दो महत्वपूर्ण सबक

अध्याय इकत्तीस


2 राजा 5:15-27

Ron Meyers

1. 2 राजा 5:15-19, 15तब वह अपने सब दल बल समेत परमेश्‍वर के भक्‍त के यहाँ लौट आया, और उसके सम्मुख खड़ा होकर कहने लगा, “सुन, अब मैं ने जान लिया है कि समस्त पृथ्वी में इस्राएल को छोड़ और कहीं परमेश्‍वर नहीं है! इसलिये अब अपने दास की भेंट ग्रहण कर।” 16एलीशा ने कहा, “यहोवा जिसके सम्मुख मैं उपस्थित रहता हूँ उसके जीवन की शपथ मैं कुछ भेंट न लूँगा;” और जब उसने उसको बहुत विवश किया कि भेंट को ग्रहण करे, तब भी वह इन्कार ही करता रहा। 17तब नामान ने कहा, “अच्छा, तो तेरे दास को दो खच्‍चर मिट्टी मिले, क्योंकि आगे को तेरा दास यहोवा को छोड़ और किसी ईश्‍वर को होमबलि या मेलबलि न चढ़ाएगा। 18एक बात यहोवा तेरे दास की क्षमा करे, कि जब मेरा स्वामी रिम्मोन के भवन में दण्डवत् करने को जाए, और वह मेरे हाथ का सहारा ले, और यों मुझे भी रिम्मोन के भवन में दण्डवत् करनी पड़े, तब यहोवा तेरे दास का यह काम क्षमा करे कि मैं रिम्मोन के भवन में दण्डवत् करूँ।” 19उसने उससे कहा, “कुशल से विदा हो।”


अरामी, नामान, धन्यवाद देने के लिए एलीशा के पास लौटते समय, वही काम करता है, जो यीशु ने दस कोढ़ियों में से एक को शुद्ध करने में किया था। वह इस्राएल के परमेश्‍वर की सामर्थ्य के बारे में आश्‍वस्त था, न केवल यह कि वह परमेश्‍वर है, बल्कि यह कि वह एकमात्र परमेश्‍वर है। यह एक अद्भुत अंगीकार है, परन्तु इसमें छिपे हुए गैर-यहूदी संसार के दु:ख के बारे में एक दु:खद संदेश है। इसका अर्थ है कि जिन राष्ट्रों के कई देवता थे, उनके पास वास्तव में कोई परमेश्‍वर ही नहीं था, परन्तु वे संसार में परमेश्‍वर के बिना थे। उसने पहले सोचा था कि अराम का देवता, रिम्मोन उन देवताओं के प्रमुख होने के नाते, देवता था, परन्तु अब इस्राएल में उसके साथ हुए अनुभव ने इस गलती को ठीक कर दिया था, और अब वह जानता था कि केवल इस्राएल का परमेश्‍वर ही परमेश्‍वर है। चँगाई की दया और आश्‍चर्यकर्म ने उसे गहराई से प्रभावित किया और वह सच्चे परमेश्‍वर का उपासक बन गया। परमेश्‍वर की बचाने या चँगा करने की सामर्थ्य के बारे में सबसे अच्छी तरह वही व्यक्ति बता सकता है, जिसने स्वयं इसका अनुभव किया हो। वह एलीशा भविष्यद्वक्ता का आभारी था और उसे उपहार अर्थात् भेंट देना चाहता था, जैसे कि यह कहना, 'तू सच्चे परमेश्‍वर के सेवक है और तेरा और तेरे परमेश्‍वर का सम्मान करने के लिए, मेरे पास तेरे लिए चाँदी और वस्त्रों का उपहार है, जो कुछ भी तू स्वीकार करना चाहता है, कर ले।' उसने चँगाई को महत्व दिया और आनन्द के साथ इसके लिए भुगतान करेगा। परन्तु एलीशा ने उदारता से भेंट लेने से इनकार कर दिया, हालाँकि उसे स्वीकार करने का आग्रह किया; और, उसे मनाने के आगे के प्रयासों को रोकने के लिए, एलीशा ने एक शपथ के साथ अपने इनकार का समर्थन किया। "नबी ने उत्तर दिया, "यहोवा जिसके सम्मुख मैं उपस्थित रहता हूँ उसके जीवन की शपथ मैं कुछ भेंट न लूँगा।" और भले ही नामान ने उसे उकसाया, परन्तु तौभी उसने मना कर दिया। ऐसा इसलिए नहीं था कि उसे इसकी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वह बहुत ज्यादा निर्धन था, और जानता था कि भविष्यद्वक्ताओं के पुत्रों के लाभ के लिए इसके साथ क्या करना है। न ही उसने इसे इसलिए अस्वीकार किया था, क्योंकि वह इसे गलत समझता था, क्योंकि अन्य अवसरों पर उसे उपहार मिलते थे, परन्तु वह किसी अरामी के प्रति बाध्य नहीं होना चाहता था, या उसे यह कहने की अनुमति नहीं देना चाहता था कि उसने एलीशा को धनी बनाया था। 


