दानिय्येल, आदर्श मध्यस्थ

अध्याय तैंतालीस


दानिय्येल 9:1-19

Ron Meyers

1मादी क्षयर्ष का पुत्र दारा, जो कसदियों के देश पर राजा ठहराया गया था, 2उसके राज्य के पहले वर्ष में, मुझ दानिय्येल ने शास्त्र के द्वारा समझ लिया कि यरूशलेम की उजड़ी हुई दशा यहोवा के उस वचन के अनुसार जो यिर्मयाह नबी के पास पहुँचा था, कुछ वर्षों के बीतने पर अर्थात् सत्तर वर्ष के बाद पूरी हो जाएगी। 3तब मैं अपना मुख प्रभु परमेश्‍वर की ओर करके गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करने लगा, और उपवास कर, टाट पहिन, राख में बैठकर वरदान माँगने लगा। 4मैं ने अपने परमेश्‍वर यहोवा से इस प्रकार प्रार्थना की और पाप का अंगीकार किया, “हे प्रभु, तू महान् और भययोग्य परमेश्‍वर है, जो अपने प्रेम रखने और आज्ञा माननेवालों के साथ अपनी वाचा को पूरा करता और करुणा करता रहता है, 5हम लोगों ने तो पाप, कुटिलता, दुष्‍टता और बलवा किया है, और तेरी आज्ञाओं और नियमों को तोड़ दिया है। 6तेरे जो दास नबी लोग, हमारे राजाओं, हाकिमों, पूर्वजों और सब साधारण लोगों से तेरे नाम से बातें करते थे, उनकी हम ने नहीं सुनी। 7हे प्रभु, तू धर्मी है, परन्तु हम लोगों को आज के दिन लज्जित होना पड़ता है, अर्थात् यरूशलेम में निवास करनेवाले सब यहूदियों को, क्या समीप, क्या दूर के सब इस्राएली लोगों को, जिन्हें तू ने उस विश्‍वासघात के कारण जो उन्होंने तेरे साथ किया था, देश देश में तितर–बितर कर दिया है, उन सभों को लज्जित होना पड़ता है। 8हे यहोवा, हम लोगों ने अपने राजाओं, हाकिमों और पूर्वजों समेत तेरे विरुद्ध पाप किया है, इस कारण हम को लज्जित होना पड़ता है। 9परन्तु, यद्यपि हम अपने परमेश्‍वर प्रभु से फिर गए, तौभी तू दयासागर और क्षमा की खान है। 10हम तो अपने परमेश्‍वर यहोवा की शिक्षा सुनने पर भी उस पर नहीं चले जो उसने अपने दास नबियों से हमको सुनाई। 11वरन् सब इस्राएलियों ने तेरी व्यवस्था का उल्‍लंघन किया, और ऐसे हट गए कि तेरी नहीं सुनी। इस कारण जिस शाप की चर्चा परमेश्‍वर के दास मूसा की व्यवस्था में लिखी हुई है, वह शाप हम पर घट गया, क्योंकि हम ने उसके विरुद्ध पाप किया है। 12इसलिये उसने हमारे और न्यायियों के विषय जो वचन कहे थे, उन्हें हम पर बड़ी विपत्ति डालकर पूरा किया है; यहाँ तक कि जैसी विपत्ति यरूशलेम पर पड़ी है, वैसी सारी धरती पर और कहीं नहीं पड़ी। 13जैसे मूसा की व्यवस्था में लिखा है, वैसे ही यह सारी विपत्ति हम पर आ पड़ी है, तौभी हम अपने परमेश्‍वर यहोवा को मनाने के लिये न तो अपने अधर्म के कामों से फिरे, और न तेरी सत्य बातों पर ध्यान दिया। 14इस कारण यहोवा ने सोच विचारकर हम पर विपत्ति डाली है; क्योंकि हमारा परमेश्‍वर यहोवा जितने काम करता है उन सभों में धर्मी ठहरता है; परन्तु हम ने उसकी नहीं सुनी। 15अब, हे हमारे परमेश्‍वर, हे प्रभु, तू ने अपनी प्रजा को मिस्र देश से, बली हाथ के द्वारा निकाल लाया और अपना ऐसा बड़ा नाम किया, जो आज तक प्रसिद्ध है, परन्तु हम ने पाप किया है और दुष्‍टता ही की है। 16हे प्रभु, हमारे पापों और हमारे पुरखाओं के अधर्म के कामों के कारण यरूशलेम की और तेरी प्रजा की, हमारे आस पास के सब लोगों की ओर से नामधराई हो रही है; तौभी तू अपने सब धर्म के कामों के कारण अपना क्रोध और जलजलाहट अपने नगर यरूशलेम पर से उतार दे, जो तेरे पवित्र पर्वत पर बसा है। 17हे हमारे परमेश्‍वर, अपने दास की प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनकर, अपने उजड़े हुए पवित्रस्थान पर अपने मुख का प्रकाश चमका; हे प्रभु, अपने नाम के निमित्त यह कर। 18हे मेरे परमेश्‍वर, कान लगाकर सुन, आँख खोलकर हमारी उजड़ी हुई दशा और उस नगर को भी देख जो तेरा कहलाता है; क्योंकि हम जो तेरे सामने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करते हैं, वह अपने धर्म के कामों पर नहीं, वरन् तेरी बड़ी दया ही के कामों पर भरोसा रखकर करते हैं। 19हे प्रभु, सुन ले; हे प्रभु, पाप क्षमा कर; हे प्रभु, ध्यान देकर जो करना है उसे कर, विलम्ब न कर; हे मेरे परमेश्‍वर, तेरा नगर और तेरी प्रजा तेरी ही कहलाती है; इसलिये अपने नाम के निमित्त ऐसा ही कर।”


