अपने लोगों में जा मिला।


याक़ूब अपने सबसे प्यारे बेटों, यूसुफ और बिन्यामीन के आशीर्वाद के साथ समाप्त करता है और इसके साथ वह अपनी अन्तिम सांस लेता है।


यूसुफ पर याक़ूब का आशीर्वाद बहुत बड़ा और भरपूरी के साथ है। उसकी तुलना एक फलदार शाखा, या युवा वृक्ष से की गई है; "यूसुफ फलवन्त लता की एक शाखा है, वह सोते के पास लगी हुई फलवन्त लता की एक शाखा है; उसकी डालियाँ भीत पर से चढ़कर फैल जाती हैं" (वचन 22)। परमेश्‍वर ने यूसुफ को उसके दुःख के देश में फलदायी बनाया था, जैसा कि यूसुफ ने स्वयं स्वीकार किया था, जब उसने अपने दूसरे बेटे का नाम एप्रैम रखा था। "दूसरे का नाम उसने यह कहकर एप्रैम रखा, कि ‘मुझे दु:ख भोगने के देश में परमेश्‍वर ने फलवन्त किया है।’" (उत्पत्ति 41:52)। यूसुफ के दो बेटे एक लता की शाखाओं, या अन्य फैलाने वाले पौधे की तरह थे, जो भीत पर चढ़कर फैल जाएँगे। परमेश्‍वर अपने और दूसरों के लिए उन फलदायी, बड़ी भरपूरी वाला बना सकता है, जिन्हें सूखे और कमजोर के रूप में देखा जाता है। याक़ूब के किसी भी अन्य पुत्र की तुलना में यूसुफ का इतिहास में अधिक वर्णित है। केवल यही तथ्य हमें यूसुफ से सीखने के लिए कहता है। याक़ूब उसके बारे में जो कहता है, वह ऐतिहासिक होने के साथ-साथ भविष्य-सूचक भी है।