उसने स्पष्ट रूप से सोचा कि इस नए बदले हुए जन को यह दिखाना परमेश्‍वर के सम्मान के लिए बहुत अधिक होगा कि इस्राएल के परमेश्‍वर का सेवक इस संसार के धन के लिए उत्सुक नहीं था। यह नामान को और भी अधिक गहराई से प्रभावित कर सकता है कि इस्राएल में उसके अतिरिक्त कोई परमेश्‍वर नहीं था! मेरा मानना है कि आज परमेश्‍वर के सेवकों के लिए यहाँ एक सबक है। यदि कोई हमें पैसे देता है, तो परमेश्‍वर से पूछें कि क्या यह उसे प्राप्त करने का समय है या नहीं। गलातियों 6:6 जो लोग परमेश्‍वर के वचन में सिखाए जाते हैं, उन्हें शिक्षा के लिए भुगतान करना चाहिए या किसी तरह से परमेश्‍वर के सेवक को लाभ पहुँचाने के लिए कुछ देना चाहिए। यह कहता है, "जो वचन की शिक्षा पाता है, वह सब अच्छी वस्तुओं में सिखानेवाले को भागी करे।" इसलिए किसी ऐसे व्यक्ति से उपहार प्राप्त करना सदैव गलत नहीं होता है, जो हमारी सेवकाई से लाभान्वित होता है, परन्तु एलीशा के उदाहरण से पता चलता है कि ऐसे समय आएँगे, जब यह उचित नहीं होगा। परमेश्‍वर हमें बताए कि उपहारों को स्वीकार करना है या नहीं। और निश्‍चित रूप से हमें यह सीखना चाहिए कि परमेश्‍वर की किसी सेवा या आश्‍चर्यकर्म से जो हमें मिल सकता है ,उसे पाने में व्यस्त न रहें।


यह एक अद्भुत मिशनरी कहानी है। हम सामान्य रूप से इसे आकर्षण द्वारा मिशन के रूप में संदर्भित करते हैं। शीबा की रानी के अपने कई प्रश्नों के साथ सुलैमान से मिलने आने की कहानी एक और उदाहरण है। अधिकांश समय मिशनरी सेवा करने के लिए लोग विदेश जाते हैं, परन्तु एलीशा और सुलैमान को उनके पास आने वालों की सेवा करके अंतर-सांस्कृतिक, अंतर्राष्ट्रीय मिशन करने के अवसर मिले। आज, जब अंतर्राष्ट्रीय छात्र विदेश से और विकसित देश में अपनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते हैं, तो स्थानीय मसीहियों के पास भी ऐसा ही अवसर होता है। नामान को इस्राएल के परमेश्‍वर की उपासना में परिवर्तित कर दिया गया था। वह न केवल अपनी वर्तमान चँगाई के लिए परमेश्‍वर को एक बलिदान देगा, बल्कि वह संकल्प लेता है कि वह कभी भी किसी अन्य परमेश्‍वर को बलिदान नहीं देगा। वचन 17 में कहा गया है, "अच्छा, तो तेरे दास को दो खच्‍चर मिट्टी मिले, क्योंकि आगे को तेरा दास यहोवा को छोड़ और किसी ईश्‍वर को होमबलि या मेलबलि न चढ़ाएगा...।" यह उसके कुष्ठ रोग की एक आनन्दमय चँगाई थी, जिसने उसे उसकी मूर्तिपूजा से भी ठीक किया, जो निश्‍चित रूप से और भी अधिक खतरनाक, विनाशकारी और संक्रामक बीमारी थी... सब अधिक खतरनाक, क्योंकि यह अक्सर अपरिचित हो जाता है या यहाँ तक कि स्पष्ट रूप से बताए जाने पर इनकार कर दिया जाता है।


