एलियाह और अहज्याह

अध्याय तेईस


2 राजा 1:1-17

Ron Meyers

1अहाब के मरने के बाद मोआब इस्राएल के विरुद्ध हो गया। 2अहज्याह एक जालीदार खिड़की में से, जो शोमरोन में उसकी अटारी में थी, गिर पड़ा और बीमार हो गया। तब उसने दूतों को यह कहकर भेजा, “तुम जाकर एक्रोन के बालजबूब नामक देवता से यह पूछ आओ, कि क्या मैं इस बीमारी से बचूँगा कि नहीं?” 3तब यहोवा के दूत ने तिशबी एलिय्याह से कहा, “उठकर शोमरोन के राजा के दूतों से मिलने को जा, और उनसे कह, ‘क्या इस्राएल में कोई परमेश्‍वर नहीं जो तुम एक्रोन के बालजबूब देवता से पूछने जाते हो?’ 4इसलिये अब यहोवा तुझ से यों कहता है, ‘जिस पलंग पर तू पड़ा है, उस पर से कभी न उठेगा, परन्तु मर ही जाएगा।’ “ तब एलिय्याह चला गया। 5जब अहज्याह के दूत उसके पास लौट आए, तब उसने उनसे पूछा, “तुम क्यों लौट आए हो?” 6उन्होंने उससे कहा, “एक मनुष्य हम से मिलने को आया, और कहा, ‘जिस राजा ने तुम को भेजा है उसके पास लौटकर कहो, यहोवा यों कहता है, कि क्या इस्राएल में कोई परमेश्‍वर नहीं जो तू एक्रोन के बालजबूब देवता से पूछने को भेजता है? इस कारण जिस पलंग पर तू पड़ा है, उस पर से कभी न उठेगा, परन्तु मर ही जाएगा।’ “ 7उसने उनसे पूछा, “जो मनुष्य तुम से मिलने को आया, और तुम से ये बातें कहीं, उसका कैसा रंग–रूप था?” 8उन्होंने उसको उत्तर दिया, “वह तो रोंआर मनुष्य था और अपनी कमर में चमड़े का फेंटा बाँधे हुए था।” उसने कहा, “वह तिशबी एलिय्याह होगा।” 9तब उसने उसके पास पचास सिपाहियों के एक प्रधान को, उसके पचासों सिपाहियों समेत भेजा। प्रधान ने एलिय्याह के पास जाकर क्या देखा कि वह पहाड़ की चोटी पर बैठा है। उसने उससे कहा, “हे परमेश्‍वर के भक्‍त, राजा ने कहा है, ‘तू उतर आ।’ “ 10एलिय्याह ने उस पचास सिपाहियों के प्रधान से कहा, “यदि मैं परमेश्‍वर का भक्‍त हूँ तो आकाश से आग गिरकर तुझे तेरे पचासों समेत भस्म कर डाले।” तब आकाश से आग उतरी और उसे उसके पचासों समेत भस्म कर दिया। 11फिर राजा ने उसके पास पचास सिपाहियों के एक और प्रधान को, पचासों सिपाहियों समेत भेज दिया। प्रधान ने उससे कहा “हे परमेश्‍वर के भक्‍त, राजा ने कहा है, ‘फुर्ती से तू उतर आ।’ “ 12एलिय्याह ने उत्तर देकर उनसे कहा, “यदि मैं परमेश्‍वर का भक्‍त हूँ तो आकाश से आग गिरकर तुझे, तेरे पचासों समेत भस्म कर डाले।’ “ तब आकाश से परमेश्‍वर की आग उतरी और उसे उसके पचासों समेत भस्म कर दिया। 13फिर राजा ने तीसरी बार पचास सिपाहियों के एक और प्रधान को, पचासों सिपाहियों समेत भेज दिया, और पचास का वह तीसरा प्रधान चढ़कर, एलिय्याह के सामने घुटनों के बल गिरा, और गिड़गिड़ा कर उससे कहने लगा, “हे परमेश्‍वर के भक्‍त, मेरा प्राण और तेरे इन पचास दासों के प्राण तेरी दृष्‍टि में अनमोल ठहरें। 14पचास पचास सिपाहियों के जो दो प्रधान अपने अपने पचासों समेत पहले आए थे, उनको तो आग ने आकाश से गिरकर भस्म कर डाला, परन्तु अब मेरा प्राण तेरी दृष्‍टि में अनमोल ठहरे।” 15तब यहोवा के दूत ने एलिय्याह से कहा, “उसके संग नीचे जा, उससे मत डर।” तब एलिय्याह उठकर उसके संग राजा के पास नीचे गया, 16और उससे कहा, “यहोवा यों कहता है, ‘तू ने तो एक्रोन के बालजबूब देवता से पूछने को दूत भेजे थे तो क्या इस्राएल में कोई परमेश्‍वर नहीं कि जिससे तू पूछ सके? इस कारण तू जिस पलंग पर पड़ा है, उस पर से कभी न उठेगा, परन्तु मर ही जाएगा।’” 17यहोवा के इस वचन के अनुसार जो एलिय्याह ने कहा था, वह मर गया। उसकी सन्तान न होने के कारण यहोराम उसके स्थान पर यहूदा के राजा यहोशापात के पुत्र यहोराम के दूसरे वर्ष में राज्य करने लगा।