यूसुफ के दैनिक जीवन में परमेश्‍वर के शामिल होने को दो वचनों में बताया गया हैः "धनुर्धारियों ने उसको खेदित किया, और उस पर तीर मारे, और उसके पीछे पड़े हैं। पर उसका धनुष दृढ़ रहा, और उसकी बाँह और हाथ याक़ूब के उसी शक्‍तिमान परमेश्‍वर के हाथों के द्वारा फुर्तीले हुए, जिसके पास से वह चरवाहा आएगा, जो इस्राएल की चट्टान भी ठहरेगा" (वचन 23 एवं 24)। यूसुफ की सफलता के इन कारकों का उल्लेख परमेश्‍वर की महिमा के लिए और याक़ूब के विश्‍वास और आशा के प्रोत्साहन के लिए किया गया है, अर्थात् परमेश्‍वर ने उसके वंश के लिए आशीर्वाद रखा था, परन्तु हम में से उन लोगों के लिए भी, जो इसे बाइबल से पढ़ते हैं। इन कहानियों को उन अपेक्षाकृत कम लोगों की तुलना में हजारों अधिक लोग पढ़ते हैं, जो याक़ूब को याक़ूब के तम्बू में यूसुफ से बात करते हुए सुनते हैं। हम भी यूसुफ की कठिनाइयों और परेशानियों के बारे में सीखते हैं, जिसमें उसके भाइयों की उसके सुंदर अंगरखे और उसके पिता के साथ अनुकूल स्थिति की ईर्ष्या शामिल होती है और फिर बाद में पोतीपर के घर में उसकी सफलता से ईर्ष्या करने वाला कोई भी व्यक्ति, स्वयं पोतीपर की पत्नी, बन्दीगृह में याक़ूब की अच्छी प्रतिष्ठा से ईर्ष्या करने वाला कोई भी व्यक्ति और फिर अंत में, फ़िरौन के दरबार में उन लोगों से, जिन्हें दरकिनार कर दिया जाता है और इसलिए उससे ईर्ष्या होती है, जब कैदी यूसुफ को बन्दीगृह से एक ही दिन में पूरे मिस्र का प्रधान मंत्री बनने के लिए मजबूर किया जाता है। हम धटना में इन सफलताओं के बारे में पढ़ते हैं, परन्तु क्योंकि हम अपने लिए सर्वश्रेष्ठ की खोज करने की मानवीय प्रवृत्ति को समझते हैं, इसलिए इसे आसानी से देख सकते हैं कि यूसुफ की कहानी में ऐसे कई लोग थे, जो निस्संदेह उससे ईर्ष्या करते थे। हालाँकि अब वह विश्राम से और सम्मान के साथ जी रहा था, याक़ूब यूसुफ और उसके भाइयों को उन कठिनाइयों का स्मरण दिलाता है, जिनसे वह पहले गुजरा था। उसके कई शत्रु थे, जिन्हें यहाँ धनुर्धारी कहा जाता था, जो शरारत करने में कुशल थे, सताव की कला में महारत रखते थे। वे उससे घृणा करते थे और यूसुफ पर सताव उसी घृणा से हुआ था। उन्होंने उस पर अपने जहरीले तीरों को चलाया था, और इस तरह से उसे बहुत दु:ख हुआ था। उसके भाई, उसके पिता के घर में, उसके प्रति बहुत ज्यादा द्वेषपूर्ण थे, उसको ठट्ठों में उड़ाते थे, उसके वस्त्र उतार देते थे, उसे धमकी देते थे, उसे बेच दिया था और सोचते थे कि वे ही उस की मृत्यु हैं। पोतीपर के घर में उसकी मालकिन ने उसे बहुत दु:खी किया और उस पर तलवार चला दी, जब उसने निर्दयता से आग के डंडों, शरीर में कांटों जैसे प्रलोभनों से उसकी शुद्धता पर आक्रमण किया, जो दया करने वाला ईश्‍वर के प्रति बहुत ज्यादा गंभीर था, और जब वह इसमें प्रबल नहीं हो सकी, तो वह उससे घृणा करती है, और अपने झूठे आरोपों, अर्थात् तीरों को उस पर चला देती है, जिसके विरुद्ध वह बहुत कम सुरक्षा या बचाव करता है। निस्संदेह फ़िरौन के दरबार में उसके शत्रु थे, जो उसकी पसन्द से ईर्ष्या करते थे और उसे कमजोर करने की कोशिश करते थे। फिर भी यूसुफ के पास इन सभी परेशानियों के बीच शक्ति और समर्थन था; "पर उसका धनुष दृढ़ रहा, और उसकी बाँह और हाथ याक़ूब के उसी शक्‍तिमान परमेश्‍वर के हाथों के द्वारा फुर्तीले हुए, जिसके पास से वह चरवाहा आएगा, जो इस्राएल की चट्टान भी ठहरेगा" (वचन 24)। उसका विश्‍वास विफल नहीं हुआ, परन्तु उसने अपना आधार बनाए रखा, और एक विजेता के रूप में प्रतियोगिता को समाप्त किया। उसके सभी व्यक्तिगत अनुग्रहों ने अपनी भूमिका निभाई, वह अपनी बुद्धिमत्ता, साहस और धैर्य में, जो युद्ध के हथियारों से सर्वोतम है, बना रहा। संक्षेप में, उसने इन सभी परीक्षाओं के दौरान अपनी सत्यनिष्ठा और अपनी शांति दोनों को बनाए रखा; उसने एक अजेय संकल्प के साथ अपने सभी बोझ उठाए, और उनके अधीन नहीं हुआ। न ही उसने ऐसा कुछ किया, जिससे उन्हें बुरा लगे। इस शक्ति का झरना और सोता शक्तिशाली परमेश्‍वर के हाथों से था, जो उसे मजबूत करने में सक्षम था, और याक़ूब का परमेश्‍वर, जो उसके साथ वाचा में परमेश्‍वर था, और वह इसलिए उसकी सहायता करने में लगा हुआ था। प्रलोभनों का विरोध करने और दुःखों को सहने के लिए हमारी सारी शक्ति परमेश्‍वर से आती है। उसकी कृपा पर्याप्त है, और उसकी शक्ति हमारी कमजोरी में परिपूर्ण है। याक़ूब उस सम्मान और उपयोगिता की स्थिति का भी उल्लेख करता है, जिसके लिए बाद में यूसुफ को ऊँचा उठाया गया था। वह परमेश्‍वर का इस्राएल, याक़ूब और उसके परिवार का चरवाहा और चट्टान, पोषक और समर्थक बन गया। इसमें, यूसुफ यीशु का एक प्रकार, एक उदाहरण था, जिस पर भी तीर चलाया था और जिससे घृणा की गई थी, परन्तु अपने कष्टों के कारण वह ऊब गया था और फिर हमें सिखाया कि शिष्य गुरु से बड़ा नहीं हो सकता है। इसके बाद ही यीशु को सामान्य रूप से और विशेष रूप से प्रत्येक विश्‍वासी के लिए कलीसिया का चरवाहा और चट्टान बनने के लिए ऊँचे पर उठाया गया। नरक हम संतों के विरुद्ध अपने तीर चलाता है, परन्तु स्वर्ग हमारी रक्षा करता है और हमें मजबूत करता है, और हमें मुकुट पहनाया जाएगा।