दानिय्येल अध्याय 8 के अंत में, दानिय्येल राजा के काम में लगा हुआ था; परन्तु यहाँ हम देखते हैं कि वह किसी भी राजा की तुलना में उत्तम काम में लगा हुआ थाः अर्थात् परमेश्‍वर से बात करना और उससे सुनना, न केवल अपने लिए, बल्कि उस समय इस्राएल के लिए। आज हम इस्राएल और कलीसिया दोनों के लिए प्रार्थना करते हैं। यह दारा मादी के पहले वर्ष में हुआ, जिसे कसदियों का नया राजा बनाया गया था, बेबीलोन पर उसके और उसके भतीजे, या पोते, क्षयर्ष ने अभी-अभी विजय प्राप्त की थी। इस वर्ष यहूदियों की सत्तर वर्ष की कैद समाप्त हो गई, परन्तु उनकी रिहाई की राजाज्ञा स्पष्ट रूप से अभी तक सार्वजनिक रूप से जारी नहीं की गई थी। ऐसा लगता है कि परमेश्‍वर से दानिय्येल की यह प्रार्थना उसी वर्ष तैयार हो गई थी, और संभवतः, शेरों की मांद में डाले जाने से पहले भी वह इस तरह से प्रार्थना कर रहा था। अध्याय 9 में जिन विषयों के बारे में वह प्रार्थना करता है, क्या वह प्रार्थना जारी रखने के लिए एक शक्तिशाली प्रलोभन नहीं होता, हालाँकि इससे उन्हें अपने प्राण गंवाने पड़े।


वह पुस्तकों से समझ गया कि सत्तर वर्ष इस्राएल की कैद और यरूशलेम के विनाश के लिए निर्धारित समय था। यह पुस्तक यिर्मयाह की भविष्यद्वाणियों की एक पुस्तक होती, जिसमें उसने पाया था कि यह स्पष्ट रूप से यिर्मयाह 29:10 में भविष्यद्वाणी की गई थी। "यहोवा यों कहता है : बेबीलोन के सत्तर वर्ष पूरे होने पर मैं तुम्हारी सुधि लूँगा, और अपना यह मनभावना वचन कि मैं तुम्हें इस स्थान में लौटा ले आऊँगा, पूरा करूँगा।" यह मानते हुए कि 70 वर्षों की गणना पहली कैद से की जानी है, यहोयाकीम के तीसरे वर्ष में, जो वह कैद थी, जिसमें दानिय्येल स्वयं को ले जाया गया था, अब 70 वर्ष बाद, जब वह यिर्मयाह में अगले वचनों को पढ़ता है, तो वह बहुत अधिक प्रेरित होगा। अगले वचन, यिर्मयाह 29:11-14, कहते हैं, "11क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन् कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा। 12तब उस समय तुम मुझ को पुकारोगे और आकर मुझ से प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूँगा। 13तुम मुझे ढूँढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे। 14मैं तुम्हें मिलूँगा, यहोवा की यह वाणी है, और बँधुआई से लौटा ले आऊँगा; और तुम को उन सब जातियों और स्थानों में से जिनमें मैं ने तुम को जबरन निकाल दिया है, और तुम्हें इकट्ठा करके इस स्थान में लौटा ले आऊँगा जहाँ से मैं ने तुम्हें बन्दी करवाके निकाल दिया था, यहोवा की यही वाणी है।" यह सारा देश सत्तर वर्ष तक उजाड़ (चोर्बत) पड़ा रहेगा, जो वही शब्द है, जिसका उपयोग दानिय्येल ने यहाँ वचन 2 में यरूशलेम के उजाड़ पड़ रहने के लिए किया है। 