परन्तु यहाँ कुछ महत्वपूर्ण सबक दिए गए हैं, जिन्हें बुद्धिमान और संवेदनशील एलीशा ने सही ढंग से संभाला। नामान ने कहा कि वह न केवल इस्राएल के परमेश्‍वर की आराधना करेगा, बल्कि अपने निर्णय को स्मरण रखने के लिए, वह अपनी आराधना करने के तरीके को बदल देगा। खुले तौर पर यह घोषणा करना कि वह सच्चे परमेश्‍वर का उपासक था, वह इस्राएल से अधिक से अधिक मिट्टी ले जाएगा और जब वह घर वापस जाएगा, तो वह सच्चे परमेश्‍वर की आराधना करने के लिए उस पर खड़ा हो सकता था या घुटने टेक सकता था। यह नहीं कहता कि वह एक वेदी का निर्माण करेगा, परन्तु यह कहता है कि वह उतनी ही मिट्टी लेगा, जितनी दो खच्चर ले जा सकते हैं। ओह! अभी कुछ समय पहले ही उसने इस्राएल के जल के बारे में अपमानजनक बात की थी, परन्तु अब वह अपनी धुन बदल देता है और इस्राएल की मिट्टी को बहुत अधिक महत्व देता है। नि:सन्देह, हम जानते हैं कि आराधना के उद्देश्यों के लिए मिट्टी को अराम में ले जाने का यह प्रयास अनावश्यक था, क्योंकि सारी मिट्टी के सच्चे परमेश्‍वर की आराधना किसी भी भूमि पर कहीं भी की जा सकती है और सारी पृथ्वी प्रभु यहोवा की और उसकी पूर्णता है, परन्तु एलीशा के द्वारा नए बदले हुए लोगों के साथ इस तरह से काम करना बुद्धिमान था, ताकि उन्हें हतोत्साहित करने के बजाय प्रोत्साहित किया जा सके।


हो सकता है कि नामान को अनुस्मारक की आवश्यकता हो या उसके मन में भी एलीशा के पड़ोस से स्मारिका का आनन्द रहे। ओह! शायद नबी के लिए उसका स्नेह और सम्मान, उपचार के आश्‍चर्यकर्म के कारण और जब एलीशा ने चाँदी और वस्त्रों को अस्वीकार कर दिया था, तो उसने जिस उदाहरण को देखा था, उसने उसे, कहने के लिए, उसी मिट्टी से प्रेम किया, जिस पर वह चलता था और उसमें से कुछ अपने साथ घर ले जाना चाहता था। आज इसके समतुल्य आधुनिक प्रशंसा कुछ इस तरह होगी, "कृपया, महोदय, क्या मैं आपके साथ एक सेल्फी ले सकता हूँ? नामान के अनुरोध के अगले पहलू की सराहना करने के लिए अंतर-सांस्कृतिक विषयों की कुछ समझ और सोच की आवश्यकता होती है। एक कार्य, व्यवहार या घटना का अर्थ अभिनेता के दिमाग में होता है; गतिविधि की प्रकृति में उतना नहीं है, जितना कि जब वह कार्य करता है, तो व्यक्ति के दिमाग में क्या चल रहा होता है। नामान रिम्मोन की पूजा नहीं करना चाहता था, परन्तु उसकी आधिकारिक जिम्मेदारियों में अपने स्वामी की सहायता करना शामिल था, जब उसका स्वामी रिम्मोन की पूजा करता था। उसके लिए यह अनुरोध करना कि वह अपने कर्तव्य का पालन करने में सक्षम हों, एक बुद्धिमानी भरा अनुरोध था। वह अपने मन में आराधना करने नहीं वाला था, परन्तु वह अपने स्वामी की सहायता करने वाला था, क्योंकि अपने स्वामी की सहायता करना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा था। उसके स्वामी के पास पसन्द करने की उतनी ही शक्ति थी, जितनी उसके पास थी। वह स्वयं उस परमेश्‍वर को चुनता है, जिसकी वह सेवा करना चाहता है और उसके स्वामी को भी वही स्वतंत्रता थी और वह शायद रिम्मोन को चुनना जारी रखेगा। इसलिए नामान ने दरबार में अपने स्थान के कर्तव्य के अनुसार, रिम्मोन के घर में, अपने स्वामी, राजा के अधीनता में झुकने की स्वतंत्रता अपने लिए सुरक्षित रखी। नामान स्वीकार करता है कि इस्राएल के परमेश्‍वर के उपासक के लिए रिम्मोन के मंदिर में झुकना आदर्श नहीं है, परन्तु निवेदन करता है कि अपने आधिकारिक पद पर रहते हुए, वह ऐसा नहीं कर सकता है। 