हमारे पास यहाँ अहज्याह है, जो अहाब का पुत्र और उत्तराधिकारी है, जो इस्राएल का एक और दुष्ट राजा है, जो अपने अद्भुत, शक्तिशाली कार्यों और अपने भविष्यद्वक्ता द्वारा; उसकी छड़ी और उसकी वाणी के द्वारा परमेश्‍वर की डाँट के अधीन है। अविश्‍वासी राजा अहज्याह और विश्‍वासयोग्य भविष्यद्वक्ता एलिय्याह के बीच क्या होता है, उससे मसीही अगुवा सीख सकते हैं।


पहला, अहज्याह गलत चीज पर भरोसा कर रहा है। जो कोई प्रभु यहोवा की दृष्टि में बुराई करता है और उसे क्रोधित करता है, वह कैसे सफल होने की अपेक्षा कर सकता है? जब अहज्याह ने परमेश्‍वर के विरुद्ध विद्रोह किया, और उसके प्रति अपनी निष्ठा से विद्रोह किया, तो मोआब ने इस्राएल के विरुद्ध विद्रोह किया, और दाऊद के समय से इस्राएल को दी गई अधीनता और दासता से विद्रोह किया। एदोमियों ने पहले अपनी जंजीरों को तोड़ा था और अब मोआब भी ऐसा ही कर रहा है। यदि लोग हमारे साथ अपने समझौतों को तोड़ते हैं, और अपने कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं, तो हमें इस बारे में सोचना चाहिए कि क्या यह परमेश्‍वर के साथ हमारी पहली वाचा तोड़ने और उसके प्रति हमारे कर्तव्य की उपेक्षा के कारण है या नहीं। पाप हमें कमजोर और निर्धन बनाता है। अहज्याह को शरीर में बीमारी हो जाती है, किसी आंतरिक कारण से नहीं, बल्कि एक गंभीर दुर्घटना से। वह एक जालीदार खिड़की से नीचे गिर गया और गिरने से गंभीर रूप से घायल हो गया।


हम जो कुछ भी करते हैं, हमारे और मृत्यु के बीच केवल एक कदम है। मनुष्य का घर उसका किला होता है, परन्तु यह परमेश्‍वर के दण्डों से सुरक्षित नहीं है। टूटी हुई जाली अहज्याह के लिए घातक है, जब परमेश्‍वर इसे इस तरह से बनाना चाहता है, जैसे कि एक तीर-कमान के द्वारा खींचा गया धनुष उसके पिता अहाब के लिए था। अहज्याह ने मोआबी लोगों को कम करने की कोशिश नहीं की, ऐसा न हो कि वह युद्ध के मैदान में नष्ट हो जाएः परन्तु वह सुरक्षित नहीं है, भले ही वह अपने घर में रहे। राजसी महल सदैव दृढ़ आधार प्रदान नहीं करते हैं। फन्दा पापी के लिए रखा जाता है, जहाँ वह कम से कम सोचता है, अय्यूब 18:9 और 10 कहते हैं, "उसकी एड़ी फन्दे में फँस जाएगी, और वह जाल में पकड़ा जाएगा। 10फन्दे की रस्सियाँ उसके लिये भूमि में, और जाल रास्ते में छिपा दिया गया है।" मनुष्य के पाप के कारण कराहने वाली पूरी सृष्टि अंत में इस जाली की तरह डूब जाएगी और टूट जाएगी। यदि उसके पास अपने शत्रु के नाम पर परमेश्‍वर है, तो कोई भी अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं है। अब परमेश्‍वर ने इसके बारे में क्या किया और उसने किसका उपयोग किया?