इससे पता चलता है कि जब उसने यह लिखा था, तो उसके सामने (कम से कम उसके दिमाग में) वह भविष्यद्वाणी थी। हालाँकि दानिय्येल स्वयं एक बड़ा भविष्यद्वक्ता था, और परमेश्‍वर के दर्शनों से अच्छी तरह से परिचित था, फिर भी वह पवित्रशास्त्र का एक परिश्रमी छात्र था, और उसने सोचा कि यिर्मयाह की भविष्यद्वाणियों से परामर्श लेना उसके लिए कम नहीं था। वह एक बड़ा राजनेता था, और पृथ्वी पर सबसे बड़े राजाओं में से एक के लिए उसके देश का प्रधानमंत्री था, और फिर भी परमेश्‍वर के वचन के साथ बातचीत करने के लिए मन और समय दोनों ढूँढ लेता था। संसार के सबसे बड़े और सबसे अच्छे लोगों को स्वयं को अपनी बाइबल से ऊपर नहीं सोचना चाहिए। परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाओं का उद्देश्य, उनका स्थान लेने के लिए नहीं है, बल्कि प्रार्थनाओं को उत्तेजित करने और प्रोत्साहित करने के लिए है और जब हम देखते हैं कि उनकी पूर्ति का दिन निकट आ रहा है, तो हमें उन्हें हमें देने के लिए परमेश्‍वर से विनती करने के लिए उनका अधिक ईमानदारी से उपयोग करना चाहिए।


मेरे साथ वचन 3 में वर्णित इस प्रार्थना में दानिय्येल की तीव्रता को देखें, "तब मैं अपना मुख प्रभु परमेश्‍वर की ओर करके गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करने लगा, और उपवास कर, टाट पहिन, राख में बैठकर वरदान माँगने लगा।" अपने पापों और अपने लोगों के पापों के लिए परमेश्‍वर के सामने अपने गहरे अपमान में, और अपनी अयोग्यता की भावना में, जब वह प्रार्थना करता था, तो वह उपवास करता था, टाट पहनता था, और राख में लेट जाता था, यरूशलेम की बर्बादी और एक मध्यस्थ के रूप में अपने काम की तात्कालिकता से स्वयं को प्रभावित करने से कहीं अधिक। निश्‍चित रूप से हम जिस प्रार्थना की जाँच करने वाले हैं, वह ऐसा कुछ नहीं थी, जिससे दानिय्येल ने केवल एक बार प्रार्थना की थी। निश्‍चित रूप से ये अनुरोध कुछ ऐसे थे, जिनके लिए उसने अक्सर और लंबे समय तक प्रार्थना की। हमारे पास शायद दानिय्येल द्वारा दी गई लंबी मध्यस्थताओं वाली प्रार्थनाओं की एक रूपरेखा है। दानिय्येल की प्रार्थना उसकी सेवकाई की सबसे बड़ी केंद्रीय विशेषता थी।