वह मूर्ति देवता रिम्मोन का सम्मान करने की कोशिश नहीं करता है, परन्तु केवल राजा के सम्मान में, और इसलिए उसे अपेक्षा है कि परमेश्‍वर उसे क्षमा कर देगा। यह कि भविष्यद्वक्ता ने कहा "कुशल से विदा हो” मुझे बताता है कि अनुरोध ठीक था और इस बुद्धिमान भविष्यद्वक्ता ने नामान की बात को पहचानकर अशांत पानी पर तेल डाला और उसे इसके बारे में चिंता न करने के लिए कहा। परमेश्‍वर व्यावहारिक है। दूसरी ओर, यदि, परमेश्‍वर के साथ हमारे बदले हुए संबंध में, हम किसी भी ज्ञात पाप के लिए अपवाद बनाते हैं, जिसे वे करना जारी रखना चाहते हैं, तो इसे परमेश्‍वर के किसी भी सेवक द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाना चाहिए। हम सभी को, यहाँ तक कि हाल ही में मन परिवर्तन करने वालों को भी, अपने सभी अपराधों को त्यागना चाहिए और रिम्मोन के किसी भी देवालय में जाना भी नहीं चाहिए।

हालाँकि हमें अपने किए हुए पापों की क्षमा के लिए प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, फिर भी, यदि हम भविष्य में किसी भी पाप में जाने की अनुमति माँगते हैं, तो हम परमेश्‍वर को ठट्ठों में उड़ाते हैं, और स्वयं को धोखा देते हैं। हममें से कोई भी जो दरबार में किसी स्थान या किसी अन्य प्रकार के कार्य को छोड़ना नहीं जानता है, जब वे परमेश्‍वर के विरुद्ध पाप किए बिना इसे नहीं रख सकते हैं, और अपनी अंतरात्मा को गलत समझते हैं, तो वे परमेश्‍वर के अनुग्रह को उचित रूप से महत्व नहीं देते हैं, उसे नहीं समझते हैं या उसकी सराहना नहीं करते हैं; वे जानबूझकर पाप में आगे बढ़ते हुए इसका तिरस्कार करते हैं। जो लोग वास्तव में बुराई से घृणा करते हैं, वे बुराई के सभी रूपों से बचना सुनिश्‍चित करेंगे। हालाँकि इस विषय में नामान की स्थिति ने कुछ पर्यवेक्षकों के मन में एक प्रश्न पैदा किया होगा, या हम में जो इस कहानी को पढ़ते हैं, फिर भी किसी भी देवता को कोई बलिदान नहीं देने के उसकी प्रतिज्ञा के कारण केवल इस्राएल के परमेश्‍वर को इस अरामी के साथ एक बड़ा बिंदु प्राप्त हुआ। क्योंकि, इस विषय में क्षमा माँगने से, उसने मुद्दों के बारे में जागरूकता और इतने उच्च स्तर के दृढ़ विश्‍वास और अंतर्दृष्टि को दिखाया, यह किसी भी पर्यवेक्षक को नामान के निरंतर सुधार के लिए वर्तमान आशा देगा। इसलिए नबी ने उसे रिहा कर दिया और उसे "कुशल से विदा हो" के लिए कहा। नए मन परिवर्तित लोगों को हमारे प्रोत्साहन की आवश्यकता है।