दूसरा, अहज्याह के संकट में वह एक्रोन देवता से यह पूछने के लिए दूत भेजता है कि वह ठीक हो सकता है या नहीं। उसकी पूछताछ दो तरह से गलत थीः उसने गलत परमेश्‍वर से पूछा और उसने यह नहीं पूछा कि कैसे ठीक हो सकता है। उसका खोखला प्रश्न केवल अपनी नियति को जानना था, अपने कर्तव्य को नहीं जानना था; उनका प्रश्न केवल यह है, क्या मैं चंगा हो जाऊँगा? वह यह सीख सकता था, यदि उसने केवल थोड़ा समय प्रतीक्षा की होती। लोगों को इस बारे में अधिक विचारशील होना चाहिए कि मृत्यु के बाद उनका क्या होगा, बजाय इसके कि वे कैसे, कब या कहाँ मरेंगे। इस बात की चिंता करने के बजाय कि हम अपनी बीमारी से चंगे होंगे या नहीं, यह जानना कहीं अधिक उत्तम है कि हम बीमारी के दौरान अपना आचरण किस प्रकार सही रखें, और इसके माध्यम से अपनी आत्मा के लिए कुछ आत्मिक लाभ कैसे प्राप्त करें।


अहज्याह को बाल-जबूब के पास भेजना बहुत ज्यादा दुष्टता और मूर्खतापूर्ण कार्य था। यह एक मृत और गूंगे मूर्ति को परमेश्‍वर के लिए अपनी वाणी बनाना था और यह उसके तर्क का उतना ही बड़ा अपमान था, जितना कि उसके धर्म का। एक निर्जीव मूर्ति अपने प्रश्न का उत्तर कैसे दे सकती है, भले ही प्रश्न खोखला हो? बाल-जबूब, एक्रोन नगर में एक पलिश्ती देवता था, जिसका अर्थ "मक्खियों का स्वामी" है। पलिश्तियों का जो भी विश्‍वास हो, हम मान सकते हैं कि इस मूर्तिपूजा के पीछे शैतान का हाथ था। ऐसा माना जाता है कि बाल-जबूब में विश्‍वास एक बड़ी मक्खी या मक्खियों के झुंड या संभवतः शारीरिक कचरे के ढेर से संबंधित महामारी रोग से उत्पन्न हुआ है। एक ऐसे देवता को उत्पन्न करने के लिए कितना गंदा स्रोत है, जिसके बारे में सामान्य रूप से तर्कसंगत, परन्तु विचारहीन लोग पूछताछ करेंगे! बाद में बाइबल में, जैसा कि मत्ती 12:24 कहता है, यह स्पष्ट रूप से दुष्टात्माओं के राजकुमार को संदर्भित करता है, और वह संभवतः सभी गैर-यहूदी दुष्टात्माओं में से, यह सबसे अधिक प्रसिद्ध हो गया। "परन्तु फरीसियों ने यह सुनकर कहा, "यह तो दुष्‍टात्माओं के सरदार बालज़बूल की सहायता के बिना दुष्‍टात्माओं को नहीं निकालता।"" बालजबूब निश्‍चित रूप से अच्छी या सटीक सलाह के लिए एक भरोसेमंद स्रोत नहीं था! 