उसने पाप स्वीकार करने के साथ आरम्भ किया। प्रत्येक प्रार्थना में हमें न केवल उन पापों को स्वीकार करना चाहिए, जिनके लिए हम दोषी रहे हैं, बल्कि परमेश्‍वर में हमारे विश्‍वास और उस पर निर्भरता, पाप के लिए हमारे दु:ख और उसके विरुद्ध हमारे संकल्पों को स्वीकार करना चाहिए। यही हमारा अंगीकार होना चाहिए; अर्थात् हमारी अपनी गहरी धारणाओं और दृढ़ विश्‍वासों की भाषा। परमेश्‍वर के प्रति उसके विनम्र, गंभीर, श्रद्धापूर्ण संबोधन पर ध्यान दें, एक ऐसे परमेश्‍वर के रूप में जिससे डरना चाहिए, और जिसके प्रति सदैव भय में खड़ा रहना हमारा कर्तव्य हैः "हे प्रभु, तू महान् और भययोग्य परमेश्‍वर है।" वह एक ऐसा परमेश्‍वर है, जिस पर भरोसा किया जाना चाहिए, और जिस पर निर्भर रहना हमारा कर्तव्य है और जिस पर हम अपना भरोसा रखते हैंः वह एक है "जो अपने प्रेम रखने और आज्ञा माननेवालों के साथ अपनी वाचा को पूरा करता और करुणा करता रहता है" (वचन 4), यदि हम वाचा के अपने हिस्से का पालन करते हैं, तो वह अपने हिस्से को पूरा करने में विफल नहीं होगा। वह अपने लोगों के लिए अपने वचन के समान अच्छा होगा, क्योंकि वह उनके साथ वाचा बनाए रखता है, और उसकी प्रतिज्ञा का एक भी टुकड़ा भूमि पर नहीं गिरेगा। नहीं, वह अपने वचन से उत्तम होगा, क्योंकि वह हम पर दया करता है, जो वाचा में है, उससे कहीं अधिक है। 


दानिय्येल के लिए यह उचित था कि वह परमेश्‍वर की दया पर अपनी दृष्टि लगाए रखे, क्योंकि अब उसे अपने लोगों के दु:खों को परमेश्‍वर के सामने रखना था, और परमेश्‍वर की वाचा पर अब जब वह ईमानदारी से एक प्रतिज्ञा के निपटारे का आग्रह कर रहा था। प्रार्थना में हमें परमेश्‍वर की महानता और उसकी भलाई, उसकी संयुक्त महिमा और दया दोनों को देखना चाहिए। दानिय्येल ने कैसे प्रार्थना की? वचन 5, 6 में कहा गया है, "5हम लोगों ने तो पाप, कुटिलता, दुष्‍टता और बलवा किया है, और तेरी आज्ञाओं और नियमों को तोड़ दिया है। 6तेरे जो दास नबी लोग, हमारे राजाओं, हाकिमों, पूर्वजों और सब साधारण लोगों से तेरे नाम से बातें करते थे, उनकी हम ने नहीं सुनी।"

जब हम राष्ट्रीय दया के लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करते हैं, तो हमें राष्ट्रीय पापों के लिए उनके सामने स्वयं को विनम्र करना चाहिए। ये वे पाप हैं, जिन पर दानिय्येल यहाँ विलाप करता है; और हम यहाँ उन विभिन्न प्रकार के शब्दों का अवलोकन कर सकते हैं, जिन्हें वह उनके पापों की अधिकता को व्यक्त करने के लिए उपयोग करता है। दानिय्येल व्यक्तिगत रूप से इन पापों के लिए स्वयं दोषी नहीं था, परन्तु वह स्वयं को एक प्रतिनिधि के स्थान पर रखता है और समूह की ओर से पापों को स्वीकार करता है, हालाँकि उसने स्वयं परमेश्‍वर की उपेक्षा नहीं की थी। यह प्रतिनिधि वाली प्रार्थना है। किसी और के लिए प्रार्थना करना और स्वयं को उनके स्थान पर रखना और उनकी ओर से ऐसी बातें कहना, जो उन्हें कहना चाहिए, परन्तु शायद नहीं कह रहे हैं। यीशु प्रतिनिधि के रूप में हमारे लिए पीड़ित हुआ और हम प्रतिनिधि के रूप में प्रार्थना कर सकते हैं; किसी और के बजाय, किसी और की ओर से।