2. 2 राजा 5:19ब-27, वह उसके यहाँ से थोड़ी दूर चला गया था, 20कि परमेश्‍वर के भक्‍त एलीशा का सेवक गेहजी सोचने लगा, “मेरे स्वामी ने तो उस अरामी नामान को ऐसे ही छोड़ दिया है कि जो वह ले आया था उसको उसने न लिया, परन्तु यहोवा के जीवन की शपथ मैं उसके पीछे दौड़कर उससे कुछ न कुछ ले लूँगा।” 21तब गेहजी नामान के पीछे दौड़ा। नामान किसी को अपने पीछे दौड़ता हुआ देखकर, उससे मिलने को रथ से उतर पड़ा और पूछा, “सब कुशल क्षेम तो है?” 22उसने कहा, “हाँ, सब कुशल है; परन्तु मेरे स्वामी ने मुझे यह कहने को भेजा है, कि ‘एप्रैम के पहाड़ी देश से भविष्यद्वक्‍ताओं के चेलों में से दो जवान मेरे यहाँ अभी आए हैं, इसलिये उनके लिये एक किक्‍कार चाँदी और दो जोड़े वस्त्र दे।” 23नामान ने कहा, “खुशी से दो किक्‍कार ले ले।” तब उसने उससे बहुत विनती करके दो किक्‍कार चाँदी अलग थैलियों में बाँधकर, दो जोड़े वस्त्र समेत अपने दो सेवकों पर लाद दिया, और वे उन्हें उसके आगे आगे ले चले। 24जब वह टीले के पास पहुँचा, तब उसने उन वस्तुओं को उनसे लेकर घर में रख दिया, और उन मनुष्यों को विदा किया, और वे चले गए। 25तब वह भीतर जाकर, अपने स्वामी के सामने खड़ा हुआ। एलीशा ने उससे पूछा, “हे गेहजी, तू कहाँ से आता है?” उसने कहा, “तेरा दास तो कहीं नहीं गया।” 26उसने उससे कहा, “जब वह पुरुष इधर मुँह फेरकर तुझ से मिलने को अपने रथ पर से उतरा, तब से वह पूरा हाल मुझे मालूम था; क्या यह समय चाँदी या वस्त्र या जैतून या दाख की बारियाँ, भेड़–बकरियाँ, गाय–बैल और दास–दासी लेने का है? 27इस कारण से नामान का कोढ़ तुझे और तेरे वंश को सदा लगा रहेगा।” तब वह हिम–सा श्‍वेत कोढ़ी होकर उसके सामने से चला गया।


नामान, एक अरामी, राजा के दरबार का एक प्रतिष्ठित सदस्य और एक सैनिक था, जिसके पास कई सेवक थे, और हमने पहले, 13वें वचन में पढ़ा था कि वे कितने बुद्धिमान और भले थे—विशेषकर तब, जब उनका स्वामी इस बात पर क्रोधित हो गया था कि एलीशा ने उसे यरदन नदी में स्नान करने के लिए कहा था। उस वचन में कहा गया है, "तब उसके सेवक पास आकर कहने लगे, “हे हमारे पिता, यदि भविष्यद्वक्‍ता तुझे कोई भारी काम करने की आज्ञा देता, तो क्या तू उसे न करता? फिर जब वह कहता है कि स्‍नान करके शुद्ध हो जा, तो कितना अधिक इसे मानना चाहिए?" इसके विपरीत, एक पवित्र भविष्यद्वक्ता, परमेश्‍वर का एक जन, एलीशा के पास केवल एक सेवक है, और वह कहानी के इस हिस्से में एक मुख्य पात्र के रूप में, झूठ बोलने वाला, स्वार्थी और सांसारिक व्यक्ति साबित होता है। परन्तु यह सेवक, जो लगातार उनके सामने खड़ा रहता था और यदि वह ध्यान देता, तो एलीशा की बुद्धिमत्ता को सुन सकता था, उसे उन अच्छे प्रभावों से, जिनका वह लाभ उठा सकता था, शायद ही कोई मूल्यवान चीज मिली। ऐसा लगता है कि एलीशा की शिक्षा और आश्‍चर्यकर्मों से इस व्यक्ति को कोई लाभ नहीं हुआ। 