तीसरा, एलिय्याह, परमेश्‍वर के निर्देश से, दूतों से मिलता है, और उन्हें एक उत्तर के साथ वापस भेज देता है, जो उन्हें एक्रोन की यात्रा करने की परेशानी से बचाएँगे। यदि अहज्याह ने एलिय्याह को बुलाया होता, स्वयं को नम्र किया होता, और उसकी प्रभावी और भली प्रार्थनाओं का अनुरोध किया होता, तो उसे शांति संबंधित उत्तर मिल सकता था, परन्तु यदि वह इस्राएल के परमेश्‍वर के बजाय एक्रोन के देवता को भेजता है, तो वह निश्‍चित रूप से अपने पापों को बढ़ा देगा। क्या आपको स्मरण है कि शाऊल ने भूत-सिद्धि करने वाली स्त्री से सलाह लेकर गलत स्रोत से सलाह लेने से अपने पाप को बढ़ा लिया था? परन्तु उस समय कम से कम शमूएल प्रकट हुआ और उसे सटीक जानकारी दी। इस विषय में अहज्याह ने अपने गलत काम को बढ़ा दिया और फिर भी वह वास्तव में अपने प्रश्न का सटीक या सही उत्तर प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं कर सकता था। उसने स्वयं को मौत का दण्ड सुनाया। जो कोई भी अपने विश्राम और निर्देश के लिए परमेश्‍वर के वचन से पूछताछ नहीं करेगा, तो वह दोनों के लाभों से चूक जाएगा। वे उस सांत्वना से चूक जाते हैं, जो परमेश्‍वर दे सकता है और उनके पास वह निर्देश नहीं है, जो उन्हें विनाश से बचा सकता है। मसीही अगुवा, सदैव परमेश्‍वर को खोजना सीखें; अन्य कमतर, अक्षम, भ्रामक या अविश्‍वसनीय स्रोतों को नहीं। अहज्याह की कहानी के इस भाग से यही सबक सीखने को मिलता है।

चौथा, एलिय्याह विश्‍वासयोग्यता से अहज्याह के पाप की भर्त्सना करता है। "क्या इस्राएल में कोई परमेश्‍वर नहीं जो तुम एक्रोन के बालजबूब देवता से पूछने जाते हो?’ 4इसलिये अब यहोवा तुझ से यों कहता है, ‘जिस पलंग पर तू पड़ा है, उस पर से कभी न उठेगा, परन्तु मर ही जाएगा।’ तब एलिय्याह चला गया!"" (वचन 3,4)। इसलिए एलिय्याह के भाषण में शामिल "इसलिए" इंगित करता है कि, अहज्याह के अन्य पापों के अतिरिक्त, परमेश्‍वर के अतिरिक्त किसी अन्य स्रोत से परामर्श करना वह पाप था, जिसने उसे मौत का दण्ड दिया था। "क्या इस्राएल में कोई परमेश्‍वर नहीं जो तुम एक्रोन के बालजबूब देवता से पूछने जाते हो" जो पलिश्तियों का एक मूर्तिपूजक नगर था, जिसे लंबे समय से इस्राएल ने जीत लिया था? पाप काफी बुरा था, शैतान को वह सम्मान देना, जो केवल परमेश्‍वर के कारण है, जो उनकी पूछताछ से उतना ही किया गया काम था, जितना कि उनके बलिदानों से। शैतान से परामर्श लेना, किसी भी परिस्थिति में, एक बहुत ही दुष्ट बात है। यह दुष्टता अन्यजातियों के संसार पर शासन करती थी और मसीही संसार में भी बहुत ज्यादा बनी हुई है। शैतान का राज्य इसके द्वारा समर्थित है।


दुष्टात्माओं से परामर्श करने के बारे में यशायाह 47:12-14 क्या कहता है? "12अपने तन्त्र–मन्त्र और बहुत से टोन्हों को, जिनका तू ने बाल्यावस्था ही से अभ्यास किया है, उपयोग में ला, सम्भव है तू उनसे लाभ उठा सके या उनके बल से स्थिर रह सके। 13तू तो युक्‍ति करते करते थक गई है। अब तेरे ज्योतिषी जो नक्षत्रों को ध्यान से देखते और नये नये चाँद को देखकर होनहार बताते हैं, वे खड़े होकर तुझे उन बातों से बचाएँ जो तुझ पर घटेंगी। 14देख, वे भूसे के समान होकर आग से भस्म हो जाएँगे; वे अपने प्राणों को ज्वाला से न बचा सकेंगे। वह आग तापने के लिये नहीं, न ऐसी होगी जिसके सामने कोई बैठ सके!"