दानिय्येल की पूरी प्रार्थना में यही दृष्टिकोण मिलता है और यदि हम इस प्रार्थना से और कुछ नहीं सीखते हैं, तो हम सीख सकते हैं कि मध्यस्थ स्वयं को दूसरों की ओर से अनुरोध करने की स्थिति में रखते हैं। यदि हम इस नबी से कुछ सीखना चाहते हैं, जो हमें उत्तम मसीही अगुवा बनने में सहायता कर सकता है, तो आइए इसे सीखें। हम आसानी से देख सकते हैं कि इस प्रार्थना में "हम" और "हमारे" शब्द कितनी बार आए हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि दानिय्येल दूसरों की ओर से मध्यस्थता कर रहा था। क्या आप ऐसा करने के लिए तैयार हैं? दानिय्येल स्वीकार करता है कि उसने उन स्पष्ट नियमों का उल्लंघन किया था, जो परमेश्‍वर ने उन्हें मूसा द्वारा दिए थेः वचन 10 कहता है, "हम तो अपने परमेश्‍वर यहोवा की शिक्षा सुनने पर भी उस पर नहीं चले जो उसने अपने दास नबियों से हमको सुनाई।" दानिय्येल पाप की प्रकृति की बात करता है, कि यह व्यवस्था का उल्लंघन है। परमेश्‍वर ने अपनी विधियों को हमारे सामने स्पष्ट रूप से और हमारे आगे रखा है, एक लेखे के रूप में जिसे हमें देखना और पालन करना चाहिए, फिर भी हम उन पर नहीं चले हैं, बल्कि अलग हो गए हैं, या पीछे हट गए हैं।


उसने कहा कि उन्होंने उन उचित चेतावनियों को अनेदखा कर दिया था, जो परमेश्‍वर ने उन्हें भविष्यद्वक्ताओं द्वारा दी थी, जिसे हर युग में उसने उन्हें वचन 6 के रूप में भेजा था, जिसे हम अभी पढ़ते हैं, बोलते हैं। उसने ईमानदारी से अपने भविष्यद्वक्ताओं को हमारे पास भेजा, परन्तु हमने नहीं सुना। परमेश्‍वर के दूतों को ठट्ठों में उड़ाना, और उनके शब्दों का तिरस्कार करना, मानो यरूशलेम के माप - भरने वाले पाप जैसे थे, जैसा कि 2 इतिहास 36:16 में कैद में जाने से ठीक पहले इस्राएल का वर्णन करने के लिए दर्ज किया गया था। "परन्तु वे परमेश्‍वर के दूतों को ठट्ठों में उड़ाते, उसके वचनों को तुच्छ जानते, और उसके नबियों की हँसी करते थे। अत: यहोवा अपनी प्रजा पर ऐसा झुँझला उठा कि बचने का कोई उपाय न रहा।" दानिय्येल की इस प्रार्थना के दौरान पाप का अंगीकार करने वाले कथन दोहराया जाता है। उसने इस पर दृढ़ता से जोर दिया; पश्चाताप करने वालों को बार-बार स्वयं पर दोष लगाना चाहिए और स्वयं को तब तक नीचा दिखाना चाहिए, जब तक कि वे अपने मन को पूरी तरह से टूटा हुआ नहीं पाते। वचन 11 में कहा गया है, "वरन् सब इस्राएलियों ने तेरी व्यवस्था का उल्‍लंघन किया, और ऐसे हट गए कि तेरी नहीं सुनी। इस कारण जिस शाप की चर्चा परमेश्‍वर के दास मूसा की व्यवस्था में लिखी हुई है, वह शाप हम पर घट गया, क्योंकि हम ने उसके विरुद्ध पाप किया है।" यही पाप स्वीकार करने का तरीका है। यही प्रार्थना करने का तरीका है।  यह इस्राएल है, परमेश्‍वर का दावा करने वाले लोग, जो बड़ी अच्छी तरह से जानते हैं, और जिनसे उत्तम की अपेक्षा की जाती है - इस्राएल, परमेश्‍वर के विशिष्ट लोग, जिन्हें उसने अपने अनुग्रह से घेर लिया है; यहाँ और वहाँ एक नहीं, बल्कि यह सारा इस्राएल है, उसकी व्यापकता, लोगों की देह, जिन्होंने परमेश्‍वर से दूर जाने और उससे हटने का अपराध किया है, ताकि वे न सुन सकें, और ताकि वे उसके शब्द को न पहचान सकें। 