याक़ूब ने यूसुफ से परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाएँ भी शामिल की हैं। देखें कि परमेश्‍वर, उसके ज्ञान और उसकी शक्ति के साथ कैसे जुड़ा हुआ है, जैसा कि वचन 25 में वर्णित है, "यह तेरे पिता के उस ईश्‍वर का काम है, जो तेरी सहायता करेगा, उस सर्वशक्‍तिमान् का जो तुझे ऊपर से आकाश में की आशीषें, और नीचे से गहिरे जल में की आशीषें, और स्तनों और गर्भ की आशीषें देगा।" अब तक हमें मजबूत करने में परमेश्‍वर की सामर्थ्य और भलाई के हमारे अनुभव अभी भी उससे निरंतर सहायता पाने की आशा रखने के लिए हमारे प्रोत्साहन हैं; जिसने सहायता दी है, सहायता की है और सहायता करेगा। ध्यान दीजिए कि यूसुफ, यहाँ तक कि अपने पिता के सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर से क्या आशा कर सकता है। वह कठिनाइयों और खतरों में आपकी सहायता करेगा, जो अभी भी आपके मार्ग में आ सकते हैं। वह आपके और आपकी सन्तानों के सामने उनके युद्धों में होगा। इसमें कौन शामिल हो सकता है? उदाहरण के लिए, यहोशू उसे से आया था, जिसने कनान के युद्धों में सेनापति के रूप में कार्य किया था। वह आपको आशीर्वाद देगा। जितना हो सके उतना आशीर्वाद कोई नहीं दे सकता। याक़ूब यूसुफ पर आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है, परन्तु याक़ूब का परमेश्‍वर आशीर्वाद का आदेश देता है।


हमारे पास यूसुफ के लिए आशा करने के लिए कई विशिष्ट आशीर्वाद हैं। इन विभिन्न और बहुतायत से भरे आशीर्वादों की जाँच करेंः स्वर्ग का आशीर्वाद, जिसके ऊपर अपनी ऋतु में वर्षा और अपनी ऋतु में साफ वातावरण होता है। इसे पृथ्वी के नीचे की गहराई के इस आशीर्वाद को जोड़ें, जो ऊपरी संसार की तुलना में एक बड़ी गहराई है, जिसमें खनिजों के साथ भूमिगत खदानें और आवश्यक पानी के साथ झरने हैं। आत्मिक आशीर्वाद ऊपर स्वर्ग की आशीर्वाद हैं, जिनकी हमें सबसे पहले कामना और खोज करनी चाहिए, और जिन्हें हमें प्राथमिकता देनी चाहिए। सांसारिक आशीर्वादों का आनन्द लेना ठीक है, परन्तु उन्हें कभी भी हमारी सोच में अधिक महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए। और जब यूसुफ की सन्तानों के सन्तान पैदा होता हैं? याक़ूब गर्भ और स्तनों जैसे शब्दों को आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता है, ताकि सन्तान सुरक्षित रूप से पैदा हों और आराम से उनकी देखभाल हो सके। परमेश्‍वर के वचन में, जिसके द्वारा हम नए सिरे से जन्म लेते हैं, और पोषित होते हैं, 1 पतरस 2:2 में ऐसे लिखा है, "नये जन्मे हुए बच्‍चों के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ।" ये, नए व्यक्ति के लिए, गर्भ और स्तन दोनों वाले आत्मिक आशीर्वाद हैं।