हे परमेश्‍वर के पुरुष, परमेश्‍वर की स्त्री, हमारे पास एक अच्छा, विश्‍वसनीय, भरोसेमंद, बुद्धिमान और दयालु स्रोत है, जिससे हम लाभदायी सलाह प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्‍वर का धन्यवाद है! एलिय्याह, परमेश्‍वर के नाम पर, अपने प्रश्न पर, जो तार्किक निर्माण करता है, वह इसे और भी बदतर बनाता हैः "यह इसलिए है, क्योंकि तू न केवल यह सोचता है कि इस्राएल का परमेश्‍वर तुझे बताने में सक्षम नहीं है, बल्कि यह कि इस्राएल में कोई भी परमेश्‍वर नहीं है, अन्यथा तू एक ईश्‍वरवीय उत्तर पाने के लिए अब तक किसी को नहीं भेजता।" हम कितने मूर्ख होते हैं, जब हम भूल जाते हैं कि परमेश्‍वर की कलीसिया में एक परमेश्‍वर है और हम उससे परामर्श कर सकते हैं! निश्‍चय ही हम सोचते हैं कि इस्राएल में कोई परमेश्‍वर नहीं है, जब हम मांस को अपना भुजा बनाते हैं, और इस संसार की चीजों में कुछ ढूँढ़ते हैं। जब हम परमेश्‍वर से पूछते हैं, तो हम उसका सम्मान करते हैं। और जब हम उसका पालन करते हैं, तो उसका अधिक सम्मान करते हैं। इसलिए एलिय्याह, अहज्याह को समायोजित करता है। वह अपनी नियति जानना चाहता है। वह इसे जान लेगा और उसे इसका पूरा लाभ उठाने देगा। क्या अहज्याह डर गया था? अब उसे वास्तव में भयभीत होने का कारण दिया जाए। "इसलिये अब यहोवा तुझ से यों कहता है, ‘जिस पलंग पर तू पड़ा है, उस पर से कभी न उठेगा, परन्तु मर ही जाएगा’!" हमारे अद्भुत यीशु ने आपसे और मुझसे जो कहा है, यह उससे कितना अलग है। "मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा।" "मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा।" "मैं तुम्हारे लिए जगह तैयार करने जाता हूँ।" एलिय्याह के संदेश से अहज्याह का मन टूट गया था, परन्तु हमारे उद्धारकर्ता हमें जो कहता है, उससे आप और मैं मजबूत और प्रोत्साहित हो सकते हैं। मसीही अगुवा, मजबूत बनें, आत्म-विश्‍वास रखें, साहसी बनें। क्या आप जाली में गिर गए हैं? अपने प्रेम करने वाले स्वर्गीय पिता से परामर्श करें।


पाँचवाँ, अहज्याह जानना चाहता था कि उसके दूतों ने उनका संदेश किससे सुना। अहज्याह उनसे पूछता है कि यह किसके द्वारा उसके पास भेजा गया था, और उसके बारे में उनके वर्णन से यह निष्कर्ष निकालता है कि यह एलिय्याह होना चाहिए, उसका पहनावा वही था, जिसमें उसने उसे अपने पिता के दरबार में देखा था। उसने बालों वाली वस्त्र पहने हुए थे, और उसके चारों ओर चमड़े का कमरबंद था, वे सादे और घरेलू वस्त्र थे। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला, नए नियम का एलिय्याह, उससे मिलता-जुलता था, क्योंकि उसके वस्त्र भी बालों से बने हुए थे, और वह चमड़े के कमरबंद से लैस था। वह जो आत्मा से ढका हुआ था, उसने सभी समृद्ध और भड़कीले वस्त्रों को तुच्छ जाना। एलिय्याह का संदेश वैसा ही था, जैसा कि वह अहज्याह के पिता अहाब को देता था, जिसे वह कभी अच्छाई की नहीं, बल्कि बुराई की भविष्यद्वाणी करता था। जो अहाब की आँखों में काँटा था, वह भी अपने बेटे की आँखों में से एक होगा, जबकि वह अपने पिता की दुष्टता के पद-चिन्हों में चलेगा। यदि हमें वह संदेश पसन्द नहीं है, जो हमें मिल रहा है, तो हम सदैव अपने तरीके बदल सकते हैं, ताकि परमेश्‍वर द्वारा हमें भेजा गया संदेश भी उसी के अनुसार बदल जाए। मुझे आश्‍चर्य है कि क्या अहज्याह ने कभी ऐसा सोचा होगा!