वचन 13 कहता है, "जैसे मूसा की व्यवस्था में लिखा है, वैसे ही यह सारी विपत्ति हम पर आ पड़ी है, तौभी हम अपने परमेश्‍वर यहोवा को मनाने के लिये न तो अपने अधर्म के कामों से फिरे, और न तेरी सत्य बातों पर ध्यान दिया।" इस अवज्ञा को सभी सच्चे पश्चातापी सबसे सही ढंग से स्वीकार करते हैं। परमेश्‍वर धर्मी है, हमने आज्ञा नहीं मानीः "इस कारण यहोवा ने सोच विचारकर हम पर विपत्ति डाली है; क्योंकि हमारा परमेश्‍वर यहोवा जितने काम करता है उन सभों में धर्मी ठहरता है; परन्तु हम ने उसकी नहीं सुनी" (वचन 14)। हमने गलत किया, "अब, हे हमारे परमेश्‍वर, हे प्रभु, तू ने अपनी प्रजा को मिस्र देश से, बली हाथ के द्वारा निकाल लाया और अपना ऐसा बड़ा नाम किया, जो आज तक प्रसिद्ध है, परन्तु हम ने पाप किया है और दुष्‍टता ही की है।" यदि हम दया चाहते हैं, और निश्‍चित रूप से हम करते हैं, तो हमें अपने पापों को स्वीकार करना चाहिए और दूसरों के पापों को सामने से स्वीकार करना चाहिए।

दानिय्येल की पुस्तक में उन पर लाए गए सभी दण्डों में परमेश्‍वर की धार्मिकता की आत्म-अपमानजनक स्वीकृति शामिल है। यह सदैव सच्चे पश्चातापियों का मार्ग है कि वे परमेश्‍वर को सही ठहराएँ, ताकि जब वह न्याय करे, तो वे स्पष्ट हो सके, और पापी को सारा दोष दिया जा सके। वह स्वीकार करता है कि यह पाप था, जिसने उन्हें इन सभी परेशानियों में डुबो दिया। इस्राएल आसपास के सभी देशों में फैला हुआ था, और उनके बीच कमजोर, निर्धन और उजागर था। परमेश्‍वर के हाथ ने उन्हें इधर-उधर खदेड़ दिया था, कुछ को ऐसे स्थानों पर, जहाँ वे पहचाने जाते थे और इसलिए अधिक शर्मिंदा थे, अन्यों दूर स्थानों पर, जहाँ वे नहीं जाने जाते थे और इसलिए अधिक त्यागे हुए थे, और यह सब उनके अपने जानबूझकर किए गए अपराध के कारण हुआ था।


उन्होंने अन्यजातियों के साथ अपने आप को मिला लिया, ताकि वे उनके द्वारा पापी बनाए जाएँ, और अब परमेश्‍वर उन्हें अन्यजातियों के साथ मिलाता है, ताकि वे उनके द्वारा निर्धन बनाए जा सकें। दानिय्येल इसमें परमेश्‍वर की धार्मिकता को स्वीकार करता है, कि वह उन पर जो कुछ भी लाया था, उसमें उसने उनके साथ कोई बुराई नहीं की थी, बल्कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया था, जिसके वे योग्य थे। ऐसा लगता है कि वह उसी विचार का अनुसरण कर रहा है, जो यिर्मयाह ने विलापगीत 1:18 में व्यक्त किया था, "यरूशलेम ने बड़ा पाप किया, इसलिये वह अशुद्ध स्त्री सी हो गई है; जितने उसका आदर करते थे वे उसका निरादर करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी नंगाई देखी है; हाँ, वह कराहती हुई मुँह फेर लेती है।"


दानिय्येल उन पर जो कुछ आया था, उसमें पवित्रशास्त्र की पूर्ति को देखता है। यह उनकी परेशानियों में परमेश्‍वर को उचित ठहराता है, कि उसने उन्हें केवल व्यवस्था से संबंधित दण्ड दिया, जिसमें उसने उन्हें अग्रिम उचित सूचना दी थी। परमेश्‍वर की सच्चाई और पवित्रता के सम्मान को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था। उसने उनसे कई बार कहा था कि यदि वे न्याय नहीं करेंगे—और दुष्टों के लिए आतंक नहीं बनेंगे—तो उन्हें यह कार्य अपने हाथों में लेना ही पड़ेगा, और वह ऐसा अवश्य करेगा; और अब उसने अपनी कही हुई बात को सच साबित कर दिया है, हम पर एक ऐसी बड़ी विपत्ति लाकर, जिसमें स्वयं राजा और अधिपति भी गहरे रूप से लिप्त थे। परमेश्‍वर के हाथ के न्याय उसके मुँह के न्यायों के अनुरूप हैं। जैसा कि दानिय्येल परोक्ष रूप से प्रार्थना करता है, फिर भी वह पूरे देश को, सबसे ऊँचे से लेकर सबसे निचले तक, शर्मिंदा करता है; और यदि वे केवल उसकी प्रार्थना के लिए आमीन कहेंगे, जैसा कि उन्हें कहना चाहिए, यदि वे इसके लाभ में भाग लेना चाहते हैं, तो उन सभी को अपने मुँह पर अपना हाथ रखना चाहिए, और मिट्टी में अपना मुँह छिपा लेना चाहिए। यदि इस्राएल ने केवल अपने चरित्र को बनाए रखा होता, और एक पवित्र लोगों को बनाए रखा होता, तो व्यवस्थाविवरण 16:19 में मूसा के शब्द पूरे होते। "तुम न्याय न बिगाड़ना; तू न तो पक्षपात करना; और न तो घूस लेना, क्योंकि घूस बुद्धिमान की आँखें अन्धी कर देती है, और धर्मियों की बातें पलट देती है।" 