याक़ूब या तो अपने पिता इसहाक की तुलना में अधिक कल्पनाशील था या रचनात्मक सद्भावना से भरे हुआ था। उसके पिता के पास केवल एक ही आशीर्वाद था, और जब उसने वह याक़ूब को दिया था, तो वह एसाव के लिए प्रार्थना करने के लिए आशीर्वाद से वंचित था। परन्तु याक़ूब के पास अपने बारह बेटों में से प्रत्येक के लिए एक आशीर्वाद था, और अब, उन सभी आशीर्वादों के अंत में, यहाँ यूसुफ के लिए एक बड़ा और बहुआयामी आशीर्वाद है। इसे सुनें: "तेरे पिता के आशीर्वाद, मेरे पितरों के आशीर्वादों से अधिक बढ़ गए हैं और सनातन पहाड़ियों की मनचाही वस्तुओं के समान बने रहेंगे : वे यूसुफ के सिर पर, जो अपने भाइयों से अलग किया गया था, उसी के सिर के मुकुट पर फूले फलेंगे" (वचन 26)। रुचिपूर्ण बात यह है कि यरदन के पश्‍चिम की ओर यहोशू द्वारा एप्रैम और मनश्शे को दी गई भूमि सिर के ऊपर एक मुकुट की तरह दिखती है या आकार में है। इसलिए मनश्शे को भूमि दिया जाना यूसुफ के "सिर" पर आशीर्वाद की इस प्रतिज्ञा या प्रार्थना की पूर्ति है। आशीर्वाद स्थायी और व्यापक आशीर्वाद थेः सनातन पहाड़ियों की मनचाही वस्तुओं के समान बने रहेंगे, जिसमें सबसे फलदायी पहाड़ियों की सभी उपज शामिल हैं, जब तक ये पहाड़ियाँ बनी रहती हैं, तब तक आशीर्वाद बना रहता है। सनातन परमेश्‍वर की आशीषों में सनातन पहाड़ियों का धन और बहुत कुछ शामिल है। खैर, इन आशीर्वादों के बारे में यहाँ कुछ और कहा गया है, "वे यूसुफ के सिर के मुकुट पर फूले फलेंगे” इसलिए यह एक प्रार्थना है, यूसुफ के सिर पर, जिसके लिए आशीर्वाद एक मुकुट की तरह होगा, ताकि इसके आगे दण्डवत् किया जा सके।