छठा, राजा एलिय्याह को पकड़ने का आदेश देता है। यदि एक्रोन के परमेश्‍वर ने उसे बताया होता कि वह मर जाएगा, तो यह संभव है कि वह इसे चुपचाप ले लेता, परन्तु अब जब सच्चे प्रभु यहोवा का एक सच्चा भविष्यद्वक्ता उसे अपने पाप के लिए फटकार लगाते हुए और उसे इस्राएल के परमेश्‍वर का स्मरण दिलाते हुए ऐसा कहता है, तो वह इसे सहन नहीं कर सकता। अब तक वह चेतावनी के कारण कोई अच्छा बदलाव करने से दूर है, वह नबी के विरुद्ध क्रोधित है। देखें कि वे लोग कितने अतार्किक हैं, जिनसे परमेश्‍वर आपसे प्रभाव डालने, जीतने या नेतृत्व करने की अपेक्षा कर सकता है। क्या राजा ने सोचा था कि एलिय्याह एक सच्चा भविष्यद्वक्ता था? फिर वह उसे क्यों सताता है? क्या वह उन्हें केवल एक सामान्य व्यक्ति समझता था? फिर उसे पकड़ने के लिए ऐसी सेना क्यों भेजी जाए? यदि संदेश किसी पुरुष का था, तो इससे न डरें। यदि यह एक सच्चे परमेश्‍वर का सच्चा संदेश है, तो इससे बहुत डरें, इसे स्वीकार करें और बदल जाएँ!


सातवाँ, अपने पचास सैनिकों के साथ भेजा गया सेनापति एलिय्याह को एक पहाड़ी की चोटी पर मिला। एलिय्याह अब छिपने से ज्यादा दूर नहीं था, जैसा कि उसने पहले होरेब में किया था, एक गुफ़ा के निकट विश्राम लेते हुए, पर अब वह अब एक पहाड़ी की चोटी पर एक साहसिक रूप से दिखाई देता है। परमेश्‍वर की सुरक्षा का अनुभव अब उसे और अधिक साहसी बनाता है। सेनापति उसे परमेश्‍वर का भक्त कहता है, यह नहीं कि वह अपने मन से उसे ऐसा मानता था, या उसे ऐसा मानता था, बल्कि इसलिए कि उसे सामान्य रूप से ऐसा पुकारा जाता था। यदि वह वास्तव में उसे एक नबी के रूप में देखता, तो वह उसे अपना कैदी बनाने का प्रयास नहीं करता। यदि वह वास्तव में उसे परमेश्‍वर के वचन के साथ सौंपा गया मानता, तो वह उसे केवल मनुष्य के वचन के साथ आज्ञा देने का नाटक नहीं करता।


आठवाँ, एलिय्याह स्वर्ग से आग की माँग करता है, इस अभिमानी साहसी पापी को भस्म करने के लिए, परन्तु केवल अपनी रक्षा या बदला लेने के लिए नहीं। परमेश्‍वर उसकी रक्षा कर सकता था और यह उसका अपना कारण नहीं था, जिसने उसे खतरे में डाल दिया। एलिय्याह अपने मिशन को साबित कर रहा था, और मनुष्यों की भक्ति-हीनता और अधर्म के विरुद्ध स्वर्ग से परमेश्‍वर के क्रोध को प्रकट करने के लिए। इस सेनापति ने तिरस्कार में उसे परमेश्‍वर का भक्त कहा थाः "यदि मैं परमेश्‍वर का भक्‍त हूँ तो” एलिय्याह कहता है, "इसका ठट्ठा उड़ाने के लिए तुझे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।" एलिय्याह उसे बताएगा कि इस्राएल का परमेश्‍वर इस्राएल के राजा से श्रेष्ठ है और उसके पास उसकी आज्ञाओं को लागू करने की अधिक सामर्थ्य है।