परन्तु इस्राएल के अपने पाप ने उसे मुसीबत में डाल दिया था। ऐसा लगता है कि दानिय्येल कह रहा है, ''हम मारे गए हैं, परन्तु हमें मारने वाले के पास नहीं लौटे हैं। हमने परमेश्‍वर के साथ मेल-मिलाप करने और उसके साथ मेल-मिलाप करने की कोई परवाह नहीं की।'' दानिय्येल ने अपने भाइयों के लिए लगातार प्रार्थना करने का एक अच्छा उदाहरण रखा, परन्तु उसे यह देखकर खेद हुआ कि उसके उदाहरण का अनुसरण करने वाले कितने कम थे। उनके दुःख में यह अपेक्षा की गई थी कि वे परमेश्‍वर को जल्दी ढूँढेंगे, ताकि वे अपने अधर्म के कामों से फिर सकें और उसकी सच्चाई को समझ सकें, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।


यदि मनुष्यों को परमेश्‍वर की सच्चाई को समझने और उसकी सामर्थ्य और अधिकार के अधीन होने के लिए उचित रूप से लाया जाता, तो वे अपने मार्गों की गलतियों से फिर जाते। क्योंकि हम पिघले नहीं हैं, इसलिए उसने हमें अभी भी भट्टी में रखा है, और उस पर दृष्टि लगाए रखी है, ताकि इसे और अधिक भड़काया जा सके। जब परमेश्‍वर न्याय करेगा, तो वह जीत जाएगा, और अपनी सभी कार्यवाहियों में न्यायसंगत ठहरेगा। वह जीत जाएगा। हम इससे बच नहीं सकते। आज की हिन्दी भाषा में दानिय्येल का विचार कुछ इस तरह का हो सकता हैः ''अपने आप को विनम्र करना, अपने पाप और उसकी भलाई को स्वीकार करना और इसके साथ किया जाना उत्तम है।''


इसके बाद, हम परमेश्‍वर की दया के लिए एक आग्रह करते हैं। यह उनके लिए कुछ सांत्वना है कि परमेश्‍वर पापों को क्षमा करने के लिए सदैव तैयार रहा है। निर्धन पापियों के लिए यह स्मरण रखना बहुत उत्साहजनक है कि दया परमेश्‍वर की ओर से है, क्योंकि यह स्मरण रखना उनके लिए आश्‍वासन और विनम्रता है कि धार्मिकता उसकी है। यदि वे सुनते और स्मरण करते तो वे जानते कि यशायाह 55:7 में क्या लिखा हैः "दुष्‍ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्‍वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।" परमेश्‍वर में बहुत सारी दया हैं, और न केवल दया बल्कि क्षमा भी है; वह क्षमा करने वाला परमेश्‍वर है। इसी तरह यह उनके लिए एक समर्थन है कि वे स्मरण रखें कि परमेश्‍वर ने पहले उन्हें मिस्र से बाहर निकालकर अपनी महिमा की थी।