इसके बाद हम वचन 28 में याक़ूब के बेटे के आशीर्वाद का सारांश पाते हैं। "इस्राएल के बारहों गोत्र ये ही हैं : और उनके पिता ने जिस जिस वचन से उनको आशीर्वाद दिया, वे ये ही हैं; एक एक को उसके योग्य आशीर्वाद के अनुसार उसने आशीर्वाद दिया।" हालाँकि रूबेन, शिमोन और लेवी को उनके पिता की नाराजगी की अभिव्यक्ति के अधीन दण्डित किया गया था, फिर भी कहा जाता है कि याक़ूब उन्हें हर एक को उनके आशीर्वाद के अनुसार आशीर्वाद देता है। यहाँ तक कि एक सुधार, या शायद हम विशेष रूप कहें तो एक फटकार कह सकते हैं, एक आशीर्वाद हो सकता है। उनमें से किसी को भी एसाव की तरह अस्वीकार नहीं किया गया था। परमेश्‍वर के वचन, न्याय या बुद्धिमता की ओर से हमें किसी भी समय चाहे कितनी भी डांट-फटकार क्यों न मिले, फिर भी—जब तक परमेश्‍वर की वाचा में हमारा कोई हिस्सा है, उसके लोगों के बीच हमारा स्थान और नाम है, और स्वर्गीय कनान में भागीदारी पाने के लिए हमारे पास भली आशाएँ हैं—तब तक हमें स्वयं को धन्य ही समझना चाहिए। मैं नियमित रूप से परमेश्‍वर से मुझे सही करने के लिए कहता हूँ, तब भी जब मेरे पास यह सोचने का कोई विशेष कारण नहीं है कि मुझे अन्य समय की तुलना में इसकी अधिक आवश्यकता है। राज्य के काम में फलने-फूलने के लिए अच्छे विश्‍वास, आज्ञाकारिता, पवित्रता, शुद्धता और व्यवहार की आवश्यकता होती है, इसलिए मुझे सही किया जाना था। यदि हम जान लें कि उस दिन प्रत्येक बेटे ने क्या अनुभव किया, तो यह बहुत संभव है कि रूबेन, शिमोन और लेवी को सबसे अधिक लाभ हुआ। नि:सन्देह, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उनमें से प्रत्येक सुधार से लाभान्वित होने के लिए तैयार है।

याक़ूब के पूरे परिवार को दिया गया एक बड़ा आशीर्वाद बढ़ गया। याक़ूब के आशीर्वाद और मृत्यु के बाद मिस्र में रहने के दौरान सभी इस्राएलियों के वंशजों के तेजी से बढ़ने पर विचार करें। वृद्धि का आशीर्वाद सीमित नहीं लगता है, जैसा कि अब्राहम और इसहाक का आशीर्वाद था। न तो अब्राहम और न ही इसहाक के वंशजों की इतनी बड़ी सँख्या थी, जितनी कि याक़ूब की मृत्यु के तुरन्त बाद की पीढ़ियों में हुई थी। याक़ूब ने अपने बेटों के लिए जो आशीर्वाद की प्रार्थना की, वह याक़ूब की मृत्यु के बाद के वर्षों में जो हुआ, उससे प्रदर्शित होता है। भले ही इस्राएल के वंशज मिस्र में गुलाम थे, तौभी वे बहुत अधिक बढ़ गए।