लोगों के पापों के प्रायश्‍चित के रूप में उस बलिदान की परमेश्‍वर की स्वीकृति को प्रदर्शित करने के लिए एलिय्याह ने कर्मेल पर्वत पर बलिदान को भस्म करने के लिए स्वर्ग से आग उतारी थी। परन्तु उस आग के संदेश के अभाव में, अब यह आग स्वयं पापियों पर उतर जाती है। परमेश्‍वर अपने भविष्यद्वक्ताओं के प्रति विश्‍वासयोग्य है। उनमें परमेश्‍वर के आत्मा ने जिसके लिए प्रार्थना की, परमेश्‍वर की सामर्थ्य ने उसे प्रभावित किया। एलिय्याह ने केवल बात की, और यह हो गया। जिसने पहले स्वर्ग से आग और फिर पानी बरसाया था, अब वह केवल आग बरसाता है। ओह, प्रार्थना की शक्ति कितनी अद्भुत है! परमेश्‍वर अपने भविष्यद्वक्ताओं के प्रति विश्‍वासयोग्य है। परमेश्‍वर सदैव उनके कारण की वकालत करने के लिए तैयार था, और उन्हें पहुँचाई गई चोटों का बदला लेने के लिए, राजाओं को अभी भी उनके लिए फटकार लगाई जाएगी, और उसके भविष्यद्वक्ताओं को कोई नुकसान नहीं पहुँचाने का आरोप लगाया जाएगा; एक एलिय्याह परमेश्‍वर के लिए 10,000 सेनापतियों और उनके पचास से अधिक है।


नौवाँ, यीशु एक रेखा खींचता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एलिय्याह ने एक ईश्‍वरवीय नेतृत्व द्वारा आग को नीचे उतारा था, और फिर भी हमारे उद्धारकर्ता ने शिष्यों को इसे एक स्मृति बनने की अनुमति नहीं दी। लूका 9:54 इस बात को स्पष्ट करता है। जब चेलों याकूब और यूहन्ना ने यह देखा, तो उन्होंने पूछा, "यह देखकर उसके चेले याकूब और यूहन्ना ने कहा, “हे प्रभु, क्या तू चाहता है कि हम आज्ञा दें, कि आकाश से आग गिरकर उन्हें भस्म कर दे?” 55परन्तु उसने फिरकर उन्हें डाँटा [और कहा, “तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो। क्योंकि मनुष्य का पुत्र लोगों के प्राणों का नाश करने नहीं वरन् बचाने के लिए आया है।”]" नहीं, यीशु कहता है, किसी भी तरह से, तुम नहीं जानते कि तुम किस तरह की आत्मा के हो, तुम आत्मा के तरीके को नहीं मानते हो, शिष्यों के रूप में, जिसके लिए तुम बुलाए गए हो। तुम नहीं जानते कि यह दिन एलिय्याह के दिन से कितना अलग है। कोलाहल के उस समय के लिए, जो बात बहुत ज्यादा स्वीकार्य थी, और उस व्यवस्था के शब्दों के लिए, जिसने एलिय्याह के लिए आग उतारने को उचित बनाया, वह आत्मा और अनुग्रह के इस समय में सही नहीं है। मैं किसी भी तरह से इसकी अनुमति नहीं दूँगा। तुम नहीं जानते कि अब आप किस तरह की आत्मा हो और यह दिन एलिय्याह के दिन से कितना अलग है। उसने इसे पवित्र उत्साह में किया, परन्तु तुम जुनून में ऐसा करता हो; वह परमेश्‍वर की महिमा के लिए चिंतित था, तुम केवल अपनी प्रतिष्ठा के लिए।

दसवाँ, एलिय्याह की आग फिर से उतारी; क्या कोई ऐसा सोचेगा? अहज्याह, दूसरी बार, एलिय्याह को पकड़ने के लिए भेजता है, मानो कि उसने स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर द्वारा चकित नहीं होने का संकल्प लिया था। आज्ञाकारी पापियों को विश्‍वास दिलाया जाना चाहिए और जीत लिया जाना चाहिए, अंत में, नरक की आग से, क्योंकि ऐसा लगता है कि स्वर्ग से आग उन्हें वश में नहीं करेगी। एक और सेनापति अपने पचास लोगों के साथ तैयार होता है, जो नबी के विरुद्ध अपने अंधे क्रोध और राजा के प्रति समान रूप से अंधी आज्ञाकारिता में, एक ऐसी परियोजना में शामिल होने की हियाव करता है, जिसने पहले पचास लोगों के प्राण ले लिए थे। यह व्यक्ति न केवल कहता है, 'नीचे आ', वह कहता है 'जल्दी नीचे आ'। एलिय्याह इस व्यक्ति की परमेश्‍वर की निर्लज्ज अवज्ञा का उत्तर कैसे देता है? एलियाह पीछे नहीं हटता है, परन्तु बिजली की एक और चमक के उतर आने के लिए प्रार्थना करता है, जो तुरन्त इस सेनापति और उसके पचास सैनिकों को मौके पर ही घात कर देती है। जो दूसरों की तरह पाप करना चाहते हैं, उन्हें उनकी तरह पीड़ित होने की अपेक्षा करनी चाहिए; परमेश्‍वर अपने न्याय में दृढ़ है।