किसी को अपेक्षा रही होगी कि एलीशा का सेवक एक अच्छा व्यक्ति होगा। यहाँ तक कि अहाब का सेवक, ओबद्याह भी था, परन्तु तब हम सभी जानते हैं कि यीशु के पास भी उसके अनुयायियों में यहूदा था। यह एक गहरा सत्य है कि अनुग्रह का साधन अनुग्रह नहीं दे सकता है। सबसे अच्छे लोग, सबसे अच्छे सेवक अक्सर अपने आस-पास ऐसे होते हैं, जो उनके लिए दु:ख और शर्म की बात होते हैं। कुछ लोग कलीसिया में रहते हैं, परन्तु परमेश्‍वर से दूर रहते हैं। बुद्धिमान लोगों अर्थात् ज्योतिषियों के एक समूह ने नए राजा यीशु को खोजने के लिए पूर्व से एक लंबी यात्रा की, परन्तु उस समय यरूशलेम में रहने वाले विद्वानों ने, जिन्होंने उन्हें बैतलहम जाने के लिए कहा था, यहाँ तक कि इब्री भविष्यद्वक्ताओं के उन विद्वानों ने भी बैतलहम की 10 किलोमीटर की यात्रा नहीं की।

गेहजी का पाप जटिल था। धन का प्रेम, जो सभी बुराइयों की जड़ है, उसके मूल में था। उसके स्वामी ने नामान के खजाने को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, परन्तु गेहजी को लालच आ गया। गेहजी ने नामान की छाती में डाले जाने वाले वस्त्रों और चाँदी के धन की कल्पना की, और उसे उसमें से कुछ लेने के लिए उसके पीछे भागना पड़ा। बाइबल यह नहीं कहती कि धन रखना गलत है। वास्तव में, बाइबल के सिद्धांतों का, जब आज्ञाकारी रूप से पालन किया जाता है, तो धन होने की ओर ले जाता है। परन्तु बाइबल कहती है कि हमें इससे प्रेम नहीं करना चाहिए। गेहजी ने नामान के उपहार को अस्वीकार करने के लिए अपने स्वामी को दोषी ठहराया, उसे चाँदी और बढ़िया वस्त्र न लेने में मूर्ख बताया। 


गेहजी इस अजनबी के प्रति एलीशा की दया और उदारता से ईर्ष्या करता था, हालाँकि यह उस नए मन परिवर्तित व्यक्ति की आत्मा की भलाई के लिए था। गेहजी ने सोचा कि वह अपने स्वामी से अधिक बुद्धिमान है। जब नामान, एक उदार और अच्छे व्यवहार वाले व्यक्ति की तरह, गेहजी से मिलने के लिए अपने रथ से उतरा, तो गेहजी ने उसे जानबूझकर झूठ बोला, कि उसके स्वामी ने उसे उसके पास भेजा था, और इसलिए उसे अपने लिए वह शिष्टाचार मिला, जो नामान ने एलीशा के लिए इरादा किया था। गेहजी ने अपने स्वामी का अपमान किया, और नामान के सामने उसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया, क्योंकि उसने जल्द ही अपना मन बदल लिया था, वह अस्थिर था, जो अपने मन को नहीं जानता था, जो कुछ कहता था और फिर उसे उलट देता था, शपथ खाता था और फिर पीछे हटने की कोशिश करता था, जो कहता था कि क्या सम्मानजनक था और फिर उसे बदल देता था।


भविष्यद्वक्ताओं के कथित दो पुत्रों की उसकी कहानी उतनी ही अवास्तविक थी, जितनी कि झूठी थी। यदि वह दो युवा धर्मी विद्वानों के लिए कुछ माँगना चाहता, तो निश्‍चित रूप से एक तोड़े चाँदी से कहीं कम मात्रा भी उनके लिए एक बड़ा वरदान साबित हो सकती थी। नामान एक नया मन परिवर्तित व्यक्ति था और यहाँ अपनी मूर्खता और लालच में, गेहजी ने नामान को उस जीवन रक्षक, जीवन बदलने वाले विश्‍वास से अलग करने का जोखिम उठाया, जो उसे अभी-अभी मिला था। गेहजी के लालच ने नामान की इस बारे में अच्छी राय को आसानी से बदल दिया होगा – अर्थात् उसके नए विश्‍वास को। नामान प्रतिक्रिया दे सकता था, जैसा कि पौलुस के शत्रुओं ने किया था, इसके बारे में पौलुस ने 2 कुरिन्थियों 12:16, 17 में क्या लिखा था। "ऐसा हो सकता है कि मैं ने तुम पर बोझ नहीं डाला, परन्तु चतुराई से तुम्हें धोखा देकर फँसा लिया! 17भला, जिन्हें मैं ने तुम्हारे पास भेजा, क्या उनमें से किसी के द्वारा मैं ने छल करके तुम से कुछ ले लिया?"