वचन 15 कहता है, "अब, हे हमारे परमेश्‍वर, हे प्रभु, तू ने अपनी प्रजा को मिस्र देश से, बली हाथ के द्वारा निकाल लाया और अपना ऐसा बड़ा नाम किया, जो आज तक प्रसिद्ध है, परन्तु हम ने पाप किया है और दुष्‍टता ही की है।" इसमें एक संकेत है कि मिस्र से छुड़ाने वाला परमेश्‍वर उन्हें बेबीलोन और फारसी कैद से भी छुड़ा सकता है। दानिय्येल तर्क देता हैः "तू पहले अपने लोगों को एक शक्तिशाली भुजा के साथ मिस्र से बाहर ले आया था, और अब क्या तू उसी शक्तिशाली भुजा के साथ से उन्हें बेबीलोन से बाहर नहीं निकालेगा? क्या वे तब एक लोगों, एक राष्ट्र के रूप में गठित हुए थे, और क्या वे अब सुधार और नए रूप में नहीं बनेंगे? क्या वे अब पापी और अयोग्य हैं, और क्या वे तब ऐसे नहीं थे? क्या उनके अत्याचारी अब शक्तिशाली और अभिमानी हैं, और क्या वे तब नहीं थे? और क्या परमेश्‍वर ने नहीं कहा कि बेबीलोन से उनका उद्धार मिस्र से भी अधिक हो जाएगा?"


क्योंकि यिर्मयाह 16:14, 15 कहता है, "14फिर यहोवा की यह वाणी हुई : "देखो, ऐसे दिन आनेवाले हैं जिनमें फिर यह न कहा जाएगा, ‘यहोवा जो इस्राएलियों को मिस्र देश से छुड़ा ले आया उसके जीवन की सौगन्ध,’ 15वरन् यह कहा जाएगा, ‘यहोवा जो इस्राएलियों को उत्तर के देश से और उन सब देशों से जहाँ उसने उनको बँधुआ कर दिया था छुड़ा ले आया, उसके जीवन की सौगन्ध।’ क्योंकि मैं उनको उनके निज देश में जो मैं ने उनके पूर्वजों को दिया था, लौटा ले आऊँगा।"" इस तर्क का बल हैः "तूने हमें मिस्र से बाहर निकालकर, आज के रूप में, आज भी, अपने आप को प्रसिद्ध कर लिया है। बेबीलोन में हमें नष्ट होने देने से क्या तू इसका श्रेय खो देगा? क्या तू उस मुक्ति से प्रसिद्ध नहीं हुआ, जिसे हम अक्सर स्मरण करते हैं, और क्या तू अब इस से प्रसिद्ध नहीं होगा, जिसके लिए हमने अक्सर प्रार्थना की है, और जिसके लिए हमने लंबे समय तक प्रतीक्षा की है?" दानिय्येल परमेश्‍वर के सामने अपने विषय पर बहस कर रहा है। परमेश्‍वर चाहता है कि हम उसके साथ प्रार्थना में मल्लयुद्ध करें।


अब उसकी विनतियाँ क्या हैं? उसके अनुरोध? कि परमेश्‍वर अपने क्रोध को उनसे दूर कर देगा। "तू अपने सब धर्म के कामों के कारण अपना क्रोध और जलजलाहट अपने नगर यरूशलेम पर से उतार दे, जो तेरे पवित्र पर्वत पर बसा है (वचन 16)। वह उनकी बँधुवाई से वापसी के लिए प्रार्थना नहीं करता (परमेश्‍वर को उनके साथ वैसा ही करने दें, जैसा उसकी दृष्टि में अच्छा लगता है), परन्तु वह पहले परमेश्‍वर के क्रोध को दूर करने के लिए प्रार्थना करता है। कारण (क्रोध) को हटा दें और प्रभाव (विनाश) समाप्त हो जाएगा। वह पूछता है कि परमेश्‍वर उन पर अपने मुख का प्रकाश चमकाएगा। "हे मेरे परमेश्‍वर, तेरा नगर और तेरी प्रजा तेरी ही कहलाती है; इसलिये अपने नाम के निमित्त ऐसा ही कर।" यदि क्रोध समाप्त हो जाता है और परमेश्‍वर के मुख का प्रकाश उपस्थित है, तो परमेश्‍वर को वह करने दिया जाए, जिसे वह चाहता है। यह, भाइयों और बहनों की शक्तिशाली प्रार्थना है। आइए मध्यस्थता करना सीखें, परमेश्‍वर के क्रोध को दूर करें और परमेश्‍वर का मुख चमकने दें। यदि हम ऐसा करते हैं, तो परमेश्‍वर बाकी काम करेगा।


आदर्श मध्यस्थ दानिय्येल ने ऐसा किया। उसका उदाहरण और परिणाम हमें बताते हैं कि मध्यस्थता कैसे की जाती है।