अंत में हम उस गंभीर आदेश का पालन करेंगे, जो याक़ूब ने अपने बेटों को अपने मिट्टी दिए जाने के संबंध में दिया था, जो कि यूसुफ को पहले दिए गए आदेश की दुहराव है। देखें वह मृत्यु के बारे में कैसे बात करता है, अब जबकि वह मर रहा है। वचन 29 में लिखा है, "तब उसने यह कहकर उनको आज्ञा दी, "मैं अपने लोगों के साथ मिलने पर हूँ : इसलिये मुझे हित्ती एप्रोन की भूमिवाली गुफ़ा में मेरे बापदादों के साथ मिट्टी देना," अपने और दूसरों के लिए मृत्यु का वर्णन चाह योग्य, और इसलिए सत्य, दृश्यों के साथ करना अच्छा है, ताकि केवल सांसारिक सोच पर आधारित इसके परेशानी को दूर किया जा सके। हालाँकि मृत्यु हमें इस संसार में हमारी सन्तान और हमारे लोगों से अलग करती है, परन्तु यह हमें हमारे पिता और दूसरे संसार में हमारे लोगों के साथ जोड़ भी देती है। हालेलूय्याह! शायद याक़ूब मृत्यु के बारे में इस अभिव्यक्ति का उपयोग एक कारण के रूप में करता है कि उसके बेटों को उसे कनान में क्यों मिट्टी दी जानी चाहिए; क्योंकि, वह कहता है, "मै अपने लोगों के साथ मिलने पर हूँ। वह कह रहा था, 'मुझे मेरे पूर्वजों, अब्राहम, इसहाक, उनकी पत्नियों और मेरी पहली पत्नी के साथ गाड़ दो।'" वहाँ अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को मिट्टी दी गई थी, वहाँ इसहाक और उसकी पत्नी रिबका को मिट्टी दी गई थी, और वहाँ मैंने लिआ: को मिट्टी दी थी। याक़ूब का मन कनान देश के हेब्रोन में उसे मिट्टी दिए जाने के लिए बहुत ज्यादा दृढ़ था, ऐसा अपने मूल देश के प्रति स्वाभाविक स्नेह के कारण नहीं था, बल्कि परमेश्‍वर के प्रतिज्ञा में विश्‍वास के सिद्धान्त के कारण, अर्थात् कनान को उचित समय पर उसके वंशजों की विरासत होना चाहिए। इस तरह वह चाहता था कि उसके बेटे प्रतिज्ञा की गई भूमि को स्मरण रखें, और न केवल वहाँ की यात्रा से उनके साथ उनका परिचय नए सिरे से होगा, बल्कि इसके प्रति उनकी इच्छा और आशा यह होगी कि इसके प्रति उनकी अपेक्षा बनी रहेगी।  वह उस स्थान की स्थिति और अब्राहम द्वारा इसे मिट्टी दिए जाने के लिए खरीदे जाने दोनों का वर्णन करने में बहुत विशिष्ट है। उसे डर था कि ऐसा न हो कि उसके बेटे, मिस्र में सत्रह वर्ष रहने के बाद, कनान और यहाँ तक कि अपने पूर्वजों के कब्रिस्तान को भी भूल जाएँ। शायद उसने यह भी सोचा था कि कनानी उसके नाम पर विवाद कर सकते हैं; और इसलिए वह इसके विवरण और इसे खरीदने के बारे में कुछ विस्तार से बताता है, तब भी जब वह मर रहा होता है। यह न केवल एक गलती को रोकेगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि वह उस देश के प्रति कितना सचेत था। मरने वाले संतों के लिए यह बहुत अधिक आनन्द की बात है और होनी चाहिए कि वे अपने विचारों को स्वर्गीय कनान पर केंद्रित करें, और बाकी बातों के लिए वे मृत्यु के बाद वहाँ आशा करते हैं। यहाँ तक कि जहाँ आप इस पुस्तक को सुन रहे हैं, क्या आप कह सकते हैं, "आमीन?"


याक़ूब की मृत्यु वचन 33 में वर्णित है, "याक़ूब जब अपने पुत्रों को यह आज्ञा दे चुका, तब अपने पाँव खाट पर समेट प्राण छोड़े, और अपने लोगों में जा मिला।" जब उसने अपना आशीर्वाद और अपने निर्देश दोनों को पूरा कर लिया, अर्थात् याक़ूब जो कुछ भी कहना चाहता था, वह सब कह चुका, तब वह अपने अंतिम काम में जुट गया। और यह क्या था? उसने स्वयं को मरने की मुद्रा में डाल दिया। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह अपने बिछौने के किनारे पर बैठे हुआ था, जब उसने आशीर्वाद दिया और उसने बेटों से बात की, परन्तु जब वह काम पूरा हो गया, तो उसने बिछौने पर अपने पाँव इकट्ठे कर लिए, जैसे कि इस कार्यवाही से यह संकेत मिलता है कि वह अब मरने के लिए तैयार था। इसे देखने के लिए एक सुंदर कार्य माना जा सकता है कि वह बिछौने पर विश्राम से लेट सकता था, न केवल एक धैर्यपूर्वक तरीके से, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो आनन्द से विश्राम करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा था, अब जब वह थका हुआ था। मैं लेट जाऊँगा, और सो जाऊँगा। 


उसने स्वतंत्र रूप से अपनी आत्मा को आत्माओं के पिता परमेश्‍वर के हाथ में सौंप दिया और अपनी अन्तिम साँस ली। उसकी अलग की हुई आत्मा विश्‍वासियों की आत्माओं की सभा में चली  गई, जो शरीर के बोझ से मुक्त होने के बाद आनन्द और हर्ष में थी। वह अपने लोगों के साथ जा मिला। यदि परमेश्‍वर के लोग हमारे लोग हैं, तो मृत्यु हमें उनके पास जोड़ देगी।