एलीशा ने नामान पर बोझ नहीं डाला था, परन्तु क्या एलीशा ने गेहजी को उससे लाभ पाने के लिए भेजा था? नि:सन्देह नहीं, और हम आशा करते हैं कि नामान बाद में समझ गया कि गेहजी ने जो किया, उसमें एलीशा की कोई भूमिका नहीं थी और यह कि गेहजी ने नामान से जो अन्यायपूर्ण रूप से लिया था, उसे बहाल करने के लिए मजबूर किया गया था। अन्यथा, यह नामान को फिर से अपने आदर्शों की ओर ले जा सकता था। गेहजी ने अपने पाप को छिपाने की कोशिश की, जिससे यह और बढ़ गया। (1.) उसने इसे छुपाया, जैसा कि आकान ने किया था। उसने अपने मन में सोचा कि वह इसके बारे में निश्‍चित था, और एक धोखाधड़ी के अपने प्रबंधन के बारे में अच्छी तरह से सोचा, जिसके द्वारा उसने नामान से लिया था और एलीशा की समझ की भावना का अपमान किया था, जैसा कि हनन्याह और सफीरा ने प्रेरितों के साथ किया था। (2.) उसने इनकार कर दिया। वह भीतर गया, और अपने स्वामी के सामने खड़ा हो गया, और उसके आदेश लेने के लिए तैयार हो गया। वह ऐसा लग रहा था कि वह अपने स्वामी की देखभाल कर रहा था, हालाँकि वास्तव में उसने उसे चोट पहुँचाई थी। उसके स्वामी ने उससे पूछा कि वह कहाँ था, "तेरा सेवक कहीं नहीं गया था।" एक झूठ के लिए अक्सर दूसरे की आवश्यकता होती है और उस तरह का पाप सदैव नीचे की ओर होता है।


गेहजी ने सोचा कि वह भविष्यद्वक्ता को धोखा दे सकता है, परन्तु जल्द ही समझ गया कि भविष्यद्वाणी के आत्मा को धोखा नहीं दिया जा सकता है, और यह कि पवित्र आत्मा से झूठ बोलना व्यर्थ था। एलीशा उसे बता सकता था कि उसने क्या किया था, भले ही उसने इसका खंडन किया था। छिपाए रखने की आशा के साथ पाप में शामिल होना मूर्खता है। क्या आप जहाँ कहीं भी जाते हैं, वहाँ परमेश्‍वर की दृष्टि आपके साथ नहीं जाती? नीतिवचन 12:19 कहता है, "सच्‍चाई सदा बनी रहेगी, परन्तु झूठ पल ही भर का होता है।" हम नहीं जानते कि वह अपनी गलत तरीके से अर्जित दो तोड़े चाँदी का क्या करना चाहता था। इतने पैसे से वह जमीन और मवेशी खरीद सकता था। वह एलीशा की सेवा छोड़ सकता था, और अपने लिए तैयार हो सकता था। क्या उसे इस बात का एहसास नहीं था कि सांसारिक लोगों की सभी मूर्ख आशाएँ और स्वार्थी प्रयास परमेश्‍वर के सामने खुले हैं।