ग्यारह, परन्तु, तीसरे सेनापति ने स्वयं को विनम्र किया और स्वयं को परमेश्‍वर और एलिय्याह की दया पर छोड़ दिया। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि अहज्याह ने उसे एक और, नरम, विनम्र दृष्टिकोण अपनाने का आदेश दिया, परन्तु तीसरा सेनापति पहले दो सेनापतियों के अनुभव से सीखता है। उसने अपने पूर्वजों की नियति से चेतावनी ली, जो शायद उसकी आँखों के सामने मरे पड़े थे; और, नबी को नीचे बुलाने के बजाय, स्वयं उसके सामने झुक जाता है, और अपनी पापी होने की दशा और नबी की सामर्थ्य को स्वीकार करते हुए, अपने जीवन और अपने सैनिकों के जीवन के लिए भीख मांगी। मेरा जीवन तेरी दृष्टि में बहुमूल्य ठहरे। परमेश्‍वर के साथ संघर्ष करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता हैः यदि हम उसके साथ विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो यह विनम्रता, अधीनता से होना चाहिए। यदि हम सम्मानपूर्वक परमेश्‍वर के सामने न पड़ना पसन्द करते हैं, तो हमें अंततः उसके सामने झुकना चाहिए। कोई भी बुद्धिमान होता है, जो दूसरों की जिद्दीपन और हठ के घातक परिणामों से अधीनता सीखता है।


बारह, एलिय्याह इस तीसरे सेनापति के अनुरोध को स्वीकार करने से कहीं अधिक करता है। परमेश्‍वर उन लोगों के साथ इतना कठोर नहीं है, जो उसके विरुद्ध खड़े होते हैं कि वह उन लोगों पर दया करने के लिए तैयार ही न हो, जो पश्‍चाताप करते हैं और उसके अधीन होते हैं; किसी ने भी स्वयं को परमेश्‍वर की दया पर डालना व्यर्थ नहीं पाया। यह सेनापति, न केवल अपने प्राणों को बचाता है, बल्कि उसे सफलता दी जाती है; वह एलिय्याह के साथ राजा के पास जाता है। तब एलिय्याह निडर होकर राजा के पास आते हैं, और उसके मुँह पर वही बात कहता है, जो उसने पहले उसे कह भिजवाई थी, कि उसकी मृत्यु निश्‍चित है और वह शीघ्र ही होगी। जब यह संदेश स्वयं भविष्यवक्ता के मुँह से निकलता है, तो अहज्याह इस बात से इतना ज्यादा स्तब्ध रह जाता है कि न तो उसमें और न ही उसके साथ आए किसी भी व्यक्ति में उसका विरोध करने का साहस होता है। उस सिंहों की मांद से एलिय्याह, दानिय्येल की ही तरह, सुरक्षित बाहर निकलता है। भला उसका कौन बाल भी बाँका बिगाड़ सकता है, जिसकी रक्षा स्वयं परमेश्‍वर करता है?


भविष्यद्वाणी पूरी हो जाती है और कुछ ही दिनों में अहज्याह की मृत्यु हो जाती है। मेरा सुझाव है कि केवल एक आग, जिसे आप स्वर्ग से नीचे बुलाते हैं, वह पवित्र आत्मा की आग है, जो हम में से प्रत्येक को और जिनकी हम सेवा करते हैं, उन्हें ऊर्जावान और शुद्ध करेगी। चलिए उस आग के लिए प्रार्थना करते हैं।