एलीशा गेहजी को बताता है कि उसने जो किया वह बुरा था। वचन 26 हमें बताता है कि एलीशा ने क्या कहा, "जब वह पुरुष इधर मुँह फेरकर तुझ से मिलने को अपने रथ पर से उतरा, तब से वह पूरा हाल मुझे मालूम था; क्या यह समय चाँदी या वस्त्र या जैतून या दाख की बारियाँ, भेड़–बकरियाँ, गाय–बैल और दास–दासी लेने का है?" दूसरे शब्दों में, 'क्या यह स्वयं को समृद्ध करने का अवसर है? क्या आप पैसे कमाने के लिए अपने स्वामी को धोखा देने और एक नए मन परिवर्तित हुए व्यक्ति के सामने गंभीर अड़चन डालने से उत्तम कोई मार्ग नहीं खोज सकते थे? जो लोग किसी भी समय धन प्राप्त करने के लिए होते हैं, और किसी भी तरह से और कैसे भी, चाहे वह कठिन हो या आसान, सही हो या गलत, स्वयं को बहुत अधिक प्रलोभन में डाल देते हैं। 1 तीमुथियुस 6:9 कहता है, "पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा और फंदे और बहुत सी व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फँसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डुबा देती हैं।" जो कोई भी मसीही सेवकाई में शामिल होने का विकल्प चुनता है, उसे धनी बनने की महत्वाकांक्षा को छोड़ देना चाहिए। अच्छा, कड़ा परिश्रम, ईमानदारी से भरा काम सराहनीय है, परन्तु फिर भी हमें अपने उद्देश्य की जाँच करनी चाहिए। हम विश्राम करते हैं, ताकि हम उत्तम रीति से काम कर सकें और अधिक पैसा कमा सकें, ताकि हम उत्तम रीति से सेवा कर सकें। जॉन वैस्ली ने कहाः "जितना हो सके उतना कमाएँ, जितना हो सके उतना बचाएँ और जितना हो सके उतना दें।" यह अच्छा प्रबंधन लगता है।


गेहजी को उसके पाप की दण्ड कैसे मिलेगा? वचन 27 कहता है, "इस कारण से नामान का कोढ़ तुझे और तेरे वंश को सदा लगा रहेगा।” तब वह हिम–सा श्‍वेत कोढ़ी होकर उसके सामने से चला गया।" गेहजी अपने वंशजों को भूमि और पशु देने की अपेक्षा कर रहा था, परन्तु इसके बजाय वह पीढ़ी दर पीढ़ी अपने उत्तराधिकारियों को एक घृणित बीमारी पहुँचाएगा। स्पष्ट रूप से दण्ड को तुरन्त निष्पादित कर दिया गया था; जितना जल्दी कहा गया था, उतना जल्दी नहीं किया गया था। अब उसके ऊपर यह कलंक है और वह बदनाम हो जाता है। वह जहाँ भी जाता है, अपने ऊपर शर्म का निशान रखता है। वह अपने आप को और अपने परिवार को एक अभिशाप से भर देता है, जो न केवल वर्तमान के लिए उसकी बुराई की घोषणा करेगा, बल्कि इसकी स्मृति को सदैव के लिए स्थिर रखेगा।


नीतिवचन 21:6 कहता है, "जो धन झूठ के द्वारा प्राप्‍त हो, वह वायु से उड़ जाने वाला कुहरा है, उसके ढूँढ़नेवाले मृत्यु ही को ढूँढ़ते हैं।" जो लोग धोखाधड़ी और अन्याय से धन प्राप्त करते हैं, वे इसमें किसी भी विश्राम या स्थायित्व की अपेक्षा नहीं कर सकते। गेहजी को कैसे लाभ हुआ, हालाँकि उसने अपने लिए दो तोड़े प्राप्त किए, जबकि इससे उसने अपना स्वास्थ्य, सम्मान, शांति, रोजगार खो दिया, और यदि पश्चाताप ने इसे नहीं रोका, तो वह भी अपनी आत्मा को सदैव के लिए खो देगा? 


क्योंकि शिक्षाओं की इस श्रृँखला का उद्देश्य मसीही अगुवों को उत्तम अगुवा बनने में सहायता करना है, इस अध्याय में हमारा सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष गेहजी के बारे में नहीं होगा, बल्कि एलीशा के बारे में होगा और इस बड़े अगुवा ने गेहजी विषय को कैसे निपटारा किया। 


उसने गेहजी को ऐसे ही नहीं जाने दिया, बल्कि उसके द्वारा किए गए पाप के लिए उसे जवाबदेह ठहराया। क्या हम उस अच्छी आदर्श से सीख सकते हैं?